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क्या हमारा देश एक नस्लवादी राष्ट्र है?

हमारे कानून इतने कमजोर हैं कि न तो पुलिस और न ही न्याय व्यवस्था को मजबूत किया गया है, जिसका परिणाम यह है कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। यह आपराधिक मानसिकता या सीधे तौर पर अपराधी हैं, जो मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार हैं।

नस्लवाद और कुछ नहीं, बल्कि जन्म, जाति, संप्रदाय, धर्म या त्वचा के रंग के आधार पर दूसरों के खिलाफ भेदभाव जताना है। युद्ध के दौरान इसे दुश्मनों के खिलाफ घृणा या अन्य अपराधों को प्रोत्साहन देने के लिए एक शक्तिशाली हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह एक अलग किस्म का रंगभेद है जिसके खिलाफ गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में लड़ाई लड़ी। कई भारतीयों के इन दावों के बावजूद कि हम एक सहनशील देश के वासी हैं और विदेशियों का स्वागत करते हैं, जमीनी हकीकत बहुत अलग है, भले ही हम ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका (विशेष तौर पर सिखों के खिलाफ भेदभाव के लिए) जैसे दूसरे देशों के खिलाफ काफी हो-हल्ला करते हों।

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विभिन्न देशों में लोगों के दृष्टिकोण को मापने वाले दि वल्र्ड वैल्यू सर्वे में सामने आया है कि ऐसे असहिष्णु लोगों वाला सर्वोच्च देश जॉर्डन है, जहां कि 51.4 प्रतिशत आबादी अलग प्रजाति के लोगों के साथ रहने से इंकार करती है। इसके बाद, दूसरा नंबर भारत का आता है जहां 43.5 प्रतिशत लोग अन्य प्रजाति के लोगों के प्रति असहिष्णु हैं। सर्वे के मुताबिक, असहिष्णुता के लिए अन्य देशों के आंकड़े इस प्रकार हैं-

30- 39.9 प्रतिशत आंकड़े वाला देश हैं – मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, वियतनाम, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया।

20-39.9 प्रतिशत वाले देशों में फ्रांस, तुर्की, बुल्गारिया, अल्जीरिया, मोरक्को, माली, जांबिया, थाईलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, बांग्लादेश, हांगकांग है।

15-19.9 प्रतिशत की श्रेणी में वेनेजुएला, हंगरी, सर्बिया, रोमानिया, मकदूनिया, इथियोपिया, यूगांडा, तंजानिया, जिंबाब्वे, रूस, चीन का स्थान आता है।

10-14.9 प्रतिशत असहिष्णु आबादी वाले देशों में फिनलैंड, पोलैंड, यूक्रेन, इटली, यूनान, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया शामिल हैं।

5-9.9 प्रतिशत आबादी चिली, पेरू, मेक्सिको, स्पेन, जर्मनी, बेल्जीयम, बेलारूस, क्रोएशिया, जापान, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका के देशों में असहनशील है।

0 से 4.9 प्रतिशत की श्रेणी में अमेरिका,

कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीना, कोलंबिया, ग्वाटेमाला, ब्रिटेन, स्वीडन, नार्वे, लातविया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे शामिल हैं।

भारत एक देश नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप है। हमारे देश की राष्ट्रीय या आधिकारिक भाषा हिंदी और अंग्रेजी है। देश में आधिकारिक तौर पर 22 अनुसूचित भाषाएं – असमी, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मराठी, मेइती, नेपाली, ओडिय़ा, पूर्वी पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तेलुगू और उर्दू बोली जाती हैं।

अन्य सूचीबद्ध भारतीय भाषाओं की संख्या 452 है। इनमें से 438 जीवित भाषाएं हैं और 14 भाषाओं को बोलने वाला कोई नहीं है। इनमें से कई भाषाओं की बोलियां भी भिन्न हैं। देश में 28 राज्य हैं और 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं। एक राज्य के रीति-रिवाज व पहनावा दूसरे राज्यों से बिल्कुल अलग है।

दिल्ली के लाजपत नगर बाजार में 29 जनवरी, 2014 को पुरुषों के एक समूह ने अरुणाचल प्रदेश के एक 19 वर्षीय छात्र को इस तरह पीटा कि अगले ही दिन अपने मित्र के घर उसकी मृत्यु हो गई। उसे अपने मित्र के घर निंद्रावस्था में मृत पाया गया था। पूरा बखेड़ा तब खड़ा हुआ जब कुछ दुकानदारों ने उसके हेयर स्टाइल को लेकर मजाक उड़ाया। ऐसे में उसने गुस्से में आकर दुकान का शीशा तोड़ दिया, जिस पर दुकानदारों ने उसके साथ मारपीट की। चूंकि, लड़का पूर्वोत्तर का था, कई लोगों ने इसे घृणावश अपराध बताया। खेदजनक ढंग से हमारे गृहमंत्री के पास स्थिति में सुधार लाने का वक्तनहीं है ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति होने से रोका जा सके। पुलिस और कानून यहां एक अहम भूमिका निभाते हैं।

यद्यपि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है और यहां पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है। लेकिन यहां कि पुलिस की भी स्थिति उतनी ही खराब है, जितनी की अन्य राज्यों में। दिल्ली पुलिस पर 1.65 करोड़ लोगों की सुरक्षा का जिम्मा है, लेकिन उसे 83,762 कर्मचारी रखने की मंजूरी है, जो कि अंतर्राष्ट्रीय मानक से बहुत कम है। पुलिसकर्मियों की तैनाती इस प्रकार है :

पुलिस नियंत्रण कक्ष                       8,558

अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा                            7,315

फिलहाल रिक्तपद                                          लगभग 7,000

सेवानिवृत्ति एवं अन्य कारणों के चलते हर साल 3,000 से अधिक पद रिक्त हो जाते हैं। यदि आप बाकी को बांटें, तो तीन पालियों में पुलिस की ड्यूटी के लिए उपलब्ध बल के बारे में लिखने के लिए कुछ नहीं बचता। उपरोक्त के अलावा, एसएचओ से अटैच किए गए कर्मचारियों की गिनती ही नहीं की गई है, क्योंकि ये मंजूरशुदा नहीं हैं और न ही इन्हें दिखाया जाता है, लेकिन पुलिस के काम के लिए ये महत्वपूर्ण हैं।

पुलिस का अग्रणी स्तर कांस्टेबल है, जो एक बार भर्ती होने पर शायद ही कभी बदले हुए कानूनों या स्थितियों के लिए फिर से प्रशिक्षण पाता हो या उसे संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता हो। यहां पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के उस कथन का जिक्रकरना उपयुक्तहोगा जिसमें उन्होंने देश भर में पुलिस की स्थिति का सार प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि पुलिस तंत्र पुराना पड़ चुका है। पुलिस को अच्छा प्रशिक्षण नहीं मिल रहा, वे बेहतर साजो-सामान से लैस नहीं हैं और उन्हें कम पगार दी जाती है। पूरे साल 12 से 14 घंटे काम करने वाले पुलिस कांस्टेबल को सबसे ज्यादा गालियां खानी पड़ती हैं। ये मशीनरी का हिस्सा हैं। हर कोई सोचता है कि उस पर (कांस्टेबल) धौंस जमाई जा सकती है या उसकी खुशामद की जा सकती है या उसे घूस दी जा सकती है। वह सबसे अधिक भला-बुरा सुनने वाला सरकारी नौकर है। औसत पुलिसकर्मी का आत्मसम्मान बहुत कम है और यही औसत दर्जे का पुलिस कांस्टेबल आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे आगे का पुलिस बल है।

पुलिस के कामकाज में सुधार के लिए राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977) सहित निम्नलिखित समितियों का गठन किया गया है और साथ ही उच्चतम न्यायालय का 22 सितंबर का सीमित पुलिस सुधारों पर आदेश है।

केरल पुलिस पुनर्गठन समिति                     (1956)

पश्चिम बंगाल पुलिस आयोग                      (1960-61)

पंजाब पुलिस आयोग                                     (1961-62)

महाराष्ट्र पुलिस आयोग                                 (1964-65)

मध्य प्रदेश पुलिस आयोग                           (1965-66)

दिल्ली पुलिस आयोग                                    (1967-68)

असम पुलिस आयोग                                      (1970-71)

उत्तर प्रदेश पुलिस आयोग                            (1960-61, 1970-71)

तमिलनाडु पुलिस आयोग                          (1971)

राजस्थान पुलिस पुनर्गठन समिति     (1972-73)

राष्ट्रीय पुलिस आयोग                                    1977-1981

वर्ष 2001 में रिबेरियो पुलिस सुधार समिति

पद्मनाभैया समिति,                                         2004

न्यायमूर्ति मालीमठ समिति,                        2001-2003

सोली सोराबजी समिति                                            (2008)

लेकिन इन सभी आयोगों और समितियों के गठन की सारी कवायद बेकार रही, जिनका नतीजा भी सिफर रहा। इसका परिणाम यह है कि लोग हत्याओं के शिकार होते हैं, फिर कारण चाहे जो भी हो।

अब घृणावश अपराध पर आते हैं। हमारे कानून इतने कमजोर हैं कि न तो पुलिस और न ही न्याय व्यवस्था को मजबूत किया गया है, जिसका परिणाम यह है कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। यह आपराधिक मानसिकता या सीधे तौर पर अपराधी हैं, जो मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार हैं। संयोग से, भारत के पूर्वोत्तर से कुछ युवतियों ने छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई हैं। छेड़छाड़ का सामना करने वाली ये अकेली नहीं हैं, बल्कि, दिल्ली की कई अन्य महिलाओं को भी यह जहर पीना पड़ा है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में अपराध के आंकड़े इस प्रकार है।

अपराध             बलात्कार                     छेड़छाड़

2012                       680.00                                 653.00

2013                      1,559.00                               3344

लेकिन सच्चाई जस की तस है, हमारे सभी कानून अपराधियों के अनुकूल हैं और ज्यादातर मामलों में अपराधी दंडित होने के बजाय बच निकलते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 37 लाख विद्यार्थी बेहतर शिक्षा के लिए अपने राज्यों से अन्य राज्यों में जाते हैं।

जब भारत ऑस्ट्रेलिया या ब्रिटेन या अमेरिका (एक कनिष्ट राजनयिक के हाल के मामले सहित) या फ्रांस या किन्हीं अन्य देशों के खिलाफ जातिवाद को लेकर हल्ला मचाते हैं तो यह समय भारत को अपने भीतर झांकने और खुद को उसी कतार में रखने का भी है। भारत में इस तरह की शिकायतें अफ्रीकियों द्वारा भारतीयों के खिलाफ की गई हैं। भारत एक मोजैइक है और कोई भी सही सोच रखने वाला इसे बर्बाद नहीं करना चाहेगा। लेकिन, संभवत: सबसे कमजोर व्यवस्था के साथ और उन्हीं कानूनों के साथ जिन्हें 1863 में अंग्रेजों ने बनाया था, यह समस्या हल नहीं की जा सकती। एक बदलाव के लिए ही क्यों न सही, इस प्रावधान के साथ कि जब तक अपराधी निर्दोष साबित नहीं हो जाता, उसे जमानत नहीं मिलेगी, यह सिद्ध करने का दायित्व अपराधी पर डाला जाए कि वह दोषी नहीं है। पहले उदाहरण में, भारत को ‘जातिवाद के साथ कोई समझौता’ नहीं करने की एक नीति घोषित करनी होगी। हम जातिवाद के बारे में और किसने किसके साथ कितना बुरा बर्ताव किया, इसको लेकर

बहस जारी रख सकते हैं। लेकिन, सवाल यह है कि हम सभी की ओर से काम करने वाली सरकार क्या कर रही है या इस बारे में क्या करने जा रही है। संभवत: वोट और चुनाव जीतना, जातिवाद से निपटने से अधिक महत्वपूर्ण है जो कि न सिर्फ भारत को, बल्कि पूरे विश्व को बांटता है।

सरकार को देश के खिलाफ किसी भी गलत चीज या विध्वंसकारी चीजों के खिलाफ अपने तलवार की धार तेज करने की जरूरत है। उसे वैसे ही अपनी जिम्मेदारी निभाने का साहस दिखाना चाहिए, जैसे कि उसने संविधान एवं प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करने की कसम खाई है।

जोगिन्दर सिंह

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