ब्रेकिंग न्यूज़ 

भारतीय लोकतन्त्र का नया दौर

आम आदमी पार्टी के उदय से सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी, देश के प्रत्येक राज्य में दूरगामी संदेश गया है। निश्चित रूप से आगे आने वाले लोकसभा चुनावों में सोच-समझ के साथ चयन कर, जनहित में ही योग्य एवं सक्ष्म जन प्रतिनिधियों को ही टिकट देनी पड़ेगी।

अन्ना हजारे के जन आन्दोलन और जन लोकपाल बिल, सूचना का अधिकार (आर.टी.आई.) दिल्ली में रेप की घटनाओं पर प्रचण्ड जनाक्रोश, प्रदर्शन, राजनीति आपराधिकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश, यौन दुराचार के लिए नया कानून, चुनाव प्रक्रिया में अब तक का सबसे अधिक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मतदान, भ्रष्टाचार एवं घोटाले के सी.ए.जी. की रिपोट्र्स, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की अद्भुत ऐतिहासिक जीत और कांग्रेस द्वारा बिना शर्त आम आदमी पार्टी की अल्पमत सरकार को बाहर से समर्थन, कांग्रेस पार्टी की राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में सफाई, चुनाव प्रक्रिया एवं मतदान प्रक्रिया की सुव्यवस्था, सुसंचालन आदि बातें भारतीय लोकतन्त्र की जड़ों को मजबूत करने के साक्ष्य हाल ही के तथ्य हैं। यह एक भारतीय गणतन्त्र के नए दौर की शुरूआत है। राज्य व्यवस्था को स्वराज और सुराज बनाने के अच्छे संकेत हैं।

पिछले कई वर्षों से पंचायत, विधानसभा, लोकसभा एवं अन्य लोकतान्त्रिक संस्थान में धनबल, बाहुबल हावी रहा था। इन सब में प्रत्येक पार्टी के दागी और अपराधी तत्वों का प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है। जन प्रतिनिधि सेवा की जगह, राजनीति को निजी लाभ का व्यवसाय बना चुके हैं। नेताओं एवं पार्टियों की कथनी और करनी में निरन्तर फर्क बढऩे लगा। जनता की आवाज, जन प्रतिनिधियों की आवाज, माननीय सदस्यों की आवाज, गुटबाजी और पार्टी तन्त्र द्वारा दबा दी जाती है। इसमें सुधार के प्रयास, चाहे वे जन आन्दोलन के थे, या न्यायपालिका के आदेश, सभी पार्टियां एक होकर उन्हें विफल करने के लिए प्रभाव शून्य बना देती हैं। ऐसे मुद्दों पर सभी पार्टियां आपसी विरोध छोड़कर आपस में एक होकर सुधार के प्रयासों को जड़ से उखाड़ फेंकती हैं।

हद तो तब हुई जब राजनीतिक पार्टियां लोकतन्त्र की बजाय परिवारवाद में सिमट गईं और राजनीति को व्यक्तिगत अधिकार की सम्पति बना दिया। यह बात सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी ही नहीं, सिर्फ दो-तीन पार्टियां छोड़कर लगभग बाकी सारी राजनैतिक पार्टियों में दिखती है। देश का सारा दबदबा, निर्णयों पर प्रभावी तौर से हावी होने की शक्ति कुल 200 छोटे परिवारों के कब्जे में आ गई और लोकतन्त्र में ये एक तरह से क्षत्रप बन बैठे। राजनीतिक पार्टियां जानबूझ कर चुनाव में गलत लोगों को टिकट देकर लोकतान्त्रिक मूल्यों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने का प्रयास कर रही हैं। तकरीबन हर राजनैतिक पार्टी इस बात के लिए निश्चित रूप से देश की गुनाहगार है कि वह चुनावी टिकट देश के फायदे की जगह अपने स्वार्थ, पार्टी के हित एवं अपनी गिनती बढ़ाने के लिहाज से बांट रही है। वर्तमान के बिगड़े हालात का मूल कारण यही है। राजनैतिक पार्टियों के अधिकार एवं तरीकों की समीक्षा होनी चाहिए। आचार संहिता में आवश्यक बदलाव होने चाहिए। पार्टी या किसी नेता के निजी हित की बजाय राष्ट्रीय ध्येय सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। निर्णय के सही-गलत का यही पैमाना होना चाहिए। मन्त्री व अन्य स्तर के जनप्रतिनिधि बहुसंख्या में अपराधी करार दिए जाने लगे हैं। वे जेल और लम्बी सजा के अधिकारी बनने लगे हैं। ऐसे वातावरण में सद्चरित्र और सक्ष्म सेवाभाव वाले नागरिक जन प्रतिनीधि बनने से विमुख होने लगे हैं। ऐसे वातावरण में घुटन और असफलता के आलावा और कुछ प्राप्त होता नहीं दिखता। किसी समाज को बुरी नजर से देखने वाले दुर्जनों से जितना खतरा नहीं होता, उससे सौ प्रतिशत अधिक खतरा सज्जन पुरूषों के निष्क्रिय होने से होता है। देश में सुयोग्य, दक्ष, निस्वार्थ, सेवाभावी, शिक्षित-प्रशिक्षित लोग, ईमानदारी, सेवा समर्पण के साथ देश सेवा और जनप्रतिनिधित्व करने के लिए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। कमी है उनके आगे आने की। कमी है उचित वातावरण की, जिसमें वे काम कर सकें, आगे बढ़ सकें, और लक्ष्य प्राप्त कर सकें।

हर चीज का समय होता है। आखिर लोकतन्त्र और जनता के शुभचिंतकों को यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि चुनाव की क्रियाशील राजनीति, आपसी चट्टे-बट्टे की बन कर रह गई है। सब आपस में मिल बांट रहे हैं। जानबूझ कर सुधारों की योजनाओं को लटकाना, प्रशासन व्यवस्था सुधार, भ्रष्टाचार विरोध, महंगाई पर नियन्त्रण आदि की बातें तो करते हैं, लेकिन वास्तविकता में उल्टी नीतियां अपनाते हैं। घोषणाएं होती हैं, वादे किए जाते हैं, परन्तु उन्हें लागू करने के इरादे नहीं होते। उन्हें क्रियान्वित करने की इच्छा-शक्ति या नीयत नहीं होती है। इससे प्रबुद्ध लोगों को लगता है कि जो लोग राजनीति में नहीं हैं, सिर्फ वही पहल करें तो प्रशासन और राजनीति में आवश्यक सुधार हो सकता है, अन्यथा नहीं। ऐसे प्रबुद्ध लोग ही जन सहयोग और जन आन्दोलन के जरिए स्वार्थी राजनीतिज्ञों को निष्क्रिय करने का काम कर सकते हैं। हुआ भी यही। मतदाताओं, जनता और प्रबुद्ध वर्ग ने पुराने राजनीतिज्ञों को दरकिनार करने का मन बनाया। नए को बनाने का मौका दिया। इसी उम्मीद से ‘आप’ पार्टी का उदय हाल के राज्यों के चुनाव में देखा जा सकता है। कांग्रेस की सफाई, भारतीय जनता पार्टी की आशा से बढ़कर जीत और आम आदमी पार्टी का प्रभावी उदय। इन बातों के साक्ष्य हैं कि मतदाता वोट की कीमत समझ गया है। गणतान्त्रिक व्यवस्था में मतदाता अपने वोट का प्रयोग कर राज्य व्यवस्था को सही दिशा दे सकता है।

आम आदमी पार्टी के उदय से सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी, देश के प्रत्येक राज्य में दूरगामी संदेश गया है। आने वाले लोकसभा चुनावों में सोच-समझ के साथ चयन कर, जनहित में ही योग्य एवं सक्ष्म जन प्रतिनिधियों को ही टिकट देनी पड़ेगा।

यह बहुत ही शुभ संकेत है। इसी से दुनिया के सबसे बड़े गणतन्त्र का सर्वोन्मुखी विकास होगा। इससे अन्तर्राष्ट्रीय बदलाव भी आएगा। अन्य मुल्कों में भी इसका प्रभाव पड़ेगा। इस नए पहलू का असर अभी चारों राज्यों में सरकार बनाने में मन्त्रियों की नियुक्ति में बरती जाने वाली सावधानी और सर्तकता पूर्ण रूप से इस के प्रभाव को प्रमाणित करती है। आम आदमी पार्टी की सरकार, अपने संकल्पों को साकार करके गणतान्त्रिक मूल्यों को और मजबूत करेगी। आम आदमी पार्टी की सोच, सपने और वादे अगर सफलता से पूरे करती है तो नया दौर, नया जमाना शुरू हो सकता है। यानी- सर्वे भवन्तु सुखीन:।

आम आदमी पार्टी की सरकार अन्य राज्यों या केन्द्र में बने, ना बने, कब बने, इस सबके बिना भी राजनैतिक पार्टियों को अपने आचरण को नया बदला रूप देना ही होगा। केजरीवाल जैसे नए रुप हर जगह, हर राज्य, हर क्षेत्र में विकसित होंगे। सक्ष्म सेवा भावी योग्य लोग अब विमुख न रहकर, राष्ट्रहित में काम करने आगे आएंगे, पहल करेंगे। यही युग बदलाव धारा, बदलाव का शुभ श्री गणेश है।

अन्ना हजारे, गांधी जी के कदमों पर चले, तो आम आदमी पार्टी के कर्णधार उन्हीं की राह पर पंचायत, मोहल्ला और जनस्वराज लाने के प्रयास में हैं। जयप्रकाश नारायण और लालबाहदुर शास्त्री जैसे महापुरूषों का अनुकरण होता हुआ दिख रहा है। राजनीति में लालबहादुर शास्त्री जैसी ईमानदारी एवं नैतिकता का पैमाना ही ठीक है, न कि वर्तमान में ईमानदार माने जाने वाले जननायक का। यही जनतन्त्र के मूल्यों के विकास के लिए शुभ संकेत है। जनतन्त्र के मूल्यों की रक्षा स्वयं जन जागरूकता ही कर सकती है न कि राजनीतिज्ञ वर्ग।

केजरीवाल हजारों आवेदनों को गंभीरता से फिल्टर अवश्य करें। कुछ गन्दे पानी की बूंदें पूरे घड़े के पानी को खराब करने की ताकत रखती हैं। जिसके बारे में जो नहीं दिखे, उसे अवश्य देखना हर जन नायक के लिए आवश्यक है।

भारतीय गणतन्त्र के दृष्टा और निर्माता चाणक्य की सादगी, सदाचार, सतर्कता, राष्ट्रभक्ति एवं सर्वस्व अर्पण की तमन्ना के साथ उनकी राजनीति, कूटनीति, अर्थनीति एवं प्रशासन विधि से चलकर ही गणतन्त्र को जन-जन के लिए कल्याणकारी मंगलकारी बना सकता है। तिरूव्लूवर, विदुर, कबीर, गांधी, विनोबा, पटेल, शास्त्री, राजेन्द्र प्रसाद, कृपलानी आदि के समर्पण से ही युग बदलाव ला सकते हैं। युग बदले, सोच बदले, कार्यशैली बदले, तभी जन-जन का दिल बदलेगा, उनका हाल बदलेगा। भाग्य जगेगा। सपने सच होंगे।

राज्य और सरकार वही लोकप्रिय होती हैं और होगी, जो सरकार असहाय, गरीब, भयभीत, कमजोर, निर्बल, शोषित, वंचित, पिछड़े, आदिवासी, वनवासी, भूखे, नाबालिग, वृद्धजन, व्याधि से दुखी, लोगों की तरफ देखे और उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए सूझ-बूझ और ईमानदारी से अथक प्रयास करती है।

वर्तमान के नए दौर में उपेक्षित वर्ग को कुछ सुविधाएं बांटने से काम चल सकता है। भविष्य में सर्वजन कल्याणकारी राज्य को राष्ट्रीय प्राकृतिक सम्पदा एवं साधनों का सही तरह से उपयोग करते हुए विकास की गति तेज करनी होगी। यहां तक कि चीन से भी आगे जाना होगा। इस विकास का फल उपेक्षित वर्ग को ज्यादा मिले, इस बात को भी निरन्तर सुनिश्चित करना होगा। ज्यादा उत्पादन और ज्यादा आमदनी होगी, तभी तो उम्मीद रखने वालों को बांट सकेंगे। उपेक्षित वर्ग भी विकास के अवरोध हटाते हुए उसे अपने ही लाभ के लिए तीव्र गति प्रदान करने में आगे आयेंगे। सब मिलकर विकास तेज करें, देश को आगे ले जाएं, तभी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित है।

इस सबके लिए सत्ता परिवर्तन तो शुरूआत मात्र है। असली काम सुधारों को तुरन्त प्रभावी रूप से लागू करना है। पार्टी तन्त्र और चुनाव तन्त्र के आवश्यक सुधार पहले हों। प्रशासनिक, पुलिस, रक्षा, शिक्षा, भूमि, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आदि हर क्षेत्र में सुधार दीर्घावधि से लंबित हैं। इन सबके साथ-साथ सामाजिक सुधार भी लाने आवश्यक होंगे। जातिवाद, नस्लवाद, लिंग भेद, परिवारिक मूल्यों, कुरीतियों का निरोध आदि सभी क्षेत्रों में सुधार जरूरी हो।

डॉ. रिखब चन्द जैन

отзывов сайтсервисы контекстной рекламы

Leave a Reply

Your email address will not be published.