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संन्यासी के तीन गुण ज्ञान, भक्ति और कर्म

 

आजकल के साधु-संन्यासी, चेले-चपाटे धन चाहते हैं, यश चाहते हैं, कीर्ति चाहते हैं, माला चाहते हैं, पैर पड़वाना चाहते हैं। इसीलिए समाज में आज लोग संन्यासियों पर विश्वास नहीं करते। लेकिन जिस प्रकार हाथ की पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं, उसी तरह सब साधु-संन्यासी एक प्रकार के नहीं होते। उनमें कुछ अपवाद भी होते हैं, और जो अपवाद होते हैं वे वास्तव में संन्यासी होते हैं।

सच्चे संन्यासी के जीवन में तीन गुण होते हैं। वे तीनों गुण व्यावहारिक होते हैं। पहला गुण है ज्ञान।

केवल इतिहास और भूगोल का ज्ञान ही ज्ञान नहीं होता। साधु में धर्म का, सत्य का, न्याय का ज्ञान होना चाहिए। वही ज्ञानी होता है। जो पोथी पढ़कर शास्त्रों को रट लेता है, वह ज्ञानी नहीं, तोता कहलाता है। बोलता कुछ है और करता कुछ है। लेकिन जो संत होता है, जो साधु होता है, उसकी कथनी और करनी में फर्क नहीं होता। धर्म, सत्य और न्याय को वह अपने जीवन का आधार बनाता है।

दूसरा गुण है– भक्ति। साधु-संतों में भक्ति का होना अतिआवश्यक है। ‘भक्ति’ एक व्यापक शब्द है, जिसके अंतर्गत बहुत सारी बातें आती हैं। अगर ‘भक्ति’ है तो ‘वैराग्य’ भी निश्चित होगा। ‘भक्ति’ के साथ ‘श्रद्धा’ भी बढ़ती है। ‘श्रद्धा’ के बढऩे से मन ईश्वराभिमुख होता है। अभी हमारा मन विषयाभिमुख है, संसाराभिमुख है, लेकिन भक्ति के जागृत होने से मन हमेशा गुरू तत्व और ईश्वर तत्व की ओर ही देखता है। इसलिए भक्ति का होना जरूरी है।

तीसरा गुण है– कर्म में संलग्नता। साधु-संन्यासी कर्म त्याग करने की शिक्षा कभी नहीं देते, बल्कि कर्म को करते रहने की शिक्षा देते हैं। अगर कोई कहे कि कर्म करना छोड़ दो, तो मालूम होना चाहिए कि यह आदमी हमें गलत सुझाव दे रहा है। आखिर कर्म कैसे छूटेगा? एक बार को ऑफिस जाना छोड़ा जा सकता है, पर खाना-पीना तो नहीं छोड़ा जा सकता। खाना-पीना छोड़ दोगे क्या? नहीं, भूख-प्यास से मर जाओगे। कर्म को कभी नहीं छोडऩा। चाहे वह अपने लिए किया गया कर्म हो या दूसरों के लिए, कर्म, कर्म होता है, और कर्म ही जीवन होता है। उस कर्म को रचनात्मक और सकारात्मक बनाओ।

ज्ञान, भक्ति और कर्म– संन्यासी में इन तीनों का सम्यक् समावेश होना चाहिए। केवल सैद्धान्तिक और दार्शनिक चिंतन के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से। यही प्रयास होने चाहिएं कि हम अच्छे संस्कारों से अपने आपको युक्त कर सकें।

स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती

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