ब्रेकिंग न्यूज़ 

गांधीजी अमर रहें!

जनवरी 30, 1948 को शाम 5 बज कर 17 मिनट पर एक पथभ्रष्ट कट्टरवादी हिन्दू ने मोहनदास कर्मचंद गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी थी। उनकी मृत्यु व्यर्थ नहीं गई। महात्मा गांधी ने बलिदान देकर वह प्राप्त कर लिया, जो वह जीवित रहते हुए प्राप्त नहीं कर पाए। गांधी ने मर कर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अस्थाई शान्ति की उपलब्धि प्राप्त की। दुनिया भर के समाचार पत्रों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, लेकिन सबसे मार्मिक और स्मरणीय श्रद्धांजलि हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड के सम्पादकीय में दी गई जिसने लिखा: ”गांधीजी जिनकी मुक्ति के लिए जिए, उन्हीं अपने लोगों के द्वारा वह मारे गए। विश्व के इतिहास में सलीब पर चढऩे की यह दूसरी घटना शुक्रवार को – उसी दिन हुई जब एक हजार नौ सौ पन्द्रह साल पूर्व जीसस को मृत्यु दी गई थी। परमपिता, हमें क्षमा कर देना।’’

क्या हम भारतीयों ने गांधीजी को गोली मारने के लिए खुद को माफ कर दिया है? प्रतिवर्ष, उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें और उनकी शिक्षा को याद किया जाता है। ”दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल, आंधी में भी जलती रहे गांधी तेरी मशाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल, दे दी हमें आजादी…।’’ देशभक्ति से सराबोर इस गीत की पंक्तियां उन्हें समर्पित की गई हैं। इन पंक्तियों को गांधीजी की पुण्यतिथि पर भारत के स्कूलों में हजारों विद्यार्थियों द्वारा गाया जाता है। लेकिन क्या गांधीजी की शिक्षा को वर्तमान समय में कोई स्वीकार करने वाला है? क्या वर्तमान पीढ़ी वास्तव में ”राष्ट्रपिता’’ की शिक्षा को पढऩा या उनके दिखाए मार्ग पर चलना चाहती है? ऐसा लगता है कि उनकी सादगी और रोजमर्रा के मितव्ययी जीवन से कोई प्रेरित नहीं है।

वह अकेले और विस्मृत किए हुए खड़े हैं। उन्हें हर वर्ष केवल 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को हार पहनाने के लिए याद किया जाता है। ऐसा करते हुए कांग्रेसी नेताओं का स्वर सबसे ऊंचा होता है। हो भी क्यों न, गांधीजी को कांग्रेस ने ही ”ब्रांड इमेज’’ के तौर पर प्रयोग किया है। बाद में, भाजपा, एसपी और बीएसपी ने भी महात्मा की शिक्षा को अपने भाषणों का हिस्सा बनाना शुरू किया। हाल ही में दिल्ली में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गांधीजी और उनकी शिक्षा के विस्तार से संदर्भ दिए। लेकिन गांधीजी की मृत्यु के छह दशकों से अधिक समय के बाद भी क्या इस पर विचार करने का समय नहीं है कि वास्तव में महात्मा क्या चाहते थे और क्या राजनीतिक दलों ने किया है? खासतौर पर तब जब कि राष्ट्र भ्रष्टाचार की चपेट में है, शासन ढुलमुल है और व्यवस्था ढह रही है?

यद्यपि देश के विभाजन ने गांधीजी की राजनीतिक असफलता सिद्ध कर दी है, उनके दृष्टिकोण ने उन्हें सचमुच असाधारण बनाया है। उनके द्वारा निर्धारित नीतियां उनकी मृत्यु से आधी शताब्दी से भी अधिक काल के बाद भी इंसान के अस्तित्व के लिए अनिवार्य सिद्ध हो रही हैं। परमाणु हथियारों और आतंकवाद की आज की दुनिया में मानव जाति के जीवन के लिए अहिंसा का अनुसरण बेहद आवश्यक है।

2008 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने ”गांधीवादी विचारों पर पीजी डिप्लोमा’’ शुरू किया था। इस डिप्लोमा की सभी पन्द्रह सीटें तुरन्त ही भर गईं। वर्ष के अन्त में इस पाठ्यक्रम में केवल तीन छात्र ही पास हुए। बाकी इसे बीच में ही छोड़ कर चले गए। कोर्स में थ्योरी और प्रेक्टिकल– दोनों को ही शामिल किया गया था। मेडिटेशन और गांधीजी के अंहिसा के मार्ग पर चलने को इसका हिस्सा बनाया गया था। छात्रों को समाज सेवा और गरीबों के बीच काम भी करना था। उन्हें गरीबों की समस्याएं समझना और उन समस्याओं के हल निकालना और सुविधाएं जुटाना था। छात्रों को ये कार्य बेहद मुश्किल लगे। अधिसंख्यों ने संभवत: आगे के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त करने के लालच में इस पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। अगले वर्ष इस पाठ्यक्रम में एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया और परिणामत: विश्वविद्यालय को यह डिप्लोमा कोर्स बंद कर देना पड़ा। अपनी हत्या किए जाने के दिन 30 जनवरी, 1948, को गांधीजी ने अपने समाचार पत्र ”द हरिजन’’ में कांग्रेस के लिए सलाह प्रकाशित की थी। यह सब गांधीजी की लाहौर जा कर बसने के लिए प्रस्थान करने की योजना के पूरा होने से केवल एक पखवाड़े पूर्व हुआ था। गांधीजी ने देश के बंटवारे से बने भावनात्मक विभाजन को समाप्त करने के लिए जिन्ना से अनुमति लेकर 50 पंजाबी शरणार्थियों के साथ पैदल चल कर लाहौर में बसने की योजना बनाई थी। उनकी ओर से सुशीला नैयर पहले ही लौहार का दौरा कर आईं थीं। उन्होंने वहां गांधीजी और शरणार्थियों के परिवारों के रहने के लिए शिविर भी लगा दिए थे। गांधीजी की हत्या ने इस मिशन को रोक दिया था।

गांधीजी की कांग्रेस के लिए अन्तिम सलाह क्या थी, जो शायद पूर्व के उनके वक्तव्यों का खंडन करती थी? अपनी अन्तिम सलाह में उन्होंने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया था। कांग्रेसी नेता महात्मा गांधी की कसम तो खाते हैं, लेकिन उन्होंने कभी उनकी इस अन्तिम और तर्कपूर्ण ढंग से कहा जाए तो सबसे प्रासंगिक सलाह को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन क्या कांग्रेस को एक राजनीतिक दल के तौर पर काम करते रहना चाहिए? या कांग्रेस के नेताओं को बासी, सड़ी-गली संस्कृति को अमान्य कर और भूतकाल के चिन्हों से मुक्त होने का साहस नहीं जुटाना चाहिए, और एक नए भारत के लिए एक नई पार्टी का गठन नहीं कर लेना चाहिए?

गांधीजी केवल एक राष्ट्रीय नेता ही नहीं, बल्कि वह एक अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत भी थे, जिन्होंने अनेक नेताओं को प्रभावित किया। विश्व के पांच गांधीवादी नेताओं– मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, आंग सान सू की और बाराक ओबामा नोबल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित हैं। गांधीजी केवल वर्तमान में ही नहीं, बल्कि भविष्य में भी प्रासंगिक रहेंगे और सभ्यता के अस्तित्व में रहने तक प्रासंगिक रहेंगे। यदि दुनिया के लोगों को शान्ति और समृद्धि से रहना है और भाईचारा और बिरादरी बनाए रखनी है, तो वह केवल अहिंसा, शान्ति और प्यार के गांधीजी के सिद्धान्तों से ही संभव होगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार 08

ru.oltatravel.comукладка модульного паркета видео

Leave a Reply

Your email address will not be published.