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नहीं है देश का मतदाता भोला

देश में महंगाई बढऩे का क्रम तो ऐसा है कि वह सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि को भी खा जाएगी और देश की जनता तो महंगाई से स्थायी रूप से त्रस्त है ही। खजाने पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार अप्रत्यक्ष रूप से तो आम जनता की जेब पर ही पडऩे वाला है।

मेरे भांजे पुनीत गौत्तम के बच्चे– तविश और तारिणी जब काफी छोटे थे, तब उनके साथ खेलने में बहुत मजा आया करता था। उन्हें टॉफी देते हुए मैं पहले उनके आगे हाथ फैला कर अपनी हथेली उन्हें दिखा दिया करता था कि हथेली बिल्कुल खाली है। फिर उनसे पूछता– ‘टॉफी चाहिए?’ उनके ”हां’’ कहने पर हवा में अपनी बंद मुट्ठी लहरा कर कहता– ‘देखो जादू दिखाता हूं! हवा में से अब टॉफी आएगी।’ फिर उनकी आंख बचा कर अपने पास छिपा कर रखी टॉफी मुट्ठी में बंद कर उनके सामने मुट्ठी खोल देता था। मेरी हथेली पर टॉफी रखी देख वे खुश हो जाते। उन्होंने मेरा नाम ही ”जादू दादू’’ रख दिया था। तविश और तारिणी अब बड़े हो गए हैं। टॉफी वे अब भी मांगते हैं, लेकिन हवा में लहराने से पहले ही वे मुट्ठी खुलवा लेते हैं। अब उन्हें पता है कि मैं उनकी मासूमियत का लाभ उठा कर उनसे खेल करता रहा हूं। केवल मैं ही नहीं बल्कि खुश करने के लिए बच्चों के साथ लगभग सभी ऐसा ही खेल खेलते हैं।

लोकसभा के लिए चुनावी धमक सुन कर यूपीए सरकार ने भी अपनी डूबती नैया पार लगाने के लिए ”जादू दादू’’ की तरह मुट्ठी हवा में लहरा कर सातवें वेतन आयोग के गठन की ”टॉफी’’ मतदाताओं के सामने रखी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक कुमार माथुर की अध्यक्षता में सातवां वेतन आयोग गठित कर केन्द्र सरकार के 80 लाख कर्मचारियों (30लाख पेंशनभोगी सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों सहित) को चुनावी ”टॉफी’’ दी है।

केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों को आम चुनावों में लुभाने के लिए यूपीए सरकार दूसरा चुनावी तोहफा देने की तैयारी की जा रही है। दूसरा चुनावी तोहफा केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के डीए में 10 प्रतिशत की वृद्धि का हो सकता है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि सरकार अपने कर्मचारियों के डीए में 10प्रतिशत की वृद्धि करने पर विचार कर रही है। यदि केन्द्रीय कर्मचारियों के डीए में 10प्रतिशत की वृद्धि की जाती है तो उसके बाद सरकारी कर्मचारियों के वेतन में महंगाई भत्ता बढ़ कर शतप्रतिशत हो जाएगा। इसी क्रम में यूपीए सरकार बड़े ही नाटकीय ढंग से हाल ही में रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या 9 से बढ़ा कर 12 कर चुकी है। इतना ही नहीं लोकलुभावन योजनाओं में महिला स्वयं सहायता समूहों को सस्ता ऋण देने की घोषणा भी सरकार कर चुकी है।

खुद को वेतन आयोग के गठन पर पहले फोकस करते हैं। सरकार हर दस साल में अपने कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए वेतन आयोग गठित करती है और बाद में राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए थोड़े-बहुत बदलाव के साथ उस पर अमल करने लगती हैं। वेतन आयोग महंगाई और बदली परिस्थितियों के मद्देनजर सरकारी कर्मचारियों की वेतनवृद्धि की मात्रा पर सरकार को सुझाव देता है। वित्त मंत्रालय ने नवगठित वेतन आयोग की सिफारिशें 1जनवरी 2016 से लागू करने के लिए आयोग से अपनी रिपोर्ट दो साल के भीतर सौंपने के लिए कहा है।

केन्द्र सरकार आमतौर पर 9 साल के अन्तराल में वेतन आयोग का गठन करती है। लेकिन यूपीए सरकार कुछ जल्दी में दिखाई दे रही है। लग तो यह रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार महसूस कर रही है कि केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के हित में आगे उसे कुछ करने का सीधा मौका नहीं मिल पाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है। है इसका उलट। मनमोहन सिंह सरकार अपने कर्मचारियों के भले में कदम उठाने की बजाए उन कदमों से खुद का भला करने की मंशा बना रही है।

लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने हैं। चुनाव आयोग द्वारा इन चुनावों की घोषणा करते ही आचार संहिता लागू हो जाएगी। इसमें अधिक वक्त दिखाई नहीं देता। इस बात की संभावना है कि चुनाव आयोग कभी भी लोकसभा चुनावों की घोषणा कर सकता है। उसके बाद मतदाताओं को लुभाने के लिए लोकलुभावन योजनाओं की घोषणाएं करने में यूपीए सरकार के हाथ बंध जाएंगे। मनमोहन सिंह सरकार की जल्दबाजी के पीछे असल कारण यही दिखाई देता है।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने, डीए में 10 प्रतिशत की संभावित वृद्धि किए जाने, रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या 9 से बढ़ा कर 12 करने, महिला स्वयं सहायता समूहों को सस्ता ऋण दिए जाने में लगभग एक लाख 30हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्तभार सरकार के खजाने पर पडऩे का अनुमान है, जो हिरफिर कर जनता की जेब से निकलना है। इसमें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में सरकारी खजाने पर एक लाख करोड़ रूपए का भार पडऩे की संभावना है।

कांग्रेस विरोधियों का उसके खिलाफ एक स्थायी आरोप होता है– ”कांग्रेस आई, महंगाई लाई!’’ देश की जनता महंगाई से भयंकर रूप से त्रस्त है। गरीब की थाली से रोटी-दाल ही नहीं, बल्कि पूरी थाली गायब होती दिख रही है। महंगाई ने गरीब के आगे से उसकी पूरी थाली और मतदाता ने हाल के चुनावों में दिल्ली और राजस्थान से कांग्रेस को गायब कर दिया है। ”बीमारी के कारणों को दूर करने की बजाय दर्द निवारक गोली से उसका ईलाज करने’’ की शैली में सरकार महंगाई दूर करने का रास्ता मूल्यों को नियन्त्रित करने के कारगर उपाय करने की बजाय, उससे बड़ी रेखा खींच कर वेतन आयोग का गठन करने, महंगाई भत्ता बढ़ाने, रसोई गैस के सिलिंडरों की संख्या में वृद्धि करने जैसी अपनी बाजीगरी दिखाने की कोशिश कर रही है।

ऐसा नहीं है कि लोक कल्याण की सभी योजनाएं जनता के हित में होती हैं। ईमानदारी और सही नीयत तथा उचित समय पर लागू की जाने वाली योजनाओं का लाभ आम जनता को मिलने की संभावना अधिक होती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि सभी लोकलुभावन योजनाएं जनता का स्थायी कल्याण करती हों। कई बार ऐसी योजनाएं जनता के कल्याण की बजाय, सरकार के खुद के कल्याण के लिए भी होती हैं। लम्बे समय में वे जनता के लिए त्रास्दी भी बन जाती हैं।

महंगाई की विभीषिका और सरकार के लोकलुभावन कदमों से आम जनता की त्रास्दी को ऐसे समझा जा सकता है कि केन्द्र सरकार ने वेतन आयोग गठित किया पचास लाख केन्द्रीय कर्मचारियों और 30 लाख पेंशनभोगियों के लिए। सरकारी कर्मचारियों का वेतन अभी बढ़ा नहीं है। वेतन तो 2016 में बढ़ेगा। अभी तो वेतन आयोग का केवल गठन हुआ है। वेतन तो आयोग की सिफारिशें आने पर और आने वाली सरकार द्वारा उन्हें स्वीकार कर उसकी अधिसूचना जारी किए जाने पर बढ़ेगा, लेकिन वेतन आयोग के गठन की सूचना मात्र से ‘महंगाइ’ में आगे बढऩे की ताकत पैदा हो गई है। राज्य सरकारें केन्द्र का ही अनुसरण करेंगी। लेकिन महंगाई तो वहीं की वहीं रहेगी। देश में केवल 80 लाख परिवार नहीं, बल्कि सवा सौ करोड़ की जनसंख्या रहती है।

देश में महंगाई बढऩे का क्रम तो ऐसा है कि वह सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि को भी खा जाएगी और देश की जनता तो महंगाई से स्थायी रूप से त्रस्त है ही। खजाने पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार अप्रत्यक्ष रूप से तो आम जनता की जेब पर ही पडऩे वाला है।

वैसे भी लोकसभा चुनावों में इतना समय नहीं रह गया है कि यूपीए सरकार अपनी योजनाओं को खुद लागू कर सके। हालांकि संवैधानिक रूप में तो अपना कार्यकाल पूरा करने या नई सरकार आने तक हर मौजूदा सरकार ‘पूर्ण अधिकारिक’ सरकार ही होती है। लेकिन नैतिकता का तकाजा होता है कि उसे केवल उतने ही वैसे कदम उठाने चाहिएं जिनकी संवैधानिक बाध्यता या समय की मांग हो, अन्यथा जिन्हें वह खुद पूरा कर सकती हो।

सातवें वेतन आयोग का गठन होना ही था। यह सरकार नहीं करती, तो आने वाली सरकार की जिम्मेदारी होती। लेकिन चुनावों की दस्तक सुन कर ऐसे कदम उठाना मनमोहन सिंह की सरकार की घबराहट बताता है। लेकिन, उसके साथ ही देश के मतदाता, खासतौर पर यह लोकलुभावन योजनाओं से लाभान्वित होने वाले मतदाताओं को न समझ पाने की कांग्रेस की नासमझी भी बताता है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा सितम्बर में सातवें वेतन आयोग के गठन की मंजूरी दिए जाने के बाद दिसम्बर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दिल्ली (जहां केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की संख्या सबसे अधिक है।) और राजस्थान में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने और मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में आज कांग्रेस की सरकार न होने की वजहों के स्पष्ट संकेत कांग्रेस और चुनाव पूर्व ही सातवें वेतन आयोग के गठन की मंजूरी देने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह जरूर समझ गए होते। वैसे इस बात की संभावना भी है कि डॉ. मनमोहन सिंह समझते सब हैं, लेकिन न समझने का दिखावा भी करते हैं। सभी जानते हैं कि वो दिन लद गए जब लोकलुभावन वादों पर मतदाता फिदा हो कर मूर्ख बना करता था।

अब समय की मांग है कि मतदाता को मासूम समझ कर यूपीए सरकार ”हवा में मुट्ठी लहरा कर टॉफी निकालने’’ की बाजीगरी के इस प्रकार के कदम न उठा कर केवल अपने नैतिक एवं संवैधानिक दायित्वों को ही पूरा करे। चुनावी दंगल में तो सभी दलों के लिए अखाड़ा समान ही होना चाहिए।

श्रीकान्त शर्मा

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