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इस्लामिक आतंकवाद और अमेरिका का दोमुंहापन

पाकिस्तान के परमाणु बम को मूलरूप से इस्लामी कट्टरवाद से जोड़ा जाता है, क्योंकि इसके लिए पाकिस्तान ने अरब देशों से आर्थिक सहायता मांगी और ली, खासकर सऊदी अरब से इस आधार पर कि वह ‘इस्लामिक बम’ बना रहा है। लेकिन यह भी सच है कि सऊदी अरब इस क्षेत्र में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी है।

पिछले दिनों मैं दिल्ली स्थित ‘इंस्टिट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फिलिक्ट स्टडीज’ संस्थान में गया था। एक ‘डिस्टिंग्विश फैलो’ के रूप में मैं इस संस्थान से जुड़ा हू। उस दिन मैं वहां भारतीय उपमहाद्वीप में सामरिक मामलों के एक प्रमुख अमेरिकी विशेषज्ञ प्रो. स्टीफन पी. कोहेन को सुनने गया था। वे ‘अमेरिकी फौजों के अफगानिस्तान से हटने के बाद 2014 के पश्चात अफगानिस्तान के हालात’ पर अपना व्याख्यान देने वाले थे। क्या उस देश में लोकतंत्र बना रह सकेगा? क्या वहां महिलाएं शिक्षा के अपने अधिकार को बचा कर आजादी से काम कर सकेंगी? क्या अफगान लोग, जिनमें से 73 प्रतिशत 25 साल से कम उम्र के हैं, अपने लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकेंगे, जिनकी राह में इस्लामी कट्टरवाद किसी तरह की रुकावट न डाल सके? अमेरिका जिस तरह से लोकतंत्र और इसके मूल्यों में विश्वास करने वाली शक्तियों के सहअस्तित्व की अपनी अवधारणा को बढ़ावा दे रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए यह तो माना ही जा सकता है कि तालिबानी सत्ता में आ जाएंगे। इस लिहाज से ये सवाल बहुत प्रासंगिक हैं।

बेशक, इन सवालों के जवाब बहुत मुश्किल हैं। अगर सामरिक मामलों के विशेषज्ञों की बातों पर गौर किया जाए तो उनमें कई मत हैं। जहां कुछ लोग 2014 के बाद के अफगानिस्तान की निराशाजनक तस्वीर देख रहे हैं और वे जातीय आधार पर संभावित विघटन की चेतावनी दे रहे हैं (एक के बाद एक जातीय युद्ध -कुछ का समर्थन पाकिस्तान कर रहा होगा, कुछ का भारत, कुछ का अफगानिस्तान और कुछ का ईरान)। कुछ लोगों का कहना है कि अफगानिस्तान के सामने वे एक बेहतर भविष्य देख रहे हैं, क्योंकि पिछले दस सालों में वहां काफी बड़े पैमाने पर शहरीकरण हुआ है और ये युवा, शिक्षित व शहरी लोग अतिवादी और फूट डालने वालों को बरदाश्त नहीं करेंगे।

आश्चर्य की बात है, कोहेन ने सुरक्षित रास्ता चुना। वह इन सवालों के जवाब ही टाल गए। बार-बार यह कहते हुए कि ‘मैं अफगानिस्तान का विशेषज्ञ नहीं हूं’, उनका कहना था कि– ‘अगर काबुल के प्रति एक तरफ भारत और पाकिस्तान तथा दूसरी ओर अमेरिका और ईरान एक साझा रवैया अपना सकें तो अफगानिस्तान में वाकई स्थिरता रह सकती है।’ लेकिन वास्तव में क्या इस तरह का कोई रवैया संभव है? कोहेन कहते हैं, ”इसमें समस्या तो है, लेकिन इसकी जरूरत है।’’ कोहेन के अनुसार उपमहाद्वीप में भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के पीछे पड़े हैं। इसका एक कारण यह है कि दोनों ही ब्रिटिश राज की सामरिक नीति की विरासत संभाले हुए हैं और अफगानिस्तान समेत हर मुद्दे पर ये एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं। ब्रितानियों की भी यही समस्या रही है और मुगल भी इसी सामरिक क्षेत्र में उलझे रहे थे।

”भारत और पाकिस्तान दोनों ही अफगानिस्तान में ब्रिटिश विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों ही अफगानिस्तान को अपने सामरिक क्षेत्र के रूप में देखते हैं। इसका मतलब है कि दोनों एक दूसरे के साथ स्पर्धा कर रहे हैं। किसी ने भी ऐसी कोशिश नहीं की है और मेरे खयाल से अमेरिका को यह काम करना चाहिए था कि दोनों आपसी सहयोग के लिए सहमति से काम कर सकें। काबुल के मामले में दोनों को साथ लाने की कोशिश की जानी चाहिए थी। दोनों मिलकर अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित करते। अफगानिस्तान के आर्थिक पुनर्निर्माण और सुरक्षाबलों को प्रशिक्षित करने में मदद करके भारत एक बहुत बड़ा काम कर रहा है। लेकिन सुरक्षाबलों को प्रशिक्षित करके तालिबानियों की मदद कर रहे पाकिस्तान के साथ भारत स्पर्धा में आ रहा है।’’

कोहेन का जोर इस बात पर था कि भारत और पाकिस्तान को अफगानिस्तान में परस्पर सहयोग का कोई रास्ता तलाश करना चाहिए, जो इन दोनों के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ईरान के लिए भी बेहतरी का हो। उनका स्पष्ट मानना था कि अमेरिका में अब अफगानिस्तान में लड़ाई जारी रखने का या पश्चिमी एशिया के किसी भी मामले में दखल देने का कोई दम नहीं है, क्योंकि इससे अमेरिका के भीतर ही उनकी लोकप्रियता कम होती जा रही है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि पूर्व अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने अपनी पुस्तक ‘ड्यूटी : मेमोयर्स ऑफ सेक्रेटरी ऑफ वॉर’ में ओबामा के नेतृत्व और अफगानिस्तान में युद्ध जारी रखने की उनकी प्रतिबद्धता की तीखी आलोचना की है। गेट्स ने ओबामा को ‘व्यक्तिगत निष्ठा का इंसान’ बताते हुए कहा है कि राष्ट्रपति इराक और अफगानिस्तान में युद्ध को लेकर असुविधा में थे। वह लिखते हैं कि ‘सैनिकों की संख्या बढ़ाने के लिए ओबामा ने जो आदेश दिया था (2009) उस पर से उनका विश्वास उठ गया था’ और वह ‘भले ही यह न सोच रहे हों कि यह कदम असफल रहने वाला है, लेकिन इसके प्रति संदिग्ध जरूर थे।’ ओबामा के लिए अब इसमें से ‘किसी तरह बाहर निकलना था।’

9/11 के हमले (11 सितंबर को अलकायदा द्वारा न्यूयॉर्क के वल्र्ड टे्रड सेंटर पर हमला किया गया था) के बाद 2002 में अमेरिकी अफगानिस्तान में आए थे। तब से वे अलकायदा और उसके सहयोगी तालिबान के साथ लड़ रहे हैं। लेकिन उन्हें हासिल क्या हुआ? अलकायदा पस्त है, लेकिन हारा नहीं है, भले ही मई 2011 में अमेरिकी सेनाओं ने पाकिस्तान के एबटाबाद में हमला करके ओसामा बिन लादेन को मार डाला हो। लेकिन तालिबान अपनी जगह पर है और उसकी हरकतें जारी हैं। अब अमेरिकियों को लगता है कि वह ‘अच्छा तालिबान’ है और काबुल की सत्ता को उनके साथ साझा किया जा सकता है (या किया जाना चाहिए)। दूसरे शब्दों में अमेरिकी ‘अफगानिस्तान में असफल रहे हैं और वे ‘पराजित होकर’ देश छोड़ रहे होंगे। लेकिन साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर अफगानिस्तान से सेनाओं की वापसी को पश्चिमी एशिया के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है, तो कहा जा सकता है कि अमेरिकियों ने इस्लामी कट्टरवादी विचारधारा के सामने घुटने टेके हैं।

मेरा मानना कुछ और है। मुझे नहीं लगता कि अमेरिका कभी भी इस्लामी कट्टरवाद और उसके साथ जुड़े आतंकवाद के साथ भिडऩा चाहता था। कुछ विद्वान इसे हमेशा की तरह अपने लक्ष्यों को हासिल करने में अमेरिकी विदेश नीति या सामरिक नीति की ‘असंगति’ बताते हैं। लेकिन मुझे तो यही लगता है कि अमेरिकी व्यवहार को ‘असंगति’ की जगह ‘दोमुंहापन’ कहा जाना बेहतर होगा। अब मैं अपनी बात को स्पष्ट करता हूं।

यह तो सर्वविदित है कि सोवियत संघ जब अफगानिस्तान में था, तब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. ने ही तालिबान को खड़ा किया था। वह शीत युद्ध का जमाना था। सीआईए ने तालिबान को पैसे की मदद की थी, नशीले पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा दिया था और पाकिस्तान को (जो तालिबान का गढ़ था) उसके परमाणु अस्त्रों के कार्यक्रम में पूरे दिल से मदद की थी। पुरस्कृत पत्रकार जोड़ी एड्रियन लेवी और केथरीन स्कॉट-क्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘डिसेप्शन : पाकिस्तान, युनाइटेड स्टेट्स एंड ग्लोबल न्यूक्लियर कांस्पिरेसी’ में विस्तार से लिखा था कि किस तरह ए.क्यू. खान ने, अमेरिका की जानकारी में, अमेरिका समेत पश्चिमी देशों से नाभिकीय सामग्री और प्रौद्योगिकी चुराई थी। चाहे वह रोनाल्ड रीगन हों या जॉर्ज बुश या फिर बिल क्लिंटन अथवा जॉर्ज बुश (बेटा) – हर अमेरिकी राष्ट्रपति और उसके अधिकारियों ने न सिर्फ पाकिस्तान को अपना काम करने की छूट दी, बल्कि परमाणु बम बनाने और उसे विकसित करने में मदद भी दी। रीगन ने चीन की धरती से और चीन की सहायता से 1983 और 1984 में पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों की ‘अनदेखी करके’ दुनिया को धोखे में रखा था। जो अधिकारी इस पूरी कहानी को दुनिया के सामने लाना चाहते थे, वरिष्ठ बुश और क्लिंटन ने, उस अधिकारी को न सिर्फ रोका, बल्कि उसे सजा भी दी।

और अंत में, इस तथ्य के बावजूद कि ‘बहुत सी खुफिया जानकारियां इस तरह की आ रही थीं कि पाकिस्तान वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बनता जा रहा है, वह इस्लामिक आतंकवाद का मेजबान और प्रमुख संरक्षक है, एक सैनिक गुट वहां संहार के हथियार बेचकर अपना राजनैतिक प्रभाव बना रहा है।’ बुश (कनिष्ठ) ने पाकिस्तान और ए.क्यू. खान के सभी गुनाह माफ कर दिए। ये सब बातें रिच बार्लो की चौंका देने वाली कहानी से स्पष्ट हैं, जिनका वर्णन इन लेखक द्वय ने बहुत बेहतरीन ढंग से किया है। बार्लो पाकिस्तान में सी.आई.ए. के पाकिस्तानी परमाणु रहस्यों का विशेषज्ञ था और जब उसने अमेरिका के इस रहस्य का परदाफाश किया तो उसे अपमानित किया गया। उसका करिअर और विवाहित जीवन बरबाद हो गए और अब वह इंसाफ की तलाश में अमेरिकी अदालतों के चक्कर लगा रहा है।

पाकिस्तान के परमाणु बम को मूलरूप से इस्लामी कट्टरवाद से जोड़ा जाता है, क्योंकि इसके लिए पाकिस्तान ने अरब देशों से आर्थिक सहायता मांगी और ली, खासकर सऊदी अरब से इस आधार पर कि वह ‘इस्लामिक बम’ बना रहा है। लेकिन यह भी सच है कि सऊदी अरब इस क्षेत्र में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी है। इसके अलावा जांच रिपोर्टों के अनुसार पिछले 40 बरसों में सऊदी अरब ने अलकायदा और इसी तरह के विद्रोही संगठनों को एक खरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी है। सऊदी शाही परिवार भले ही उस तरह का कट्टरपंथी नहीं है जैसा कि बिन लादेन था, लेकिन वह अतिवादिता से ज्यादा दूर भी नहीं हैं।

प्रकाश नंद

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