ब्रेकिंग न्यूज़ 

इतिहास से दयालुता और भविष्य से उम्मीदें

डॉ.मनमोहन सिंह देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं और हताशा के इन क्षणों में उम्मीद कर रहे हैं कि इतिहास उनके प्रति ज्यादा दयालु रहेगा। यह बात उन्होंने शायद उन स्तंभकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के संदर्भ में कही है, जो भ्रष्टाचार, घोटाले और नीतिगत पक्षाघात के लिए मनमोहन सिंह को जिम्मेदार मान रहे हैं। यह बात उन्होंने लगभग एक दशक तक प्रधानमंत्री के रूप में रहते हुए 3 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर कही।

डॉ. सिंह की सबसे बड़ी विरासत ‘मौन रहने की उनकी कला’ है। इस कला का उपयोग उन्होंने बचाव के लिए राजनीतिक हथियार के रूप में और अपने विरोधियों को अर्थहीन बनाने में इस्तेमाल किया है। उन्हें बोलने के लिए मजबूर करने का हर प्रयास व्यर्थ जाता देखकर विरोधी असहाय महसूस करने लगते हैं। मौन की इस कला ने डॉ. सिंह की कई तूफानों में बचाने में मदद की है। वह दोनों ही सदनों में आलोचनाओं, आरोपों और भत्र्सनाओं के बावजूद भी भावशून्य चेहरे के साथ बैठे रहे हैं। यहां तक कि वह अपनी आंखों की पलकें भी नहीं झपकाते। इससे उनके विरोधी हताश हो जाते हैं और उन्हें बोलने के लिए मजबूर करने का प्रयास छोड़ देते हैं। उन्होंने सिर्फ एक बार मानसिक संबलता का परिचय देते हुए कुछ कहने का हौसला दिखाया था और उनके इस पश्चाताप के कारण घोर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘चोर’ कहा गया। वह अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें इस तरह के आरोप लगाकर उपहास उड़ाया गया। शायद वह टोनी ब्लेयर को भूल गए, जिन्हें सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका का साथ देने के कारण युद्धाभिलाषी और हत्यारा तक कहा गया था।

जवाहरलाल नेहरू के बाद, डॉ. सिंह भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे पहले व्यक्तिहैं, जो लोकसभा का चुनाव लड़े बिना ही सोनिया गांधी के सौजन्य से लगातार 10 वर्षों से 7 रेसकोर्स में रहने में कामयाब रहे हैं। इसके साथ ही वह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अपना त्यागपत्र देने की घोषणा की। यह एक चतुराई भरी चाल थी। वह कुछ समय बाद कांग्रेस के अंतिम प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं। अप्रैल में चुनाव के बाद यदि कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचती है तो उनकी जगह राहुल गांधी को बैठाया जा सकता है। लेकिन इसके नकारात्मक पक्ष भी हैं।

वर्तमान संकेतों के अनुसार, मई के बाद भारत में गैर-कांग्रेसी सरकार होगी। नई सरकार पर क्षेत्रीय क्षत्रपों का नियन्त्रण हो सकता है।

यदि डॉ. सिंह ने पहले ही कार्यकाल (2004-09) के बाद अपनी कुर्सी छोड़ दी होती तो आज उनकी महिमा का गुणगान हो रहा होता। सोनिया गांधी द्वारा नियुक्त किए जाने से पहले, उनकी विश्वसनीयता एक विख्यात विश्वस्तरीय अर्थशास्त्री और सार्वजनिक जीवन में एक ईमानदार व्यक्तिकी थी। लेकिन दूसरे कार्यकाल के शुरूआत के साथ ही एक सम्मानीय प्रधानमंत्री के रूप में उनकी चमक खोने लगी।

जब हाल ही में उन्होंने घोषणा की कि आगामी आम चुनावों के बाद वह सेवानिवृत्त हो जाएंगे, तब तक उनकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता टूट कर बिखर चुकी थी। जनता का मानना है कि उनके मंत्रियों द्वारा किए गए ज्यादातर घोटाले उनकी चुप्पी के कारण हुए। इसमें ज्यादातर का मानना है कि यह सब मिलीभगत का परिणाम है। प्रधानमंत्री इसे गठबंधन की मजबूरी बताते हैं। उनकी छवि पर उसी वक्त गहरे दाग लगने शुरू हो गए थे, जब अमेरिकी नागरिक और कई मामलों में आरोपी संतसिंह चटवाल को पद्म भूषण से नवाजा गया था और प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लवली को प्रधानमंत्री कार्यालय ने बचाते हुए, उसके खिलाफ कार्रवाई करने में अनिच्छा दिखाई थी। उन्होंने 2005 में नवीन चावला को मुख्य निर्वाचन अधिकारी बनाए जाने का भी विरोध नहीं किया था। ”मनमोहन सिंह का यह पहला ऐसा कार्य था, जिसने राजनीति की समस्त बेशर्मी को पार करते हुए, जनहित की अवमानना की गई थी। शाह आयोग द्वारा चावला को एक ऐसे ‘तानाशाह’ की संज्ञा दी गई थी, जो ‘सत्तावादी और कठोर’ है। शाह आयोग ने 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी शासन में हुई ज्यादतियों की जांच की थी।’’ इस आयोग ने चावला को ‘सार्वजनिक पद के अयोग्य’ ठहराया था। अब तक यही कहा जाता है कि मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी के कारण चावला का अतीत जानने की कोशिश नहीं की थी। गांधी परिवार में संजय गांधी के समय से ही चावला प्रिय रहे हैं।

इसके बाद से डॉ. सिंह की ईमानदारी पर संदेह होना शुरू हो गया था। उनका चेहरा उस व्यक्ति के रूप में आना शुरू हुआ, जो दुर्बल और समझौता करने के लिए तैयार रहने वाला है, खासकर तब, जब उनकी कमान उनकी न्योक्ता के पास हो। वह अपनी शपथ को भी जल्दी ही भूल गए, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह बिना किसी भय, पक्षपात, अनुराग या द्वेष के भारतीय संविधान और कानून के अनुसार कार्य करेंगे। मुख्य सर्तकता आयुक्तके रूप पी.जे. थॉमस की नियुक्ति जैसे अनेक विवादास्पद फैसले भी उनके द्वारा किए गए। थॉमस की नियुक्ति को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया था। उन पर अपने ‘बॉस’ के निर्देशानुसार बोफोर्स तोप सौदे में 7.3 मिलियन यूएस डॉलर की दलाली देने के आरोपी ओतिवियो क्वात्रोची को भगाने का आरोप था।

डॉ. सिंह से कॉमनवेल्थ घोटाले, 2-जी घोटाले और कोयला घोटाले के बारे में पूछा गया, लेकिन तथ्यों को सामने लाने के बजाय वह उसे नजरअंदाज कर गए। कुछ आलोचकों का कहना है कि भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में वह अपने कार्यों को छिपाने की कोशिश करते रहे, जो वास्तव में उन्हें आरोपियों की सूची में शामिल कर सकते थे। उनके खिलाफ ये सभी कथित आरोप उन्हें अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में लाचार दिखा रहे हैं। यहां तक कि उनके आका गांधी परिवार ने भी उन्हें परित्यक्त कर दिया है। वह कहते हैं कि इतिहास उनके प्रति अधिक दयालु रहेगा। किस आधार पर उन्हें इस प्रतिदान की आशा है?

रिमोट नियंत्रित विदेश नीति

संभवत: इतिहास उन्हें याद करेगा कि वह भारत के प्रधानमंत्रियों के बीच भू-पर्यटक के रूप में अग्रणी और एक विश्व यात्री थे। न्यू इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक प्रभु चावला के अनुसार, 7 रेसकोर्स में कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह ने 50 देशों की कई मिलियन मील की यात्रा की। 2004 से उन्होंने अपना हर 10वां दिन किसी विदेशी शहर में बिताया। चावला के अनुसार, सुपर पॉवर के रूप में भारत की स्वीकारोक्ति ही उनका वैश्विक मिशन रहा है। इसके तहत उनकी आधी यात्रा अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन और रूस की थी, जिसमें 11 यात्राओं के साथ अमेरिका का पहला स्थान है। जनता के पैसों से की गई इन यात्राओं के बारे में उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने इन यात्राओं के तहत ऐसा क्या हासिल किया जो देश के लिए लाभदायक रहा है और वह विकास व जनता के हित में देश के लिए लाभदायक अनुबंध करने में सफल रहे हों। क्या उन्होंने ऐसा किया?

राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन सिंह द्वारा अपने 9 साल के कार्यकाल के दौरान लगातार की गई 80 यात्राओं से हुए फायदे और उसके प्रभावों का विश्लेषण करते रहे हैं। वास्तविक रूप में उनकी उपलब्धियों की सूची नगण्य है, जबकि उसके नकारात्मक प्रभाव अधिक हैं। डॉ. सिंह की अमेरिका से नजदीकियों के कारण भारत का सबसे विश्वसनीय सहयोगी रूस भारत के प्रति संदेहात्मक रूख अपनाने पर मजबूर हो गया है। यूरोप, जो आर्थिक मार्गदर्शन के लिए हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की तरफ देखता रहा, वह भी भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्दशा देखकर भारत को नजरअंदाज करने लगा। यूरोपीय संघ के एक वरिष्ठ ने मुस्कुराते हुए कहा कि भगवान का शुक्र है कि हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह नीचे नहीं फिसले। काश यह मजाक होता! लेकिन दुर्भाग्य से सच्चाई यही है कि एक समय अपनी विदेश यात्राओं में सबसे सफल प्रधानमंत्री के रूप में सम्मान पाने वाले मनमोहन सिंह, बाद में अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अक्षम होने के रूप में अपना सम्मान खोते गए। एक भूतपूर्व राजदूत के अनुसार, ओबामा और नवाज शरीफ से अपनी अंतिम मुलाकात के दौरान उन्हें उच्च-स्तरीय कूटनीति के मैदान में हाशिए पर कर दिया गया। देवयानी मामले में ही साबित हो गया कि ओबामा, मनमोहन सिंह से कितने प्रभावित हुए। ओबामा के रडार पर भारत का नामो निशान नहीं है। मनमोहन सिंह अब ‘परिवार’ की तरह नहीं रहे, जैसा कि ओबामा ने कई बार कहा था।

शांति के नाम पर डॉ. सिंह पाकिस्तान के समक्ष कई बार इसलिए झुके ताकि उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिल सके और इतिहास इस बात के लिए उन्हें याद रखे कि इस प्रधानमंत्री की वजह से दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हो सकी। इसके परिणामस्वरूप इस्लामाबाद के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ती गई और उसने रिकॉर्ड संख्या में नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया। लगभग दैनिक घुसपैठ और एक जवान का सिर काटने की घटना ने भी मनमोहन सिंह की अंतरात्मा को नहीं कचोटा। दूसरी तरफ विश्व की महाशक्तियां लोकतांत्रिक रूप से चुने गए और आईएसआई द्वारा नियंत्रित पाकिस्तानी प्रमुख नवाज शरीफ से आंख-मिचौली खेलती रहीं।

पाकिस्तान के साथ वार्ता जारी रखने की प्रधानमंत्री की जिद ने कोई सकारात्मक उपलब्धि हासिल नहीं की। फिर भी वह पाकिस्तान स्थित अपने जन्म स्थान गह की यात्रा की उम्मीद लगाए बैठे हैं। क्या यही वजह है जिसके कारण वह दोनों देशों के बीच वार्ता जारी रखना चाहते हैं? और, कोई भी शर्त लगा सकता है कि अपने कार्यकाल पूरा होने से पहले वह वहां जाएंगे भी। उन्होंने वह सब कुछ पाया है, जिसे उन्होंने निर्धारित किया है।

चीन की कहानी भी ऐसी ही है। चीनी प्रमुख ली और मनमोहन ङ्क्षसह के बीच सीमा समझौता के तहत सीमा विवाद सुलझाने के दावे पर भी खुश होने की जरूरत नहीं है। सभी अनुबंध भविष्य से संबंधित हैं, जो कि विश्वास बहाली के उपायों पर निर्भर हैं। वीजा के मुद्दे को भी हल नहीं किया गया था। चीन अब भी नत्थी किया हुआ वीजा देना जारी रख सकता है। इसका मतलब यह भी हुआ कि अरूणाचल प्रदेश पर चीन के दावे पर बहस नहीं की गई, कम से कम उस दबाव के साथ, जिसकी जरूरत थी। पाक अधिकृत कश्मीर में नियंत्रण रेखा के समीप चीन द्वारा 15 हजार सैनिकों की तैनाती की रिपोर्ट पर क्या कोई चर्चा हुई? चीनी सैनिकों द्वारा बार-बार घुसपैठ किए जाने पर क्या भारत ने मजबूती से विरोध जताया?

‘भारतीय बाजारों में अपनी असीमित पहुंच चाहने वाले भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लाभार्थियों ने लिखित भाषणों और औपचारिक मुलाकातों के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे के प्रति सहानुभूति दिखाने के अलावा कुछ खास नहीं किया।’ भारत का संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थायी सदस्यता का सपना भी अधूरा रह गया।

सार्क के सदस्य देश और दक्षिण एशिया के अन्य देश बुरी तरह नजरअंदाज होते आ रहे हैं। ये देश अन्यत्र कहीं देखने के लिए बाध्य हो रहे हैं। इस तरह भारत अपने पड़ोसियों पर नियंत्रण खोता जा रहा है। चीन ने भारत के चारों तरफ के पड़ोसियों को अपने साथ मिलाकर भारत पर शिकंजा कस दिया है। उसने श्रीलंका में बंदरगाह बना ली है और हवाई अड्डा लगभग तैयार होने वाला है। पाकिस्तान उसका सर्वकालिक सहयोगी है। यहां तक कि एक छोटा-सा देश मालदीव भी भारत को धत्ता बताते हुए आंखें तरेर रहा है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार आज अस्थिर है, क्योंकि साउथ ब्लॉक उनकी स्थिति को मजबूत बनाने में असफल रहा है। कूटनीति में प्रधानमंत्री की सफलताओं का बैलेंस शीट लगभग खाली है। दुर्भाग्य से इतिहास में वह अपने लिए सहानुभूति नहीं जुटा पाएंगे।

 घरेलू राजनीति

प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में मनमोहन सिंह का नरेन्द्र मोदी पर तीखा बयान देने का मकसद अपनी खामियों और यूपीए के कुशासन को छिपाना था। मीडिया में मोदी के खिलाफ दिया गया अपमानजनक बयान हेडलाईन बना। ‘नरेन्द्र मोदी की खूबियों की चर्चा के बिना, मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूं कि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए विनाशकारी होगा।’ रिपोर्टों के अनुसार – ‘उन्होंने यह बात अपनी भाव-भंगिमाओं में बिना किसी बदलाव के बेहद धीमी आवाज में कही।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि मोदी क्यों इस देश के लिए विनाशकारी होंगे। मुलायम सिंह यादव जैसे उनके सहयोगी मानते हैं कि मोदी आम चुनावों में मोदी एक कारक हैं। वास्तविकता यह है कि मोदी आज सबसे लोकप्रिय और प्रतिबद्ध चेहरा हैं। बेहतर होता कि मनमोहन सिंह अपने इस निम्न विचार की व्याख्या करते कि गुजरात जैसे विकसित राज्य के तीन बार से मुख्यमंत्री चुना जाता रहा व्यक्ति देश के लिए किस तरह खतरनाक है। इस तरह के बयान से उन्होंने अपने आका गांधी परिवार को खुश करने की कोशिश की है। रिपोर्टरों के कमजोर प्रधानमंत्री कहलाने के प्रश्न के जवाब में यह कहते हुए उन्होंने अपने सिद्धांतों को तोड़ा कि एक मजबूत प्रधानमंत्री का अर्थ यह है कि किसी के नेतृत्व में अहमदाबाद की सड़कों पर निर्दोष लोगों का संहार किया जाए, तो इस तरह की मजबूती मेरे पास नहीं है।

इससे गांधी परिवार निश्चित रूप से बहुत खुश होगा, लेकिन दुर्भाग्यवश इनाम के लिए अब कोई स्थान नहीं बचा है। राष्ट्रपति भवन पहले से ही अधिकृत है और वह वर्तमान में 7 रेस कोर्स में स्थापित हैं। कांग्रेस की दुबारा सत्ता में वापसी के आसार नहीं हैं। वह पहले ही कह चुके हैं कि वह सेवानिवृति चाहते हैं। ऐसे में यूपीए की सारी खामियों का दोष कांग्रेस के संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी पर जाएगा।

125 साल पुरानी पार्टी, जिसने देश की आजादी के बाद के 78 सालों में लगभग 55 सालों तक देश पर शासन किया, अब उसकी कमान संभालने की क्षमता क्या राहुल गांधी में है? टाईम्स नाउ के अर्णब गोस्वामी के साथ राहुल के साक्षात्कार में कांग्रेस के रूख से साफ हो गया कि पार्टी राहुल को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखती है। यह गांधी-नेहरू वंश की चौथी पीढ़ी का प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ता कदम है। सूत्रों, अभियान प्रबंधकों और वरिष्ठ पार्टी नेताओं की मानें तो शहरी मध्यम वर्ग और युवाओं के बीच कांग्रेस की छवि खराब हुई है। लेकिन राहुल गांधी के मीडिया मैनेजर इस उम्मीद से राहुल गांधी का लगातार साक्षात्कार करा रहे हैं, ताकि इस तरह के एक्सपोजर से उनकी छवि को बेहतर बनाया जा सके।

उनसे कुछ अलग होने के बारे में प्रश्न पूछा जाता है, तो राहुल गांधी के पास महिला सशक्तिकरण, लोकतंत्र, आरटीआई और चरणबद्ध बदलाव के अलावा कहने को कुछ नहीं होता। लेकिन वह भ्रष्टाचार (आदर्श सोसायटी, वीरभद्र सिंह, अगस्ता-वेस्टलैंड आदि) जैसे गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज कर देते हैं। 2002 के दंगों पर बार-बार हंगामा मचाने वाले राहुल 1984 के सिख दंगे के लिए माफी मांगने से इंकार कर देते हैं। लगभग 9 वर्षों से राजनीति में होने के बावजूद साक्षात्कार के दौरान पसीने-पसीने होने वाले राहुल गांधी इसी छवि पर 2014 का चुनाव लडऩा चाहते हैं। कभी-कभार ही आंखों से आंखें मिलाकर जवाब देने उनकी घबराहट, उनके मजबूत नेतृत्व पर शंका पैदा करता है। अर्थव्यवस्था, विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी समझ में भी नितांत कमी दिखती है।

1984 के दंगों पर मात्र 14 साल का होने का बहाना बनाना, इतिहास के प्रति उनकी समझ को दर्शाता है। प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार से कम से कम पिछले 50 वर्षों के राजनीतिक इतिहास की जानकारी की अपेक्षा की ही जानी चाहिए। राहुल गांधी 2002 के दंगों को सरकारी तंत्र द्वारा निर्दोष लोगों का सुनियोजित संहार तो बताते हैं, लेकिन राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुए 84 के दंगों में सिखों के कत्लेआम को जनसंहार मानने से इंकार करते हैं। सिखों का कत्लेआम हो रहा था, लेकिन राजीव गांधी की सरकार ने इसे रोकने के लिए न कफ्र्यू लगाया, न आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया और न ही लाठी चार्ज किया। सिखों के दुकानें जलाई जा रही थीं, लेकिन वहां पर पुलिस मौजूद नहीं थी।

लेकिन देश के प्रधानमंत्री ने यह कहकर कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है, दंगों के प्रति अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया था। राहुल गांधी से इतनी उम्मीद की जा सकती है कि वह निष्पक्ष तरीके से इनका विश्लेषण करते।

इन सारी बातों से राहुल गांधी अनभिज्ञ हैं। अब सवाल उठता है कि राहुल गांधी का भविष्य क्या है? उन्हें राजवंश की परंपरा का लाभ मिला है। उन्हें सभी वीवीआईपी सुविधाएं मिली हैं और वह इसका लाभ भी उठा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि पार्टी का पुनरूद्धार तभी संभव है, जब उत्तर प्रदेश में पार्टी मजबूत हो। इसलिए यूपी पर उनका विशेष ध्यान है। लेकिन चार साल बाद भी पार्टी की कमजोरियां वहीं की वहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आम चुनावों में यूपी में कांग्रेस चौथे स्थान पर रहेगी। उन्होंने वादा किया था कि उत्तर प्रदेश में 10 लाख कैडरों को जोड़ेंगे। कहां हैं वे, यह कोई नहीं कह सकता।

2009 लोकसभा चुनाव में 206 सीटों पर जीत के बाद राहुल को न सिर्फ यूपी में पार्टी का उद्धार करने के लिए कांग्रेस की मशाल थमाई गई, बल्कि पूरे देश में उन्हें पार्टी का स्टार प्रचारक प्रचारित किया गया। लेकिन आज जो संभावित सीटें कांग्रेस के पाले में बताई जा रही हैं, वह भी 50 से 70 के बीच हैं। इस गिरावट का जिम्मेदार कौन है? राहुल को भले ही चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया हो, लेकिन कुछ राज्यों में एक-दो नेताओं को छोड़कर उनके पास लोकप्रिय और प्रभावी चेहरों की कमी है। इस तरह राहुल के लिए यह लगभग असंभव है कि वह पोलिंग बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं और लोगों से संवाद स्थापित करने में सक्षम हो पाएंगे। इस तरह की कमजोरियां राहुल गांधी के लिए खतरनाक साबित होने वाली हैं।

आखिर प्रधानमंत्री के रूप में उनका भविष्य क्या है? इसे दो आधार पर देखा जा सकता है। पहला, यदि पार्टी 50 सीटों के आसपास सिमटती है, तो इसके टूटने की आशंकाएं बढ़ जाएंगी। कांग्रेस नेताओं की वफादारी उन्हीं नेताओं में है, जो उन्हें जीतवाने में सक्षम हों। उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना तभी पूरा सकता है, जब मोदी के नेतृत्व में एनडीए बहुमत हासिल करने में असफल हो जाए और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गठबंधन बनाने के लिए कांग्रेस के पास कम से कम 70 से 80 सीटें हों।

लेकिन दीर्घकालिक रणनीति के तहत, कई विशेषज्ञों का मानना है कि राहुल गांधी 2019 तक इंतजार करेंगे। इन पांच सालों में पार्टी की विश्वासनीयता बढ़ाने और पार्टी को राज्यों में स्थापित करने का प्रयास करेंगे। उनकी दादी इंदिरा गांधी ने राज्य स्तरीय नेताओं के पर कतरने शुरू कर दिए थे, ताकि उनके पुत्र संजय गांधी को चुनौती न मिल सके। उनके उत्तराधिकारी और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने भी इसी नीति को अपनाते हुए अपने सलाहकारों और मित्रों के माध्यम से क्षेत्रीय क्षत्रपों को उनके राज्यों तक मैनेज करते रहे। बाद में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली। राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी ने इन 15 सालों में कई कठिनाईयों का सामना किया। लेकिन अपनी दादी की तरह उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्हें पता है कि यूपीए शासन की गलत नीतियों और भ्रष्टाचार के कारण लोगों में जबरदस्त गुस्सा है।

राहुल जानते हैं कि उन्हें किस तरह का चुनौतीपूर्ण और विशाल कार्य सौंपा गया है। मोदी के विरोध में खड़ा होने से पहले उन्हें खुद में वाकपटुता का विकास और क्षेत्रों की विस्तृत जानकारी रखनी चाहिए थी। आस्तीन चढ़ाना और विरोधियों के खिलाफ नकारात्मक बातें करना, शायद ही मतदाताओं को लुभाए।

तो क्या कांग्रेस की शिकस्त के बाद भी राहुल गांधी शक्ति का केन्द्र बने रहेंगे? क्या उनमें इतना धैर्य और साहस है कि वह राख में तब्दील हो चुकी पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएं? अब तक वह अपनी मां और पार्टी के वफादारों के भरोसे आगे बढ़ते आए हैं। चुनाव बाद उनके लिए ये दोनों चीजें नहीं होंगी। वीवीआईपी सुविधाओं का अभाव और कांग्रेस पार्टी में सन्नाटे की स्थिति में वह बेचैनी महसूस करेंगे। क्या वह शारीरिक और मानसिक रूप से इतने मजबूत हैं कि इस राजनीतिक तूफान में खुद को संभाल सकें?

राहुल गांधी राजनीति की इस उथल-पुथल से अलग एक धनाढ्य युवा की तरह जिंदगी जी सकते हैं। लेकिन यदि वह राजनीति में बने रहना चाहते हैं तो उन्हें 1977 से 1980 के बीच अपने पारिवारिक इतिहास के पन्ने पलटने चाहिए, जब उनके चाचा संजय गांधी ने अपनी मां इंदिरा को सत्ता में लाने के लिए सड़कों की खाक छानी थी।

विजय दत्त

Что такое Перелинковкаwobs

Leave a Reply

Your email address will not be published.