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आसान नहीं ‘7 रेस कोर्स’ का सफर

 

 

 

रहनुमाई किसकी होगी मुझको हैरत है यही

काफिले में कौम के सब पेशवा होने को है।’ –चकबस्त

एक सामान्य नौकरशाह से सीधे दिल्ली सरीखे सूबे की जागीरदारी हासिल करनेवाले आम आदमी पार्टी (आप) के संस्थापक नेता अरविंद केजरीवाल की विगत विधानसभा चुनावों में आशातीत सफलता किसी करिश्माई प्रदर्शन से कम नहीं है। राजनीतिक पृष्ठभूमि तथा वंशानुगत विरासत की तिलस्मी दुनिया से बहुत दूर मध्यमवर्गीय पारिवारिक-सामाजिक भीड़ से अपने वजूद को सितारों की बुलंदी तक पहुंचाने वाले अरविंद केजरीवाल की कामयाबी ने भारतीय सियासत में व्याप्त तथाकथित ‘पैरालायसिस’ में अद्भूत रूप से जीवन फूंक दिया है। कहते हैं कि जब केजरीवाल किसी सभा को या प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे होते हैं तो श्रोताओं को गोया ऐसा प्रतीत होता है कि उन आवाजों में खुद उनके ही दर्द की टीस छुपी हुई है। औपचारिक भाषा के उलझनों तथा मानकों के तामझाम से दूर जब वे बोलते हैं तो मानो ऐसा प्रतीत होता है कि आवाज गले से नहीं बल्कि दिल से निकल रही हो। इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने तथा एक साफ तथा पारदर्शक सरकार के चुनावी वायदों के तेज घोड़े पर सवार होकर अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में चुनाव जीतने के नियम-संहिता में एक युगांतकारी बदलाव ला दिया है। राष्ट्र को प्राचीन विविध सियासी समस्याओं से निजात दिलाने के भीष्म प्रतिज्ञा के अदम्य साहस के माहौल में मिली ऐतिहासिक कामयाबी के नर्म एवं रेशमी साए में ‘आप’ के 7 रेस कोर्स रोड के ‘पंचवटी’ पर फतह हासिल करने की कयास का बाजार गर्म हो चला है। मीडिया के विभिन्न चैनलों पर चुनाव-पूर्व हुए सर्वेक्षण के आधार पर ‘आप’ की अनुमानित विजयरथ से कांग्रेस तथा भाजपा के दुर्गों में सेंध लगने की चिंता ने राजनीतिक हलको में अजीबोगरीब बेचैनी को जन्म दिया है। इस प्रकार की मीडिया की तथाकथित सुविधानुसार बनायीं गयी कल्पित कहानियों में कांग्रेस का पत्ता पूरी तरह से साफ होते देखकर पार्टी के थिंक टैंक के होश उड़े हुए हैं। सियासत तथा सत्ता की बदलती हुई नई शैली एवं बुनियाद की जड़ पकड़ते हुए धर्म के वर्तमान संक्रमण काल में एक अहम प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि क्या भारत सरीखे बहुधर्मी, बहुभाषी तथा बहु-मतावलंबी जनतांत्रिक राष्ट्र में अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित हो सकते हैं? क्या ‘आप’ का भारत के प्रधानमंत्री पद तक का सफर दिल्ली विधानसभा में विजय सरीखा ही आसान तथा सुगम है?

यदि स्वतान्त्रोयोत्तर भारत के हुक्मरानों को गौर से देखें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते देर नहीं लगेगी कि उनमें अधिकांश शख्सियत ऐसे रहे हैं जिन्होंने बुनियादी स्तर पर समाज की सेवा तथा राष्ट्रभक्ति में खुद को समर्पित करके अपनी पहचान बनाई है। राजकुमारों के शीशमहल में रहकर सीधे हस्तिनापुर के सिंहासन पर ताजपोशी का सौभाग्य पानेवालों को अंगुली पर गिना जा सकता है। अर्थात भारत की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचने के लिए जमीं से आगाज करने की लम्बी परम्परा रही है और इस मामले में न तो केजरीवाल और ना ही उनकी पार्टी के किसी अन्य नेताओं का कोई रिकार्ड रहा है। उन्हें आज भी इस क्षेत्र में शून्य से आगाज करने की सख्त जरुरत है। भारत की आजादी के लगभग छ: दशकों से भी अधिक का लम्बा अरसा गुजर चुका है और यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज भी भारत की जनसंख्या का 37 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहा है। हिंदुस्तान की आबादी के उन एक तिहाई से भी अधिक लोगों के दुर्भाग्य के समाधान का उपाय उन बेशुमार एजेंडों में एक अहम एजेंडा साबित हो सकता है और इस दिशा में ‘आप’ को अपनी नीति को राष्ट्र के सामने रखना चाहिए। वैदेशिक मामलों की बातें करें तो सम्प्रति भारत अपने गणतांत्रिक इतिहास के सबसे दुखद दौर से गुजर रहा है, जहां कि एक तरफ यह पाकिस्तान के साथ तो दूसरी तरफ चीन से एक शीत युद्ध तथा सीमा पर अतिक्रमण का सामना कर रहा है। अनाधिकारिक रूप से विश्व मॉनिटर के रूप में अपनी मर्जी थोपने तथा भारत की संप्रभुता को चुनौती देता संयुक्त राज्य अमेरिका हमारे लिए एक बहुत बड़ा संकट है, जिसके समाधान के तरीकों को देश के सामने पारदर्शी तौर पर रखने की आवश्यकता है। भारत की कूटनीतिज्ञ देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका का पक्षपातपूर्ण तथा अपमानजनक व्यवहार वो ताजा उदहारण है, जिस पर अरविंद केजरीवाल को अपने रुख तथा विचार को प्रकट करना चाहिए। 1990 के आर्थिक सुधार के उत्तर संक्रमण काल में जिस प्रकार से पूरी दुनिया वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के परिवर्तनों का सामना कर रही है, ऐसी दशा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा अन्य आर्थिक मुद्दों के समाधान के रूप में ‘आप’ को अभी भी जमीनी तौर पर शुरुआत करना बाकी है। हाल में जिस प्रकार से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता के मसले को गैरकानूनी बताया है, जनमानस की संवेदनशीलता के ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों पर क्या ‘आप’ को अपने विचार स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है? कहते हैं कि प्रत्येक राजनीतिक पार्टी के पास राष्ट्र के विकास के लिए एक मॉडल होता है और जिसका अनुसरण कर विश्व नक्शे पर राष्ट्र की पहचान कायम की जाती है। एक वर्ष की नवजात पार्टी के रूप में ‘आप’ को इन सभी मसलों पर गंभीरता से एक होमवर्क करने की जररूत है। इस होमवर्क के अभाव में पार्टी को तथा इसके नेताओं के द्वारा देश के नेतृत्व का सपना देखना कदाचित भारत के राजनीतिक इतिहास के बारे में भारी अज्ञानता को ही दर्शाता है।

यह कहने में भी कोई गलती नहीं है कि दिल्ली कभी भी भारत नहीं बन सकती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांवों में बसता है और कृषक भारत के भगवान हैं। महज दिल्ली की सफलता से भारत के लोकसभा चुनाव में उसी जादुई सफलता की उम्मीद करने में विवेक कम विजयजनित जोश अधिक दिखता है। भारत के गांवों में बस रही आधी से भी अधिक आबादी को भ्रष्टाचार सरीखे मसलों से अधिक सरोकार नहीं होता है। उनकी चिंता महज इसी मुद्दे तक सीमित रहती है कि केंद्र में बैठा तथा लालकिला के प्राचीर से देश को संबोधित करने वाला प्रधानमंत्री उनके कल्याण के लिए कौन-कौन सी योजनाएं शुरू कर रहा है और सच पूछिये तो ‘आप’ जैसी नवजात पार्टी को इस बारे में अभी भारत के सामाजिक तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि का विस्तार से अध्ययन करने की जरुरत है। कदाचित इस सत्य से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि अरविंद केजरीवाल के पास विद्वता तथा कार्य करने की अदम्य इच्छा है। किन्तु किसी देश को चलाने के लिए केवल ज्ञान नहीं बल्कि अनुभव की भी दरकार होती है और दुर्भाग्यवश इस सन्दर्भ में पूरी की पूरी ‘आप’ खाली है। यह अलग बात है कि अनुभव कार्य से प्राप्त होता है किन्तु राष्ट्र की सत्ता के संचालन में किसी प्रकार की गलती एक ऐसा अपराध होता है जिसका खामियाजा आनेवाली कई पीढिय़ों को भूगतना पड़ता है।

आशय यह है कि दिल्ली से लेकर पूरे हिंदुस्तान पर विजय का सपना देखने में कुछ भी बुरा नहीं है। किन्तु इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारी करने की जरुरत है। पहले सम्पूर्ण राष्ट्र को समझने की जरुरत है, तमाम लोगों की नब्ज पहचानने की आवश्यकता है और सबसे बढ़कर भारत जैसे सर्वाधिक विशाल प्रजातंत्र का विश्व के विकसित राष्ट्रों के समानांतर विकास करने के एक विस्तृत मॉडल को राष्ट्र के सामने प्रकाशित करने की जरुरत है। जल्दीबाजी में सत्ता को हथियाने की कोशिश कहीं ‘आप’ के लिए चार दिन की चांदनी बन कर नहीं रह जाये। इस खतरे से अरविंद केजरीवाल को भयभीत रहना चाहिए और सत्ता की तरफ जानेवाली हर गली में कोई कदम बिना संजीदगी से सोचे और उनके परिणामों के बारे में अनुमान किये नहीं उठाना चाहिए।

श्रीप्रकाश शर्मा

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