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राहुल का युद्धाभिषेक

कांग्रेस उपाध्यक्ष और हाल में चुनाव अभियान के प्रमुख के रूप में नामित हुए राहुल गांधी को 17 जनवरी की कांग्रेस कोर कमिटी की बैठक में सुरक्षा कवच पहनाकर अपने राजनीतिक दुश्मन भाजपा और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और अरविंद केजरीवाल एवं आम आदमी पार्टी के खिलाफ लोकसभा चुनाव के लिए तैयार कर दिया गया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह काम उन्हें हताशा भरी शक्ति के साथ करना पड़ेगा।

हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव के परिणामों, जिनमें राहुल गांधी स्टार प्रचारक थे, ने पार्टी की ऊर्जा को कम किया और कार्यकर्ताओं के जुझारूपन को लूट लिया। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की दौड़ से खुद को बाहर कर दिया। अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी अपने स्वास्थ्य और उम्र को ध्यान में रखते हुए अपने कदम वापस खींचते हुए ज्यादातर जिम्मेदारियों को राहुल के हाथों में सौंप दिया।

यहां तक कि दिसंबर में विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के पहले ही कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर चुका था। यह सब पिछले 10 सालों की सत्ता विरोधी लहर और बढ़ती महंगाई को रोकने में नाकाम रहने के कारण हुआ। पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान शीर्ष स्थानों पर हुए भ्रष्टाचार ने पहुंचाया, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय को विवादित करने वाला कोल ब्लॉक का मामला भी है। सरकार द्वारा दलाली के कारनामों ने सरकार और पार्टी की छवि को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया।

जब ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की बैठक बुलाई गई, तब यह उम्मीद की जा रही थी कि इस बैठक में अप्रैल-मई में होने वाले निर्णायक चुनावों के लिए पार्टी की गतिविधयों में तेजी लाई जाएगी और बैठक में शामिल होने आए प्रतिनिधि अपने-अपने राज्यों में जोश के साथ लौटेंगे। ऐसे में दृढ़संकल्प भाजपा और दिल्ली में कांग्रेस को साफ कर अद्भूत जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी की चुनौतियों का जवाब देने के लिए उनके पास महत्वपूर्ण बिंदू होंगे।

इस बैठक में एकमात्र महत्वपूर्ण संकेत राहुल की जुझारू और आक्रमक शैली का था। उन्होंने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की तरह ही कांग्रेस के जोशविहीन कार्यकर्ताओं के मनोबल को झकझोरते हुए, पार्टी के धर्मनिरपेक्ष, उदार और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए भाजपा की सांप्रदायिक विचारधारा पर वार किया। उन्होंने आगाह किया कि कांग्रेस को खत्म करने वाले खुद खत्म हो जाएंगे, क्योंकि कांग्रेस एक सोच है, एक दृष्टि है, एक लोकाचार है, जो भारत के पिछले 3 हजार सालों के इतिहास का साक्षी है।

कांग्रेस के वैसे कार्यकर्ता, जो बैठक में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग कर रहे थे, वे निराश होकर वापस लौट गए। इसके पहले पार्टी की वर्किंग कमिटी ने उन्हें चुनाव अभियान की कमान सौंपने का निर्णय ले लिया था। उन्हें पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से इसलिए परहेज किया गया, ताकि राहुल गांधी को मोदी से प्रत्यक्ष तुलना होने से बचाया जा सके। मोदी एक मजबूत, निर्णायक और गतिशील नेता के रूप में पेश किए जा रहे हैं, जबकि अमेठी के सांसद राहुल गांधी को एक बार फिर सामने से नेतृत्व करने के बजाय, उनकी जिम्मेदारियों को सीमित कर दिया गया।

इसके पीछे कांग्रेस ने यह तर्क दिया कि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ है, क्योंकि चुने हुए सांसद अपने नेता का चुनाव करते हैं। लेकिन आश्ंाका यह भी है कि पार्टी के खिलाफ जनता के मूड को देखते हुए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से महंगाई और भ्रष्टाचार सहित यूपीए सरकार की सारी खामियों का दोष उनके ऊपर आ जाता।

करिश्मा और विश्वश्नीयता का संकट

कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट और समर्थकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गांधी नाम और ब्रांड का करिश्मा, जिसने पार्टी को कई मुश्किलों से उबारा, अब खत्म हो जाएगा? क्योंकि पार्टी ने सन् 2012 में प्रियंका द्वारा जबरदस्त चुनाव प्रचार के बावजूद सोनिया के गढ़ राय बरेली में सभी पांच सीटें गवां दी। इसके अलावा राहुल के संसदीय क्षेत्र अमेठी में भी पांच में से तीन सीटें गवां दी।

2009 तक पार्टी के लिए सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। तब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के रूप में ताकतवर त्रिमूर्ति थी। सबने साथ मिलकर जाति और विचारधारा के बंटवारे की बाधाओं को तोड़ा और देश के गरीब, मध्यमवर्गीय और युवाओं के आईकॉन बन गए। लेकिन मनमोहन सिंह की चमक घटती गई और मध्यम वर्ग पार्टी से दूर होता गया। न प्रत्यक्ष रूप से और न ही अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी युवाओं का समर्थन पाने में सफल हुए, जिन्होंने दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन और अण्णा हजारे के आह्वान पर भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली की सड़कों को पाट दिया था। इस वजह से सोनिया ने अपने अभियान में वंचितों और गरीबों के साथ उचित न्याय करने की कोशिश की। लेकिन राहुल गांधी के समर्थन से सोनिया गांधी का पीछे हटना, यह प्रश्र खड़ा करता है कि क्या राहुल के आगे आने से लोगों को गांधी नाम प्रभावित करेगा?

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद पार्टी को बचाने के लिए कांग्रेस हर विकल्प पर विचार कर रही है। इस संदर्भ में अकेला सबसे बड़ा कदम रहा। प्रियंका गांधी को परिदृश्य में लाना। वह न सिर्फ अपनी मां और भाई के संसदीय क्षेत्र — राय बरेली और अमेठी का प्रबंधन देखेंगी, बल्कि देश भर में उनके चुनावी अभियान और कार्यक्रमों की भी देख-रेख करेंगी। इसके तहत प्रियंका गांधी देश भर में आम जनता और स्थानीय नेताओं से बातचीत और बैठक करेंगी और उनसे फीडबैक लेंगी। इसके अलावा, वह पार्टी के चुनावी अभियान के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिकार के रूप में भी काम करेंगी।

सोनिया भी दोषी

ऐसा नहीं है कि पार्टी की वर्तमान हालत के लिए सोनिया जिम्मेवार नहीं हैं। हालांकि उन्होंने असफलताओं के बजाय उपलब्धियां ज्यादा हासिल की हैं। लेकिन पिछले 10 सालों से यूपीए का केन्द्र की सत्ता में रहने के बावजूद वे संगठन को उन राज्यों में मजबूत करने में, जहां दशकों से पार्टी मुख्यधारा की राजनीति से गायब है, असफल रही हैं। इसमें बिहार, उत्तर प्रदेश (2009 में 21 लोकसभा सीट जीतने के बावजूद), पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु शामिल है, जहां लोकसभा की कुल 201 सीटें हैं। गुजरात में स्थिति और भी बुरी है, जहां नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने में कांग्रेस पूरी तरह असफल है और आज नरेन्द्र मोदी एक राष्ट्रवादी दल के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

सोनिया की असफलताओं में संभवत: एक बिंदू यह भी है कि उन्होंने पार्टी को मजबूत करने के लिए सक्रिय राजनीति में अपने बेटे को महत्व दिया। 2004 में कांग्रेस की जीत के बाद राहुल गांधी को पार्टी महासचिव बनाना, जनवरी 2013 में उन्हें स्टार प्रचारक घोषित करते हुए उपाध्यक्ष बनाना और 2014 में मुख्य रणनीतिकार और चुनाव अभियान का प्रमुख बनाना उसी महत्वकांक्षा का हिस्सा है।

ठोस वोट बैंक नहीं

कांग्रेस अपने लिए ठोस सामाजिक आधार तैयार करने में असफल रही है। वह ऊंची जाति, दलित और अल्पसंख्यकों के परंपरागत वोट बैंक को भाजपा और बसपा-सपा-राजद-लोजपा जैसी क्षेत्रीय दलों के हाथों खो चुकी है। यूपीए-1 को वाम झुकाव देने वाली सोनिया गांधी की पहल ने सत्ताधारी पार्टी को गरीबों तक पहुंचाने में मदद की। मनमोहन सिंह के आकर्षण से मध्यम वर्ग को और राहुल के आकर्षण से युवाओं को बल मिला। लेकिन इस सामाजिक गठबंधन के पतन के साथ ही कांग्रेस का चुनावी मंच तक पहुंचने का आधार भी खत्म हो गया।

आम आदमी पार्टी, जिसका नाम लिए बिना राहुल गांधी ‘गंजों को हेयरकट बेचने वाली पार्टी’ कहकर उपहास उड़ा चुके हैं, के उदय ने दिल्ली के गरीब तबके के बीच कांग्रेस के प्रभाव को कमजोर कर दिया। साथ ही यूपीए सरकार के कुशासन और ‘आप’ का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने आम आदमी पार्टी को एक बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड भी दिया है। यूपीए सरकार आदर्श सोसायटी घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, हेलिकॉप्टर घोटाला, टेट्रा ट्रक घोटाला और कोयला घोटाला सहित कई लाख करोड़ रूपयों के कई घोटालों के आरोपों का सामना कर रही है।

एक नौसिखिया पार्टी ने इंदिरा गांधी के वोट बटोरू नारे ‘गरीबी हटाओ’ को बकवास बताकर उसे एक और झटका दे दिया है। ’आप’ को सरकार बनाने का मौका देकर कांग्रेस का नारा ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ उसका उपहास उड़ाने पर मजबूर करेगा। यह वही नारा है, जिसने सोनिया गांधी को 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने में मदद की और यूपीए-1 ने कृषि ऋण माफ, सूचना का अधिकार और नरेगा जैसी योजनाएं लागू की और यूपीए-2 के दौरान खाद्य सुरक्षा बिल लाई। अब पार्टी 2014 के चुनावों के लिए दूसरा नारा तैयार करने में व्यस्त है।

सरोज नागी

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