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भारत में मृत्युदंड खत्म हो एक जान के बदले दूसरी जान लेना बदला है, न कि न्याय – बिशप डेसमंड टुटु

भारतीय कानूनी इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह न केवल कानूनी व्यवस्था के लिए, बल्कि देश व सभी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण फैसला है। जिस तरह का भारत का इतिहास रहा है, उसे देखते हुए एक प्रबुद्ध राष्ट्र अपनी परंपराओं, परमार्थ चिंतन, धर्म, नैतिकता एवं आचार नीति के साथ धोखा नहीं कर सकता तथा मृत्यु दंड की अनुमति नहीं दे सकता। भारत वेदों व उपनिषदों, बुद्ध, अशोक, गुरू नानक व महात्मा गांधी की भूमि है। बहुत कम लोकतांत्रिक देशों ने मृत्यु दंड बरकरार रखा है, जबकि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में अब भी मृत्यु दंड दिया जाता है। क्या मृत्यु दंड असभ्य, जंगली, प्रतिगामी व बदला लेने वाला नहीं है? यदि सरकार असरदार तरीके से कहती है कि किसी भी तरीके से जान लेना स्वीकार्य है, तो इससे उन लोगों एवं बच्चों को हम क्या संदेश देते हैं जो आतंक, हत्या, जुर्म की दुनिया में कदम रखने वाले हैं।

भारत के उच्चतम न्यायलय ने हत्या के 15 दोषियों की दया याचिकाओं में निर्णय करने में अनुचित विलंब के आधार पर मृत्यु दंड परिवर्तित कर एक बार फिर मृत्यु दंड का दायरा सीमित कर दिया है। जहां 13 दोषियों की दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति द्वारा निर्णय करने में विलंब के आधार पर उन्हें मिले मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया, वहीं 2 अन्य को इसलिए मृत्यु दंड दिया गया क्योंकि वे कई वर्षों तक मरने के भय से व मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गए थे। हत्या के 20 से अधिक दोषियों ने इस मामले पर एक प्रामाणिक फैसले की मांग करते हुए उच्चतम न्यायलय से संपर्क किया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब दया याचिकाओं पर निर्णय में अनुचित एवं अकथनीय विलंब हो तो मृत्यु दंड कम कर दिया जाना चाहिए। पीठ ने फैसला दिया कि मृत्यु दंड के क्रियान्वयन में विलंब, जीवन जीने के अधिकार का हनन है। जीवन जीने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त सभी अधिकारों में सबसे अधिक मौलिक अधिकार है और इसमें मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में तब्दील करने का आधार है। यह निर्णय भारत में मृत्यु दंड खत्म करने की दिशा में एक कदम है।

इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए पीठ ने कहा कि इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं कि अनुच्छेद 21 सर्वोपरि सिद्धांत है जिसपर दोषियों के अधिकार आधारित हैं। इस पर पीडि़तों या मृतक के परिजनों के अधिकारों के साथ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भी विचार किया जाना आवश्यक है, क्योंकि ये तत्व दंड देने की प्रक्रिया का हिस्सा भी हैं। पीठ ने यह भी कहा कि, राष्ट्रपति द्वारा कई वर्षों तक दया याचिका को अधर में रखकर एक दोषी को दुविधा में रखना निश्चित तौर पर एक यातना है। यह प्रतिकूल भौतिक स्थितियों को जन्म देता है और मृत्यु की सजा पा चुके दोषी के मन को तनावग्रस्त रखता है।

निर्विवाद रूप से अदालत संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान याचिका खारिज किए जाने पर अनुच्छेद 21 का साथ में विचार करते हुए केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर दोषी को अति पीड़ा देने वाले विलंब को माफ नहीं कर सकती। अदालत ने यह व्यवस्था भी दी कि मृत्यु दंड के दोषी को उसकी दया याचिका खारिज किए जाने के 14 दिनों के भीतर फांसी पर लटकाना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने पर इसकी सूचना को लिखित में दिया जाना अनिवार्य है।

भारतीय कानूनी इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह न केवल कानूनी व्यवस्था के लिए, बल्कि देश व सभी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण फैसला है। जिस तरह का भारत का इतिहास रहा है, उसे देखते हुए एक प्रबुद्ध राष्ट्र अपनी परंपराओं, परमार्थ चिंतन, धर्म, नैतिकता एवं आचार नीति के साथ धोखा नहीं कर सकता तथा मृत्यु दंड की अनुमति नहीं दे सकता। भारत वेदों व उपनिषदों, बुद्ध, अशोक, गुरू नानक व महात्मा गांधी की भूमि है। बहुत कम लोकतांत्रिक देशों ने मृत्यु दंड बरकरार रखा है, जबकि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में अब भी मृत्यु दंड दिया जाता है। क्या मृत्यु दंड असभ्य, जंगली, प्रतिगामी व बदला लेने वाला नहीं है? यदि सरकार असरदार तरीके से कहती है कि किसी भी तरीके से जान लेना स्वीकार्य है, तो इससे उन लोगों एवं बच्चों को हम क्या संदेश देते हैं जो आतंक, हत्या, जुर्म की दुनिया में कदम रखने वाले हैं।

इस तरह से यदि हम एक आंख के बदले एक आंख लेना जारी रखेंगे तो क्या पूरी दुनिया अंतत: अंधी नहीं हो जाएगी?

भारत में, अक्सर मौत की सजा सुना दी जाती है, लेकिन उसे बड़ी मुश्किल से क्रियान्वित किया जाता है। भारत में करीब 470 लोग मृत्यु दंड भुगत रहे हैं, जिसमें 13 महिलाएं शामिल हैं। लेकिन 1995 के बाद से केवल 4 लोगों को फांसी दी गई है। मृत्यु दंड की सजा पाने वाले सबसे अधिक 106 दोषी उत्तर प्रदेश से हैं। इसके बाद 63 कर्नाटक से, 51 महाराष्ट्र से, 42 लोग बिहार से, 27 दिल्ली से, 19 गुजरात से, 16 पंजाब से, 14 केरल से, 12 तमिलनाडु से जबकि 10-10 लोग असम, जम्मू कश्मीर व मध्य प्रदेश से हैं। सबसे अधिक 5 महिला दोषी महाराष्ट्र से हैं, जबकि दिल्ली से 4, पंजाब से 2 और हरियाणा व कर्नाटक से एक-एक महिला दोषी हैं जिन्हें मृत्यु दंड मिला है। भारतीय अदालतों ने 2001-2011 के दौरान 1,455 दोषियों को मौत की सज़ा सुनाई है। इनमें से ज्यादातर मृत्यु दंड की सजा को बाद में आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, भारत में केवल एक ही दोषी, धनंजय चटर्जी को अगस्त, 2004 में सूली पर लटकाया गया। धनंजय ने कोलकाता में एक 14 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी निर्मम हत्या कर दी थी। आतंकवाद के मामले न्यायपालिका और कार्यपालिका मृत्यु दंड देने पर सहमत हुईं, जिसके तहत वर्ष 2012 में अजमल कसाब और वर्ष 2013 में अफजल गुरू को फांसी दी गई थी।

पिछले कुछ वर्षों में कुछ प्रमुख मामलों में उच्चतम न्यायालय ने मृत्यु दंड को बरकरार रखने से मना कर दिया। इनमें ग्राहम स्टेन्स की हत्या के मामले में दोषी दारा सिंह, जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्या के दोषियों के मामले शामिल हैं। इन मामलों को अति दुर्लभ मामलों के तौर पर नहीं देखा गया। जुलाई, 2012 में राष्ट्रपति पद छोडऩे से पहले, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने हत्या के 35 दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था।

वर्ष 2013 तक कनाडा, मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, रूस, दक्षिण अमेरिकी राष्ट्रों और ज्यादातर यूरोपीय देशों समेत कुल 118 देशों ने अपने यहां मृत्यु दंड की व्यवस्था खत्म कर दी है। इनमें से 80 देशों व प्रदेशों ने सभी तरह के अपराधों के लिए मृत्यु दंड खत्म कर दिया है। 15 देशों ने अपवाद वाले अपराधों (जैसे युद्ध के समय अपराधों) को छोड़कर सभी अपराधों के लिए मृत्यु दंड खत्म कर दिया है। 23 देश ऐसे हैं जिन्हें मृत्यु दंड की व्यवस्था खत्म करने वाला माना जा सकता है। इन देशों ने कानून में भले ही इस सजा का प्रावधान बरकरार रखा है, लेकिन 10 साल या इससे अधिक समय से किसी को फांसी नहीं दी गई। माना जाता है कि इन देशों ने फांसी नहीं देने की नीति बनाई है या व्यवस्था की है। यद्यपि 78 देशों ने मृत्यु दंड बरकरार रखा है और वे इसका इस्तेमाल करते हैं। किसी एक वर्ष में कैदियों को फांसी देने वाले ऐसे देशों की संख्या बहुत मामूली है।

वर्ष 2010 में 23 देशों द्वारा कम से कम 527 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया जिसमें चीन द्वारा फांसी पर चढ़ाए गए हजारों लोग शामिल नहीं हैं। चीन में फांसी पर चढ़ाए गए लोगों की संख्या सरकार गुप्त रखती है। ईरान ने 252 से अधिक लोगों को फांसी दी, उत्तर कोरिया ने 60 से अधिक लोगों को और अमेरिका ने 46 लोगों को फांसी दी। नरसंहार, युद्ध अपराधों व मानवता के खिलाफ अपराधों जैसी वैश्विक चिंताओं के अति गंभीर अपराधों के लिए लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए 120 देशों ने एक स्थाई अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत स्थापित करने का निर्णय किया जो जुलाई, 2002 में अस्तित्व में आया।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के मानकों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय मृत्यु दंड नहीं दे सकता, बल्कि वह 30 साल तक की लंबी अवधि के कारावास या आजीवन कारावास की सजा सुना सकता है जोकि मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.पी. शाह देश में मृत्यु दंड के सबसे मुखर विरोधियों में से एक हैं। उनके मुताबिक, नि:संदेह यह सिद्ध हो चुका है कि मृत्यु दंड लोगों को अपराध करने से हतोत्साहित करने में सहायक नहीं रह गया है। यही वजह है कि दुनिया के दो तिहाई देशों ने इसे पूरी तरह से खत्म कर दिया है। भारत में मृत्यु दंड देना जज पर निर्भर है। एक जैसी परिस्थितियों में कुछ को मौत की सजा मिली है, जबकि कुछ को आजीवन कारावास की सजा। वहीं कुछ को बरी कर दिया गया।

कई जजों का तो मृत्यु दंड देने का इतिहास रहा है, जबकि कुछ मृत्यु दंड नहीं देने के लिए जाने जाते रहे। मृत्यु दंड के विरोधी जजों के मुताबिक, मृत्यु दंड और कुछ नहीं, बल्कि एक कानूनी लॉटरी है जहां आप भाग्यशाली हैं तो आप को नरम रुख अपनाने वाला जज मिल जाता है और आप मरने से बच जाते हैं, अन्यथा मौत की सजा पाकर जीवन गंवा बैठते हैं।

एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के निदेशक सुहास चकमा ने कहा – ‘यह फैसला भारत को यह कानून खत्म करने वाले देश की ओर बढ़ाता है। इसे एक बार और सभी के लिए मृत्यु दंड खत्म करने पर अवश्य विचार करना चाहिए।’ फैसले का स्वागत करते हुए पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराबजी ने कहा -‘यह एक मानवोचित एवं सही फैसला है। मैं इस फैसले से सहमत हूं।’

ह्यूमन राइट्स वॉच के दक्षिण एशिया की निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा – ‘सरकार को एक आधिकारिक प्रतिबंध की घोषणा करनी चाहिए, सभी मौजूदा कैदियों की मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील करना चाहिए। सरकार को एक बार व सभी के लिए मृत्यु दंड की व्यवस्था खत्म करने की दिशा में भी काम करना चाहिए। भारत को उन देशों की जमात में शामिल होकर न्याय के लिए प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए, जिन देशों ने मृत्यु दंड खत्म करने का फैसला किया है।’

कई लोग यह सोच सकते हैं कि जब भारतीय संविधान मृत्यु दंड की अनुमति देता है तो इसमें क्या बुराई हो सकती है। इस देश के संस्थापक पुरोधाओं ने भी पूरी तरह से इसे मंजूरी दी होगी। हालांकि, वास्तविकता में संविधान सभा के कई सदस्य मृत्यु दंड के जबरदस्त खिलाफ थे। बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान सभा में स्वीकार किया था कि लोग व्यवहार में भले ही अहिंसा का पालन न करें, लेकिन वे निश्चित तौर पर अहिंसा के सिद्धांतों का नैतिक जनादेश के तौर पर जहां तक हो सके पालन करेंगे। इस विचार के साथ उन्होंने कहा था – ‘इस देश के लिए उचित चीज यह है कि मृत्यु दंड को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाय।’

भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के लिए मृत्यु दंड पाने वाले स्वतंत्रता सेनानी प्रोफेसर शिब्बनलाल सक्सेना ने 3 जून, 1949 को संविधान सभा में अपने द्वारा बेकसूर लोगों को हत्या के लिए सूली पर लटकाए जाते हुए देखे जाने की घटना बयान की। मृत्यु दंड खत्म करने का प्रस्ताव करते हुए उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय में अपील करने का रास्ता उन लोगों के लिए खुला रहेगा जो धनवान हैं और कहीं भी जा सकते हैं, लेकिन गरीब लोग इसका लाभ उठाने से वंचित रह जाएंगे। उनके ये शब्द भविष्य सूचक थे।

मृत्यु दंड को खत्म करने की दिशा में बढ़ती अंतरराष्ट्रीय सहमति के बीच भारत द्वारा गैर सर्वसम्मत मृत्यु दंड जारी रखना, प्रतिगामी कदम बढ़ाने जैसा है। एम्नेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने सभी मृत्यु दंडों पर रोक लगाने और मौजूदा दंडों को आजीवन कारावास में तब्दील कर अंतत: भारत में मृत्यु दंड खत्म करने का सरकार से आह्वान किया है। मृत्यु दंड अन्यायपूर्ण और अमानवीय है। इसका सतत इस्तेमाल एक ऐसे समाज पर धब्बा है जो मानवीय मूल्यों पर बना है और इसे तत्काल खत्म किया जाना चाहिए। दुनिया मृत्यु दंड की व्यवस्था से दूर जा रही है। यूरोपीय संघ ने सदस्यता के लिए मृत्यु दंड के उन्मूलन को पूर्व शर्त बना दिया है। दिसंबर, 2010 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा की 65वीं बैठक में तीसरी बार मृत्यु दंड खत्म करने के पक्ष में मतदान किया गया और मृत्यु दंड पर वैश्विक रोक की वकालत भी की गई। एम्नेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, 140 देश (विश्व के दो तिहाई से अधिक देश) किसी भी तरह से मृत्यु दंड नहीं देते। आज भारत को इस वैश्विक रुख को पहचानने की जरूरत है और इसके साथ ताल से ताल मिलाकर काम करने की जरूरत है।

 अनिल धीर

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