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माया मृग: जगन्नाथ मंदिर में कस्तूरी का संकट

पिछले साल पुरी में जगन्नाथ रथयात्रा के कुछ ही समय पहले गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि नेपाल के अधिकारियों से बातचीत कर सरकार को भगवान की पूजा के लिए कस्तूरी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।

कस्तूरी नामक तत्व, कस्तूरी मृग की नाभि से प्राप्त होता है, जो भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा में ‘नेत्र-उत्सव’ के अवसर पर मंदिर के तीन प्रमुख देवताओं के ‘मुख-श्रृंगार’ के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा, हेरा पंचमी के अवसर पर भी देवताओं के ‘मुख- श्रृंगार’ के लिए कस्तूरी का प्रयोग किया जाता है। देव श्रृंगार के लिए आवश्यक कस्तूरी गुप्तसेवा अनुष्ठान के दौरान तब काम आती है, जब भगवान रथयात्रा के दौरान कमजोरी महसूस करते हैं। हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ इस उत्सव का प्रमाण होती है और मंदिर का प्रांगण कस्तूरी की महक से सुगंधायमान रहता है। कस्तूरी के प्रयोग के कई दिन बाद तक मंदिर के पवित्रतम स्थल में कस्तूरी की तेज महक व्याप्त रहती है।

माना जाता है कि देवताओं के ‘मुख-श्रृंगार’ के लिए हर बुधवार को कस्तूरी का प्रयोग किया जाता है, लेकिन इस सुगंधित पदार्थ की भारी कमी के कारण यह अनुष्ठान पिछले कई वर्षों से मासिक हो गया है। देवताओं के मुख पर इस सुगंधित पदार्थ लगाने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले दैत्यपति रामचंद्रदास महापात्रा के अनुसार, लगभग पांच ग्राम कस्तूरी के पाउडर में कपूर, हींग और विभिन्न जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं। उसके बाद उस लेप को तीन देवताओं के चेहरे और शरीर पर लगाया जाता है, जिससे कि लकड़ी की आकृति कीट मुक्त बनी रहे। धार्मिक महत्व के अलावा इस अनुष्ठान का वैज्ञानिक महत्व भी है।

तीनों देवताओं को वस्त्र पहनाने का दायित्व संभालने वाले मंदिर के दूसरे सेवायत मधुसूदन सिंगारी भी कस्तूरी की कमी को स्वीकार करते हैं। सिंगारी और उनके सहयोगी भगवान को वस्त्र धारण कराने, आभूषणों से शोभायमान करने, काजल लगाने के साथ-साथ अन्य प्रकार के सौंदर्य-प्रसाधन लगाने का काम करते हैं। उनका कहना है कि बिना कस्तूरी के लेप का श्रृंगार अधूरा रहता है।

कस्तूरी का एक मात्र स्रोत, नेपाल सहित हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले कस्तूरी मृग है। यह एक विलुप्त प्रजाति है और अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के रेड डाटा में इसे अंकित किया गया है। कस्तूरी मृग सूची-1 के अंतर्गत आने वाला जीव है और वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम के तहत यह भारत और नेपाल, दोनों में संरक्षित है। कस्तूरी नाम उस पदार्थ को दिया गया है, जो ‘नर कस्तूरी मृग’ के पेट और जननांगों के बीच स्थित ग्रंथियों में होता है और वातावरण में सुगंध फैलाता है। कस्तूरी को प्राप्त करने के लिए मृग को मार कर ‘कस्तूरी फली’ कहलाने वाली उन ग्रंथियों को निकाल लिया जाता है।

प्राचीन काल से ही इस पदार्थ का प्रयोग सुगंधित इत्र बनाने के लिए किया जाता है। यह विश्व में प्राप्त सबसे महंगे जीव-उत्पादों में से एक है। संस्कृत शब्द ‘मस्क’, जिसका अर्थ अंडकोष होता है, से उत्पत्ति हुए इस नाम पर आधारित लगभग समान सुगंध के कई पदार्थ बनाए जाते हैं, जबकि रासायनिक संरचना में वे एक दूसरे से काफी अलग होते हैं।

पिछले कुछ सालों से दुर्लभ और अमूल्य कस्तूरी की भारी कमी ने 12वीं शताब्दी में बने इस मंदिर के सेवकों और पदाधिकारियों की रातों की नींद गायब कर दी है। परंपरा यह रही है कि जगन्नाथ मंदिर में विशेषाधिकार प्राप्त नेपाल का शाही परिवार पुरी में भगवान के लिए आवश्यक कस्तूरी की व्यवस्था करता है। नेपाल में राजशाही की समाप्ति के बाद, नेपाल का नया शासक वर्ग कस्तूरी-आपूर्ति की मंदिर प्रशासन के अनुरोध के प्रति उत्तरदायित्व नहीं निभा रहा है।

जगन्नाथ मंदिर में कस्तूरी का रखा भंडार प्रति वर्ष घट रहा है, जबकि नेपाल इसकी आपूर्ति पूरी तरह बंद कर चुका है। कुछ भक्त अल्प मात्रा में ही कस्तूरी का दान देते हैं। मंदिर प्रशासन इसी दान से अपना प्रबंधन कर रहा है। मंदिर के सूत्रों का कहना है कि नेपाल के राजा द्वारा कस्तूरी की अंतिम बार आपूर्ति 1999 में की गई थी। 80 के दशक में महाराज बीरेन्द्र और महारानी ऐश्वर्य ने कस्तूरी के बड़े भंडार के साथ मंदिर में भगवान के दर्शन किए थे। कस्तूरी का यह भंडार वर्षों तक चला था। 2006 में मंदिर प्रशासन उस वक्त आश्चर्यचकित रह गया, जब एक अतिथि भिक्षुक ने भगवान को कुछ फलियां अर्पित कीं। बहुत कम अवसरों पर ही कोई भक्त भगवान को कस्तूरी समर्पित करता है। लेकिन जब ऐसा होता है तो उस वक्त मंदिर के सेवायत और अधिकारिय खुशी से झूम उठते हैं।

हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ अकेले ऐसे देवता नहीं हैं, जिनके लिए कस्तूरी का प्रयोग किया जाता है। ‘कृष्ण कर्णामृत’ में भी भगवान मुकुंद द्वारा कस्तूरी का तिलक करने का संदर्भ मिलता है।

कस्तूरीतिलकम् ललाटफलके वक्ष:स्थले कौस्तुभम्

नासाग्रे नवमौक्तिकम् करतले वेणुम् करे कङ्कणम्।

सर्वाङ्गहरिचन्दम् च कलयन् कण्ठे च मुक्तावलिम्

गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूड़ामणि:।।

इस समस्या से पूरी तरह अवगत नेपाल के अधिकारी, इस मामले में अपनी विवशता व्यक्त करते हैं। प्राचीन काल से जगन्नाथ मंदिर के साथ नेपाल के राजपरिवार के साथ रहा गहरा संबंध जगजाहिर और स्वीकार्य है। सरकार ने वार्षिक रथयात्रा के लिए धनराशि का आवंटन करने की कोशिश की थी। नेपाल के वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला हिंदू अक्षय निधि संस्था ‘कौशी तोशखाना’ ने हाल ही में कोलकाता स्थित ‘मां काली के मंदिर’ के रख-रखाव के लिए 30 लाख रूपया निर्गत किया था। तोशखाना, पूरे नेपाल और नेपाल के जुड़ाव से संबंधित भारत के कुछ मंदिरों के रख-रखाव के लिए वित्तीय प्रबंधन का काम देखता है। नेपाल के वन एवं मृदा संरक्षण मंत्रालय का कहना है कि वन्यजीव अधिनियम के अंतर्गत अवैध होने के कारण कस्तूरी की आपूर्ति करना संभव नहीं है। सिर्फ मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद ही इस पर आगे बढ़ा जा सकता है। नेपाली अधिकारियों का यह भी कहना है कि कस्तूरी मृग के हिमाचल प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश में पाए जाने के कारण भारत के पास इसके स्रोत का विकल्प उपलब्ध है। भूमि सुधार मंत्रालय के अधीन आने वाला गुथी संस्थान देश में सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों को संचालित करता है। कस्तूरी की आपूर्ति कर पहले भी संस्थान पुरी मंदिर की मदद कर चुका है। संस्थान की राय है कि नेपाली सरकार को इस मामले में पहल कर भारत-नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहिए। पूर्व महाराजा ज्ञानेन्द्र शाह विक्रमदेव ने पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में कस्तूरी की आपूर्ति राजमहल के धुकुटी विभाग से सुनिश्चित की थी।

भगवान का नव-कलेवर 2015 में होना है। यह वह समय होता है, जब पुरी के इस विशाल मंदिर के देवता अपने मानव भक्तों की अपेक्षा अंत:मुद्रा में होते हैं। वे समय-समय पर अपने शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करते हैं। ‘नव-कलेवर’ उडिय़ा भाषा में ‘नए शरीर’ को इंगित करता है और जगन्नाथ मंदिर के चार देवता (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन) बदलाव के समय से विचरित होते हैं। उस दौरान लकड़ी की प्रतिमा को विसर्जित कर दिया जाता है और सदियों पहले प्राप्त भोज-पत्र की पांडुलिपियों के निर्देशानुसार अनुष्ठान कर नई प्रतिमा की स्थापना की जाती है।

यह बदलाव हिंदू कैलेंडर के पंचांगों की स्थिति के अनुसार प्रत्येक 8 से 18 वर्ष के दौरान होता है। प्राय: यह वर्ष में एक बार एक आषाढ़ के बाद दूसरे आषाढ़ के दौरान होता है। तदनुसार, पिछले ‘नव-कलेवर’ का अनुष्ठान वर्ष 1969, 1978, 1989 और 1996 में हुआ था। अब यह अनुष्ठान 2015 में होगा।

देवताओं की पुरानी प्रतिमाओं का विसर्जन किए जाने के बाद, नई प्रतिमाओं को रत्न सिंहासन पर तुरंत विराजमान किया जाता है। अगले दिन भगवान का राज्याभिषेक संस्कार संपन्न किया जाता है और उनके सहोदरों को तीसरे दिन राजसिंहासन पर आसीन किया जाता है। इस अवसर पर भगवान के नए रूप देखने के लिए विश्व भर से लाखों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं।

‘नव-कलेवर’ संस्कार के दौरान कस्तूरी की आवश्यकता बहुत अधिक मात्रा में होती है, जिसके कारण मंदिर प्रशासन और पुजारी परेशान रहते हैं। कुछ साल पहले रथयात्रा के दौरान तीन रथों के निर्माण के लिए आवश्यक ‘फसी’ लकड़ी को लेकर परेशानी पैदा हुई थी। भविष्य में इस लड़की की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उड़ीसा सरकार ने इनका वृक्षारोपण कराया है। बहुत सारे भक्तों ने भी इन वृक्षों का अपनी निजी भूमि पर रोपण किया है, ताकि बड़े होने पर इन्हें मंदिर को अर्पित किया जा सके। वर्तमान में समस्या का समाधान हो गया है, क्योंकि आने वाले वर्षों में रथ-निर्माण के लिए लकड़ी की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध है। इसी तरह सरकार को कस्तूरी मृग के लिए भी व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि उन्हें मारे बिना वैज्ञानिक तरीके से कस्तूरी-फली प्राप्त की जा सके।

जगन्नाथ संप्रदाय अपनी परंपरा से गहराई तक जुड़े हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार को कस्तूरी मृगों के विलुप्त होने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। कस्तूरी का प्रयोग परंपरागत चीनी दवाओं में होता है। प्राकृतिक क्षेत्रों में अवैध शिकार ने इनकी जनसंख्या को बर्बाद कर दिया है। उदार अर्थव्यवस्था होने के कारण चीन में जीव उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कस्तूरी की कमी से जूझ रहे मंदिर प्रशासन को अन्य विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए।

पुरी से अनिल धीर

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