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हिटलर को लिखे गांधीजी के पत्र

गांधीजी कुछ कठोरता से कहते हैं – ‘कुछ चीजों से मुझे अहसास हुआ कि मुझे उदंडता के बारे में न सोचते हुए आप (हिटलर) से मानवता को बचाने हेतु याचना करनी चाहिए।’ पत्र के अंत में गांधीजी फिर से कुछ नम्र और सज्जन होते हुए कहते हैं – ‘अगर मुझसे लिखने में कोई गलती हुई हो तो मैं आपसे क्षमा की उम्मीद करता हूं। आपका सच्चा मित्र, हमेशा, एम. के. गांधी।’

पिछले वर्ष मुझे मुंबई में बने महात्मा गांधीजी के घर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ‘मनी भवन’ नामक इस घर में गांधीजी सन् 1917 से 1934 तक रहे थे। यहां मैने उनके द्वारा हिटलर को लिखे पत्रों को देखा। पत्र में उन्होंने हिटलर से अपनी नीतियों को सुधारने का आग्रह किया था। हिटलर की नीतियों की वजह से युद्ध की स्थितियां उत्पन्न होने का खतरा था। गांधीजी की बच्चों की भांति सादगी व सरलता द्वारा पत्र को लिखा जाना आकॢषत करने वाला था।

23 जुलाई 1939 को लिखे इस पत्र में गांधीजी ने हिटलर से द्वितीय विश्व युद्ध को रोके जाने का अनुरोध किया था। इससे पिछले वर्ष ही हिटलर ने ऑस्ट्रिया पर कब्जा कर लिया था। चेकोस्लोवाकिया के ऐतिहासिक राज्य ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी। मार्च 1939 तक बचे हुए चेकोस्लोवाकिया पर हिटलर ने आक्रमण कर उसे दो भागों में बांट दिया था। अप्रैल 1939 में हिटलर ने जर्मन-पोलिश गैर-आक्रमण संधि को ठुकरा दिया था। 22 मई 1939 को जर्मनी और इटली ने स्टील संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि नेे दोनों देशों के बीच सैन्य और आर्थिक नीतियों में सहयोग बढ़ाया था। यूरोपीय देशों में नाजी जैकबूट आगे बढ़ रहे थे।

ऐसा माना जाता है कि अंगे्रजों ने पत्र को जग-जाहिर होने नहीं दिया। यह पत्र हिटलर तक अवश्य पहुंचा, परंतु कुछ विलंब से। पत्र मिलने से पहले ही 1 सितंबर 1939 को हिटलर ने पोलैंड पर चढ़ाई कर दी थी। फ्रांस और ब्रिटेन ने कुछ दिन पहले ही पोलैंड की स्वतंत्रता की जिम्मेदारी की प्रतिज्ञा ली थी। यह कदम द्वितीय विश्व युद्ध को भड़काने वाला सिद्ध हुआ।

हिटलर को पत्र लिखकर विश्व युद्ध रोकने की प्रार्थना करने के लिए गांधीजी को जरूर ब्रिटेन ने प्रेरित किया होगा। पत्र की शुरूआत कुछ हिचकिचाहट भरी है – ‘मित्रों के आग्रह पर और मानवता के लिए, मुझे आपको यह पत्र लिखना पड़ रहा है। लेकिन, उनके आग्रह को मैंने कई बार टाला। मुझे लग रहा था कि मेरे द्वारा यह एक उदंडता होगी।’ इस छोटेे पत्र में आगे था – ‘आज विश्व में केवल आप ही एकमात्र व्यक्ति हैं, जो विश्व युद्ध की स्थिति को उत्पन्न होने से रोक सकते हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं है। ऐसी स्थिति को रोका नहीं गया, तो यह मानवता को हिंसक बना देगी। आप खुद सोचिए, क्या आपको किसी भी कीमत पर अपने इरादों को पूरा करना चाहिए, भले ही वे कितने ही नेक हों? क्या आपको ऐसे व्यक्ति की राय माननी चाहिए, जिसने जान-बूझकर असफल होते हुए भी युद्ध समाप्ति की राह को अनदेखा किया हो?’

हिटलर के ‘नेक इरादों’ से गांधीजी का अभिप्राय था – हिटलर का जर्मनी के अल्पसंख्यक लोगों के पोलैंड में सामानाधिकार और ‘कॉरीडोर’ का मुद्दा। जर्मनी और पोलैंड के बीच रेल सेवा व गाडिय़ों के आवागमन के लिए एक रास्ते का सुनियोजित ढांचा तैयार किया गया था। यह रास्ता जर्मन पोमरेनिया को पोलिश-वेस्ट प्रूसिया होते हुए जर्मन-ईस्ट प्रूसिया से जोड़ता। अगर वेस्ट प्रूसिया के जनमत संग्रह ने इस जगह को जर्मनी में 1919 के बाद पुन: वापसी के लिए हरी झंडी दी, तो वेस्ट प्रूसिया पोलैंड को हार्बर से जोड़ देगा। हार्बर को वेस्ट प्रूसिया होते हुए बाल्टिक कोस्ट जाने के लिए छोड़ा गया था। ऐसे में कई लोगों को जर्मनी की मांगें उचित लगीं, जिनको सैन्य कारणों से दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए था। यह आम धारणा थी कि पोलैंड, जर्मन और ज्विश अल्पसंख्यकों को दबा रहा है।

पत्र के मध्य में गांधीजी कुछ कठोरता से कहते हैं – ‘कुछ चीजों से मुझे अहसास हुआ कि मुझे उदंडता के बारे में न सोचते हुए आप (हिटलर) से मानवता को बचाने हेतु याचना करनी चाहिए।’ पत्र के अंत में गांधीजी फिर से कुछ नम्र और सज्जन होते हुए कहते हैं – ‘अगर मुझसे लिखने में कोई गलती हुई हो तो मैं आपसे क्षमा की उम्मीद करता हूं। आपका सच्चा मित्र, हमेशा, मोहनदास करमचंद गांधी।’

गांधीजी ने हिटलर को दूसरा पत्र 17 महीने बाद, 24 दिसंबर 1940 को लिखा। इस बार का पत्र काफी लंबा था। तब तक युद्ध की स्थिति भी कुछ बदली चुकी थी। जर्मनी और इटली ने अधिकांश यूरोप में कब्जा किया हुआ था और युद्ध को अपने पक्ष में करने की स्थिति में थे। अगस्त1939 में ही खत्म हो चुकी जर्मन-सोवियत संधि विंस्टन चर्चिल के नेतृत्व में अब भी लागू थी। ग्रेट ब्रिटेन अकेला रह जाने के बावजूद जर्मनी के विरूद्ध अपनी लड़ाई को जारी रखे हुए था, जिसे उसने सितंबर 1939 में पोलैंड पर फतह प्राप्ति के बाद शुरू किया था।

इस पत्र के जरिए हिटलर को शुरूआत में ‘प्रिय मित्र’ और अंत में ‘आपका सच्चा मित्र’ के संबोधनों से गांधीजी ने कई मुश्किलों को आमंत्रण दिया। एक अन्य कथन में उन्होंने हिटलर को मित्र साबित करने की भी कोशिश की – ‘मेरे द्वारा आपको मित्र कहा जाना केवल शिष्टता नहीं है। मेरे मन में आपके प्रति कोई दुश्मनी नहीं है। पिछले 33 वर्षों से मैं रंग, जाति और धर्म से दूर हटकर मानवता के प्रति प्रेम और भाईचारे का अनुसरण कर रहा हूं।’

गांधीजी के कथन – ‘हमें आपकी बहादुरी और कर्मनिष्ठा पर कोई संदेह नहीं है। हम आपको राक्षस नहीं समझते, जैसा आपके प्रतिद्वंदियों की आपके प्रति राय है’ इस पर उनकी काफी आलोचना हुई थी। सोवियत संघ और अमेरिका के साथ लड़ाई, भारी संख्या में लोगों की मौत और काफी मात्रा में ज्विश लोगों का देश निकाला पहले नहीं हुआ था।

हालांकि, हिटलर को अच्छे विशेषणों से संबोधित करने का गांधीजी ने कोई मौक ा नहीं छोड़ा फिर भी हिटलर को उसके द्वारा किए गुनाहों पर गांधीजी ने उसे लताड़ा भी। गांधीजी ने नाजी परंपरा को भी खूब फटकारा। इस परंपरा के अंर्तगत ताकतवर लोग कमजोर लोगों पर अपना दबदबा बना कर रखते हैं। गांधीजी लिखते हैं – ‘आपकी व आपके मित्रों और सर्मथकों के लेख और घोषणाएं आपको राक्षस साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। आपके द्वारा किए कुछ काम मानव गरिमा का उल्लंघन करते हैं, विशेषकर मेरे जैसे इंसान के लिए, जो मानवता के प्रति प्रेम और भाईचारे की दुहाई देता हो। चेकोस्लोवाकिया का अपमान, पोलैंडवासियों का बलात्कार और डेनमार्क को तबाह कर देना, ऐसे काम किसी इंसान के नहीं हो सकते। मैं जानता हूं, लूटमार करना आपके लिए पवित्र और सदाचारी लक्षण हैं।’

कुछ नम्र होते हुए गांधीजी कहते हैं – ‘अत: हम आपके उद्देश्यों की पूॢत के लिए आपको शुभकामनाएं नहीं दे सकते।’ भले ही गांधीजी ने ब्रिटेन के कहने पर यह पत्र लिखे थे, लेकिन उन्होंने ब्रिटेन को भी आड़े हाथों लिया। गांधीजी लिखते हैं – ‘हम नाजीवाद के साथ-साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद का भी विरोध करते हैं। फिर भी, अगर इस विरोध में कुछ अंतर है, तो वह मात्र प्रभाव का है। मानव जाति के पांचवें भाग को जिन मापदडों के अंर्तगत ब्रिटिश शासन के अधीन लाया गया था, उनकी जांच मुश्किल है।’

गांधीजी ने ब्रिटेन की नीति के भारतीय विरोध का उदाहरण भी पत्र में दिया। अपनी सच्ची गांधी वादी भावना के साथ गांधीजी लिखते हैं – ‘ब्रिटेन के प्रति हमारा विरोध उन्हें क्षति पहुंचाना नहीं है। हम उन्हें बदलना चाहते हैं, उन्हें रण-भूमि में हराना हमारा लक्ष्य नहीं है।’ ऐसी ही कुछ नीति गांधीजी हिटलर के विरूद्ध अपना रहे थे। गांधीजी हिटलर को हराना नहीं, बल्कि बदलना चाहते थे। अगर हिटलर ने कभी यह पत्र पढ़ा होता, तो वह जरूर मुस्कुराता।

गांधीजी ने जर्मनी की मदद से ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्ति के उपाय को सिरे से खारिज कर दिया। गांधीजी लिखते हैं – ‘हम जानते हैं कि ब्रिटिश शासन का हमारे और गैर-यूरोपीय जातियों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन, फिर भी हम जर्मनी की मदद से ब्रिटिश शासन को खत्म नहीं करना चाहते।’ इसके अतिरिक्त गांधीजी ने हिटलर को अहिंसा का महत्व समझाते हुए लिखा – ‘अहिंसा से हम हिंसात्मक ताकतों को असानी से हरा सकते हैं।’ इस बात ने निश्चित तौर पर हिटलर की नीतियों को भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई की तरफ रूख करने पर मजबूर किया होगा। भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जर्मन और नाजी तानाशाहों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया।

ऐसे तानाशाहों को उनकी मृत्यु के लिए भी गांधीजी ने चेताया था। उनका विश्वास था कि ऐसे हिंसावादी लोगों को उनसे ताकतवर लोग कभी भी मार सकते हैं। हिटलर के मामले में यह भविष्यवाणी एकदम सटीक बैठी। गांधीजी के अनुसार हिटलर की जीत की अहमीयत को उसके हिंसात्मक व्यवहार के कारण क्षति पहुंचेगी। गांधीजी ने लिखा था – ‘अगर ब्रिटेन की सेना नहीं, तो कोई और ताकतवर सेना आपको, आपकी ही नीति से हरा देगी। आप अपने देशवासियों के लिए ऐसी कोई धरोहर नहीं छोड़ कर जाएंगे, जिस पर उन्हें गर्व महसूस हो।’

गांधीजी द्वारा हिटलर को लिखे दोनों पत्रों में उन्होंने हिटलर को ‘मेरे मित्र’ लिख कर संबोधित किया था। इससे कई लोगों को अचंभा हुआ। लेकिन, अंजान लोगों को मित्र संबोधित करना भारत की परंपरा थी। गांधीजी के अलावा किसी और के द्वारा हिटलर को मित्र संबोधित करना कुछ अजीब होता। खासकर तब, जब अंग्रेजों के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में हिटलर अंगे्रजों का साथ दे रहा था। सन् 1938 में लार्ड हेलीफेक्स के साथ हिटलर ने एक भेंट में अंग्रेजों को भारत में अपने शासन को जारी रखने में मदद का भरोसा दिलाया था। इसके अलावा हिटलर ने अंग्रेजों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से बात करने का अपना नुस्खा भी दिया। हिटलर ने कहा – ‘गांधी को मार दो, अगर इससे बात नही बने, तो और नेताओं को मार दो, फिर भी बात नहीं बने तो 200 क्रांतिकारियों को मार दो और यह मारकाट तब तक जारी रखो, जब तक भारत के लोग स्वतंत्रता की जिद न छोड़ दें।’ गांधीजी हिटलर की अंग्रेजों को दी गई सलाह से भले ही अनजान थे, लेकिन उन्होंने हिटलर द्वारा लिखी किताब ‘मेरा संघर्ष’ के दोनों अंक पढ़े थे। गांधीजी ने हिटलर की मंशा को भी भली-भांति भांप लिया था।

गांधीजी अगर युद्ध को रोकने के प्रयास नहीं करते, तो वे गांधी नहीं, एक आम इंसान होते। गांधीजी के पत्र द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास के अभिन्न अंग हैं। विश्व युद्ध के बाद के इतिहासकारों ने गांधीजी के पत्रों को बड़ी निंदनीयता से रखा है। इतिहासकारों का मानना है कि गांधीजी को इससे ज्यादा प्रयास करने चाहिए थे। फ्लेमिश वामपंथी उपन्यासकार प्रोफेसर क्रिस्टियन हेमरचेट्स ने कहा था – ‘गांधी एक अनुभवहीन मूर्ख थे, जो व्यर्थ प्रयास करते रहे। उनके तानाशाहों को अहिंसा का पाठ पढ़ाने का प्रयास असफल रहा।’ जब गांधीजी ने ये पत्र लिखे, तब नाजी शासन की असलियत जगजाहिर होनी बाकी थी।

गांधीजी और हिटलर, दो ऐसी शख्सीयतें थीं, जिन्होंने विश्व इतिहास का चेहरा बदल दिया। दोनों ही गजब का जुनून पैदा करने की क्षमता रखते थे। फिर चाहे वह जुनून प्यार और स्नेह का हो या नफरत और ईष्र्या का। दोनों ने अपने-अपने विचारों के हिसाब से जीवन जीया। किसी प्रकार का कोई भी लोभ, उन्हें ऐसा करने से नही रोक पाया। दोनों अपने-अपने देशवासियों से प्यार करते थे। गांधीजी ने भारतवासियों को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए आंदोलन किए। जबकि, हिटलर ने ‘संदेहास्पद’ ताकतों के खिलाफ युद्ध किया, जिन्होंने उनके देशवासियों को अलग करना चाहा। दोनों जब भाषण देते थे, तो श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते थे। दोनों के अंदर लोगों से अपनी बात मनवाने की अद्भुत क्षमता थी। दोनों ही जिद्दी और ढृढ़ निश्चयी प्रवत्ति के थे और दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोकने में कामयाब नहीं हो पायी थी। वे अपने कार्यों पर अडिग रहते थे। जिस विश्वास के साथ वे उन्हें पूरा करते थे, वह भी गजब का था। गांधीजी ने ‘दि स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरीमेंट विद ट्रुथ’ और हिटलर ने ‘मेरा संघर्ष’ नाम से आत्मकथा लिखीं। ऐसा कहा और माना जाता है कि अगर गांधीजी यहूदी होते, तो वे हिटलर से युद्ध करते और विजयी होते। इसका मुख्य कारण गांधीजी का दिमागी रूप से हिटलर से अधिक ताकतवर होना था।

अनिल धीर

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