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कर्मण्येवाधिकारस्ते…

कर्मण्येवाधिकारस्ते…

By प्रकाश नंदा

प्रधानमंत्री के लिए साइंस एडवाईजरी कॉन्सिल द्वारा 2010 में ‘इंडिया ऐज अ ग्लोबल लीडर इन साइंस’ शीर्षक से तैयार किए गए लेख को पढऩे का आग्रह मैं मोदी से करता हूं।मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि यह लेख उनके कार्यालय में उपलब्ध होगा।इस लेख में उच्च शिक्षा के लिए नया ढांचा परिभाषित करने के लिए कुछ मानदंडों के बारे में बताया गया है।

अपना 66वां गणतंत्र दिवस मना रहे भारत में जहां असंख्य चुनौतियां हैं, वहीं व्यापक अवसर भी हैं। भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरे देश से जबरदस्त समर्थन मिला है। पिछले कुछ दशक के अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत मोदी का पूरे देश में जनाधार है, चाहे वह उत्तर-पूर्व का सुदूर इलाका हो या संकटग्रस्त कश्मीर घाटी। जैसा कि मैंने हमेशा ही तर्क दिया है कि पिछले चुनावों में भाजपा की जीत से ज्यादा मोदी की जीत थी। मोदी ने अपने चुनाव अभियान का आयोजन राष्ट्रपति चुनाव की शैली में किया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्य के रिकॉर्ड के आधार पर उन्होंने भारतीय राजनीति और अर्थनीति में वास्तविक बदलाव का वादा किया। मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने आर्थिक सुधारों को गति दी, जिसकी जरूरत भारत को सबसे ज्यादा है। उन्होंने लालाफीताशाही में सुधार और लाइसेंसराज में कटौती करते हुए अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को कम किया। अब, प्रधानमंत्री के रूप में वे उस भारत के आर्थिक विकास में तेजी की उम्मीद कर रहे हैं, जिसे वैश्विकरण और सूचना प्रद्यौगिकी का पहले से ही लाभ मिल रहा है। और… मजबूत आर्थिक विकास सुनिश्चित करने का मतलब है कि सुरक्षित सीमा के साथ भारत में न सिर्फ स्थिर सरकार हो, बल्कि उसमें क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभाने की क्षमता भी हो। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि भारत 21वीं सदी के महत्वपूर्ण देशों में से एक है।

इन सब के बावजूद मोदी का विजन क्या है? अनिच्छा से ही सही, लेकिन मोदी के कटु आलोचक भी इस बात को स्वीकरते हैं कि मई में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही वैश्विक नेता भारत को गंभीरता से लेने लगे हैं। कम से कम मोदी ऐसे सकारात्मक महौल को बनाने में कामयाब हुए हैं, जिसमें विश्व भारत के साथ व्यापार कर सकता है। ऐसा माहौल अल्पभाषी मनमोहन सिंह की पिछली सरकार में नहीं था। मनमोहन सिंह की सरकार अपनी कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी खींचतान, दबाव और लड़ाई से ही लगवाग्रस्त हो चुकी थी। गणतंत्र दिवस के अवसर पर बराक ओबामा के रूप में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का शिरकत करना (अपने कार्यकाल में दो बार भारत की यात्रा करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति) संकेत देता है कि बाकी की दुनिया में भी इस आशावाद का संचार हुआ है कि मोदी के नेतृत्व में भारत इस शताब्दी में सफलता की नई कहानी लिखेगा। लेकिन… क्या यह आशावाद खत्म हो रहा है?

वैश्विक दृष्टिकोण से भारत की स्वभाविक शक्ति उसके मजबूत लोकतंत्र, अंग्रेजीभाषी विश्व का सबसे युवा मानव संसाधन के रूप में जनसांख्यिकीय लाभांश, सॉफ्टवेयर में कुशलता (जीडीपी के मामले में भारत विश्व का 10वां और क्रयशक्ति के मामले में विश्व का 3रा सबसे बड़ा देश है), प्रभावशाली सैन्य ताकत और मजबूत, स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका में निहित है। इन सबमें लोकतंत्र का चौथा खंभा मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है। ये सभी परिसंपत्तियों को एशिया पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीति के साथ दिखने की जरूरत है, जोकि 21वीं सदी में वैश्विक शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण केन्द्रबिंदू है।

14-02-2015

विश्व की चार प्रमुख शक्तियों – अमेरिका, चीन, जापान और भारत के रणनीतिक विशेषज्ञों द्वारा इस तरफ इशारा किया गया है कि एशिया पैसिफिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका में भारत केन्द्र-बिन्दू है। इस केन्द्र में एक तरफ भारत के एक हाथ में चीन के साथ संभवत: प्रतियोगिता है तो दूसरे में हाथ चीन और जापान का साथ। एशिया क्षेत्र में चीन के उदय को संतुलित करने के लिए नए रणनीतिक निर्माता के रूप में अमेरिका और जापान भारत के साथ सामरिक और दीर्घकालिन संबंध स्थापित करना पसंद करेंगे। चीन को लेकर भारत की भी कुछ चिंताएं हैं, लेकिन समझने की आवश्यकता है कि भारत को इनसे थोड़ी-सी दूरी बनाकर सर्तकता बरतनी चाहिए। भारत के साथ दोस्ती करने के लिए चीन, जापान और अमेरिका में होड़ लगी है। रूस और यूरोपीय देश भी अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए इस होड़ में शामिल हो चुके हैं। भारत एक ऐसी स्थिति में है, जहां बिना किसी प्रतिबद्धता के दोस्त बनने के प्रस्तावों की लंबी कतार है। इसके अलावा भारतीय मूल के 25 मिलियन लोगों का पूरे विश्व में धमक है। यह ‘इंडियन डाइसपोरा’ अपने प्रकार की विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। यह भारत के विकास के लिए ज्ञान, दक्षता, संसाधन और बाजारों तक पहुंचने के लिए सेतु का काम करता है।

इन सब सकारात्मक पक्षों के बावजूद कुछ ऐसे आंकड़ें हैं जो भारत पर धब्बे की तरह हैं। जेनेवा की वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 144 देशों में भारत का 71वां स्थान है और ब्रिक्स देशों में सबसे नीचला स्थान है। फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, ‘भारत 5 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है। 2007 से भारत ने संस्थान, व्यापार परिष्करण, वित्तीय बाजार विकास और माल बाजार दक्षता जैसे क्षेत्रों में गिरावट दर्ज किया है’। फोरम ने अपने रिपोर्ट में आगे लिखा है, ‘भारत को स्थानीय निवेशकों के साथ-साथ विदेशी निवेशकों के लिए भी एक मजबूत और स्थिर संस्थागत रूपरेखा तैयार करने की जरूरत है।’ वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की रैकिंग 12 क्षेत्रों के अंकों पर आधारित है। इन क्षेत्रों में संस्थान, आधारभूत ढांचे, व्यापक आर्थिक वातावरण, स्वास्थ्य एवं प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण, माल बाजार दक्षता, श्रम बाजार दक्षता, वित्तीय बाजार का विकास, तकनीकी उन्नयन, बाजार का आकार, परिष्कृत बाजार और नवाचार शामिल है।

मोदी को पदभार संभाले 8 महीने हो चुके हैं। उनकी सरकार ने अनावश्यक कानूनों को हटाने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। लेकिन, लालफीताशाही और लाइसेंसराज अब भी जारी है। व्यापार करने के मामले में भारत अभी भी एक चुनौती वाला देश है। विश्व बैंक की ताजा ‘इज ऑफ डूङ्क्षइग बिजनेस’ रिपोर्ट में भारत 189 देशों की सूची में दो अंक नीचे खिसकते हुए 142वें स्थान पर आ गया है। इससे अंदाजा लगता है कि निवेशकों को आकर्षित करने वाले शीर्ष 50 देशों की श्रेणी में भारत को पहुंचाने की कितनी बड़ी चुनौती मोदी के सामने है। पुराने कानूनों का सामना करने के अलावा विदेशी कंपनियां को राजनेताओं (खासकर विपक्षी दलों के) और मीडिया के शत्रुतापूर्ण रवैए का भी यहां सामना करना पड़ता है। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि साधारण मामले में भी पूरी प्रक्रिया को नौकरशाही जटिल और लंबा समय लेने वाला मामला बना देती है। एक विदेशी राजनयिक ने अपनी आयातित कार का भारत में पंजीकरण कराने में लगे 7 माह के बाद अगले दिन मुझे बताया कि उनके देश में किसी विदेशी राजनयिक के लिए यह एक दिन का काम होता है। उन्होंने बताया कि किस तरह एक विदेशी राजनयिक को रेस्टोरेंट में खाने और खरीददारी करने में चुकाए गए टैक्स (यह करमुक्त होता है) को वापस पाने में एक साल से ज्यादा का समय लग गया।

जैसा कि मैंने पहले ही कहीं बताया था कि जिस देश में हर चीज नेहरूवियन फ्रेमवर्क में मजबूती से ढली हो, वहां चीजों को बदलना आसान नहीं है। इस फ्रेमवर्क को भाजपा नेताओं ने हमेशा चुनौती दी है। ऐसा कहा जाता है कि खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अलावा इस फ्रेमवर्क को किसी प्रधानमंत्री ने मजबूत करने की कोशिश की तो वह अटल बिहारी वाजपेयी थे। 1980 में आधुनिक भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने ही ‘समाजवाद’ को पार्टी के चार्टर में शामिल किया था। वाजपेयी के ‘गांधीवादी समाजवाद’ को भाजपा के वर्तमान नेता दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवाद’ से समरूप बताते हैं, लेकिन मेरी राय में मामला यह नहीं है।

संक्षेप में कहें तो विपन्न और पिछड़ेपन से अलग, नेहरू का समाजवाद और नियोजन वाली एक मजबूत और केन्द्रीकृत सरकार का सपना था। वास्तव में नेहरू राजनेताओं के बीच प्रतिस्पर्धात्मक जनवाद के जनक थे, जिनका मानना था कि अर्थव्यवस्था का अर्थ है मुद्रा को बढ़ाना ताकि अपनी मर्जी के अनुसार खर्च की जा सके। राजनीतिक क्षेत्र में नेहरू ने समानता को अमूर्त रूप में कहा, क्योंकि योग्यता और क्षमता को गलत शब्द माना जाता था और आज जाति आधारित आरक्षण तथाकथित सकारात्मक क्रियान्वयन बन गया है। नेहरू के ‘विज्ञान’ ने पारंपरिक ज्ञान, मूल्य और नैतिकता, जोकि प्राकृतिक दुनिया के आंतरिक मूल्य और पवित्रता को इंगित करता है, को न सिर्फ नजरअंदाज किया बल्कि उसका क्षरण भी किया। नेहरू के धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है हिंदू धर्म में सुधार और अल्पसंख्यकवाद का संवद्र्धन। नेहरू को दुनिया देखने का नजरिया यथार्थवाद के बजाय आदर्शवाद पर आधारित था, जिसका परिणाम यह हुआ कि सुरक्षाबलों को हमेशा नजरअंदाज किया जाता रहा।

इसका यह अर्थ नहीं है कि नेहरू के महत्व और देश के प्रति उनके योगदान को कम आंका जा रहा है। फिर भी, जिस लोकतांत्रिक देश में हम रह रहे हैं उसके असंख्य समस्याओं के निदान के लिए नेहरू का विजन ही एकमात्र उपाय या रामबाण नहीं हो सकता। अधिकांश लोगों का कहना है कि उस देश में नेहरू का विचार आज भी महत्वपूर्ण है, जहां विश्व के एक-तिहाई गरीब निवास करते हैं। लिंगभेद को खत्म करने में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब है। वल्र्ड इकोनॉमी फोरम के 2014 के जेंडर गैप इंडेक्स में 142 देशों में भारत का स्थान 114वां है। आर्थिक सहभागिता, शैक्षिक प्राप्ति, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता में भारत का स्थान औसत से भी नीचे है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के समय चीन और कोरिया की अर्थव्यवस्था से मीलों आगे रही भारत की अर्थव्यवस्था आज उनसे मीलों पीछे है। भारत का नेहरूवियन मॉडल 1947 में जितना भ्रष्ट था उससे कई गुणा ज्यादा आज भ्रष्ट है। भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल 2014 में 175 देशों में भारत का 85वां स्थान था। नेहरूवादी ढांचे के कारण आज भारत का समाज 1947 की अपेक्षा आज ज्यादा खंडित हो चुका है। हिंसा, अपराध, बलात्कार, लड़कों के साथ कुकर्म, मादकता और इंसेस्ट (नजदीकी संबंधियों या परिजनों के साथ व्याभिचार) जैसे अपराध नेहरूवादी भारत में चरम पर रहा है। इन वर्षों में नेहरूवाद का मूल मंत्र रहा है, गरीब को गरीब बनाए रखना और पहले से ही विभाजित भारतीय समाज को अपने स्वार्थ के लिए और विभाजित करना।

मोदी ने भारत को नेहरूवाद के काले साए से बाहर निकालने का वादा किया था और अब हमारे सामने शासन का एक नया मॉडल रखा है। मतदाताओं ने मोदी के मॉडल के लिए उन्हें पांच साल का वक्त दिया। मतदाताओं ने मोदी में विश्वास जताया है न कि भाजपा में, जो कि खुद भी नेहरूवाद से बुरी तरह ग्रस्त है। अभी तक किसी को पता नहीं है कि मोदी अपनी ही पार्टी भाजपा के विरोधियों और वैश्विकरण एवं उदारीकरण के विरोधी संघ के दबाव से कैसे बाहर निकलेंगे। दरअसल संघ मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम से ही नफरत करता है। जैसा कि लोगों का मानना है, भाजपा प्रखर लोकलुभावन दल है। भाजपा दिल्ली के लोगों से कहती है कि बढ़ी हुई बिजली और पानी दर की बिल को न चुकाएं, जबकि राजधानी में बिजली और पानी का दर पूरे देश में अपेक्षाकृत सबसे कम है। मोदी दिल्ली को स्मार्ट सिटी बनाना चाहते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए हर अवैध और गैर-कानूनी चीज को वैध बानने के लिए दिल्ली भाजपा केन्द्र सरकार को बाध्य कर रही है। कांग्रेस की तरह भाजपा भी ‘दरिद्र नारायण’ की धारणा के महिमामंडन में विश्वास करती है और कुछ रूपए या कुछ किलोग्राम अनाज के रूप में यहां-वहां भिक्षा दे रही है। भाजपा सर्वमुखी विकास तंत्र की बात नहीं करती, ताकि कोई भी व्यक्ति भिखारी या गरीब न रहे। दूसरों की तरह भाजपा भी गरीबों के सशक्तिकरण की बात नहीं करती, बल्कि वह भी चाहती है कि गरीब हमेशा गरीब ही बना रहे।

आज मोदी दो प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। एक है उनका अपना संघ परिवार और दूसरा है ‘दिल्ली प्रतिष्ठान’। इसमें दिल्ली की नौकरशाही, दिल्ली का बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया भी शामिल है। वास्तव में संघ और भाजपा के अधिकांश सदस्य इसी दिल्ली प्रष्ठिान से जुुड़े हुए हैं, जिनकी जड़ें  नेहरूवाद में गहराई तक निहित है। इनका मानना है कि एक ‘बाहरी व्यक्ति’ मोदी ने दिल्ली का शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण कर लिया है। ये शत्रुतापूर्ण रवैया आने वाले दिनों में और बढ़ेंगे जब मोदी अपने वादों को पूरी तरह निभाने में असमर्थ रहेंगे। जहां तक मीडिया का सवाल है, फासीवादी मोदी का डर दिखाने वाले उसके मोदी-विरोधी तत्व हर गुजरते दिन के साथ और मजबूत होंगे। वे आज भी सरकार द्वारा नियंत्रित या पोषित मीडिया में पूरी तरह हावी हैं।

हालांकि यह भी एक तथ्य है कि अधिकांश समय मोदी खुद ही पीट जाने के लिए अपने आलोचकों को छड़ी थमाते रहते हैं। वे बिना किसी फॉलो-अप के बहुत ज्यादा बातें और वादे करते रहते हैं। हालांकि उनके वादे बिना गहराई वाले बेहद साधारण प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने बहुत धूमधाम से ‘स्वच्छ भारत’ अभियान की शुरूआत की। लेकिन, क्या उन्होंने ऐसा कोई तंत्र बनाया जो इस बात का ध्यान रख सके कि इसे कैसे लागू किया जा रहा है? उनका अभियान सिर्फ कागजों तक सीमित है, इसे देखने के लिए उन्हें दिल्ली से बाहर जाने की जरूरत नहीं है। लुटियंस दिल्ली के बाहर का क्षेत्र हमेशा की तरह गंदगी से भरा पड़ा है। मेरे अपने इलाके में अनियंत्रित गायों से घिरा कूड़े का ढ़ेर लगा है। इस बारे में अपने इलाके के विधायक से बात करने का मुझे अवसर मिला। उनका उत्तर थोड़ा चकित करने वाला था। उन्होंने कहा – ”भाई, यह क्षेत्र के निगम पार्षद का काम है। लोगों ने इस काम को करने के लिए मुझे विधायक नहीं चुना है।’’ दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी की तरह ही अधिकांश सांसद और विधायक इस अभियान को अपने लिए फोटो खींचवाने का अवसर मात्र मानते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं। इस संबंध में एक अन्य उदाहरण भी दिया जा सकता है। मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार मंदिरों से ज्यादा शौचालय बनवाएगी, लेकिन शौचालय के एक साधारण ढांचे-मात्र का क्या होगा, जब उसमें पानी की आपूत्र्ति और सीवेज सिस्टम न हो। जितना शौचालय का होना महत्वपूर्ण है उतना उसका साफ रहना भी महत्वपूर्ण है। शौच के लिए बदबूदार शौचालयों, जैसा कि सार्वजनिक शौचालयों में देखने को मिलता है, में जाने से ज्यादा स्वास्थ्यकर है प्राकृतिक रूप से खुले में जाना।

14-02-2015

हर बितते दिन के साथ मैं आश्वस्त होते जा रहा हूं कि मोदी का बहुप्रचारित ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम भी सिर्फ सेमिनार का विषय बनकर रह जाएगा। यदि मोदी वाकई चाहते हैं कि देश की सकल घरेलू उत्पाद में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान एक तिहाई (वर्तमान यह 18 प्रतिशत है) हो, जो कि हमारे देश के युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराएगा, तो उन्हें विदेशी निवेशकों के बजाय देश में  शोध और शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। क्या हमारे पास पर्याप्त कुशल युवा हैं? क्या हमारे पास पर्याप्त मानव संसाधन हैं जो हस्तांतरित विदेशी तकनीक को हैंडल कर सकें? भारत में संचालन करने वाली कई विदेशी कंपनियों के अधिकारियों ने एक मुलाकात में बताया कि वे को-प्राड्यूस और को-डेवलपमेंट कार्यक्रम में भारत की क्षमता को लेकर संशय में हैं। रक्षा शोध एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) तथा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का पुराना रिकॉर्ड इस तरह साफ इशारा करता है। औपचारिक डिग्री वाली भले ही हमारे पास बहुत बड़ा मानव संसाधन हो, लेकिन टैलेंट के मामले में हमारे पास क्या है? दूसरे शब्दों में कहें तो एक कंपनी या संस्थान तभी बेहतरीन परफॉर्म कर सकती है, जब उसके पास दक्ष मानव संसाधन हो।

वर्तमान शिक्षा नीति के तहत निकले अनुपयोगी डिग्रीधारकों के बजाय, हमें दसवीं के बाद 2 साल का वोकेशनल एजुकेशन को अनिवार्य बनाना चाहिए। इस अनिवार्य शिक्षा के बाद ही विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज या विश्वविद्यालय में जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके दो अपेक्षित परिणाम मिलेंगे। पहला, इससे हमारे मानव संसाधन योग्य एवं दक्ष बनेंगे और लघु उद्योग का चुनाव कर सकेंगे। वे देश की वास्तविक संपत्ति होंगे और देश में ‘मजदूरों की अस्मिता’ को बढ़ाने में मददगार साबित होंगे। दूसरा, इस शिक्षा नीति के कारण जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक होंगे, वे देश की उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाएंगे, क्योंकि वे बेहतर बुनियादी सुविधाओं के साथ गुणवत्ता वाली शिक्षा देने में समर्थ होंगे। ध्यान देने योग्य बात है कि वर्तमान उच्च शिक्षा नीति के कारण, जिसमें सिर्फ डिग्रीधारी निकलते हैं टैलेंट नहीं, भारत का एक भी विश्वविद्यालय विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में शामिल नहीं हो पाया है। अगर विदेशों में पढऩे के लिए छात्रों की संख्या बढ़ रही है तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है।

मेक इन इंडिया को सफल बनाने की जो सबसे प्रमुख विशेषता है, वह यह है कि देश का बेहतरीन दिमाग शोध एवं तकनीकी के क्षेत्र में करियर बनाने में आकर्षित होता है। यह बेहद शर्मिंदगी की बात है कि भारत शोध एवं विकास के क्षेत्र में अपनी जीडीपी का एक प्रतिशत भी खर्च नहीं करता। भारत में शोध एवं विकास के लिए केन्द्र सरकार खर्च देती है और उसका एक-चौथाई उद्योग जगत से मिलता है। इसके विपरीत, दक्षिण कोरिया में शोध एवं विकास के कुल बजट का 30 प्रतिशत (सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 3.5 प्रतिशत) कोरिया की सरकार की तरफ से मिलता है, बाकी उद्योग जगत की तरफ से हासिल होता है। संपूर्ण रूप से देखें तो भारतीय उद्योग जगत पहले की अपेक्षा वर्तमान में शोध एवं विकास पर ज्यादा खर्च कर रही है, लेकिन सकल राष्ट्रीय उत्पाद के संबंध में अपेक्षाकृत कम (85-86 में सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 0.38 प्रतिशत, वर्तमान में 0.2 प्रतिशत)। फार्मा और ड्रग्स सेक्टर को छोड़ दें तो हमारी इंडस्ट्री विज्ञान के क्षेत्र में कोई बड़ा निवेश करते हुए नजर नहीं आ रही है।

प्रधानमंत्री के लिए साइंस एडवाईजरी कॉन्सिल द्वारा 2010 में ‘इंडिया ऐज अ ग्लोबल लीडर इन साइंस’ शीर्षक से तैयार लेख को पढऩे का आग्रह मैं मोदी से करता हूं। मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि यह लेख उनके कार्यालय में उपलब्ध होगा। इस लेख में उच्च शिक्षा के लिए नया ढांचा परिभाषित करने के लिए कुछ मानदंडों के बारे में बताया गया है:

  • शीर्ष पर गतिशील नेतृत्व की तलाश और निम्नतम नौकरशाही के साथ वास्तविक स्वायत्तता
  • बेहतरीन फैकल्टी की नियुक्ति और बेतरीन सुविधा की उपलब्धता
  • फैकल्टी की प्रोन्नति के लिए उचित नीति
  • राजनीतिक हस्तक्षेप को दूर रखना
  • निजी निवेश का स्वागत और प्राईवेट वेल्थ का समर्थन
  • अंडर ग्रेजुएट शिक्षण और विश्वस्तरीय शोध का मिश्रण
  • विज्ञान, तकनीक और मानविकी में शैक्षिक संतुलन का प्रयास
  • विद्यार्थियों के बीच राष्ट्र-गौरव का विकास
  • परंपरा और चारित्रिक निर्माण आधारित कैंपस का निर्माण
  • विद्यार्थियों की उचित संख्या
  • एकीकृत 4+1 ईयर बीएस/बीए+एमएस/एमए का फ्लेक्शिबल प्रोग्राम की उपलब्धता
  • मांग और उपलब्धता के संतुलन को बनाए रखना

संक्षेप में कहें तो प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव जीतकर मोदी ने बहुत-सी उम्मीदों को जगाया है। प्रधानमंत्री के रूप में अपने 8 महिने के कार्यकाल में उन्होंने कुछ खास नहीं किया है। अब समय आ गया है कि वे वादों को अमल मे लाकर दिखाएं।

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