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मोदी पर चीन का नजरिया

चीन की जनता मोदी के आर्थिक विचारों से उत्साहित है। वे विकास के पक्षधर हैं। यहीं पर चीन की उम्मीदेें बढ़ जातीं हैं। चीन भारत में ढांचागत आधारभूत संरचना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करना चाहता है।ऐसी परियोजनाओं में उसे पेशकश की संभावना है।

चीन की घोषित स्थिति ऐसी है कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। इसलिए चीनी सरकार की तरफ से भारतीय चुनाव पर कोई बयान नहीं आया। भारत में सरकार के ऊपर अपनी वरीयता को दर्शाने के लिए चीन के अधिकारी राज्य नियंत्रण वाली मीडिया का इस्तेमाल करते हैं।

चीन का आधिकारिक अंग्रेजी दैनिक ‘दि ग्लोबल टाईम्स’ ने 5 मई के अपने अंक में सुझाव दिया था कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की विजय, पश्चिम में बेचैनी पैदा कर सकता है। अमेरिका जैसे पश्चिमी देश ने 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक हिंसा में कथित भूमिका के लिए मोदी के खिलाफ प्रतिबंध लगाए थे।

आलेख में कहा गया है कि भाजपा के घोषणा-पत्र में बहुपक्षीय कूटनीति का वादा किया गया है और पिछले कुछ दशकों में भारत की कूटनीति का अमेरिका के प्रति झुकाव को देखते हुए, राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर एक बेहतर गठबंधन बनाने की कोशिश की जाएगी। आलेख के अनुसार, यह कोशिश पश्चिम को दुखी करेगा। आलेख में यह राय व्यक्त की गई है कि अमेरिका जैसे पश्चिमी देश भारत का इस्तेमाल चीन के विरूद्ध शक्ति संतुलन के लिए करना चाहते हैं, लेकिन वो भारत के प्रमुख हितों पर उसका समर्थन नहीं करते हैं। इस संदर्भ में आलेख भारत के रूपए के अवमूल्यन और भारत से पूंजी के परागमन के लिए अमेरिका की मौद्रिक नीति को दोषी ठहराता है। आलेख में अमेरिका प्रायोजित ‘अंतर-प्रशांतीय भागीदारी (टीपीपी)’ में भारत को शामिल नहीं किए जाने का भी हवाला दिया गया है।

आगे आलेख में अमेरिका और पश्चिम के इरादों पर गहरी शंका जाहिर की गई है और पश्चिमी देशों के दबाव का मुकाबला करने के लिए भारत-चीन-रूस का संयुक्त सहकारी तंत्र विकसित करने पर बल दिया गया है। आलेख में मोदी को भारत के एक मजबूत राजनेता के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो भारत को पश्चिम के लिए राजनीतिक और आर्थिक चुनौती के रूप में खड़ा कर सकता है। लेकिन इस लेख में कुछ सावधानियों का उल्लेख भी किया गया है। इसमें कहा गया है कि पड़ोसी देशों के साथ सामरिक सहयोग बढ़ाने के कारण भारत में चीन की नकारात्मक रूप में लिया जाता है। आलेख भारत की इस नीति में ज्यादा बदलाव नहीं देखता और न ही इसे हासिल करने वाले आक्रामक प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को देखता है।

इस लेख के लेखक लियू जोंगई, प्रख्यात शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टीज में अध्येता हैं। इससे आलेख में लिखी गई बातों के वजन का पता चलता है। चीनी राष्ट्रपति झीं जिनपींग की इस साल सिंतबर-अक्टूबर में भारत यात्रा निर्धारित है। भारतीय इससे आश्वास्त हो सकते हैं कि झी भारतीय उपमहाद्वीप के कम से कम दो अन्य देशों का भी दौरा करेंगे, जिसमें पाकिस्तान भी एक हो सकता है। चाईनीज प्रीमियर ली किकीयांग भारत यात्रा के दौरान पिछले साल पाकिस्तान भी गए थे।

चीन के प्रमुख नेता, खासकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने भारतीय उपमहाद्वीप में सिर्फ भारत की यात्रा कभी नहीं की और भारत इस क्षेत्र की यात्रा कार्यक्रम को समझ नहीं सका। इन यात्राओं को इस तरह निर्धारित किया जाता था, ताकि उपमहाद्वीप के अन्य देशों को यह न लगे कि चीन की विदेश नीति में अन्य देशों की अपेक्षा भारत को अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि पाकिस्तान चीन का सर्वकालिक सहयोगी है, जिसे वह किसी भी कीमत पर खतरे में डालना पसंद नहीं करेगा।

हालांकि चीनी नरेन्द्र मोदी से परिचित हैं (मोदी कई बार चीन की यात्रा कर चुके हैं), लेकिन वे मोदी की विचारधारा, राजनीति और अव्यक्त विदेश नीति को माप नहीं सके हैं। एक बात, जिस पर सभी सहमत हैं, मोदी एक डिटरमाइंड व्यक्ति हैं, जो गलत को गलत कहने से नहीं डरते।

चीनी पिछले एक दशक से मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से मुखातिब होते आ रहे थे। प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह संभवत: कमजोर और दुविधाग्रस्त लग रहे थे, खासकर चीन और पाकिस्तान के मामलों में। वर्गीकृत रूप से नरेन्द्र मोदी मनमोहन सिंह से बहुत अलग हैं। चीनी आश्चर्यचकित हैं कि घरेलू राजनीति में मोदी का दृष्टिकोण उनकी विदेश नीति में भी परिलक्षित होगा। चुनावी अभियान के तहत उत्तर-पूर्वी राज्यों की यात्रा में मोदी ने कहा था कि चीन को अपनी विस्तारवादी नीति को त्यागना होगा। चीन ने इस टिप्पणी को नजरअंदाज नहीं किया। इससे अरूणाचल प्रदेश और भारत-चीन सीमा के पश्चिमी क्षेत्र पर चीन के दावे का संदर्भ स्पष्ट है। लेकिन मोदी की आर्थिक नीतियों से चीनी प्रोत्साहित होंगे। वे विकास चाहते हैं। चीन को उम्मीद है कि आधारभूत संरचना के निर्माण वाली वृहद परियोजनाओं में वह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। उसे उम्मीद है कि इन बड़ी परियोजनाओं में निवेश के साथ-साथ जहां तक संभव होगा उसकी मशीनरी और कामगारों को आमंत्रित किया जाएगा। यदि उन्हें खुली छूट दी गई तो चीन शोषण वाली उन नीतियों को दुहरा सकते हैं, जो वे अफ्रीकी देशों में अपना रहे हैं। यह एक आर्थिक जाल है, जिसमें भारत को नहीं फंसना है।

एक अन्य मुद्दा है, सूचना विज्ञान क्षेत्र में चीन की रूचि का। इस मामले में अमेरिका के बाद चीनी बहुत एडवांस हैं, खासकर साईबर वॉर में। यह बेहद संवेदनशील क्षेत्र है और एक विदेशी संस्था का इन तक असीम पहुंच को बहुत सावधानी से देखा जाना चाहिए। यह याद किया जा सकता है कि किस तरह अमेरिका और इस्रायल ने ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर साईबर हमला करने के लिए 2012 में कथित रूप से ‘स्टक्सनेट’ नामक वायरस का विकास किया था।

व्यापार का असंतुलन तीसरा आर्थिक पहलू है। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2011 में 74 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन 2013 में यह गिर कर 65.47 बिलियन अमेरिकी डॉलर आ गया। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 31.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर के अपने अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच चुका है। इस द्विपक्षीय व्यापार प्रतिमान की विशेषता है कि भारत द्वारा चीन को किया जाने वाला निर्यात एक गैर-अक्षय प्राकृतिक संसाधन लौह अयस्क है, जो कि चीन के विकास के लिए आवश्यक है। दूसरी तरफ, फर्मास्यूटिकल और सॉफ्टवेयर जैसे भारतीय निर्यातों पर रोक लगाकर चीन खराब गुणवत्ता वाली अपनी उपभोक्ता वस्तुओं की डंपिंग भारत में करता है। ये बहुत गंभीर समस्याएं हैं, जिन्हें तुरंत सुलझाने की जरूरत है।

अभी सीमा विवाद को अलग रखा जा सकता है। चीनी भारत के साथ एक स्थायी और अबाधित सीमा चाहते हैं, लेकिन इसके समाधान के लिए अभी तक कोई प्रगति नहीं हो सकी है। हालांकि बीजिंग इसे स्वीकार नहीं करता है, लेकिन झोंगनाहई में मैंडरिन्स को यह स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया कि यदि दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर के मामलों में भारत गंभीर नहीं है तो उसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। अब कई वर्षों के बाद, अमेरिका और हाल ही में जापान के साथ भारत के संबंधों ने चीन को चितिंत कर दिया है। वह देखता है कि चीन को टक्कर देने के लिए भारत ने अमेरिका और जापान के साथ संभावना के दायरे के भीतर हाथ मिला लिया है। अमेरिका-भारत रक्षा विनिमय और अधिग्रहण, एशिया में जापान के प्रधानमंत्री शिंजे अबे द्वारा की गई नई पहल और भारत की ‘पूर्व की ओर देखो की नीति’ के कारण यह शंका और मजबूत हो गई है।

सबूतों से पता चलता है कि चीन दक्षिणी चीन सागर पर अपने दावे को मजबूत करने के लिए अपनी सक्रियता को धीरे-धीरे कार्रवाईयों में बदल रहा है। दक्षिण चीन सागर में मिले तेल भंडार, जिस पर चीन और वियतनाम दोनों ही दावा कर रहे हैं, के कारण कई छोटी झड़पें हो चुकी हैं। वियतनाम के साथ अनुबंधों के आधार पर भारतीय तेल और ऑयल गैस कंपनी ‘ओ.वी.एल. विदेश लिमिटेड’ दक्षिणी चीन सागर में खुदाई का काम कर रही है। एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में चीन ने दक्षिणी चीन सागर के 85 प्रतिशत भाग पर दावा करते हुए इसे अपना मूल मुद्दा बना लिया है। चीनी दावे तेजी के साथ सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ रहे हैं। व्यापारिक मार्ग सहित अन्य उद्देश्यों के लिए दक्षिणी चीन सागर से भारत का बड़ा हित जुड़ा है। अत: हितों का टकराव और वैश्विक चीजों के इस्तेमाल को लेकर असंतोष भारत के साथ भी हो सकता है।

दक्षिणी चीन सागर मुद्दे पर चीन भारत के साथ एक वृहद् दृष्टिकोण विकसित कर सकता है। अमेरिका और जापान सहित अन्य पक्षों के साथ जाने की अपेक्षा, भारत द्वारा अपनाई गई स्वतंत्र विदेश नीति चीन के लिए बेहतर है। दक्षिणी चीन सागर की स्थिति परेशानी पैदा करने वाली है। इसलिए भारत को भावी परिशानियों और प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना होगा।

भाष्कर रॉय

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