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अब हरीश रावत को परखने का समय आया

विजय बहुगुणा के नेतृत्व में इस प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन में राज्य सरकार की नाकामी ने हरीश रावत को बहुगुणा को हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने की मांग का मौका दे दिया। बहुगुणा के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा की जा रही धीमी विकास के कारण लोगों में असंतोष और लोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी हाईकमान को राज्य का नेतृत्व बदलने का मजबूत कारण मिल गया।

राजनीति उठा-पटक के बीच मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाकर राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की ताजपोशी ने उत्तराखंड को राहत दिया है। बहुगुणा उत्तराखंड में पिछले साल जून में आए महाविनाशकारी आपदा के बाद, विकास कार्यों के धीमी रफ्तार के लिए आलोचना झेल रहे थे।

27 अप्रैल 1947 को अल्मोड़ा जिले के चौनालिया के नजदीक मोहनारी गांव के एक राजपूत परिवार में जन्मे रावत, 2002 और 2012 में दो बार असफलता का स्वाद चखने के बावजूद, मुख्यमंत्री बनने का सपना साकार करने में कामयाब रहे। लोकसभा चुनावों के कुछ महिने पहले पार्टी हाईकमान द्वारा राज्य में मुखिया का बदलाव करना, राज्य में पार्टी को मजबूत करने की दिशा में एक पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसके तहत एक मजबूत ठाकुर नेता से इतने कम समय में बेहतरीन नतीजे की उम्मीद की जा रही है।

बहुगुणा की अपेक्षा लोगों के अनुकूल निर्णय लेने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध 66 वर्षीय रावत से उम्मीद की जा रही है कि वे राज्य में सकारात्मक राजनीतिक बदलाव लाएंगे और आपदा प्रभावित राज्य में विकास कार्यों को और गति प्रदान करेंगे। उनके पूरवर्ती बहुगुणा को नौकरशाहों द्वारा निर्धारित निर्णयों को लागू करने वाला व्यक्ति के रूप में जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश से अलग कर बनाए गए उत्तराखंड के पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत अकेले ऐसे कांग्रेसी नेता हैं, जिनका राज्य के हर कोने में कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क है। अपने अच्छे संबंधों और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अन्य नेताओं के साथ नजदीकी संबंधों के लिए पहचाने जाने वाले रावत पार्टी के अंदर गुटबाजी को खत्म करने पर आमदा हैं और लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए सब को साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं।

आरक्षित घोषित किए जाने तक हरीश रावत अल्मोड़ा सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं। 2009 में पहली बार हरिद्वार संसदीय क्षेत्र से रिकॉर्ड एक लाख के अंतर से चुनाव जीतने वाले रावत राज्य के सबसे लोकप्रिय कांग्रेसी नेता के रूप में उभरे हैं। पिछले 25 सालों में पहली बार हरिद्वार लोकसभा सीट पर कांग्रेस की जीत थी।

पार्टी हाईकमान द्वारा जताए गए विश्वास के पूर्ति के लिए पहले कदम के रूप में हरीश रावत ने पार्टी के अंदर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों – पौड़ी गढ़वाल के कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य से हाथ मिलाया है। हालांकि आर्य ने हरीश रावत में अपनी आस्था जताई है, कुछ समय की बात है सतपाल महाराज भी उनके साथ खड़े होंगे। कुछ समय पहले हुई उत्तराखंड कांग्रेस विधायक दल की बैठक में रावत को मुख्यमंत्री चुने जाने पर मामूली विरोध हुआ था, जबकि पार्टी के ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं ने हरीश रावत को अपना समर्थन दिया था।

मुख्यमंत्री के रूप में रावत का उदय

मोहनारी में पले-बढ़े रावत ने जमीनी स्तर से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक अपने तरीके से काम किया। 1972 में ग्राम प्रधान के रूप में अपना राजनैतिक सफर की शुरूआत करने वाले लॉ ग्रेजुएट हरीश रावत, 1973 में ब्लॉक प्रमुख के रूप में चुने गए। उनके जीवन में बड़ा मौका 1977 में तब आया, जब हरीश रावत युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष चुने गए। इसी दौरान हरीश रावत संजय गांधी के करीब आए। संजय गांधी ने हरीश रावत का न सिर्फ राजनैतिक रूप से पालन-पोषण किया, बल्कि 1980 के लोकसभा चुनावों में उन्हें अल्मोड़ा से पार्टी का टिकट भी दिया।

युवा रावत अपने आलोचकों का मुंह बंद करते हुए तब लाईमलाईट आए, जब उन्होंने 1980 के चुनाव में अल्मोड़ा लोकसभा सीट से भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को अप्रत्याशित रूप से हराया। उन्होंने 1984 और 1989 के लोकसभा चुनावों में भी इस सीट को बरकरार रखा। हालांकि राम मंदिर की राजनीति के दौरान जब पूरे देश में एक लहर थी और इस नीति पर उनकी पार्टी का रूख स्पष्ट नहीं था, तब हरीश रावत को 1991, 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में लगातार हार का मुंह देखना पड़ा।

2009 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने अपने राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा खतरा उठाते हुए हरिद्वार सीट से चुनाव लड़ा। तब क्षेत्रों के परिसिमन के कारण अल्मोड़ा सीट को आरक्षित घोषित कर दिया गया था। लेकिन हरिद्वार सीट से उन्होंने न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि जीत के बाद मनमोहन सिंह सरकार में श्रम और रोजगार राज्य मंत्री भी बने। बाद में उन्हें संसदीय कार्य और खाद्य प्रसंस्करण का प्रभार मिला।

2012 के विधानसभा चुनावों के बाद भी पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए रावत को नकारते हुुए गढ़वाल से सांसद विजय बहुगुणा में विश्वास जताया था। हरीश रावत के प्रति कांग्रेस हाईकमान के विद्वेष से हैरान रावत के समर्थकों ने 18 दिनों तक नई दिल्ली में धरना दिया था। तब हरीश रावत को केन्द्र में जल संसाधन मंत्रालय का पद भार दिया गया था।

विजय बहुगुणा का पतन

पिछले साल जून में आए विनाशकारी आपदा के बाद, विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से हटाना उत्तराखंड की सबसे बड़ी घटना है। दावा किया जाता है कि 5 हजार लोगों की मौत और हजारों लोगों को लापता करने वाली और बड़े पैमाने पर तबाही फैलाने वाली प्राकृतिक आपदा का ताजा शिकार विजय बहुगुणा हुए हैं। विजय बहुगुणा के नेतृत्व में इस प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन में राज्य सरकार की नाकामी ने हरीश रावत को बहुगुणा को हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने की मांग का मौका दे दिया। बहुगुणा के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा की जा रही धीमी विकास के कारण लोगों में असंतोष और लोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी हाईकमान को राज्य का नेतृत्व बदलने का मजबूत कारण मिल गया।

राज्य में सड़क, पुल, पुलिया, स्कूल, कॉलेज आदि के पुनर्निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण प्रयासों की जरूरत है। तबाही से प्रभावित राज्य की बहुत बड़ी आबादी अभी भी अपने जीवन को स्थापित करने में मदद के लिए राज्य सरकार की तरफ देख रही है। बहुगुणा को हटाकर रावत को प्रदेश की कमान थमाने के पीछे पार्टी को यह उम्मीद है कि वे न सिर्फ विकास की गति में तेजी लाएंगे, बल्कि बहुगुणा सरकार से मोहभंग हुए लोगों के बीच पार्टी की सकारात्मक छवि भी प्रस्तुत करेंगे।

भावी चुनौतियां

पुनर्निर्माण में तेजी के अलावा हरीश रावत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, लोगों के बीच कांग्रेस की लोगों के अनुकूल पार्टी की छवि बनाना। निर्णायक आगामी लोकसभा चुनावों में सिर्फ कुछ ही महीने बचे हैं, ऐसे में रावत से राज्य में वांछित नतीजों के लिए किसी जादू की उम्मीद की जा रही है। कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के बीच खासी लोकप्रियता होने के बावजूद, सम्मानजनक चुनावी नतीजे हासिल करने के लिए रावत को आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा से कठिन लड़ाई लडऩी है।

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