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कमीशन दो तो, हिन्दुस्तान बेच देंगे!

हे भाई हे! अगर चाहते हो

कि हवा का रूख बदले    

तो एक काम करो-

संसद जाम करने से बेहतर है

सड़क जाम करो

कवि धूमिल की इन पंक्तियों को गाते हुए मित्र घनानंद भांग की गोली कुछ ज्यादा ही गटक गए। उन्हें योग गुरू रामदेव द्वारा शुरू किए ‘राजनीति -राजनीति’ खेल में खुद को संसद के सिंहासन तक पंहुचने का शॉर्टकट दिखाई देने लगा। आखिर आम पार्टी वाले जब बिजली का तार जोड़ कर सिंहासन तक पंहुच सकते हैं, तो उनमें क्या कमी है। इस पराभव के समय में नई-नई व्याख्या करने में जुटे युवराज गरीबी की बात करते-करते गरीबी को मेन्टलस्टेटस बताने लगते हैं। वह भूल जाते हैं कि इस गरीबी की जड़ उनके परिवार द्वारा पोषित की गई नीतियों की तह से निकली है। सारी जिन्दगी दिल्ली में हुक्का गुडग़ुड़ाने के अलावा उन्होंने किया ही क्या? जब भी राई रत्ती प्रयास करने की ठानी, तो उनके दल में दलदल मचा रहे लोगों ने नानी याद दिला दी। बिहार से यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली तक लगातार मिली हार ने जो ज्ञान उन्हें कराया, वह यदि अन्ना हजारे के अनशन पर दिल्ली में ही व्यक्त कर देते तो यह हाल नहीं होता। जनता में राय शुमारी करे बिना बयान-बहादुरों की दम पर दस्तक देने का दांव उल्टा ही पड़ा है। अब उन्हें ज्ञान आया है कि जीवन के 40 बसंत गुजर चुके हैं, पर उनके दर्द-ए-दिल की दास्तां सुनने आज तक कोई नहीं आया। तब उन्होंने राजनीति से मुहब्बत करने का फैसला कर ही लिया। यह क्षेत्र कंटकी से भरा पड़ा है। इस नाचीज ने भी उन्हें इस दलदल में डूबने से पहले विश्वनाथ तिवारी की यह कविता सुनाकर अगाह किया-

गुरू ने कटवा लिया शिष्य का अंगूठा

भाई ने भाई को निष्कासित कर दिया

एक असहाय नारी नंगी कर दी गई महारथियों के बीच

नहीं उठाया अर्जुन ने गाण्डीव,

नहीं दिया कृष्ण ने युद्ध-मन्त्र

एक महाभारत टल गया।

मेरे मित्र राजकुमार ने उनकी इस दशा पर तरस खाकर समझाया भी – ‘ओ भईया, इस देश में तुम्हें नहीं मिल सकती कुर्सी रूपी दुल्हनिया। चुनाचे तुम यूपी से दिल्ली तक मिली हार को हाजिर-नाजिर मान कर इंतजार में सुबह उठकर फुनवा पर फूल चढ़ाते, अगरबत्ती लगाओ… ताकि किसी कुर्सी रूपी दुल्हनिया का मधुर स्वर सुनाई पड़े।’

पर दिन गुजरते रहे फोन की घंटी नहीं बजी। अचानक एक दिन इठलाती बलखाती कुर्सी रूपी दुल्हनिया ने उनके मकान में प्रवेश करके कहा – ‘मियां, अपने खराब फोन का नम्बर देते शर्म नहीं आई…अरे, कुर्सी रूपी दुल्हनिया से मुहब्बत करने से पहले फोन को सभी परफेक्ट रखते हैं।’ वह इस बाला के खासे प्रेम से प्रभावित होकर बोले – ‘हे चन्द्रमुखी, मैं प्रतिदिन नियम से कानाफूसी यन्त्र को लोहान, अगरबत्ती और पुष्प से पूजन कर उसकी उपासना करता था, लेकिन एक घण्टी की ध्वनि हेतु बेकरार था।’ कुर्सी रूपी दुल्हनिया बोली – ‘हे स्वाभिमानी, स्वावलंबी प्रियतम! आपके धैर्यवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर आपको वरण करने हेतु मैं उत्सुक हूं, परन्तु पहले अपनी उम्र की सही-सही गणना करके बताओ…।’ प्रसन्न मुद्रा बनाकर वह बोले – ‘हे कुर्सी रूपी दुल्हनिया, मैं इस वर्ष अगस्त माह में तीस वर्ष पूर्ण कर इकत्तीसवें वर्ष में प्रवेश करूंगा। ….अब तो मॉडर्न जमाना है, यह जोड़ी तो चलेगी… दस ही वर्ष का अन्तर है!’ जवाब में कुर्सी रूपी दुल्हनिया ने कहा – ‘मेरी उम्र इस वक्त 40 वर्ष है और तुम्हारी 30 वर्ष… यह विशाल दूरी भरनी असंभव है। इसलिए तुम मेरी कल्पना छोड़ो….हां, अपना टेलीफोन परफेक्ट रखो।’ इतना कह कर कुर्सी रूपी दुल्हनिया चली गई। मेरे मित्र के दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, वह कुंवारे के कुवांरे ही रह गए।

मित्र घनानन्द को लगा – ‘नत्था भले ही आत्महत्या न कर पाए, शोभन सरकार को खजाना न मिल पाए, लेकिन जनता सब जानती है कि कौन किसे कहां गर्जना रैली में अपना फलूदा बनाने की जुगत में है।’ जैसा कि जनता के शायर अदम गोंडवी कहते हैं :

जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे

कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे।

ये वंदेमातरम् का गीत गाते हैं, सुबह उठ कर,

मगर बाजार में चीजों का दुगुना दाम कर देंगे।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

Влад Малийчто наносят под тональный крем

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