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कभी भी भरभराकर गिर सकता है सोनार किला

यह किला साढ़े सात सौ साल से अधिक पुराना है। इसका निर्माण त्रिकूट पहाड़ी पर किया गया है। यह पहाड़ी मुल्तानी मिट्टी से बनी है। सैकड़ों साल से वर्षा का पानी इसकी बुर्जियों और आधार को कमजोर कर चुका है। छह साल पहले एक एजेंसी ने यहां सर्वे किया था। उसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि किला कभी भी भरभराकर गिर सकता है।

सैलानियों के आकर्षण का केंद्र जैसलमेर का सोनार किला कभी भी भरभराकर गिर सकता है। इस पर चौतरफा संकट मंडरा रहा है। इसके बावजूद इस किले को इसमें रहने वाले खाली करने को तैयार नहीं है। इस किले में करीब पांच हजार लोग रहते है। यहां कई तरह के खतरे है, लेकिन लोग इस बात को समझ नहीं रहे हैं और जिद्द पर अड़े हुए हैं कि कुछ भी हो जाए किला खाली नहीं करेंगे।

यह किला साढ़े सात सौ साल से अधिक पुराना है। इसका निर्माण त्रिकूट पहाड़ी पर किया गया है। यह पहाड़ी मुल्तानी मिट्टी से बनी है। सैकड़ों साल से वर्षा का पानी इसकी बुर्जियों और आधार को कमजोर कर चुका है। छह साल पहले एक एजेंसी ने यहां सर्वे किया था। उसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि किला कभी भी भरभराकर गिर सकता है। वर्षा का पानी तो किले की नींव को खोखला कर ही चुका है, साथ ही किले का सीवर सिस्टम भी गड़बड़ा गया है। निर्माण के बाद से ही सीवर का पानी किले की नींव में जाकर उसे खोखला कर रहा है। विदेशी सामाजिक कार्यकर्ता सू कारपेंटर ने सबसे पहले किले की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। उसके बाद इंटैक के माध्यम से इसके रख-रखाव व जीर्णोद्धार का काम शुरू हुआ। इंटैक से जैसलमेर के पूर्व नरेश बृजराज सिंह खुद जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्होंने भी विकास के नाम पर खानापूर्ति ही की। कई बार विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से किले का रख-रखाव व बुर्जियों का नव निर्माण किया गया। लेकिन जब तक किले से आबादी हट नहीं जाती, उस पर संकट बरकरार रहेगा।

यातायात का दबाव

इस किले में छोटे-बड़े वाहन धड़ल्ले से आते-जाते हैं। एक तरफ तो किले में रहने वाले लोगों के वाहन प्रतिदिन किले के एक मात्र द्वार ‘अखे पोल’ से निकलते हैं, दूसरी तरफ सैलानी भी वाहनों में आते-जाते रहते हैं। प्रतिदिन अखे पोल से पांच हजार वाहन आते-जाते हैं। किले के चार द्वार हैं, जिन्हें पोल कहते हैं। किले में आने जाने का मुख्य रास्ता एक ही है – अखे पोल। सभी पोल एक-दूसरे से जुड़े हैं। यातायात का दबाव किले पर बढ़ गया है। वाहनों की चिल्ल-पौं, शोर और गति से दीवारों पर असर पड़ रहा है। करीब 17-18 साल पहले किले की एक दीवार गिर गई थी, जिसके नीचे कुछ लोग दबकर मर गए थे।

डेढ़ दशक पहले किले में एक निर्माणाधीन भवन में बारूद में विस्फोट हो गया था। यह बारूद रियासत काल का है, जो यत्र-तत्र दबा है। बारूद के धमाके से किला कभी भी धराशायी हो सकता है। रियासत काल में सुरक्षा की दृष्टि से किले में जगह-जगह बारूद छिपा कर रखा जाता था। स्थिति यह है कि अब किसी को नहीं पता कहां बारूद छिपा हुआ है। कई बार निर्माण के दौरान बारूद निकल आता है और विस्फोट का भय बना रहता है। किले में लोग रहते हैं, इसलिए लोग सिलेंडर, केरोसिन, पेट्रोल और अन्य वस्तुएं ले जाते हैं। ऐसे में कभी भी हादसा हो सकता है।

भूकंप का खतरा

जैसलमेर भूकंप जोन में आ गया है। यहां आए साल भूकंप आते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप से भी किले को खतरा हो सकता है। इसलिए इस किले में रहने वाले लोगों को किला खाली कर देना चाहिए। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो जैसलमेर पाकिस्तान के बॉर्डर पर बसा हुआ है। कभी भी युद्ध हुआ तो जैसलमेर के विख्यात किले पर हमला हो सकता है। इसलिए समय रहते किले को खाली करवाना चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि यह किला सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है। किले के भीतर होटल, और दुकानें चल रही हैं। किला लोगों के लिए आय का जरिया है। इस वजह से लोग इसे खाली करने को तैयार नहीं हैं।

इंग्लैंड के एक एनजीओ ‘फोर्ट एंड फोर स्टेप’ के प्रतिनिधि अल्बर्टो ट्राइकॉन ने विस्तृत शोध के बाद निष्कर्ष निकाला कि ऐसे ही हालात रहे तो सन 2050 तक स्थिति विकट हो सकती है। उन्होंने समस्या के हल के लिए चार कदम बताते हुए कहा कि पहला कदम किला खाली करा लिया जाए। दूसरा कदम किले में होटल व अन्य कारोबार बंद कर दिए जायें। तीसरा कदम किले के भीतर आने-जाने के लिए एक अन्य वैकल्पिक रास्ता बनाया जाए। चौथा कदम जागरूकता है।

 डी. के. पुरोहित

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