ब्रेकिंग न्यूज़ 

‘द सरदार इन द लाईटबल्ब’

खुशवंत सिंह अपनी ‘लार्जर-दैन-लाइफ’ छवि के लिए जाने जाते थे। वे एक लेखक, पत्रकार, स्तंभकार और जोक टेलर थे। मैं उनके लेखन का बड़ा प्रशंसक रहा हूं। मैं हमेशा से उनकी तरह लिखना चाहता था। मैं उन्हें आधे दर्जन से अधिक बार उनकी टिप्पणियों के लिए अपने लेख भेज चुका था, लेकिन उन्होंने उसे नजरअंदाज कर दिया।

1982 में मैं उनसे पहली बार मिला था, जब वह एक स्थानीय वर्नाकुलर डेली के जयंती समारोह के लिए भुवनेश्वर आए थे। खुशवंत सिंह ने कोणार्क यात्रा की योजना बनाई थी और मुझे उनके साथ एक गाईड के रूप में भेजा गया था। उनके मेजबान को लगा कि मैं उनको कंपनी देने के लिए उपयुक्त व्यक्ति रहुंगा, क्योंकि मैं भी एक पंजाबी ही हूं। हालांकि, मैंने इस बात को गुप्त रखा और यह बात उन्हें नहीं बताई कि मुझे पंजाबी बोलनी आती है। मुझे अभी भी सूर्य मंदिर की दीवारों पर कामुक मूर्तियों को देखकर उनके तीखे और मजाकिया टिप्पणियां याद हैं। उन्होंने अपनी पत्नी को पंजाबी में कुछ ऐसी बातें कहीं जो मैं यहां लिख नहीं सकता। बाद में जैसे ही मंदिर की परिक्रमा पूरी हुई, उन्होंने दबी हुई हंसी से कहा – ”आप उडिय़ा लोग बहुत सरल दिखते हैं, लेकिन सदियों पहले भी आपके दिमाग में यही सब चलता था।’

अगले कुछ वर्षों में कई बार उनसे मिलने का अवसर मिला। मुझे एक उड़ान के दौरान उनके बगल में बैठने का भी मौका मिला। वह ज्यादा बातूनी नहीं थे, फिर भी मैंने उन्हें कुछ चुटकुले सुनाए जिनमें से दो उन्हें पसंद भी आए। उन्होंने एक बड़ी डायरी बाहर निकाली और उसमें इन्हें लिखना शुरू कर दिया। कुछ हफ्तों बाद मैंने इन्हें उनके कॉलम में देखा और इसकी जानकारी खुद उन्होंने मुझे दी थी।

खुशवंत सिंह ‘लार्जर-दैन-लाइफ’ वाली अपनी छवि के लिए जाने जाते थे। वे एक लेखक, पत्रकार, स्तंभकार और जोक टेलर थे। मैं उनके लेखन का बड़ा प्रशंसक रहा हूं। मैं हमेशा से उनकी तरह लिखना चाहता था। मैं उन्हें आधे दर्जन से अधिक बार उनकी टिप्पणियों के लिए अपने लेख भेज चुका था, लेकिन उन्होंने उसे नजरअंदाज कर दिया।

जब सद्दाम हुसैन को अमेरिकियों ने मार डाला था तब मैंने कुछ शोकपत्र बनाए और उन्हें जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर को भेज दिए। यह कहानी यहां और विदेशों दोनों के प्रेस द्वारा उठाई गई थी। इसमें मेरे शोकपत्र की तस्वीर और मेरी कहानी के टुकड़े को छापा गया था। खुशवंत जी ने टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे इस टुकड़े को पढ़ा था और छपने के दो सप्ताह के बाद मुझे एक पोस्ट कार्ड पर उनका एक गुप्त पत्र मिला। उनके शब्द कुछ ऐसे थे : ”प्रिय श्री धीर, यह कैसा अजीब, पर फिर भी आकर्षक शौक है आपका, अपने लिखे शोकपत्रों को संग्रह करने का। मुझे आपके संग्रह किए गए शोकपत्रों को देखने में दिलचस्पी है। आप जब भी दिल्ली आएं तो मुझे कॉल करें।’’

मैंने तुरंत उनके पोस्टकार्ड का जवाब देते हुए लिखा कि मैं अगले महीने दिल्ली आउंगा तो संग्रह किए अपने पत्रों को लेकर आपसे मिलूंगा। जल्दी ही मुझे एक और पोस्टकार्ड मिला, जिसमें एक लाइन का गुप्त संदेश एक फोन नंबर के साथ लिखा था: ‘आने से पहले मुझे फोन करना’। मैंने बहुत घबराहट के साथ उन्हें फोन किया। मुझे बोला गया था कि वो अपना फोन खुद ही उठाते थे और समय के काफी पाबंद थे। अगर बताए गए समय से कोई पांच मिनट से भी चूकता है तो वह उससे मिलने से मना कर देते थे। उन्होंने मेरा फोन उठाया और मैंने उन्हें उनके पत्र के बारे में याद दिलाया। ‘आज शाम 7 बजे आ जाइए’ उन्होंने कहा और मेरा फोन नंबर ले लिया।

उस दिन जब मैं शाम को होटल पहुंचा तो वहां खुशवंत सिंह ने रिसेप्शन पर एक नोट छोड़ा था, जिसमें उन्होंने ‘शाम को मिलना संभव नहीं है’ लिखा था। ये देख मैं निराश हो गया था। अगली सुबह मैंने उन्हें फिर से फोन किया और उन्होंने मुझसे माफी मांगी और कहा कि विदेश से उनके कुछ मेहमान आए थे तो वह नहीं मिल पाए। मैंने उनसे शाम को मिलने के लिए पूछा तो वो मौन हो गए। उन्होंने पूछा – ‘क्या आप अभी आ सकते हैं?’ मैंने सकारात्मक उत्तर दिया और सिर्फ आधे घंटे के अंदर मैं अपनी प्रदर्शनी के साथ उनके सुजान सिंह पार्क वाले घर के बाहर खड़ा था।

उनके गेट पर लिखा था कि ‘कृपया तब तक घंटी न बजाएं, जब तक आप से उम्मीद न की जा रही हो।’ मैंने डरते हुए घंटी का बटन दबाया और एक छोटे सरदार ने मुस्कुराते चेहरे के साथ दरवाजा खोल मुझे अंदर आने को कहा। वह घर में अकेला था और चाय बनाने में सक्षम नहीं होने के कारण उसने मुझसे माफी मांगी।

वे अपने सोफे पर बैठ कर एक स्टूल पर पैर फैलाए, फरवरी की ठंड से बचने के लिए एक कंबल लपेटे हुए थे। उनके बैठक का कमरा पुस्तकों से भरा हुआ था। उस कमरे में कागज ही कागज थे। छात्रवृत्ति का टोकन, उर्दू शायरी और साठ से अधिक उच्चस्तरीय पुस्तकों के अनुवाद से वह कमरा भरा हुआ था। लेकिन इतने सब के बावजूद भी वो दावा करते थे कि वो कोई विद्वान नहीं थे। मैं कालीन वाले फर्श पर बैठ गया और उन्हें अपनी पूरी प्रदर्शनी सौंप दी। अगले एक घंटे तक उन्होंने पूरे संग्रह को अच्छे से देखा और कवर, टिकटों और इतिहास के बारे में मुझसे सवाल करते रहे। उन्होंने कवर और टिकटों को बारीकी से देखते हुए विवरण दिया, मैं इस विषय पर उनके ज्ञान को देख अवाक हो उठा।

उन्होंने मुझे बताया कि लेख को पढऩे के बाद उन्हें यह सब दिलचस्प लगा तो उन्होंने इस पर काफी ज्ञान बटोर लिया। एक घंटे बाद जब मैं अपना सामान बटोर रहा था तो खुशवंत सिंह ने अचानक मुझसे कहा कि ‘मेरे मरने के बाद, मेरे लिए भी एक ऐसा शोक कवर तैयार करना’।

‘आप मुझसे ज्यादा जीएंगे, ऐसा मौका कभी आएगा ही नहीं’, मैंने उनसे कहा। ‘बकवास मत करो, मुझसे वादा करो कि मेरे मरने के बाद मेरे लिए एक कवर बनाओगे। यह बहुत जल्द ही होगा। तुम्हें ज्यादा समय तक इंतजार नहीं करना होगा।’ उनकी इस बात ने मुझे काफी परेशान कर दिया।

मुझसे वादा लेने के बाद, हम दोनों कवर कैसा बनेगा उस पर चर्चा करने लगे। वे उठे और पास की किताबों की एक अलमारी के पास गए और एक ब्लैक एंड वाईट तस्वीरों की एलबम निकाली। उन्होंने अपने युवा दिनों की कुछ तस्वीरों की तरफ इशारा किया, लेकिन अंत में हमने उनके कॉलम ‘मेलिस टुवर्ड्स वन ऐंड ऑल’ में लगी बल्ब में बैठे सरदार की तस्वीर पर फैसला किया।

पहले इलस्ट्रेटेड वीकली और फिर हिन्दुस्तान टाइम्स, जिसके वो कुछ समय पहले संपादक रह चूके थे, में लिखे गए उनके कॉलम काफी चर्चा में रहे थे और काफी कुछ विवादों के घेरे में भी। यह कई सालों तक चला, उनकी एक व्हिस्की की बोतल और गिलास के साथ गुरु की तरह बल्ब के नीचे बैठे, बगल में किताबों का ढेर और कुछ लड़कियों की पसंद की पत्रिकाओं वाला एक कार्टून उनके कॉलम की विशेषता थी। यह कार्टून मारियो मिरांडा द्वारा तैयार किया गया था और यह पहले इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया में संपादकीय पेज में दिखाई दिया था।

अपने खुलकर और कड़वाहट भरी लेखनी के लिए खुशवंत सिंह को कई अपमानजनक मेल भी मिले। उन्होंने मुझे कनाडा से आया एक लिफाफा दिखाया जिस पर ‘खुशवंत सिंह, बासटर्ड, इंडिया’ लिखकर संबोधित किया गया था। क्योंकि वह पत्र डाकघर द्वारा वितरित हुआ तो वह इस पर गौरवान्वित महसूस करते थे। यह लिफाफा उनके लिए काफी कीमती था। उन्होंने कई सालों से इस लिफाफे को संभाल कर रखा था और अपने कई दर्शकों को भी यह दिखाया।

मैं अपने साथ उनकी दो किताबों की प्रतियां: ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और ‘अ हिस्ट्री ऑफ द सिख्स’ ले आया था। उन्होंने अनिच्छा से उन किताबों पर अपना ऑटोग्राफ दिया और फिर मुझे अलविदा कहा। यह आखिरी बार था जब मैं उनसे मिला था। उस दोपहर की यादें अभी भी मेरे मन में रह गईं है। मैंने बाद में कई बार अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान उन्हें फोन किया, लेकिन हर बार उन्होंने मुझसे मिलने से इनकार कर दिया। वह बूढ़े हो गए थे और बहुत कम लोगों से मुलाकात किया करते थे। खुशवंत सिंह का 20 मार्च, 2014 को निधन हुआ, वह तब 99 वर्ष के थे।

खुशवंत सिंह उन संयमी, विनम्र, अनुशासित और उदार व्यक्तियों में से थे जिन्हें मैं कभी मिला था। मैं विशेष रूप से उनका, उनके लेख और भाषणों में निडरता से अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रशंसा करता हूं। 1974 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, लेकिन 1984 में सेना के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर उठाए गए कदम का विरोध करने के लिए उन्होंने इस सम्मान को वापस कर दिया। वह एक दुर्लभ चरित्र के व्यक्ति थे जो अपने तरीके से अपने जीवन को जीते थे। वह खुले तौर पर किसी भी धार्मिक समारोह के अनुयायी न होने की घोषणा करते थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सिखों के इतिहास के बारे में बहुत लिखा है और अन्य सिख लेखकों के मुकाबले अधिक सिख शास्त्रों का अनुवाद भी किया।

खुशवंत सिंह अपने जीवनकाल के दौरान दफनाने की प्रक्रिया में विश्वास करते थे, क्योंकि उनका मानना ​​था कि दफनाने से आप पृथ्वी को वो सब वापस कर देते हैं जो आपने उससे लिया है। उन्होंने बहाई धर्म के प्रबंधन से अनुरोध किया था कि उन्हें तरने के बाद कब्रिस्तान में दफनाया जाए। प्रबंधन ने सहमति तो दी परंतु कुछ शर्तों के साथ, जो कि इन्हें अस्वीकार्य थी। इसलिए उसी दोपहर को उनका अंतिम संस्कार किया गया। उन्होंने मृत्यु के बाद किसी भी तरह के धार्मिक समारोह के आयोजन के लिए परिवार को मना किया था।

अनगिनत लोग (स्त्री एवं पुरूष) जिनके जीवन को 99 वर्षों के दौरान खुशवंत सिंह ने छुआ था, उन्होंने उनके निधन पर अपना शोक व्यक्त किया होगा। असली खुशवंत सिंह कौन थे? क्या वह गुरु नानक के भजन के प्रेरित अनुवादक या फिर नीच और गंदे मजाकी पुस्तकों के लेखक थे? क्या वह पूर्ण उपन्यास और लघु कहानियों के लेखक थे या सिखों और पंजाब के वैज्ञानिक इतिहासकार थे? उनके सभी लेखों में एक समानता थी कि उसमें पाखंड और दिखावे की कमी थी।

मैंने जो वादा उनसे किया था उसे मैंने निभाया है। काले बॉर्डर के साथ मैंने वह शोक कवर पिछले सप्ताह प्रकाशित किया था। काफी फिलेटेलिस्ट्स ने मुझे कवर के लिए संपर्क किया है। ‘द सरदार इन बल्ब’ आखिरी बार दिखाई दिया। स्वर्ग अब और सुखद जगह बन गई है, क्योंकि वहां खुशवंत सिंह अपने जोक्स सुनाने के लिए मौजूद हैं। मैं खुशवंत सिंह को अलविदा कहता हूं।

अनिल धीर

владимир мунтян исцелениекосметичка дорожная

Leave a Reply

Your email address will not be published.