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अरविंद केजरीवाल के राजनीति में आने के मायने

केजरीवाल की जन्मपत्री पढऩा जरूरी है। केजरीवाल ने 1995 में भारतीय राजस्व सेवा में काम करना शुरू किया था। वह दिल्ली में आयकर विभाग में अतिरिक्तआयुक्त नियुक्त हुए थे। सभी जानते हैं कि देश में यदि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है तो इसी विभाग में होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आयकर के ब्यौरे कम कर के ही नहीं दिखातीं, बल्कि इस क्षेत्र में धोखाधड़ी भी करती हैं।

आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली में सरकार बना ली है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए हैं। आज से पांच-छह महीने पहले देश के दो मुख्य राजनीतिक दल – सोनिया-कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ‘आप’ को अहमयित नहीं दे रही थी। यह पार्टियां मानने को तैयार ही नहीं थी कि दिल्ली में ‘आप’ की सरकार भी बन सकती है। वे इसी के गुणा-जोड़ में थे कि राजधानी के राजनैतिक दंगल में ‘आप’ के कूदने से सोनिया-कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में से किसी को नुकसान होगा। सोनिया कांग्रेस तो शायद शुरू से ही यह मान कर चल रही थी कि इससे भाजपा नुकसान में रहेगी। शुरूआती दौर में तो भाजपा का आकलन यह था कि ‘आप’ सोनिया-कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी, लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आते गए भाजपा के नीति-निर्धारकों का आकलन भी बदलने लगा। लेकिन आकलन बदलने के बावजूद भाजपा ‘आप’ को दो से पांच और जब चुनाव नजदीक आ गए तो दस से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं थी। केजरीवाल मुख्यमंत्री भी बन जाएंगे, ऐसा तो किसी को गुमान भी नहीं था।

सोनिया-कांग्रेस की शुरूआती दौर की राजनीति तो शायद अरविंद केजरीवाल के माध्यम से भाजपा को नुकसान पहुंचाना ही था। केवल इतना नुकसान पहुंचाना ताकि कांग्रेस को भाजपा सत्ता से न उखाड़ सके। परंतु केजरीवाल नाम की दोधारी तलवार ने भाजपा को तो नुकसान पहुंचाया, लेकिन सोनिया-कांग्रेस का तो सुपड़ा ही साफ कर दिया। इस मरहले पर शायद सोनिया-कांग्रेस के देशी-विदेशी नीति निर्धारकों ने अपनी नीतियां बदलीं। सोनिया-कांग्रेस के लिए मुख्य प्रश्न यह था कि दिल्ली में ‘आप’ द्वारा कांग्रेस की हत्या कर दिए जाने के बावजूद ‘आप’ से किस प्रकार के संबंध रखे जाएं? उसे राजनैतिक दंगल में चुनौती दी जाए या फिर उसके साथ हाथ ही मिला लिए जाए? लगता है दिल्ली में महज आठ सीटों तक सिमट जाने के बावजूद, सोनिया-कांग्रेस ने अतत: ‘आप’ से हाथ मिलाने की ही रणनीति को स्वीकार किया है। यही कारण है कि केजरीवाल द्वारा शीला दीक्षित से लेकर सोनिया गांधी, बरास्ता राबर्ट वाड्रा तक को महाभ्रष्ट घोषित किए जाने के बावजूद अल्पमत में होते हुए भी केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री ही नहीं बनाया, बल्कि जयराम रमेश ने उन्हें कंधे पर उठा कर नाचना भी शुरू कर दिया। सोनिया-कांग्रेस और उसके देशी-विदेशी रणनीतिकारों का उद्देश्य एकदम स्पष्ट है कि किसी ढंग से भी भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों के रथ को दिल्ली के बाहरी दरवाजे पर रोकना है। राजस्थान, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश और दिल्ली में भाजपा की चुनावी सफलता ने यह संकेत तो दे ही दिया है कि भाजपा का यह रथ कितनी तेजी से दिल्ली की ओर बढ़ रहा है। सोनिया-कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि 2012 में हुए चुनावों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पार्टी की जीत, उसकी जीत नहीं थी, बल्कि भाजपा की भीतरी फूट का कुपरिणाम था। पंजाब में तो सोनिया-कांग्रेस राहुल गांधी की इतनी परेड कराने के बावजूद अकाली-भाजपा गठबंधन को अपदस्थ नहीं कर सकी। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत उसकी अपनी जीत कम और येदयुरप्पा को लेकर की गई भाजपा की भूल ज्यादा थी। भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित प्रत्याशी नरेंद्र मोदी भाजपा परिवार के भीतर की इन दरारों को पाटने में लगे हुए हैं, उससे निश्चय ही भाजपा की पराजय का एक सशक्तकारक खत्म हो जाने की संभावना बढ़ती जा रही है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य के कद्दावर नेता येदयुरप्पा की घर वापसी इसी के संकेत हैं। सुदूर उत्तर-पूर्व तक की राष्ट्रवादी शक्तियों में भाजपा की इस पहल से जो स्फूर्ति उत्पन्न हुई है, निश्चय ही उससे उन शक्तियों को तकलीफ हुई है, जो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के पराजित हो जाने के बाद किसी भी हालत में राष्ट्रवादी शक्तियों को भारत में सत्ता के केंद्र में नहीं आने देना चाहती। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ही भारत ने परमाणु बम बनाने का निर्णय लिया था, अमेरिका अब भी इस घाव को भूला नहीं है।

सौ टके का एक सवाल तो यही है कि नरेंद्र मोदी के रथ को कैसे रोका जाए? इतना तो स्पष्ट ही है कि वर्तमान परिस्थितियों में सोनिया-कांग्रेस अपने बलबूते यह काम नहीं कर पाएगी। यह उन लोगों को शायद पहले ही अंदाजा था, जो भारत में राष्ट्रवादी शक्तियों के उत्थान से सबसे ज्यादा घबराते हैं। उन्हें ऐसा भारत चाहिए, जो यूरोप और अमेरिका की सांस्कृतिक नीति पर चलता हुआ, अपनी पुरातन पहचान को मिटा कर, नई पहचान को स्वीकार कर ले। ठीक उसी तरह, जिस तरह कभी यूनान और मिस्र ने अपनी पुरानी पहचान, सभ्यता और संस्कृति को तिलांजलि देकर नई पहचान को स्वीकार कर लिया था। इसलिए साल भर पहले ही अरविंद केजरीवाल को खिला-पिला कर मोटा-ताजा किया जाने लगा। अब सोनिया-कांग्रेस उसी केजरीवाल की सहायता से भाजपा के नरेंद्र मोदी का रथ रोकने का प्रयास कर रही है। पटना विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रमेशचन्द सिन्हा के अनुसार, किसी छोटे आदमी से बड़ा काम नहीं करवाया जा सकता। यदि उससे बड़ा काम करवाना है, तो पहले उसका कद बढ़ाना पड़ेगा। सोनिया-कांग्रेस ने शायद इसी को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल का कद बढ़ाने का निर्णय किया। यदि केजरीवारल को आगे करके मोदी का रथ रोकना है, तो केजरीवाल को बड़ा बनाना ही होगा। यही कारण है कि तमाम अपमान सहते हुए भी सोनिया-कांग्रेस, केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर हुई, जबकि ‘आप’ के पास 70 सदस्यों की दिल्ली विधानसभा में केवल 28 सदस्य हैं ।

अब केजरीवाल की जन्मपत्री पढऩा भी जरूरी है। केजरीवाल ने 1995 में भारतीय राजस्व सेवा में काम करना शुरू किया था। वह दिल्ली में आयकर विभाग में अतिरिक्त आयुक्त नियुक्त हुए थे। सभी जानते हैं कि देश में यदि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है तो इसी विभाग में होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आयकर के ब्यौरे कम कर के ही नहीं दिखातीं, बल्कि इस क्षेत्र में धोखाधड़ी भी करती हैं। ईमानदार और साहसी आयकर अधिकारियों ने कई बार इन कंपनियों की धोखाधड़ी को बेनकाब कर उनके खिलाफ अभियान चलाए हैं। लेकिन जाहिर है कि इस काम में खतरा भी उठाना पड़ता है। केजरीवाल ने आयकर विभाग में ईमानदारी का और भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे का ऐसा कोई उदहारण प्रस्तुत किया हो, यह रिकार्ड में नहीं है। अलबत्ता उन्होंने ‘परिवर्तन’ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था गठित करउसके माध्यम से दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में लोगों के राशन कार्ड बनवाने, बिजली और पानी का कनेक्शन लेने और उनके दैनिक कार्यों में छोटी-मोटी सहायता करने के लिए वेतनभोगी कर्मचारियों की नियुक्ति कर अपना कार्य प्रारंभ कर दिया। ‘परिवर्तन’ के ये कर्मचारी ही उसके कार्यकर्ता कहलाए और उसे सक्रिय रूप से चलाने के लिए केजरीवाल ने भारत सरकार से कुछ साल का अवकाश प्राप्त कर लिया। सरकार के नियमों का लाभ उठाते हुए सरकारी खजाने से वह वेतन भी प्राप्त करते रहे। ये घटनाएं सन् 2000 के आसपास की हैं। यही वह समय था, जब भाजपा में मोदी का रूतबा बढऩा शुरू हुआ था और उनके व्यक्तित्व की खासियत भी उजागर होने लगी थी। उधर वाजपेयी की सरकार भी अमेरिका को सिर दर्द दे रही थी। परमाणु बम बनाने के घोषणा की घाव भरे भी नहीं थे कि पाकिस्तान द्वारा आरोपित करगिल युद्ध में वाजपेयी ने अमेरिकी राष्ट्रपति की मध्यस्थ की भूमिका को ठुकराते हुए वाशिंगटन जाने से इंकार कर दिया। देशी-विदेशी शक्तियों के लिए 2004 के चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए थे। इसे भाजपा की रणनीतिक विफलता अथवा आम जनता का उसके कुछ मामलों में वैचारिक मूलाधारों से किनारा कर लेने के कारण उपजा क्रोध कहा जाए, यह विवादास्पद हो सकता है, लेकिन परिणामत: भाजपा की 44 सीटें कम हो गईं। ये सीटें देखने में चाहे ज्यादा दिखाई न देती हों, लेकिन भाजपा की सरकार को उखाडऩे में काफी महत्वपूर्ण सिद्ध हुईं। इन चुनावों में भाजपा को 138 सीटें और सोनिया-कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं। तभी यह स्पष्ट हो गया था कि आने वाले समय में केंद्र में सरकार बनाने के लिए पांच-सात सीटें भी निर्णायक सिद्ध हो सकती हैं। कांग्रेस की व्यापक रणनीति को देखते हुए सोनिया गांधी का उस समय प्रधानमंत्री बनना न तो संभव था और ना ही उपयोगी। उनकी इतालवी नागरिकता को लेकर अभी विवाद ठंडा नहीं हुआ था। यूरोप की एक औरत का प्रधानमंत्री बन जाना कालांतर में लोगों की राष्ट्रीय भावना उलझाने में सहायक सिद्ध हो सकता था। देश-विदेश में इसका खतरा उठाने के लिए कोई तैयार नहीं था। इससे भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों को बल मिल सकता था। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व बैंक में काम कर चुके डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर बैठाने का प्रयोग किया गया। इससे पहले नरसिम्हा राव सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री रह चुके थे। पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्री प्रो. अशोक मित्रा के अनुसार मनमोहन सिंह को नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री बनवाने में अमेरिका ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

भारत की राजनीति में संक्रमण काल चल रहा था। सोनिया गांधी अपनी पार्टी को लेकर लंबी दूरी तक चल पाएंगी, इस पर संशय उत्पन्न होने शुरू हो गए थे। सोनिया गांधी की पार्टी का कमजोर होने का अर्थ था, भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों का सशक्त हो कर एक बार फिर सत्ता के केंद्र दिल्ली की ओर कूच कर देना। इसी कालखंड में मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री बन चुके थे और गोधरा हत्याकांड के बाद हुए दंगों को लेकर किए गए तमाम प्रकार के कुप्रचार के बावजूद सरदार पटेल की तरह उनका दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व उभरना प्रारंभ हो गया था। हालात को देखते हुए सोनिया-कांग्रेस के साथ-साथ भारत की राजनीति में भाजपा को रोकने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था या फिर सोनिया-कांग्रेस के लिए सहायक व्यवस्था की तलाश शुरू हो गई थी। इसी कालखंड में केजरीवाल ने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। अपनी संस्था ‘परिवर्तन’ के माध्यम से वे दिल्ली के कुछ क्षेत्रों मे ग्राउंड वर्क कर ही चुके थे। केजरीवाल और उनकी सहायता करने वाले उनके दूसरे मित्र अब तक समझ चुके थे कि यदि भविष्य में समयानुकुल राष्ट्रवादी शक्तियों के उभार को रोकने में किसी पक्ष की भी सहायता करनी है तो उसके लिए नौकरी छोडऩी ही पड़ेगी। वैसे केवल रिकार्ड के लिए केजरीवाल को नौकरी छोडऩे पर कोई बहुत बड़ा पारिवारिक संकट झेलने की आशंका नहीं थी, क्योंकि उनकी पत्नी भी भारतीय राजस्व सेवा में उच्च पद पर कार्यरत हैं।

जैसा की उपर लिखा ही जा चुका है कि 2004 के चुनावों में भाजपा और सोनिया-कांग्रेस की सीटों में अंतर केवल सात सीटों का था, जिससे जाहिर है कि देशी-विदेशी क्षेत्रों में उन लोगों की चिंता बढ़ती, जिनके भारत में निहित आर्थिक और सांस्कृतिक हित लगे हुए हैं। इसमें पहला नंबर तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का था और दूसरा नंबर चर्च का। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने आर्थिक हितों की चिंता थी, तो चर्च को भारत में चलाए जा रहे अपने मतांतरण आंदोलन की। केजरीवाल और उसके साथी ‘परिवर्तन’ की नौका संभालकर लहरों में उतार तो चुके थे, लेकिन जिस प्रकार का कार्य करने की उनसे आशा थी, उसके लिए बहुत धन की दरकार थी। धन की व्यवस्था कैसे और कहां से की जाए? इसका भी अंतत: रास्ता निकाला गया। अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने मिल कर एक दूसरी गैर-सरकारी संस्था खड़ी की, जिसका नाम ‘कबीर’ रखा गया। अंग्रेजी में जरूर इसका लंबा-चौड़ा नाम होगा, लेकिन उसके प्रारंभिक शब्दों को जोड़कर ‘कबीर’ बनाया गया, ताकि उस संत के नाम से ही दूसरे लोग भ्रम को पाले रहें। इस ‘कबीर’ को 2005 से लेकर 2010 तक अमेरिका के फोर्ड फांउडेशन ने चार लाख डॉलर दिए। बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि फोर्ड फांउडेशन और विदेशों की राजनीति में उथल-पुथल मचा देने के लिए कुख्यात सीआईए में उद्देश्य को लेकर स्पष्ट साझेदारी है। लेकिन केजरीवाल और उनके साथियों पर जिम्मेवारी बढ़ी थी, उसके लिए जहां पैसे की आवश्यकता थी, उसी प्रकार उसके व्यक्तित्व और पहचान को स्थापित करने की भी अति आवश्यकता थी। केजरीवाल को भारत के भविष्य के नेता के रूप में जनमानस में स्थापित करना था। इसके लिए दूसरा रास्ता निकाला गया। केजरीवाल को रैमन मैग्सेस पुरस्कार दिया गया। एशिया में यह पुरस्कार उनको दिया जाता है, जिनको अपने देश में भविष्य के नेता के रूप में देखा जाता है, या फिर दिखाना जरूरी होता है। इस पुरस्कार की राशि भी परोक्ष रूप से अमेरिका का फोर्ड फांउडेशन ही मुहैया कराता है। इस पुरस्कार के मिलने से केजरीवाल और उसके साथियों के आगे आए आसन्न संकट का हल निकाल लिया गया। पुरस्कार से प्राप्त राशि से केजरीवाल ने दिसंबर 2006 में एक तीसरा गैर-सरकारी संगठन शुरू कर दिया। इसका नाम ‘पब्लिक कॉज रिसर्च फांउडेशन’ रखा गया। इस फांउडेशन से ही ‘परिवर्तन’ के कर्मचारियों को वेतन दिया जाने लगा। 2009 तक ‘परिवर्तन’, ‘कबीर’ और ‘पब्लिक कॉज रिसर्च फांउडेशन’ दिल्ली में चुपचाप कार्य करते रहे और सरकारी दफ्तरों में काम में व्यापक ढिलाई और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर झुग्गी-झोपडिय़ों में अपना सशक्त आधार बनाने में लगे रहे। केजरीवाल एंड कंपनी के पास अब पैसे की कमी नहीं थी, क्योंकि लाखों डॉलर फोर्ड फांउडेशन मुहैया करवा ही रहा था। अमेरिका के दिए ये लाखों डॉलर दिल्ली पहुंचते-पहुंचते करोड़ों रूपयों में परिवर्तित होने लगते थे। यानि पर्दे के पीछे खेल जारी था।

उधर इसी कालखंड में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी का व्यापक प्रभाव धीरे-धीरे समस्त देश में पडऩा प्रारंभ हो गया था। भारत सरकार की सहायता और उसके सक्रिय सहयोग से मोदी को दंगों के लिए दोषी ठहरा कर, उन्हें मुस्लिम विरोधी प्रचारित करने वाली टोली अपने तमाम प्रयासों के बावजूद मोदी का मूर्तिभंजन नहीं कर पा रही थी। इस काम के लिए अंतत: अमेरिका को खुद पर्दे के पीछे से निकल कर मोदी के मूर्तिभंजक की भूमिका में उतरना पड़ा। अमेरिका के विदेश-विभाग ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि उसने वीजा देने से इंकार कर दिया है। अमेरिका यहीं पर चुप नहीं हुआ। उसने वीजा न देने के कारणों की व्याख्या करते हुए लंबे-लंबे भाषण देने शुरू कर दिए। अमेरिका के अनुसार मोदी गुजरात में अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में असफल हुए हैं, इसलिए ऐसे मुस्लिम और ईसाई विरोधी मोदी को अमेरिका में प्रवेश करने नहीं दिया जा सकता। मोदी के मूर्तिभंजन में भारत सरकार की सहायता से एक टोली देश के भीतर सक्रिय थी और दूसरी टोली अमेरिका की सहायता से देश के बाहर सक्रिय हो गई। सोनिया गांधी और उसके देशी-विदेशी मित्रों के लिए तसल्ली की बात केवल इतनी ही थी कि भाजपा भी अपने भीतर की दलबंदी के कारण जन असंतोष का लाभ नहीं उठा पा रही थी।


आम आदमी पार्टी या फिर नए रूप में सोनिया-कांग्रेस की ही नीतियों को जारी रखने की कवायद?


 अब क्योंकि किन्हीं भी कारणों से और किसी की भी रणनीति से आम आदमी पार्टी (आप) उस स्थिति में पहुंच गई है जिसकी अवहेलना करके बचा नहीं जा सकता। यदि ऐसा किया गया तो वह शुतुरमतूर्ग की तरह रेत में गर्दन देने के समान होगा। फिलहाल आप को लेकर हड़बड़ी में जो कहा और लिखा जा रहा है, वह रक्षात्मक ज्यादा लगता है और गंभीर विवेचननुमा कम। लहजा कुछ-कुछ सफाई देने जैसा है। आम आदमी पार्टी अपने नेता केजरीवाल की सादगी को आगे करती है, तो दूसरे राजनैतिक दल भी भागदौड़ करके अपने स्टोर में से कुछ उदहारण लाकर उसका मुकाबला करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। कोई भाग कर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को दिखा रहा है, तो कोई हड़बड़ी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को लेकर आ हाजिर हुआ है। जिनकी इतिहास में रूचि है, वे कभी लोकसभा के अध्यक्ष रहे रवि राय को ओडिशा के किसी कोने से ढूंढ लाए हैं। जिनकी और भी पीछे जाने की हिम्मत है, वे गृहमंत्री रह चुके और अब परलोक चले गए इंद्रजीत गुप्ता को झाड़-पोंछ रहे हैं। यह एक प्रकार से आम आदमी पार्टी की चाल में ही फंसने जैसा है। केजरीवाल भी चाहते हैं कि सारी बहस इन्हीं सतही मुद्दों पर घूमती रहे, ताकि असली गंभीर मुद्दों से बचा जा सके।

गंभीर और गहरे दूरगामी मुद्दों पर भारत की राजनीति में बहस न हो, इसको लेकर देश में वातावरण कुछ देशी-विदेशी शक्तियों ने पिछले दो दशकों से ही बनाना शुरू कर दिया था। मीडिया में और विश्वविद्यालयों में यह बहस अच्छा प्रशासन बनाम विचारधारा के नाम पर चलाई गई थी। इस आंदोलन में यह स्थापित करने की कोशिश की गई थी कि हिंदुस्तान की तरक्की के लिए पहली प्राथमिकता अच्छे प्रशासन की है, विचारधारा का राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। मीडिया की सहायता से सब जगह यह शोर मचाया जाने लगा कि विचारधारा महंगा शौक है, जिसे हिंदुस्तान झेल नहीं सकता। हिंदुस्तान को तो अच्छा प्रशासन चाहिए। इसी आंदोलन में से भ्रष्टाचार समाप्त करने के स्वर भी उभरने लगे थे और इसी आंदोलन में देशवासियों में राजनैतिक नेतृत्व और संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का वातावरण भी तैयार किया गया। इस आंदोलन को चलाने वाले लोगों ने बहुत शातिराना अंदाज से यह बात गोल कर दी कि अच्छा प्रशासन या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की कल्पना आईसोलेशन में नहीं की जा सकती। आंदोलन चलाने वालों ने बहुत ही शातिर तरीके से अच्छे प्रशासन अथवा भ्रष्टाचार मुक्तप्रशासन को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया। ऐसा माहौल बनाया गया, मानो विचारधारा और भ्रष्टाचार मुक्तप्रशासन एक दूसरे के विरोधी हों और हिन्दुस्तान को यदि आगे बढऩा है, तो उसे विचारधारा को त्यागना होगा। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। सत्ता का वैचारिक आधार साम्यवादी, मिश्रित अर्थव्यवस्था, एकात्म मानवतावादी, पूंजीवादी या फिर माओवादी ही क्यों न हो, अच्छा प्रशासन तो सभी वैचारिक व्यवस्थाओं के लिए अनिवार्य शर्त है। वह सभी प्रकार के वैचारिक सत्ता मॉडलों का अभिन्न अंग है।

लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि हिन्दुस्तान में पिछले दो दशकों में हड़बड़ी में सुप्रशासन और विचारधारा को एक दूसरे के खिलाफ सिद्ध करने का आंदोलन चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? भारत में कुल मिलाकर तीन वैचारिक प्रतिष्ठान आसानी से चिह्नित किए जा सकते हैं। इनमें विभिन्न साम्यवादी दलों के नेतृत्व में साम्यवादी वैचारिक मॉडल और संघ परिवार के नेतृत्व में एकात्म मानव दर्शन पर आधारित भारतीय वैचारिक मॉडल शामिल हैं। तीसरा खेमा, जिसे सही अर्थो में वैचारिक मॉडल नहीं कहा जा सकता, सोनिया गांधी की पार्टी का है, जिसमें सत्ता सुख भोगने के लालच में विभिन्न विचारधाराओं के वाहक अपनी सुविधानुसार एक छतरी के नीचे एकत्रित हैं। इस खेमें में नक्सलवाद से लेकर हिन्दुत्व की चर्चा करने वालों तक, विशुद्ध पूंजीवाद से लेकर शत-प्रतिशत राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था के पक्षधर भी हैं। इसमें अब भी मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र मांगने के पक्षधर हैं और ईसाई स्थान का सपना संजोने वाले ही इस खेमे में शामिल हैं। बाबरी ढांचे के टूटने पर खून की नदियां बहाने की धमकियां देने से लेकर शयनगृह में छिप कर ताली बजाने वाले भी इसी खेमें में है। अमेरिका के आगे दंडवत करने वाले भी इसी खेमे में हैं, जबकि उसे सबक सिखाने वालों का भी खेमा यही है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि इस खेमे की न कोई अपनी पहचान है, और न ही कोई प्रतिबद्धतता। भारत की राजनीति में जिन देशी-विदेशी शक्तियों के अपने निहित स्वार्थ हैं, उनके लिए सोनिया गांधी की पार्टी जैसा खेमा ही सबसे ज्यादा अनुकूल होता है। सोवियत रूस के पतन के बाद अमेरिका के लिए साम्यवादी वैचारिक मॉडलों की चुनौती एक प्रकार से समाप्त हो गई थी। भारत में इसकी शक्ति पहले भी पश्चिम बंगाल में ही सिमट कर रह गई थी। इसे निर्णायक चोट ममता बनर्जी ने पहुंचा दी थी। इसलिए इतना स्पष्ट ही था कि आने वाले समय में भारत की राजनीति में मुख्य दंगल संघ परिवर के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों के भारतीय वैचारिक मॉडल और सोनिया गांधी की पार्टी के पहचान की और बिना किसी प्रतिबद्धता के निर्मित हुए खेमे में होने वाला है।

मान लीजिए सोनिया गांधी पार्टी का खेमा हार जाता है तो भारत की सत्ता के केंद्र में भारतीय वैचारिक प्रतिष्ठान स्थापित हो सकता है। यदि उसमें अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल के प्रयोगों से सबक हासिल कर लिया तो वह अधिक देर तक इस केंद्र में रह भी सकता है। सैम्युअल हंटिंग्टन ने जिन सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणी की है, उसके अनुसार भारत में राष्ट्रवादी शक्तियों के केंद्र में आ जाने से भारतीय संस्कृति और सभ्यता एक बार फिर विश्व में अपना सम्मान पूर्वक स्थान ग्रहण कर सकती है। इसलिए भारत मे रूचि लेने वाली देशी-विदेशी शक्तियों को हर हालत में कांग्रेस-1 के पराजित हो जाने पर कांग्रेस-2 को स्थापित करने के प्रयास करने ही थे। लगता है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस-1 के स्थान पर कांग्रेस-2 के रूप में ही आगे बढ़ायी जा रही है। यही कारण है कि केजरीवाल उन सब प्रश्नों पर बात करने से बचते हैं, जो इस देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। आश्चर्य है कि जब कभी इन मुद्दों पर विवशता में बोलते भी हैं, तो उनके विचारों में और कांग्रेस-1 के विचारों में कोई मौलिक अंतर दिखाई नहीं देता। कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के प्रश्न पर जो बात पिछले पांच दशकों से कांग्रेस कह रही है, पाकिस्तान कह रहा है, आतंकवादी कह रहे हैं, वही बात इस पार्टी के प्रशांत भूषण कह रहे हैं। अनुच्छेद 370 पर आम आदमी पार्टी की वही राय है, जो कांग्रेस की है। आतंकवाद पर भारत और माओवाद प्रभावित राज्यों से सेना को हटाने या फिर वहां उनकी शक्तिको नपुंसक स्तर तक लाने की बात कांग्रेस-1 भी कह रही है और आम आदमी पर्टी भी कह रही है। कांग्रेस भी यह मान कर चलती है कि इस देश में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है और उनके लिए अलग से कानून बनाया जाना चाहिए। मोटे तौर पर आम आदमी पार्टी भी यही कहती है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह भी यही कहते हैं कि इस देश में जहां भी मुस्लिम आतंकवादी मारा जाता है, वह जाली एनकांउटर होता है। केजरीवाल की पार्टी का भी यही मत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामले में आम आदमी पार्टी को भी यही लगता है कि उनका ऑडिट कर देने से समस्या हल हो जाएगी। मोटे तौर पर ये केवल कुछ उदहारण हैं। नीति के मामले में सोनिया गांधी की पार्टी और आम आदमी पार्टी में कोई अंतर नहीं है। बहस केवल इस बात को लेकर हो रही है कि इनके प्रशासन में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है, जब हम आएंगे भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश करेंगे। जहां तक वैचारिक नीति का प्रश्न है, आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस का ही प्रतिरूप है। इसलिए जिन पूंजीवादी प्रतिष्ठानों को सोनिया-कांग्रेस के गिरने का खतरा दिखाई देता है, उन्होंने तुरंत आम आदमी पार्टी पर दांव लगाना शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि आम आदमी पार्टी से वैचारिक नीतिगत निरंतरता बनी रहेगी। इसलिए देशी-विदेशी शक्तियों के निहित हित प्रभावित नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यदि राष्ट्रवादी शक्तियां सत्ता में आ जाती हैं, तो सभ्यताओं के संघर्ष में एक ऐसी सभ्यता फिर से अंगड़ाई लेने लगेगी, जिसे अब तक विश्व शक्तियों ने हाशिए पर धकेल रखा है।


2009 आते-आते भारत में राजनीति की बिसात पूरी तरह बिछ चुकी थी। सोनिया गांधी और उनकी पार्टी एक पक्ष था, भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियां दूसरा पक्ष थीं। केजरीवाल और उसकी टीम को पर्दे के पीछे से केवल दर्शक दीर्घा में बैठना था। इन चुनावों में सोनिया गांधी की पार्टी ने लोकसभा में 206 सीटें हासिल कर लीं और भाजपा 117 सीटों पर सिमट कर रह गई। इन चुनाव परिणामों के बाद लगने लगा कि शायद रिजर्व कोटे में सुरक्षित केजरीवाल और उसकी पार्टी को राजनीति की शतरंज पर उतरना न पड़े, क्योंकि सोनिया गांधी ने भाजपा को सीटों की राजनीति में काफी पीछे छोड़ दिया था। लेकिन एक विरोधाभास जिसका उत्तर न अमेरिका की समझ में आ रहा था, और न ही भारतीय राजनीति के घाघ पंडितों के समझ में। वह प्रश्न नरेंद्र मोदी का था। भाजपा तो सीटों के मामले में पिछड़ रही थी, लेकिन मोदी अपनी छवि और लोकप्रियता के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहे थे। सोनिया-कांग्रेस के तमाम प्रयासों के बावजूद गुजरात के दंगे बीता इतिहास बनता जा रहा था और उस राज्य में मोदी की विकास गाथा चर्चा के फोकस में आ रही थी। इसी विरोधाभास ने केजरीवाल और उनकी पार्टी की प्रासंगिकता को बनाए रखा था। आखिर फोर्ड फांउडेशन के करोड़ों रूपए राजनीति के इसी प्रयोग पर खर्च हुए थे।

2009 के बाद के काल में, जिसे भारतीय राजनीति में यूपीए-2 के नाम से जाना जाता है, सोनिया गांधी और उनकी पार्टी की लोकप्रियता में तेजी से कमी आने लगी। सरकार में, सरकार के चलाने वालों ने ही करोड़ों के घोटाले कर दिए। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जिस दिन यूपीए सरकार का कोई घोटाला प्रकाश में नहीं आता हो। हालत यहां तक हो गई की यूपीए सरकार के मंत्री कैबिनेट बैठक की बजाय जेल में बैठे दिखाई देने लगे। डॉ. मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार होने की छवि भी यूपीए सरकार की कलंक गाथाओं को छिपा नहीं पा रही थी। देशभर में निराशा का जो वातावरण बन रहा था, उसके कारण सोनिया-कांग्रेस समय-समय पर होने वाले विधानसभा के चुनावी दंगलों में फिसड्डी बनती जी रही थी और निराशा के इस माहौल का सर्वाधिक लाभ मोदी को मिल रहा था। देश के आम जन में यह विश्वास पनपने लगा था कि समस्याओं का समाधान, साफ-सुथरा प्रशासन और सशक्त सरकार मोदी ही दे सकते हैं। यह स्पष्ट होने लगा था कि राष्ट्रवादी शक्तियों के प्रवाह को रोकना सोनिया गांधी और उसकी पार्टी के बस का नहीं रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह भी अपनी उपयोगिता खोते नजर आ रहे थे। यही वह वक्त था जब राष्ट्रवादी शक्तियों को रोकने के लिए केजरीवाल को दिल्ली में लॉन्च करना अनिवार्य हो गया था। लेकिन इसके लिए एक सशक्त लॉन्चिंग पैड की आवश्यकता थी। सही लॉन्चिंग पैड न मिले तो उपग्रह के रास्ते में ही नष्ट हो जाने का खतरा बना रहता है। लॉन्चिंग पैड के लिए अन्ना हजारे को दिल्ली में किस प्रकार लाया गया, यह एक अलग कहानी है। जब तक अन्ना हजारे और उनके साथी यह समझ पाते की उनका उपयोग केवल लॉन्चिंग पैड की हैसियत में ही किया गया है, तब तक केजरीवाल का प्रयोग हो चुका था। मीडिया के देशी-विदेशी मालिकों ने भी इस पूरे प्रयोग में अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभाई। जब केजरीवाल और उसकी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें जीत कर कुछ सीमा तक भाजपा के रथ को रोकने में सफलता प्राप्त की, तो रैमन मैग्सेस पुरस्कार देने वाले अपनी दूरदृष्टि पर नाच रहे थे और फोर्ड फांउडेशन में ‘कबीर’ को दिए गए धन के सही परिणामों पर संतोष जाहिर कर रहे थे। जब अन्ना हजारे ने रालेगण सिद्धी में केजरीवाल के दूत गोपाल राय को मंच पर ही गांव से निकल जाने के लिए कह कर गुस्सा जाहिर करना शुरू किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और दिल्ली में केजरीवाल, ‘अन्ना को अंग्रेजी नहीं आती’, कह कर उनका मजाक उड़ाने की स्थिति में पहुंच चुके थे। अब देखना केवल यह है कि अरविंद केजरीवाल को लेकर

भारतीय राजनीति में रूचि रखने वाले लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए किया गया यह प्रयोग दिल्ली से आगे बढ़ पाता है, या धूमकेतु की तरह इधर-उधर राख बिखेर कर नष्ट हो जाता है?

डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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