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भारत की विदेश नीति एवं सुशासन

कुछ समय पहले तक विदेश नीति प्रक्रिया को एक विशेष विषय के तौर पर देखा जाता था। इसका विशेष रूप से संचालन भी किया जाता था। देश के चुनावों में इसे मुख्य कारक के रूप में नहीं देखा जाता था। भारतीय संसद में विदेश नीति और रक्षा मुद्दों पर कभी बहस नहीं हुई।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी एकाएक अपने पूर्वजों की राह पर चल पड़े हैं। आजकल वह अपने शासकीय अधिकारियों को या तो पुरस्कृत कर रहे हैं, या उन्हें लाभ पहुंचा रहे हैं। ऐसा करने के पीछे एक कारण आगामी आम चुनावों में कांग्रेस पर मंडरा रहा हार का खतरा बताया जा रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री जी अपने कार्यकाल के दौरान ही अपने निकटतम शासकीय अधिकारियों को ऊंचे पद का तोहफा देने में व्यस्त हैं। इसी कड़ी में सत्ता के गलियारे में अफवाह फैली हुई है कि प्रधानमंत्री के संयुक्त सचिव विक्रम मिसरी को सुनील लाल के स्थान पर स्पेन में राजदूत के रूप में स्थानान्तरित किया गया है। वहीं सुनील लाल को स्पेन से स्थानान्तरित कर तुर्की भेज दिया गया है। ऐसी अफवाह भी है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन को राज्यपाल बना कर जम्मू-कश्मीर भेजना चाहते हैं। माना जाता है कि मेनन के भाजपा के वरिष्ठ नेता (जो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री थे।) से भी अच्छे संबध हैं। इसलिए अगर केंद्र में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनती है, तो भी मेनन को इससे कोई खतरा नहीं होगा।

यहां दो अधिकारियों (विक्रम मिसरी व शिव शंकर मेनन) का जानबूझकर जिक्र इसलिए किया गया है, क्योंकि ये दोनों भारतीय विदेश सेवा के मुख्य सदस्य हैं। मेनन विदेश सचिव के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं और फिलहाल वह एक राजनीतिज्ञ हैं। लेकिन, इससे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान विदेश मंत्रालय ने अपनी साख निरंतर खोई है। विदेश मन्त्रालय का काम देश के विदेश संबधों को मजबूत करना और भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का संचालन करना होता है। एक संस्था के तौर पर विदेश मंत्रालय कभी इतना कमजोर नहीं हुआ, जितना आज है। ऐसा प्रतीत होता है कि विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष अपने अधिकारों का समर्पण कर दिया है। भारत की विदेश नीति प्रक्रिया कभी इतनी कमजोर नहीं थी, जितनी यह मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान हो गई है। विदेश मंत्रालय का विदेश नीति प्रक्रिया में भी योगदान न के बराबर है। सभी निर्णय प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिमंडल के सदस्य ही लेते हैं।

मेरा मकसद मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान विदेश नीति प्रक्रिया की उपलब्धियों या असफलताओं की तरफ ध्यान केंद्रित करना नहीं है। इस मुद्दे को मैं भविष्य में जरूर उठाऊंगा। यहां मैं भारत की विदेश नीति प्रक्रिया से जुड़े संस्थानों, उनकी प्रणाली और उनके तौर-तरीकों की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। भारतीय राजनीति में ‘सुशासन’ नाम के नारे पर आजकल काफी जोर दिया जा रहा है। अगर आने वाली सरकार के गठन के लिए ‘सुशासन’ ही प्रमुख कारक है, तो यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि ‘सुशासन’ किस तरह देश की विदेश नीति प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

कुछ समय पहले तक विदेश नीति प्रक्रिया को एक विशेष विषय के तौर पर देखा जाता था। इसका विशेष रूप से संचालन भी किया जाता था। देश के चुनावों में इसे मुख्य कारक के रूप में नहीं देखा जाता था। भारतीय संसद में विदेश नीति और रक्षा मुद्दों पर कभी बहस नहीं हुई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने विदेश मंत्रालय को अपने पास रखा था। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के साथ मिलकर विदेश नीति को दिशा प्रदान की थी। संसद को केवल विदेश नीति के निर्णयों के बारे में ही बताया जाता था। आज भी कहीं न कहीं यही व्यवस्था है। केंद्रीय मंत्री शशि थरूर के अनुसार संसद में प्रश्नकाल के दौरान केवल 5 प्रतिशत प्रश्न ही विदेश नीति पर पूछे जाते हैं। गौरतलब है कि शशि थरूर विदेश मामलों के एक विख्यात विद्वान भी हैं। थरूर के अनुसार नेहरू और उनके उत्तराधिकारियों के जमाने में संसद की सलाहकार समिति विदेश नीति पर बहुत कम समय व्यतीत करती थी। वहीं आज विदेश मामलों की स्थाई समीति विदेश प्रतिनिधि मंडल से मिलने-जुलने में ही सारा समय व्यतीत करती है।

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की संसद विदेश नीति या कूटनीतिक मामलों में आज अपना योगदान नहीं देती है। देश का एक और मुख्य स्तंभ, सेना भी विदेश नीति में अपना योगदान दे पाने से वंचित है। यहां तक कि सेना ने पूरी ईमानदारी से अपने आप को इससे दूर रखा हुआ है। भारतीय सेना के अनुभवी विद्वान स्टीफन कोहेन कहते हैं – ‘भारतीय सेना के बराबर महत्वपूर्ण और इतनी बड़ी शायद ही किसी अन्य देश की सेना हो, जिसका उच्च स्तर पर विदेश नीति की प्रक्रिया में कोई योगदान न हो।’ सेना के प्रमुख अधिकारी सरकार की उच्च समिति बैठकों में शामिल नहीं होते और न ही उनसे महत्वपूर्ण विदेश या रक्षा मामलों में कोई सलाह ली जाती है।

विदेश मामलों की एक पत्रिका (फॉरन अफेयर्स) में मंजरी चटर्जी मिलर ने भारतीय विदेश नीति की प्रक्रिया में तीन मुख्य कमियों को उजागर किया है। उनके अनुसार – ‘पहला, नई दिल्ली में लिए जाने वाले विदेश नीति के निर्णय एक व्यक्ति व एक सोच से प्रेरित होते हैं। प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी विदेश नीति के निर्णय में जिम्मेदार होते हैं, न कि अनुभवी कूटनीतिज्ञ। इस कारण भारत लंबे समय तक विदेश नीति के अपने लक्ष्यों से भटका रहा, जिससे भारत को विश्व स्तर पर काफी मुश्किलें हुईं। दूसरा, भारत के विदेश नीति निर्धारक तत्व बाहरी प्रभाव, जैसे विशेषज्ञों की कमेटी के आभाव से ग्रस्त है। दूसरे देशों में ऐसी कमेटियों ने विश्व स्तर पर सरकार को समर्थन दिया है। तीसरा, भारत का विशिष्ट वर्ग पश्चिमी संदर्भ में देश के विकास की धारणा से डरा हुआ है। इस धारणा ने अवास्तविक तौर पर भारत की आर्थिक स्थिति और देश की अन्तर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के विकास की उम्मीदों को फिर से जगा दिया है।’

भारतीय विदेश सेवा (जिसके अधिकारी भारत की कूटनीतिक सफलता के रचयिता हैं।) की बात करते हुए मंजरी कहती हैं – ‘अमेरिका और विश्व के अन्य देशों से अलग भारत में कूटनीतिज्ञ उच्च कूटनीतिक पदों पर कायम हैं। भारतीय विदेश सेवा की महत्वपूर्ण भूमिका विदेश नीति के निर्णय को एक व्यक्तिएक सोच से प्रेरित करती है। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को देश के बुद्धिमान लोगों में गिना जाता है। उन्हें व्यापक प्रशिक्षण दिया जाता है तथा उनसे किसी भी कार्य को विशेषज्ञ की तरह किए जाने की उम्मीद की जाती है। इसके अतिरिक्त भारतीय विदेश सेवा की प्रवेश नीतियों से साफ है कि उनके छोटे से दल के सभी अधिकारियों को उच्च स्तर की जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। इसके साथ सलाह संबंधी उनके कार्यों में उन्हें नीतियों को बनाने में विशेष छूट होती है। इस स्वायत्तता का अभिप्राय है कि नई दिल्ली में लंबे समय तक चलने वाली विदेश नीति में बहुत कम सोच-विचार किया जाता है। ज्यादातर सरकार की कूटनीतिक योजनाएं केवल एक व्यक्ति एक सोच से ही प्रेरित होती हैं।’ बहुत सारे यूरोपीय देशों में राजदूत के पद पर काम कर चुके एक पूर्व राजदूत ने मंजरी को बताया – ‘मुझे विदेश मंत्रालय में किसी भी देश के लिए भारत की लंबे समय तक चलने वाली विदेश नीति के संदर्भ में कभी कोई दिशा-निर्देश या कोई सूची नहीं मिली।’

ऊपर से नीचे तक दिशा-निर्देशों की कमी के कारण लंबे समय तक चलने वाली विदेश नीति का गठन मुश्किल है। भारतीय विदेश सेवा एक विशेष विभाग है, जिसके कारण यह समस्या और अधिक गहन हो जाती है। मंजरी आगे लिखती हैं – ‘भारतीय विदेश सेवा की प्रवेश नीतियों के कारण नई दिल्ली में स्टाफ की भारी कमी हो गई है। इस कारण अन्य अधिकारियों पर काम का अत्यधिक बोझ है जिससे वे कूटनीतिक योजनाओं के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। राष्ट्रीय रक्षा सलाह कार्यालय में नियुक्त राजदूत ने मुझे बताया कि अधिकारियों के लिए लंबे समय तक चलने वाली विदेश नीति पर ध्यान केंद्रित करना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि उन्हें रोजमर्रा के काम से ही फु र्सत नहीं मिलती।’ इन कूटनीतिक योजनाओं की कमियों को और उजागर करते हुए मंजरी आगे कहती हैं – ‘देश में प्रभावशाली सोच की कमी है। भारतीय विदेश सेवा में स्टाफ की कमी ही नहीं बल्कि अधिकारियों का देश की प्रतिष्ठा के लिए गहन शोध व अध्ययन के लिए बाहरी कारकों को दरकिनार करना भी एक कारण है। जबकि अमेरिकी विदेश सेवा अधिकारी कूटनीतिक योजनाओं के लिए उन सभी संस्थानों से संपर्क करते हैं, जिनसे स्वयं सरकार सहायता लेती है।’

मंजरी ने इस पूरे लेख में यह नहीं बताया कि विदेश मंत्रालय किस तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में निरंतर अपनी शक्ति खोता रहा। अगर विदेश मंत्रालय विशिष्ट है, तो प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रणाली अतिविशिष्ट है जो देश की विदेश नीति को संचालित करती है। लेकिन इस सब के बाद भी दूसरी प्रशासनिक सेवाओं की तरह ही भारतीय विदेश सेवा को भी शक्तिशाली एवं उत्साहित होना पड़ेगा ताकि उनका प्रदर्शन सुधरे व जवाबदेही बनी रहे। इसके साथ भारतीय विदेश नीति का लोकतंत्रीकरण करना भी अनिवार्य है। भारतीय राजनीति और शासन निरंतर बदलाव की ओर अग्रसर है। अब वो दिन लद गए जब एक पार्टी का शासन हुआ करता था। यह एक ऐसा कारक था, जो सत्ताधारी पार्टी के नेता (प्रधानमंत्री) को विदेश नीति के निर्णय लेने की छूट देता था। आज का युग गठबंधन का है। आज क्षेत्रीय पार्टियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बहुत-सी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पार्टियां, जिनका सीमावर्ती राज्यों पर शासन है, पड़ोसी देशों के रवैये से परेशान हैं, जबकि नई दिल्ली की परेशानियां इससे अलग हैं। उदाहरण के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान से परेशान हैं, तो वहीं पश्चिम बंगाल बांग्लादेश से चिंतित है और तमिलनाडू श्रीलंका से। वहीं भाजपा और सी.पी.एम जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के देश के मसलों पर अपने-अपने विचार हैं। इसके अलावा विकास पुरूष मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं, जो ऋण एवं निवेश के मामले में विदेशी निवेशकों से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। वह भारत के बाहर भी इसी प्रयास में जाते रहते हैं। इसके अलावा कृषि एवं दूसरे व्यवसायों में (जिनमें केंद्र सरकार विदेश सरकार से मोल-भाव करती है।) मुफ्त व्यापार समझौते तभी सफल हो सकते हैं, जब ऐसे प्रदेशों के मुख्यमंत्री इन समझौतों को स्वीकार करें। अब तक यही देखा गया है कि भारत की विदेश नीति एक संघीय ढांचे की तरह होती जा रही है। नई सोच, भिन्न गुटों का दवाब व पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग, सभी विदेश नीति पर आम राय को बदलने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

इन सभी उभरती विचारधाराओं के बावजूद, भारत की विदेश नीति की प्रक्रिया की मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सुस्त रफ्तार वाकई हैरान करने वाली है। इसका एक और उदाहरण उनका बांग्लादेश और श्रीलंका के संदर्भ में बनाई नीतियों में ममता बनर्जी और जयललिता को शामिल न करना भी है। उनकी पाकिस्तान और चीन के प्रति आदर्शवादी नीतियां सेना को शामिल न करने के कारण विफल रहीं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि मौजूदा सरकार की पड़ोसी देशों के प्रति नीतियां भी विफल रही हैं। दूसरे शब्दों में लोकतंत्र में भारत की विदेश नीति और इसकी प्रक्रिया पर पुनर्विचार की जरूरत है। अब यहां ‘सुशासन’ होना ही चाहिए।

प्रकाश नंद

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