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राहत शिविरों पर सरकारी डंडा

जनवरी की सर्द रात थी। आकाश में छाए बादल और शरीर को चीरती सर्द हवाएं बाहरी दुनिया को अनजान बना रही थीं। लेकिन गांधी भवन का ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। एक बेचैन आवाज ने भीड़ का ध्यान अपनी ओर खींचा। सारी सीटें अक्टूबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के पीडि़त, जिन्हें राहत शिविरों से जबरन बाहर निकाल दिया गया, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया वाले और सम्मानित नागरिकों से भरी हुई थीं। पीडि़तों के चेहरे पर डर, बेबसी और चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। पिछले महीने उनके साथ जो हुआ, उसके बारे में बात करने और शिकायत करने के लिए इस सर्द मौसम में लगभग 250 मील की दूरी तय कर यहां पहुंचे थे। वे दुनिया को बताना चाहते थे कि खुद को अल्पसंख्यकों का रहनुमा कहने वाली सरकार उनके साथ किस तरह की निष्ठुरता दिखा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र से आए इन मुसलमानों को दंगों के आतंक के कारण अपना पैतृक घर छोडऩा पड़ा, उसके बाद सरकार की उदासीनता और निष्ठुरता के कारण एक बार फिर बेघर होकर राहत शिविर छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा। वे अपने साथ हुई हृदय-विदारक घटनाओंं, आतंक, उपेक्षा, बलात्कार और मौतों के बारे में बता रहे थे, जिन्हें पिछले चार महीनों से झेलते आएं हैं। कुछ ने दबी आवाज में तो कुछ ने तीखे तेवरों में ही सही, लेकिन हर किसी ने प्रशासन की असंवेदनशीलता के बारे में बताया। रीसाद गांव की हदीसा कहती हैं – ‘कैसा न्याय। हमारे विरोध के बावजूद प्रशासन ने बड़े-बड़े जेसीबी लगा कर हमारे शिविरों को गिरा दिया और हमें सर्दी के मौसम में खुले आकाश के नीचे रहने को मजबूर कर दिया। इन शिविरों को तोडऩे से पहले न हमें चेतावनी दी गई और न ही सामान खाली करने के लिए कोई वक्त दिया गया। ठंड के मौसम में हमारे सिर पर से छत छीन कर हमें सड़कों पर धकेल दिया गया।’ दंगों के कारण मची भगदड़ से उसके हाथ की हड्डी टूट गई और पति की तबियत ठीक नहीं रहने के कारण अपने तीन बच्चों को पालने के लिए उसे अकेले काम करना है। वह इन दंगों के कारण डरी हुई है। हदीसा जौला शिविर में अपने परिवार के साथ इस आशा में रह रही थी कि सरकार से उन्हें मुआवजा मिलेगा और वापस जाकर अपना घर बना पाएंगी। लेकिन अफसोस की बात यह है कि उनके गांव का नाम उस सूची में नहीं है, जो मुआवजे के लिए चयनित किए गए हैं।

वक्ताओं ने सरकार की उस दलील को चुनौती दी, जिसमें सरकार ने दावा किया था कि लोगों को ठंड से बचाने के लिए शिविरों से निकाला गया।

उस भयानक हादसे की याद अभी भी उनके जेहन में है और उस मंजर को याद कर लोगों के अभी भी पसीने छूटने लगते हैं। कुटबा गांव के रहने वाले इमरान भी सरकार से खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि सरकार पीडि़तों को नजरअंदाज कर रही है। करद गांव के रहने वाले शमशाद की भी यही शिकायत है। कई पीडि़तों ने सरकार पर राहत और मुआवजे में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि सरकार का ध्यान और मुआवजे की राशि बुरी तरह प्रभावित सिर्फ नौ गावों के लिए ही है और बाकियों को नजरअंदाज कर दिया। सामाजिक कार्यकर्ता माधवी कुकरेजा का कहना है – ‘हम केवल राहत पुनर्वास की मांग कर रहे है और इससे कम हमें कुछ भी नहीं चाहिए।’ कुकरेजा ने एक गैर सरकारी संगठन, ज्वॉइंट सिटीजन इनिशिएटिव (जेसीआई) के तहत दंगा पीडि़तों के लिए काम करने की पहल की थी।

वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने कई बार इन शिविरों का दौरा किया और बताया कि 70 हजार व्यक्तियों के लिए बने 70 शिविरों की संख्या घट कर अब सिर्फ 16-20 हो गई है। अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने दंगों के दौरान हुए महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि दंगों के दौराने महिलाओं के खिलाफ हुए यौन हिंसा के ज्यादातर मामले सामने नहीं आए हैं और जो मामले सामने आए हैं, उनमें भी सरकार कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। इसके लिए सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ एक अभियान की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि दंगों के दौरान कई परिवारों के पुरूषों की मौत हो चुकी है और परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अब उस परिवार की महिलाओं के कंधे पर आ गई है। ऐसे परिवारों पर सरकार को विशेष ध्यान देने की जरूरत है, ताकि वे अपने जीवन की गाड़ी को फिर से पटरी पर ला सकें।

जनविकास, गुजरात के गगन सेठी ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने असहाय दंगा पीडि़तों को ठंड के इस मौसम में सड़कों पर रहने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि दंगों के दौरान बुरी तरह प्रभावित नौ गावों के कुछ चुनिंदा परिवारों को ही पांच लाख का मुआवजा मिला है, जो पुनर्वास के लिए अपर्याप्त है। सेठी ने सरकार पर अप्रभावी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस बात का पहले से अनुमान लगाया जा रहा था कि मोदी के वफादार अमित शाह को यूपी का चुनाव प्रभारी नियुक्त किए जाने से प्रदेश में हर कदम पर सांप्रदायिक सौहाद्र्र प्रभावित होगा। लेकिन यूपी सरकार प्रभावी कदम उठाने के बजाय, इसे नजरअंदाज करती रही। उन्होंने कहा कि विस्थापितों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए राष्ट्रीय पहल होनी चाहिए।


आंकड़ों के अनुसार


  • हत्या के पंजीकृत 233 मामलों में सिर्फ 81 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
  • सरकार द्वारा जमींदोज कर राहत शिविरों से निकाले गए लोगों में 72 महिलाएं गर्भवती थीं।
  • कई मुस्लिम जाटों के डर से अपने गांव छोड़ कर भाग गए।
  • हिंसा प्रभावित गांव मे भूमि की कीमतों में गिरावट आई।
  • 70 हजार व्यक्तियों के लिए 70 शिविर बनाए गए।
  • इन शिविरों में कथित रूप से 34 बच्चों की मृत्यु हुई।

राष्ट्रीय सलहाकार परिषद के सदस्य, वरिष्ट पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और फरहान नकवी ने कहा कि मुजफ्फरनगर के दंगों के मामले में सरकार ने असंवेदनशीलता का परिचय दिया है। सरकार द्वारा दंगा पीडि़तों को मुआवजे के बदले एफिडेविट पर हस्ताक्षर कराकर, अपने गांव वापस नहीं लौटने और राहत शिविर खाली करने की जबरन शपथ दिलाए जाने को उन्होंने अपमानजनक बताया।

फरहान नकवी ने कहा – ‘यह बिल्कुल गलत है। पैसा देकर पीडि़तों से उनकी पहचान छीनना और अपनी जड़ों से दूर रहने को मजबूर करना अमानवीय और अन्यायपूर्ण है।’ शिविरों को हटाने के पीछे का मकसद बताते हुए उन्होंने कहा – ‘स्टोरी मिट जाएगी जब कैम्प नहीं होंगे। सब भूल जाएंगे।’

सरकारी प्रतिबंध को देखते हुए मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. संदीप पाण्डेय द्वारा 7 जनवरी को शुरू किए जाने वाले आंदोलन को बैठक में परिवर्तित कर दिया गया। पाण्डेय ने कहा – ‘मुजफ्फरनगर का साप्रादायिक हिंसा आजादी के बाद की सबसे दर्दनाक घटना थी। यह हिंसा कैसे शुरू हुई यह अभी भी विवादित है।’ वक्ताओं के अनुसार, पीडि़तों को गांव छोडऩे के लिए मजबूर किया गया और हिंसा और अपमान के कारण वे वापस अपने गांव जाना नहीं चाहते। उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जाएं तो कहां जाएं। सामाजिक कार्यकर्ता बॉबी रमाकांत ने कहा – ‘उनका पुनर्वास करना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। अगर सरकार इन मुस्लिम परिवारों को न्याय देने में सक्षम नहीं है, तो कम से कम उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए। यह हमारे लिए शर्म की बात है कि एक तरफ मुजफ्फरनगर और शामली के राहत शिविरों में बच्चे ठंड से मर रहे हैं और दूसरी तरफ सत्ता में बैठे लोग मुख्यमंत्री के गृहनगर सैफई, इटावा में उत्सव मना रहे हैं और मंत्री तथा विधायक 17 दिनों की विदेश यात्रा पर जा रहे हैं।’

लखनऊ से कुलसुम मुस्तफा

 

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