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वसुधैव कुटुंबकम्

हमारे देश के कई बड़े शहरों में आजकल नस्लवाद का भूत फैल गया है। आए दिन नस्लवाद को लेकर हिंसा और उस हिंसा में हुई मृत्यु की खबरें सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि हमारे समाज में आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों की संख्या बढ़ गई है। पिछले हफ्ते देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नीडो तन्यम नामक एक 19 वर्षीय छात्र के साथ जो हुआ, वह अत्यंत दुखद एवं निंदनीय है। दूरस्थ अरूणाचल के पहाड़ों से आए नीडो के लिए उसके मां-बाप ने भविष्य के लिए न जाने कितने सपने देखे होंगे। शिक्षा एवं रोजगार हेतु उत्तर-पूर्व राज्यों से आए सभी लोगों को बार-बार समाज के असमाजिक तत्वों से लडऩा पड़ता है। यह सच में एक नागरिक के प्रति भयंकर सामाजिक अपराध है। हमारे राष्ट्र की राजधानी में भरे बाजार में नीडो तन्यम को पीट-पीट कर मार दिया गया। कुछ दिन पहले दिल्ली स्थित कोटला मुबारकपुर में अरूणाचल से आईं दो लड़कियों को भी अपमानित होना पड़ा था। हाल ही में बंगलूरू में लोईताम रिचर्ड और दिल्ली में रामछंपी हंगरे की रहस्मयी मृत्यु से एक बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि भारत के बड़े-बड़े शहरों में, चाहे उत्तर-पूर्वी नागरिक हो या विदेशी नागरिक, कोई भी अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हम सब भारतीय हैं। ‘अलग भाषा, अलग वेश – फिर भी अपनी माटी अपना देश।’ यह संस्कार हर भारतीयों को अपनाना चाहिए।

आजादी मिले बरसों बीत गए हैं, लेकिन विकास के व्यवधान एवं विषमता आज पूरे देश में एक बहुत बड़ा मुद्दा है। देश की एक दिशा में आज कहीं बुलेट टे्रन की योजना चल रही है, तो कहीं रेलवे लाईन तक भी उपलब्ध नहीं है। उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास के लिए भारत सरकार में एक अलग मंत्रालय भी बना, फिर भी हमारे उत्तर-पूर्वी राज्य आज तक उपेक्षित हैं। आज हजारों स्वयंसेवी संस्थाएं उत्तर-पूर्वी राज्यों में काम कर रहीं हैं, लेकिन, गरीबी और अशिक्षा आज भी देश के अन्य राज्यों की तुलना में अकल्पनीय रूप से बढ़ी है। प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुराज के अभाव में देश के समान्य देशवासियों को अपना जीवन गंवाना पड़ रहा है। विदेशी पर्यटक, जिन्हें अतिथि की तरह मान-सम्मान देना चाहिए, वे आज भारत जैसे प्राचीन व सांस्कृतिक नींव पर खड़े राष्ट्र में अपमानित हो रहे हैं। यह हमारे देश के लिए लज्जा का विषय है।

हमारी सरकार हमेशा जातिगत आधार पर राजनीतिक ढांचे को आगे बढ़ाती रही है, जिसके लिए भविष्य में देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर हम अपने देश में नस्लवादी हिंसा की घटनाएं नहीं रोक पाएंगे, तब विदेश में हुई भारतीयों की हत्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे उठा पाएंगे। गणतंत्र में हर नागरिक को न्याय, सम्मान एवं अधिकार दिलाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें सभी भारतीयों और विदेशी नागरिकों के प्रति भाईचारा निभाना चाहिए। बेसहारा व अनजान छात्रों या महिलाओं को मार देने से थोड़ी देर के लिए हमारा अवांछित गुस्सा तो शांत हो सकता है, लेकिन उससे किसी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। कानून हाथ में लेकर अपराध को बढ़ावा देकर कानून के शिकंजे से एक बार तो हम निकल सकते हैं, लेकिन परमात्मा के दरबार से नहीं निकल पाएंगे। कहीं न कहीं अपनी गलतियों का जवाब, आज नहीं तो कल हर किसी को देना ही पड़ेगा। मैं मानता हूं कि एक अपराधी के सामने इन सब बातों का कोई मूल्य नहीं है, पर क्या करें। हम सबके लिए यह शर्म की बात होनी चाहिए कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारी सरकार हमें सुशासन देने में विफल रही है। कानून एवं व्यवस्था को कायम रखने के लिए सरकार को अपराधियों के लिए ‘जीरो टॉलरैंस’ अपनाना पड़ेगा। नहीं तो जैसे ब्रिटिशर्स अपराध और अपराधियों को आड़े हाथों लिया करते थे, हमें भी कुछ वैसा ही तरीका अपनाना पड़ेगा।

अब समय आ गया है कि नस्लवाद जैसे भूत को देश की मिट्टी से उखाड़ फेंकना पड़ेगा। नहीं तो, नस्लवाद हमारी सामाजिक अखंडता को चूर-चूर कर देगा। पीडि़त चाहे किसी देश, प्रांत अथवा नस्ल से हो, लेकिन अपराध तो अपराध ही होता है। हमारे देश में कोई भी धर्म अथवा मजहब हिंसक प्रवृति को बढ़ाने की शिक्षा नहीं देता है। समाज में सहिष्णुता बढ़ाना भी एक महत्वपूर्ण विषय है। हमारे ऋषि-मुनियों ने दूसरों का आदर करने की हमें जो शिक्षा दी है, उसका हमें पालन करना चाहिए। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ यानी सारा विश्व एक परिवार। यही हमारा ध्येय होना चाहिए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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