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मृत्युदंड- वरदान या अभिशाप?

फांसी पर लटका कर व्यक्ति को सुधारना उद्देश्य नहीं है, हम उसके द्वारा दूसरों को चेतावनी दे कर सुधारते हैं।’’                 – मोंटेन

 मौत की सजा हमेशा उच्च भावनाएं पैदा करती रहीं हैं। मानवतावादियों के लिए मौत की सजा हमेशा से एक बहस का मुद्दा रही है। इस बहस ने मौत की सजा की प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं। संभवत: सार्वजनिक हंगामे के कारण मृत्युदंड के निष्पादन में अत्यधिक देरी ज्यादा प्रासंगिक है।

प्रतिशोध, निवारण, रोकथाम और पुनर्वास सहित सजा के नीतिगत सिद्धांतों में मृत्युदंड अपराध विज्ञान की सबसे निवारक फिलॉसफी है। सैमंड के अनुसार – ‘कानून में अपराध को ऐसे कार्य के रूप में परिभाषित किया गया है, जो समाज के लिए पूर्णत: हानिकारक है, यद्यपि इसका तत्काल शिकार एक व्यक्ति विशेष हो सकता है।’ अत: ‘एक हत्या मुख्य रूप से एक व्यक्तिको पीडि़त करती है, लेकिन मानवीय जीवन की जबरदस्त उपेक्षा स्थिति वहां पहुंचा देती है, जहां हत्यारा और पीडि़त परिवार के बीच मुआवजे की बात बेमानी हो जाती है।’ समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाले मामलों में मृत्युदंड दिया जाता है, ताकि संभावित अपराधियों के लिए यह निवारक का काम कर सके।

हमारे पास उपलब्ध सजाओं में मृत्युदंड, सजा का सबसे निवारक प्रारूप है। मौत की घटना विचलन को सुधारने में मदद करती है। हमारी न्याय प्रणाली द्वारा उपलब्ध कराई गई नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि सजा का यह कठोरतम रूप दुर्लभतम परिस्थितियों के लिए है, जिसमें समाज की अंतररात्मा को झकझोरने वाले जघन्य और विकृत अपराध शामिल हैं। देश की संप्रभुता और अखंडता पर किसी तरह का हमला, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा आदि ऐसे अपराध हैं, जो ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों के लिए कठोरतम दंड की मांग करते हैं।

मौत की सजा हमेशा उच्च भावनाएं पैदा करती रहीं हैं। मानवतावादियों के लिए मौत की सजा हमेशा से एक बहस का मुद्दा रही है। इस बहस ने मौत की सजा की प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं। संभवत: सार्वजनिक हंगामे के कारण मृत्युदंड के निष्पादन में अत्यधिक देरी ज्यादा प्रासंगिक है।

भारत उन देशों में से एक है, जहां जघन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड की सजा का विधिक रूप से प्रावधान है। व्यक्तिगत गरिमा और सामाजिक न्याय के महान् मूल्यों से निहित हमारा संविधान मानवीय मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था के अस्तित्व के सुखद मिलाप का प्रयास करता है। इसके निर्माताओं ने मृत्युदंड की प्रभावशीलता पर गहन विवेचना और तर्क के साथ विचार किया था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 72 और 161 के तहत क्रमश: राष्ट्रपति और राज्यपाल को माफी देने का अधिकार साबित करता है कि मृत्युदंड सजा का एक प्रारूप है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 विशेष तौर पर मौत की सजा की बात करता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में मौत को सजा के एक प्रारूप के रूप में चिन्हित किया गया है। भारतीय दंड संहिता कुछ असाधारण अपराधों के लिए मौत की सजा की हिमायत करती है। हत्या के अन्यान्यतम (रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर) मामलों में मौत की सजा दी जाती है। यह सजा के रूप में निम्नलिखित अपराधों के लिए भी दी जा सकती है :

  • भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेडऩे की स्थिति में (धारा 121)
  • विद्रोह को उकसाने के लिए (धारा 132)
  • झूठे साक्ष्य देने या गढऩे, जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा मिले (धारा 194)
  • हत्या करने के अपराधी (धारा 302)
  • किसी नाबालिग, पागल या नशे में धुत्त व्यक्तिको आत्महत्या करने के लिए उकसाने पर (धारा 305)
  • डकैती, जिसमें हत्या भी शामिल हो
  • (धारा 396)
  • आजीवन कारावास की सजा पाए किसी व्यक्तिपर जानलेवा हमला करने पर, जिसमें वह घायल हो जाए (धारा 307)

कई लोग मृत्युदंड के खिलाफ इसलिए लॉङ्क्षबग कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि सभ्य समाज में मृत्युदंड के लिए कोई जगह नहीं है और न ही कोई अनुभवजन्य ऐसे साक्ष्य हैं, जिनसे पता चले कि मृत्युदंड समाज के लिए कारगर है। उनका मानना है कि आपराधिक न्याय प्रणाली निर्बलताओं से ग्रस्त है और मृत्युदंड का प्रयोग वंचितों के खिलाफ किया जा सकता है। किसी मानवीय जीवन को मौत की सजा देने पर उनका हृदय खून के आंसू रोता है। इसके बावजूद मौत की सजा को स्थिर किया जा रहा है। किसी मानवीय जीवन की निरंतरता के खिलाफ निर्णय लेना कठिन है।

मृत्युदंड की सजा सिर्फ अन्यान्यतम (रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर) मामलों में दी जाती है। 1980 में बच्चन सिंह मामले में उच्चतम न्यायालय ने आजीवन कारावास को नियम और मृत्युदंड का अपवाद मानते हुए मृत्युदंड की गुंजाईश को बरकार रखा और इसे न्यायसंगत बनाने के लिए अन्यान्यतम (रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर) का सिद्धांत निष्पादित किया। मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार (1983) मामले में उच्चतम न्यायालय के तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मृत्युदंड देने के लिए निम्नलिखित मापदंडों को रखा।

  • अत्यन्त क्रूर, कठोर और भयानक तरीके से हत्या के मामले में
  • हत्या का उद्देश्य धन होने पर
  • अनुसूचित जाति या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की हत्या करने पर
  • किसी निर्दोष बच्चे, असहाय महिला या गणमान्य व्यक्तिकी हत्या करने पर

कोई निर्दोष इसका भुक्तभोगी न बने, इसके लिए सुनिश्चित किए गए रक्षात्मक उपाय ही इसे लागू करने में बाधा बन गए हैं। उच्चतम न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया में दशकों लग जाते हैं। तब प्राधिकारियों के पास दया याचिका शिथिल हो जाती है और इस दया याचिका के आधार पर क्षमादान देने या मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने के निर्णयों में देरी होती है। सूचना के अधिकार से यह जाहिर होता है कि गृह मंत्रालय द्वारा इसकी अनुशंसा करने में औसतन 2 वर्ष का समय लगता है। अफजल गुरू का मामला 4 वर्षों तक लटका रहा था।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट पीटिशन पर हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम् की अगुवाई में न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने गौर किया कि दया याचिकाओं के निस्तारण में विलंब अस्पष्ट और अनुचित है। इस पहलू पर विचार करना न्यायालय का कत्र्तव्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72/161 के तहत दया याचिका का अधिकार किसी कार्यकारी के विवेकाधिकार पर आधारित नहीं है। यह मौत की सजा पाए अपराधी का एक संवैधानिक अधिकार है। प्रत्येक संवैधानिक कत्र्तव्यों का निर्वाह उचित देखभाल और निष्ठा के साथ निश्चित रूप से होना चाहिए, अन्यथा संविधान के मूल्यों को कायम रखने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप होता रहेगा। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 72/161 द्वारा क्रमश: राष्ट्रपति और राज्यपाल को मिली शक्तियां, उनकी संवैधानिक बाध्यता है, विशेषाधिकार नहीं।

भुल्लर के मामले में उच्चतम न्यायालय ने 12 अप्रैल 2012 के अपने फैसले को पलटते हुए कहा – ‘न्यायालय का यही मानना है कि कार्यकारियों के हाथों होने वाली देरी अनुचित और अस्पष्ट है।’ उच्चतम न्यायालय ने 31 जनवरी 2014 को दिल्ली विस्फोट का मुजरिम आतंकी देवेन्दर पाल सिंह भुल्लर की फांसी पर रोक लगाते हुए दिल्ली और केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया और इस मामले में उनके विचार रखने के लिए कहा। राजीव गांधी हत्याकांड के सजायाफ्ता बंदियों के बारे में उच्चतम न्यायालय ने कहा – ‘वे मृत्युदंड के पात्र हैं, लेकिन सवाल यह है कि उन्हें कितने दिन तक एकांत कारावास में रखा जा सकता है।’ कैदियों की याचिका का विरोध करने वाली केन्द्र सरकार 4 फरवरी को अपना पक्ष रखेगी।

तथ्य यह है कि मृत्युदंड को बनाए रखने में मानवीय पीड़ा एक महत्वपूर्ण बिंदू है। सिर्फ मृत्युदंड में ही वो शक्ति है, जो किसी व्यक्ति में भय पैदा कर उसे नृशंस कार्यों को अंजाम देने से रोकता है। ऐसा कहकर मैं जानती हूं कि आपराधिक न्यायशास्त्र के सबसे निवारक सिद्धांतों की वकालत कर रही हूं। सिर्फ मृत्युदंड अकेला ही इस शक्ति संतुलन के लिए प्रभावकारी नहीं है। हमें आपराधिक न्याय तंत्र के कुशल कार्यों से समाज को निश्चित रूप से आश्वस्त करना है कि अपराध नहीं होगा। मृत्युदंड की समाप्ति एक बड़ी भूल होगी। इस तरह की भयंकर भूल मानवीय सौहाद्र्र हो खत्म करेगा। इसलिए यह मानवीय मूल्यों के फायदे के पक्ष में है और मानवीय जीवन के सामाजिक मूल्यों को बरकरार रखने में मृत्युदंड की वर्तमान परिकल्पना सहायक है।

दया संप्रभू का दायित्व है। अनुच्छेद 21 हमारे संविधान का मील का पत्थर है। हालांकि विवादास्पद प्रश्र तब खड़ा होता है, जब प्रणाली जान-बूझकर दया याचिकाओं के निपटारे में विलंब करे, जैसा कि अफजल गुरू के मामले में हुआ। और, दया याचिकाओं के निपटारे और आरोपियों को कहां तक छूट मिल सकती है, इसके बारे में किसी तरह की संवैधानिक पाबंदी नहीं है। दया याचिकाओं के निपटारे के लिए समय सीमा की व्याख्या की जा सकती है। यही सच्चा न्याय होगा।

पिंकी आनंद

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