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त्याग और संन्यास

एक बार देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच्छ विद्या पढ़कर आया। बृहस्पति ने देखा कि पुत्र में कुछ अहंकार है। बृहस्पति ने उससे आत्मा-परमात्मा से संबंधित प्रश्न पूछा तो वह उत्तर नहीं दे पाया। कच्छ ने पूछा, ‘पिताजी, यह ज्ञान मुझे कैसे होगा?’ उन्होंने कहा, ‘त्याग करो।’ कच्छ ने घर छोड़ दिया। वर्षभर भ्रमण करके फिर पिताजी के पास आया। पिताजी ने पूछा कि कुछ ज्ञान हुआ तो उसने कहा, ‘नहीं हुआ।’ बृहस्पति ने फिर कहा कि त्याग करो। अब कच्छ ने भोजन का त्याग कर दिया। एक वर्ष बाद फिर आया। फिर वहीं प्रश्न किया गया, उसे फिर भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। उसे फिर से त्याग करने का उपदेश दिया गया। इस प्रकार उसने फलाहार, वस्त्र और अंत में कौपीन का भी त्याग कर दिया। वह फिर अपने पिताजी के पास गया, और बृहस्पति ने फिर कहा कि त्याग करो। उसे विचार किया कि अब चह शरीर ही बचा है, इसका ही त्याग कर देता हूं।

उसने एक चिता बनाकर अग्नि लगायी। अग्नि लगाकर जैसे ही वह चिता में जाने लगा, वैसे ही बृहस्पति ने हाथ पकड़ लिया। वे कहने लगे, ‘पुत्र! घर, भोजन, कपड़े या देह छोडऩे का नाम त्याग नहीं है।’ तब कच्छ ने पूछा, ‘पिताजी, त्याग किसे कहते है?’ बृहस्पति ने कहा, ‘जिस वस्तु से तुमने इन सब चीजों को पकड़ रखा है, उसका त्याग कर दो। चित्त-त्यागमेव त्याग:- चित्त में जो आसक्ति और अज्ञान भरा हुआ है, उसका त्याग कर दो, यही सबसे बड़ा त्याग है। धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य को भी छोड़ दो। अपने मन की जिस वृत्ति के द्वारा त्याग कर रहे हो, उस वृत्ति का भी त्याग कर दो, यही वास्तव में त्याग है। यही कर्मत्याग है और यही संन्यास है।’

चाह नहीं, चिंता नहीं, मनुआ बेपरवाह।

जाके मन चाह नहीं, सोई शाहंशाह।।

स्वामी मुक्तानन्द पुरी

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