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आप: कौन-सा रूप है सच्चा?

‘आप’ पार्टी इतनी जल्दी से राजनीतिक परिदृश्य में उभरी है कि यह बता पाना मुश्किल है कि उसका असली रूप क्या है। विश्लेषक अपने-अपने नजरिए से उसका आकलन कर रहे हैं और यह तय कर पाना मुश्किल-सा है कि कौन सही, कौन गलत है। देखा जाए तो आज उसके दो चेहरे साफ नजर आते हैं। एक तो यह कि उसने राजनीति में एक नयेपन का अंदाज पैदा किया है। ‘राजनीतिविहीन’ राजनीति या ‘अराजनैतिक’ राजनीति को अपना कारगर हथियार बनाया है। इस कारण बहुत से गैर-राजनीतिक लोग आज उसकी ओर मुड़ रहे हैं। नए तौर-तरीके, नई शैली और नई भाषा। यह सब स्थापित राजनीतिक दलों को विचलित कर रहा है। मगर यह तो ‘आप’ का एक रूप है जिसने देश में एक हलचल जैसी स्थिति पैदा की है।

एक और रूप है ‘आप’ का। वह है देश की गंभीर समस्याओं के प्रति उसके नजरिए का। जब उसकी और देखते हैं तो बहुत स्पष्टता नजर नहीं आती। सवाल है कि यह अस्पष्टता क्या नई पार्टी होने के कारण है, या फिर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा? देश की आज तीन बड़ी समस्याएं हैं – आर्थिक विकास की कमजोर रफ्तार, नक्सलवाद का आतंरिक आतंक और देश के बाहर से संचालित जिहादी आतंकवाद। आज जब ‘आप’ पार्टी देश भर में लोकसभा के चुनाव लडऩे के मंसूबे बना रही है तो यह सवाल पूछना लाजमी हो जाता है कि पार्टी की सोच, नीतियां, नजरिया और कार्यक्रम आदि क्या हैं और इन समस्याओं के प्रति उसका क्या रूख है। अगर आप पार्टी की वेबसाइट को खंगालें तो इन मुद्दों पर आपको कुछ भी नहीं मिलता। तो लौट-फिर कर कर पार्टी के महत्वपूर्ण लोगों की राय को ही पार्टी की राय मानने के अलावा आपके पास कोई विकल्प नहीं है। यह अलग बात है कि फिलहाल जब भी कोई ऐसा मुद्दा उठता है तो पार्टी के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इसे अपने साथी की निजी राय कहकर पल्ला झाडऩे की कोशिश करते नजर आते हैं।

कश्मीर पर ‘आप’ पार्टी के कार्यकारिणी के महत्वपूर्ण हिस्से और संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण के बयान लोगों में लगातार बेचैनी पैदा कर रहे हैं तो खुद केजरीवाल आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों के बारे में अपने बयानों से विवाद पैदा कर चुके हैं। वह दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बता चुके हैं, जबकि अदालत से इस मामले में सजा दी जा चुकी है। इन दोनों मामलों पर मीडिया में खूब बहस हो चुकी है। इसी तरह नक्सली हिंसा के बारे में भी ‘आप’ पार्टी की सोच को लेकर गहरा भ्रम है। क्या इस बारे में पार्टी की वही सोच है, जो मेधा पाटेकर की है? पार्टी को यह साफ करना चाहिए।

एक अन्य मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वह है आर्थिक नीतियों को लेकर आम आदमी पार्टी की सोच। अभी अमेठी में पार्टी के नेता डॉ. कुमार विश्वास ने गरीबी और पिछड़ेपन को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी की जोरदार निंदा की। सवाल यह है कि ‘आप’ की खुद की सोच क्या है इस बारे में? समीर नायर, कैप्टन गोपीनाथ, इन्फोसिस के पूर्व डाइरेक्टर वी. बालाकृष्णन, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (आरबीएस) की पूर्व अध्यक्ष मीरा सान्याल और आई.टी. क्षेत्र के कई लोगों की इस पार्टी से जुडऩे की खबरें हैं। ये सब हस्तियां निजीकरण के बाद के भारत की नामचीन हस्तियां हैं। ये सब प्राइवेट कंपनियों और निजीकरण कीपक्षधर ही नहीं, बल्कि उसी की उपज हैं। वहीं ‘आप’ की सोच निजीकारण और प्राइवेट कंपनियों के बारे में ऐसी नहीं है। आमतौर से वह निजीकरण को देश की लूट का जरिया मानती है। निजी कंपनियों को चोर, लुटेरे और इस तरह के न जाने कैसे-कैसे उपनाम पार्टी के नेता देते रहे है। अब जबकि कई ऐसे लोग आम आदमी पार्टी में आ रहे हैं, जिनके विचार आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों से मेल नहीं खाते, तो आगे क्या स्थिति बनेगी, बस राम जाने!

‘आप’ ने दिल्ली में मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी कंपनियों पर तो रोक लगा दी, पर उसे स्पष्ट करना चाहिए कि वह रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाएगी? कहां से और निवेश की व्यवस्था होगी? कैसे सुस्त पड़ी आर्थिक विकास की रफ्तार फिर से तेज होगी? क्या गरीबी दूर करने के लिए पार्टी सरकारीकरण और नियंत्रण की उन्हीं नेहरूवादी नीतियों और कार्यक्रमों को अपनाएगी जिसने देश में चालीस सालों तक लाइसेंस राज, लालफीताशाही, अक्षमता और भ्रष्टाचार को पैदा किया? अगर पार्टी के नेताओं के सार्वजनिक बयानों को देखा जाए तो ऐसा ही लगता है। बड़ी मुश्किल से देश नियंत्रण, राशन और कंट्रोल के चंगुल से बाहर आया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष ‘आप’ के वजूद का कारण है, मगर भ्रष्टाचार तो सरकार के नियंत्रण, समाज के संसाधनों की बंदरबांट और उसके पास असीमित अधिकारों से ही पैदा होता है। फिलहाल ‘आप’ के ज्यादातर नेता इसी की वकालत करते दिखाई देते हैं। सिर्फ लच्छेदार भाषणबाजी, व्यंग्य, जुम्लेबाजी और लोकलुभावन नारों से तो विकास नहीं हो सकता…. और न ही ‘आम आदमी’ का भला हो सकता है। ‘आप’ को अब इससे आगे जाकर बताना चाहिए कि इस बारे में उसका ‘आधिकारिक’ नजरिया क्या है?

 उमेश उपाध्याय

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