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बुद्धि या हृदय में से हृदय को चुनो: स्वामी विवेकानन्द

युग पुरूष स्वामी विवेकानन्द के जीवन और सम्पूर्ण व्यक्तित्व के बारे कितना कुछ लिखा गया, लेकिन समाज और देश के प्रति किए गए उनके त्याग के बारे में कहना मानो सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। वह भारत की गरीबी को भारी अभिशाप और 33 करोड़ देवी-देवताओं से अधिक, देश की गरीब जनता की सेवा को अपना धर्म मानते थे। भारत में फैली अशिक्षा, कुरीतियों, गरीबी और वंचितों के दुखों से दुखी होकर रोते थे। कितने ही महापुरूषों ने विवेकानन्द के प्रति उद्गार प्रकट किए और उनसे देशभक्ति और समाज सुधार के लिए प्रेरणा ली। समाज को दिशा दिखाने वाले अनेक महान नेताओं ने उन्हें अपना आदर्श बनाया और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का प्रयास किया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के शब्दों में – ”स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को एक नया अर्थ दिया, जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वह इतने महान पुरूष और अद्वितीय योगी थे कि उनके बारे में वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।’’ एक बार बेलूर मठ में स्वामी जी ने अपने शिष्यों से कहा था – ”यदि बुद्धि या हृदय में से किसी एक को चुनने का अवसर आए तो बुद्धि को छोड़ कर हृदय को चुनें।’’

देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद

लेखक : शान्ता कुमार

प्रकाशक : किताबघर

मूल्य: 180 रु.

पृष्ठ: 184

हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केन्द्रीय मंत्री शान्ता कुमार के जीवन में तो स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों ने उस वक्त आलौकिक प्रकाश फैलाया जब वह अपना चुनाव हार कर निराशा में डूब-उतर रहे थे। गीता के उपदेश और स्वामी विवेकानन्द के जीवन का उन पर शुरू से गहरा असर रहा और उनका कहना है कि जब भी जीवन संघर्ष के विकट मोड़ों पर उन्हें आगे का मार्ग नहीं सूझता था, तब वह उन्हीं की शरण में जाया करते थे। स्वामी विवेकानन्द को अपना गुरू और पथ-प्रदर्शक मानने वाले शान्ता कुमार ने लगभग 48 साल पहले मानव ऊर्जा एवं संघर्ष शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक स्वामी विवेकानन्द के जीवन और आदर्शों का अध्ययन कर उन्हें समाज के प्रबुद्ध वर्ग ही नहीं, बल्कि आमजन तक पहुंचाने के संकल्प के साथ पुस्तक तैयार की-”देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानन्द (जीवन वृत्त)। आज जब स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं जन्म शताब्दी पूरे विश्व में मनाई जा रही है, तब इस पुस्तक का नया संस्करण पाठकों के सामने आया है। स्वामी विवेकानन्द क्रान्तिकारी विचारक और मर्मभेदी वक्ता भी थे। अमेरिका में हुए विश्वधर्म सम्मेलन में ‘हिन्दू धर्म’ के संबंध में उनके ओजस्वी भाषण ने पूरे विश्व की सोच को एक नई दिशा देते हुए उसे चिन्तन के नए आयाम दिए। उस पूर्व विवेकानन्द को उनके निकटस्थ लोगों के अतिरिक्त अधिक लोग नहीं जानते थे। उस ओजस्वी भाषण से पूरा विश्व उनके विचारों और संकल्पों से जैसे ओतप्रोत हो गया था। इस नए संस्करण में उन्हीं के शब्दों में उनके कुछ विशेष उद्गारों को अलग से सम्मिलित किया गया है। विश्व भर के महापुरूषों और मनीषियों के विचारों से सराबोर एक अलग अध्याय – ‘महापुरूषों की दृष्टि में’ भी है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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