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दल से पहले देश राजनीति का लक्ष्य हो

राजनीति का क्षेत्र भी सेवा का एक माध्यम है, जिसकी बड़ी आवश्यकता होती है। राजनीति के बिना दुनिया का काम भी कैसे चलेगा? व्यवस्था चलाने के लिए कोई प्रमुख, कोई मार्गदर्शक, कोई नियंता न हो और सामान्य लोग राग-द्वेष से जुड़े हुए हों तो मेरा मानना है कि वह समाज के लिए दुर्भाग्य की बात है।

महर्षि व्यक्तिपराक्रम करते हैं और अपने पराक्रम के द्वारा परीषहरूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। एक साधु से अपेक्षा होती है कि वह परीषहजयी बने। वह प्रतिकूलताओं को भी सहन करे और अनुकूलताओं को भी सहन करे। साधु में ऐसी साधना होनी चाहिए कि अनुकूलता और प्रतिकूलता में समताभाव और मानसिक संतुलन रह सके। साधु में तो होनी ही चाहिए, पर मैं राजनीति पर ध्यान दूं तो मेरा ऐसा सोचना है कि कुछ अंशों में यह समता की साधना, राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों में भी होनी चाहिए, तभी राजनीति स्वच्छ रह सकती है।

हम साधु लोग राजनीति से असंपृक्त हैं। और भी बहुत से लोग हैं, जो राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं। न किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार करते हैं, न किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष को वोट देने का परामर्श देते हैं। हां, इतना जरूर है कि साधु-संन्यासी राजनीतिक क्षेत्र के लोगों को मार्गदर्शन देने वाले हो सकते हैं। ऐसा प्राचीनकाल में भी होता रहा है। मेरा मानना है कि राजनीति पर नैतिकता का अंकुश या धर्म का अंकुश रहता है, तो राजनीति सम्यक्तया संचालित हो सकती है। जहां राजनीति पर धर्म का, नैतिकता का अंकुश न हो, केवल सत्ता प्राप्ति का ही लक्ष्य हो, तो उसे राजनीति का दुर्भाग्य मानना चाहिए।

मेरा मंतव्य है कि गृहस्थों के लिए राजनीति कोई अस्पृश्य चीज नहीं है। राजनीति सेवा का एक अच्छा माध्यम हो सकती है। अपेक्षा यह है कि राजनीतिक क्षेत्र के लोग नैतिकता के संकल्प से संकल्पित हों। अणुव्रत इसमें बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। एक घटना-प्रसंग मैं अपनी शैली में प्रस्तुत कर रहा हूं। बहुत पहले की बात है, आचार्य तुलसी के पास एक मंत्रीजी आए। बातचीत के प्रसंग में मंत्रीजी बोले- ”आचार्यश्री! मेरे मन में धर्म के प्रति रुचि है और मैं धर्म करना भी चाहता हूं, किन्तु समस्या यह है कि व्यस्तता के कारण मैं इसके लिए समय नहीं निकाल पाता।’’

कार्याधिक्य और गुरुतर दायित्व के कारण कुछ लोगों के सामने समय का अभाव हो सकता है। लेकिन मेरा तो चिंतन है कि व्यस्त होना एक बात है और अस्त-व्यस्त होना दूसरी बात है। व्यस्त होना कोई बुरी बात नहीं। ज्यादा काम हो तो व्यक्ति व्यस्त भी हो सकता है, पर उसका मस्तिष्क शांत रहना चाहिए। अशांति की स्थिति आदमी को अस्त-व्यस्त कर देती है।

गुरुदेवश्री ने कहा- ”मंत्रीजी, आप व्यस्त हैं, धर्म के लिए आपको समय नहीं मिल पाता तो मैं ऐसे धर्म में आपको प्रवृत्त नहीं करना चाहता जो आपकी व्यस्तता को और ज्यादा बढ़ा दे। आपकी व्यस्तता को देखते हुए आपको ऐसा धर्म बताता हूं, जिसके लिए आपको अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’’

मंत्रीजी ने ऐसे धर्म के बारे में आतुर भाव से जिज्ञासा की तो आचार्य ने कहा- ”वह धर्म है नैतिकता। आपके पास अपने विभाग से संबंधित फाइलें तो आती ही होंगी। आप उनके कार्य संपादन में प्रामाणिकता रखें। अपने दैनंदिन जीवन में नैतिक और प्रामाणिक बने रहें, यह नैतिकता का संकल्प ही आपके लिए धर्म हो जाएगा। धर्म करने के लिए आपको किसी धर्मस्थान में जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी।’’

अणुव्रत का संदेश है – आप किसी की भी उपासना करो, आप राम को मानो या महावीर को, बुद्ध, नानक, मुहम्मद, ईसा-किसी को भी मानो या न भी मानो, आपकी इच्छा पर है, अणुव्रत का इससे कोई लेना-देना नहीं है। अणुव्रत का मात्र इतना ही कहना है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें नैतिकता और प्रामाणिकता रहे। मैं तो यहां तक भी कहता हूं कि कोई व्यक्ति नास्तिक विचारधारा का हो, परलोक, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म और आत्मा को नहीं मानता हो तो ऐसा नास्तिक आदमी भी अणुव्रतों को स्वीकार कर सकता है। परलोक को भले ही कोई न माने, वर्तमान की दुनिया या इहलोक को तो मानता ही होगा, क्योंकि वह तो आंखों के सामने है। व्यक्ति कम से कम इस जीवन को शांतिपूर्ण बनाने के लिए तो नैतिकता के रास्ते पर चले।

राजनीति का क्षेत्र भी सेवा का एक माध्यम है, जिसकी बड़ी आवश्यकता होती है। राजनीति के बिना दुनिया का काम भी कैसे चलेगा? व्यवस्था चलाने के लिए कोई प्रमुख, कोई मार्गदर्शक, कोई नियंता न हो और सामान्य लोग राग-द्वेष से जुड़े हुए हों तो मेरा मानना है कि वह समाज के लिए दुर्भाग्य की बात है। ऐसी स्थिति में समाज और राष्ट्र का संचालन होगा भी तो कैसे? इसलिए राजनीति आवश्यक है। शर्त यही है कि राजनीति में काम करने वाले व्यक्ति योग्य और ईमानदार होने चाहिए।

भारत लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाला राष्ट्र है। लोकतंत्र में भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। जनता को भी प्रशिक्षण मिलना चाहिए और देश का संचालन करने वाले कर्णधार भी प्रशिक्षित होने चाहिए। अगर लोकतंत्र में कर्तव्यनिष्ठा न हो और चुनाव में भय, प्रलोभन, प्रभाव से वोट लिए और दिए जाते हों तो मुझे लगता है कि यह लोकतंत्र के लिए शुभ शकुन या प्रशस्त तरीका नहीं होता है। लोकतंत्र में वोट देने वाले और लेने वाले प्रशिक्षित हों तो यह विशिष्ट बात होती है। सत्ता के आसन पर बैठने वाले लोग योग्यता संपन्न होने चाहिए, राष्ट्र हित को प्रमुखता देने वाले होने चाहिए। भारत में अनेक राजनीतिक दल हैं, उनका अपना महत्व भी है। वास्तव में देखा जाए तो राजनीतिक पार्टियां भी देश की सेवा के लिए हैं। एक ओर राष्ट्र और दूसरी तरफ पार्टी हो तो राष्ट्र को पहला स्थान मिलना चाहिए। दल से राष्ट्र बड़ा है। नीतिशास्त्र में कहा गया है-

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत।

ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थ सकलं त्यजेत।।

एक ओर कुल परिवार की बात हो और दूसरी ओर एक व्यक्तिकी तो वहां कुल को महत्व देते हुए उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। एक ओर परिवार का प्रश्न हो और दूसरी ओर गांव का, तो गांव के हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अध्यात्म की दृष्टि से जहां आत्मा के हित की बात है, उसके लिए सब कुछ छोड़कर साधना के पथ पर आगे बढ़ जाना अभीष्ट है।

सन् 2002 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ अहमदाबाद के पास प्रेक्षा विश्वभारती में चातुर्मासिक प्रवास कर रहे थे। मेरी स्मृति के अनुसार एक दिन उन्हें सूचना मिली कि कुछ ही समय बाद राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आपके दर्शनार्थ पहुंच रहे हैं। राष्ट्रपतिजी आए। बातचीत के क्रम में आचार्यश्री ने जो कहा, उसका भाव लगभग इसी प्रकार रहा होगा- ”हमारे गुरु आचार्य तुलसी कहा करते थे कि धर्म का स्थान पहला है, सम्प्रदाय का स्थान उसके बाद का है। मैं इसी बात को इस रूप में कहना चाहता हूं-राष्ट्र का स्थान पहला है, पार्टी का स्थान दूसरे नम्बर पर होना चाहिए।’’ राष्ट्रपतिजी ने आचार्यश्री के इस कथन पर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा – ”यह बहुत बढिय़ा है। अब आपके पास जो भी राजनेता आएं, आप उनसे कहें कि राष्ट्र का स्थान हमेशा नम्बर एक पर और दल का स्थान नम्बर दो पर होना चाहिए।’’

पार्टी तो अपनी-अपनी होती है, किन्तु राष्ट्र तो किसी एक का नहीं, सबका है। इसलिए राष्ट्रहित को वरीयता मिलनी चाहिए। राजनीति के लोगों के लिए मेरा परामर्श है कि पार्टी के बारे में वे सोचते हैं, इसमें कोई दिक्कत की बात नहीं, किन्तु राष्ट्र को सामने रखकर सोचें कि हमारा पहला दायित्व किसके प्रति है? राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में ही वे पार्टी के बारे में सोचें, राष्ट्रहित को कहीं आंच नहीं आनी चाहिए। अगर राजनेताओं में राष्ट्र के प्रति निष्ठा हो और सत्ता-सुख की आकांक्षा से उपरत होकर सेवा कार्य करें, तो राजनीति में नैतिकता की संभावना रह सकती है। राजनीति में आने वाला व्यक्ति सेवा का लक्ष्य न रखे, जनता की भलाई न करे, तो राजनीति में आने की उसकी सार्थकता क्या है?

सन् 2004 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ महाराष्ट्र की यात्रा कर रहे थे। वहां जलगांव में मर्यादा महोत्सव का आयोजन था। उन दिनों एक बार महाराष्ट्र के एक राजनेता आचार्यश्री के पास खड़े थे। उनके समक्ष आचार्यवर ने संस्कृत का एक श्लोक बोला –

अधिकारपदं प्राप्य नोपकारं करोति य:।

अकारो लोपमात्रेण ककारो द्विततां व्रजेत।।

अधिकार मिलता है उपकार करने के लिए। राजनीति में आकर कोई अधिकार का पद प्राप्त कर ले, किन्तु उसे प्राप्त करने के बाद उपकार न करे तो अधिकार शब्द में से प्रथम अक्षर ‘अ’ को निकाल देने और ‘का’ से पहले ‘क्’ लगाने के बाद जो शब्द बनता है, वह उसका अधिकारी है। अधिकार मिला है तो किसी लालच में न आकर निष्ठा और निष्काम भाव से सेवा की भावना काम्य होती है। जिस राजनेता में गलत तरीके से अर्थार्जन की भावना न हो और सेवा की भावना प्रशस्त हो, वह राजनीति में नैतिक मूल्यों को अक्षुण्ण रख सकता है। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है-

राज्याधिकारं संप्राप्य य: प्रजां नैव रंजति।

अजागलस्तनस्येव तस्य जन्मनिरर्थकम्।।

राज्याधिकार यानी राजसत्ता को प्राप्त करके जो व्यक्ति प्रजा को संतुष्ट न करे यानी प्रजा की सेवा न करे, राजनेता का जन्म उसी तरह व्यर्थ, जैसे बकरी के गले का स्तन।

राजा या शासक का प्रथम कर्तव्य प्रजा का पालन करना और सज्जन लोगों की रक्षा करना है। उसका दूसरा कर्तव्य दुर्जन और असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण करना है। तीसरा कर्तव्य है – भले-बुरे जो भी लोग हैं, उनकी उदरपूर्ति करना। जनता की न्यूनतम जरूरतें पूरी करना राजा का कर्तव्य है। प्रजा को भरपेट भोजन मिलता है या नहीं, शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था है या नहीं, यह देखना भी शासक का दायित्व है।

राजा की नीति ही तो राजनीति होती है। राजनीति को कभी-कभी लोग अपकर्ष में ले जाते हैं। ‘यह व्यक्ति राजनीति करता है’- इस कथन में राजनीति के प्रति एक प्रकार का हेयभाव ध्वनित होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति को कुछ लोग तुच्छ और गर्हित रूप में लेते हैं। सबकी अपनी-अपनी दृष्टि है। मेरी दृष्टि में तो राजनीति हेय नहीं, बहुत काम की और उपयोगी चीज है, सेवा का एक अच्छा माध्यम है, किन्तु कब? जब राजनीति पर नैतिकता और धर्म का अंकुश रहे। ऐसी नैतिकतापूर्ण राजनीति जहां होती है, वह राष्ट्र सद्भाग्यशाली होता है।

भारत ऐसा देश है, जहां कितनी-कितनी त्याग-तपस्या हुई है और आज भी कुछ अंशों में हो रही है। अध्यात्म विद्या के साथ-साथ यह देश ज्ञान के विशाल भंडार से बेहद समृद्ध रहा है। हम संस्कृत, प्राकृत भाषा के प्राचीन ग्रंथों को देखें, उनमें कितना ज्ञान-विज्ञान का भंडार भरा पड़ा है। यह भी राष्ट्र के लिए मेरी दृष्टि में गौरव की बात है। इस संपदा का समुचित मूल्यांकन होता रहे, यह अपेक्षा है। यह ऋषि-मुनियों की भूमि है, जिन्होंने त्याग-तपस्या और साधना की है।

आज भी कितने ही संत अपने-अपने ढंग से साधना करते हुए जनता का पथदर्शन कर रहे हैं। मेरा तो मानना है कि राष्ट्र के धार्मिक-आध्यात्मिक और नैतिक-चारित्रिक विकास में संतों का बड़ा योगदान है। आज भी भारत की जनता में संतों के प्रति आस्था का भाव है। आम आदमी की बात पर कोई ध्यान दे, न दे, लेकिन आमतौर पर संतों की बात के प्रति सम्मान की भावना देखने को मिलती है।

हमारा चिंतन है कि राजनीति खराब या अस्पृश्य नहीं, बस, राजनीति में मूल्यवत्ता रहनी चाहिए। वह धर्म और नैतिकता से प्रभावित होनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो राजनीति और नैतिकता, दोनों का एक प्रकार से संगम हो जाता है… और ऐसा होना राष्ट्र के लिए भी सौभाग्य का सूचक बन सकता है।

                प्रस्तुति: ललित गर्ग

आचार्य महाश्रमण

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