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पायलट की मुश्किल उड़ान

सचिन जब लोकसभा सदस्य बने, तब वह मात्र 26 वर्ष के थे। लेकिन, पांच वर्षों के भीतर ही उनके समक्ष नई चुनौतियां खड़ी हो गईं। परिसीमन के बाद दौसा को अनुसूचित जनजाति निर्वाचन क्षेत्र घोषित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने एक नया निर्वाचन क्षेत्र (अजमेर) चुना, जहां से वह चुने गए थे।

दिसंबर के चुनावों में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सांसद सी. पी. जोशी की हार के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पास विकल्पों का आभाव हो गया है। राजस्थान में मतदाता मोदी लहर से इस कदर प्रभावित हैं कि वहां कोई भी पार्टी जाति के नाम पर भी लोगों को लुभा नहीं पा रही है। शायद यही वजह है कि पार्टी को बद से बदत्तर होने से बचाने के लिए राहुल गांधी युवा चेहरे को मौका देना चाहते हैं। राजस्थान कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की मानें तो राहुल सचिन पायलट को पी.सी.सी. के अध्यक्ष के रूप में पेश करना चाहते हैं। राहुल मानते हैं कि उनकी युवा सोच को एक युवा ही समझ सकता है व आगामी लोकसभा चुनावों में युवा जोश पार्टी की कुंडली बदल सकता है। राहुल का इरादा पार्टी में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को मौका देने का है, जिसका आधार जीत की अधिक संभावना है।

लोकसभा चुनावों में अभी तीन महीने का समय शेष है। ऐसे में सचिन पायलट का पी.सी.सी अध्यक्ष के रूप में सबसे महत्वपूर्ण काम आगामी चुनावों के लिए 25 युवा उम्मीदवारों की तलाश करना होगा। साथ ही पार्टी की डूबती नैया को बचाने और गिरते आत्मविश्वास को संभालने की चुनौती पर भी उन्हें विजय प्राप्त करनी होगी।

वसुंधरा राजे का राजस्थान की मुख्यमंत्री बनना अपने आप में एक विचित्र संयोग ही है। वसुंधरा का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ और राजस्थान के धौलपुर के शासक हेमंत सिंह से परिणय सूत्र में बंधने के साथ ही वह पूर्णत: राजस्थान की हो गईं। वहीं सचिन के लिए राजस्थान कमोबेश अपने पिता स्वर्गीय राजेश पायलट की तरह ही एक नया राज्य है। सचिन उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिला में जन्मे, पले व बड़े हुए। राजेश पायलट ने मेहनत कर राजस्थान को अपना चुनावी गढ़ बनाया था। उन्होंने राजस्थान से अपने पहले ही चुनाव में गुर्जरों के समर्थन से विजय प्राप्त की। तत्पश्चात उन्होंने गुर्जर बहुल संसदीय चुनाव क्षेत्र दौसा से चुनाव लड़ा। राजेश पायलट ने अनुसूचित जनजाति के मीणा समुदाय और गुर्जरों के समर्थन से अपने आप को राजस्थान में स्थापित किया। राजेश ने अपनी पत्नी और सचिन की मां रमा पायलट को भी चुनावी अखाड़े में उतारा था। दौसा के निकट सड़क हादसे में अपने पति राजेश को गंवाने के बाद वह दौसा से ही लोकसभा सीट जीतने में कामयाब रहीं। सन् 2004 के लोकसभा चुनावों में रमा ने सचिन की जीत की राह सुनिश्चित कर दी थी।

सचिन जब लोकसभा सदस्य बने, तब वह मात्र 26 वर्ष के थे। लेकिन, पांच वर्षों के भीतर ही उनके समक्ष नई चुनौतियां खड़ी हो गईं। परिसीमन के बाद दौसा को अनुसूचित जनजाति निर्वाचन क्षेत्र घोषित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने एक नया निर्वाचन क्षेत्र (अजमेर) चुना, जहां से वह चुने गए थे। लेकिन, इस बार के विधानसभा चुनावों में सचिन के लिए आश्चर्यजनक स्थिति बन गई है। कांग्रेस ने अपने विधानसभा क्षेत्र में भी सभी सीटें गंवा दी हैं। बावजूद इसके पार्टी ने सचिन को, जो खुद अपने गढ़ से हार चुके हैं, पी.सी.सी. का अध्यक्ष बनाया है। लेकिन, पार्टी के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। पार्टी के वरिष्ठ व दिग्गज नेता अशोक गहलोत और सी.पी. जोशी बुरी तरह नाकाम रहे हैं। गौरतलब है कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 200 में से कुल 21 सीटें ही जीत पाई है। पार्टी में निराशा का माहौल इस कदर है कि पार्टी विधायक दल की बैठक नतीजों के 40 दिन बाद भी नहीं हो सकी है। पी.सी.सी कार्यालय में मातम का माहौल था और पार्टी पूरी तरह से बिखरी हुई थी। हालात, इतने बुरे हो गए थे कि जो पार्टी जातिवाद खत्म करने का राग अलापती थी, उसी पार्टी ने सी.एल.पी. नेता के तौर पर एक जाट उम्मीदवार रामेश्वर दुडी को चुना। रामेश्वर पहली बार विधानसभा सदस्य बने हैं। इससे पहले वह एक बार लोकसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव सी. पी. जोशी सन् 2008 में कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने के बाद पी.सी.सी. अध्यक्ष चुने गए थे। माना जाता है कि वह इस बार भी अध्यक्ष बनने के इच्छुक थे और पार्टी की किस्मत बदलना चाहते थे। लेकिन राहुल गांधी के अनुसार पार्टी की हार की वजह युवाओं का भाजपा के साथ होना रहा है। यही वजह रही कि राहुल गांधी युवाओं को पार्टी से जोडऩा चाहते हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव संजय बापना कहते हैं – ‘देश की राजनीति फिलहाल बदलाव के दौर से गुजर रही है और दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सफलता इस बात का पुख्ता प्रमाण है। ‘आप’ ने जातिवाद की शरण में गए बगैर ही भ्रष्टाचार और मंहगाई के मुद्दों को उठाया और जीत हासिल की। कांग्रेस को यह समझना होगा कि जनता जाति आधारित राजनीति को सिरे से नकार चुकी है। ऐसी स्थिति में सचिन पायलट का चुना जाना एक प्रशंसनीय कदम है।’

लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हैं कि राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विरूद्ध अपनी पार्टी से अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवार खड़े किए थे। शिवराज सिंह चौहान अन्य पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, तो उनके विरूद्ध मध्य प्रदेश से अरूण यादव को पी.सी.सी. अध्यक्ष के तौर पर मौका दिया गया है। वहीं वसुंधरा राजे की जाट परिवार में शादी के कारण वो एक जाट हैं। जाट भी अन्य पिछड़ा वर्ग का माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सचिन को एक गुर्जर के तौर पर और अन्य पिछड़ा वर्ग का हिस्सा मानते हुए पी.सी.सी. का अध्यक्ष नियुक्तकिया गया है।

वहीं कांग्रेस के पुराने नेताओं का मानना है कि सचिन की नियुक्ति से मीणा समुदाय पार्टी से नाराज हो जाएगा। गौरतलब है कि मीणा समुदाय को गुर्जर समुदाय का दुश्मन माना जाता है। गुर्जर जब अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग कर रहे थे, तब मीणा समुदाय ने उनका काफी विरोध किया था। गुर्जर आंदोलन के दौरान दोनों गुटों में हिंसा भी भड़की, जिसमें 65 लोगों की जान गईं। लेकिन, दौसा में हुई इस शर्मनाक हिंसा के बाद सचिन ने दोनों गुटों के बीच शांति स्थापित की। मीणा समुदाय सचिन की इज्जत करता है, वहीं कांग्रेस के पक्ष वाले मीणा हर हाल में सचिन के साथ हैं।

अचंभित करने वाली बात है कि मीणा समुदाय ने डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की पार्टी आर.जे.पी. को अपना समर्थन न के बराबर दिया। पार्टी मात्र चार सीटें ही जीत पाई, जिसमें अनुसूचित जाति की एक सीट थी। अत: सचिन के सामने मीणा और गुर्जर, दोनों समुदायों को पार्टी से जोड़े जाने की चुनौती भी है क्योंकि ये दोनों समुदाय मिलकर निर्वाचनक्षेत्र के सात प्रतिशत भाग में फैले हुए हैं।

सन् 2009 में कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए 25 में से 21 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी। इसका मुख्य कारण भाजपा का निराशाजनक प्रदर्शन रहा था। इसी वजह से उसे हार का सामना भी करना पड़ा। वहीं वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 79 सीटें जीती थी। 79 सीटें कुछ बुरी या बहुत अच्छी नहीं थीं। लेकिन, पार्टी की हार का एक मुख्य कारण पार्टी द्वारा वापसी की उम्मीद छोड़ देना भी रहा। कांगे्रस की हालत तो इससे भी खराब रही। वह मात्र 21 सीटें ही जीत पाई। ऐसे में सचिन के समक्ष बड़ी चुनौतियां हैं। पी.सी.सी. की प्रवक्ता अर्चना शर्मा के अनुसार- ‘चुनावी नतीजों से साफ है कि कांगे्रस पार्टी सात से आठ सीटों पर विजयश्री हासिल करेगी। विधानसभाओं की सभी सीटों के मत प्रतिशत के आधार पर मुझे लगता है पार्टी अभी इस स्थिति में है कि वह अपनी हालत में सुधार कर लोकसभा में सात से आठ सीटों पर जीत हासिल कर सकेगी। ऐसा करने के लिए पार्टी को सही जगह पर सही उम्मीदवार को मौका देना होगा।’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस बात से खफा हैं। गुटों में बंटी पार्टी के लिए वापस मुडऩा, वह भी बिना अनुभवी नेताओं की मदद के, टेढ़ी खीर है। हालांकि, गहलोत ने इस फैसले का स्वागत किया है। वह खुद मानते हैं कि पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद महत्वपूर्ण जगहों पर योग्य उम्मीदवार को ही आना चाहिए। पार्टी में गहलोत को भारी समर्थन प्राप्त है और अगर सचिन को उनका समर्थन नहीं मिला तो सचिन की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। केवल सचिन की नियुक्ति ही गहलोत के प्रभुत्व और रूढि़वादी परंपरा को समाप्त करने के लिए काफी नहीं है। इस पर विडंबना यह है कि सचिन के पास ऐसा करने के लिए केवल तीन महीने ही शेष हैं।

सचिन ने अपने आप को बिल्कुल अपने पिता के व्यक्तित्व के अनुरूप ढाला है। यहां तक कि उनका पहनावा भी उनके पिता जैसा ही है। धोती-कुर्ते के साथ पगड़ी में भी सचिन को देखा जाना आम बात है। वार्टन बिजनेस स्कूल से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर चुके सचिन ने बी.बी.सी. और जनरल मोटर्स में भी कुछ वक्त तक काम किया था। आगामी आम चुनावों से पहले वह फिलहाल सपरिवार शिमला में छुट्टियां व्यतीत कर रहे हैं। सचिन स्वर्गीय मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाडिय़ा का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्होंने मात्र 37 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद की गरिमा बढ़ाई व 14 वर्ष तक राज्य की सेवा की। वह अशोक गहलोत का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उन्हें पी.सी.सी. का अध्यक्ष मात्र 34 वर्ष की आयु में ही बना दिया गया था। वह आगे कहते है – ‘मेरी नियुक्ति से वरिष्ठ व पुराने नेताओं को बुरा नहीं लगना चाहिए। मैं उनका हाथ पकड़कर अपनी चुनौतियों से लोहा लेना चाहता हूं। कोई भी राजनैतिक दल एकजुट होकर ही सफल हो सकता है, न कि किसी एक व्यक्तिविशेष की खामियों एवं उपलब्धियों को गिना कर।’

सचिन मानते हैं कि उनके पास समय कम है और उन्हें मीलों दूर का सफर तय करना है। वह जानते हैं कि पार्टी की दशा व दिशा को बदलने के लिए उन्हें कम से कम 20 लाख वोटरों का साथ चाहिए। पिछले लोकसभा चुनावों में पार्टी ने केवल 21 सीटें ही जीतीं थी। सचिन इस बात से भलिभांति अवगत हैं कि इस बार पार्टी 6 से 8 सीटें जीत सकती है और वह इस स्थिति को अमली जामा पहनाने की तैयारियों में लगे हुए हैं। अमेरिका के बिजनेस स्कूल से स्नातक की पढ़ाई का सचिन को अब भारत में न सिर्फ प्रयोग करना होगा, बल्कि चुनाव जीत कर बदलाव भी लाना होगा।

जयपुर से पी. बी. चंद्रा

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