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मोदी की आकृति में बंधा भारतीय जनमानस

मोदी ने अपने जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय से कहा कि वे एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, न कि धार्मिक। अध्यात्म और धर्म के बीच उन्होंने बेहद सम्मानजनक तरीके से विभेद किया है। यद्यपि वे बचपन में मंदिरों में गए, पूजा और अनुष्ठान किया और व्रत भी रखा। नवरात्र के दिनों में मोदी आज भी ऐसा करते हैं।

नरेन्द्र मोदी की सार्वजनिक छवि को कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक वाक्य में चित्रित कर सकता है। उचित लंबाई वाला लिनेन का कुर्ता और उसके रंग से मेल खाता जैकेट, उनकी पोशाक की खास पहचान है। यही कारण है कि उन्हें देखने और सुनने के लिए लाखों लोग इकट्ठे हो जाते हैं। वे लोगों को इस तरह से प्रभावित करते हैं, जैसा उनके विरोधियों ने पहले कभी नहीं किया। अतीत में सिर्फ संत की सादगी वाले गांधी और प्राकृतिक लालित्य वाले नेहरू ही लोगों को इस तरह प्रभावित कर पाए हैं, जैसा आज मोदी कर रहे हैं।

लेकिन यह मोदी का बाह्य रूप है। इस मोदी को चित्रित करना आसान है। उस मोदी को चित्रित करना वाकई कठिन है, जो एक दिन में 2500 मील की यात्रा करते हैं, जो एक दिन में दो से तीन बैठकों में हिस्सा लेते हैं, जो रात में सिर्फ तीन घंटे की नींद ले पाते हैं और खिचड़ी जैसे सादा भोजन पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यही कारण है कि देश के प्रधानमंत्री की दौड़ में वे सबसे आगे रहे और इसके लिए मोदी ने इतने समर्पण और दृढ़संकल्प के साथ काम किया, जो बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है।

मोदी ने अपने जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय से कहा कि वे एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, न कि धार्मिक। इन दोनों के बीच उन्होंने बेहद सम्मानजनक तरीके से विभेद किया है। यद्यपि वे बचपन में मंदिरों में गए, पूजा और अनुष्ठान किया और व्रत भी रखा। नवरात्र के दिनों में मोदी आज भी ऐसा करते हैं। अल्बर्ट आइंस्टाईन या अल्बर्ट कैमस जैसे लोग भी थे जो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे, लेकिन उनका मानना था कि संसार में कुछ अलौकिक शक्तियां हैं। जब मोदी कहते हैं कि वह आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, तो उनका मतलब है कि वे सिर्फ मांस और अस्थि से बने शरीर नहीं हैं, बल्कि उनके अंदर उच्च नैतिक मूल्य भी है। अपने चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने वाराणसी में कहा था कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है। उन्होंने मां गंगा के बुलावे को सुना और वह काशी विश्वनाथ घाट पर आरती और मां गंगा द्वारा दिए गए कार्यों को पूरा करने के लिए वाराणसी गए। उनका मानना है कि यह मां गंगा का ही बुलावा है जिसका वो मान रख रहे हैं। आध्यात्मिक पाखंड के रूप में हमें इसे नकारना नहीं चाहिए, क्योंकि किसी का विश्वास जो भी मायने रखे, लेकिन यह कुछ लोगों को अविश्वसनीय लग सकता है, खासकर मीडिया और शिक्षा क्षेत्र के धर्मनिरपेक्षतावादियों को। उनकी अपनी जो भी निजी भावना हो, लेकिन उनके अपने देवता हैं, जिन्हें वे सार्वजनिक रूप से पूजते हैं। उनके ये देवता सोनिया गांधी, उनके बेटे और बेटी हैं।

80 के दशक के पूर्वाद्र्ध में संघ का प्रचारक बनने से पहले मोदी के जीवन की एक घटना है। एक धर्मपरायण हिंदू की तरह वे भी संन्यास लेने के लिए हिमालय चले गए। उनके आध्यात्मिक गुरू ने कहा कि संन्यास लेने के बजाय, गरीबी और दुख में जी रहे भारत के लोगों की बेहतरी के लिए उन्हें कार्य करना चाहिए। वे संन्यास का चयन कर सकते थे, लेकिन वे पूरी दुनिया के संन्यासी नहीं बन पाते। इस तरह पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में देश के प्रधानमंत्री के रूप में सार्वजनिक भागीदारी ही मोदी का संन्यास बन गया।

अतीत के बहुत से महान नेताओं का मानना था कि उन्हें मानव जाति के हित में काम करने के लिए ही ईश्वर ने उन्हें पृथ्वी पर भेजा है। 19वीं शताब्दी के महान प्रधानमंत्री विलियम ग्लैडस्टोन, राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, गांधी जैसे लोगों का मानना था कि जनता की सेवा के जरिए वे ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। मोदी भी इन्हीं नेताओं की पंक्ति में हैं। उनके सार्वजनिक भाषण उन्हें जननेता के रूप में प्रतिस्थापित करते हैं। अपनी शक्तिशाली वक्तृत्व कला के अतिरिक्त, वे लोगों से सीधा संवाद करते हैं। लोगों को लगता है कि वे ऐसे व्यक्ति से बात रहे हैं, जो उनके पास खड़ा है। उनके शब्दों में दृढ़ संकल्प और विश्वसनीयता होती है। इसीलिए देशवासी मोदी के साथ अंतरंगता महसूस करते हैं।

इसमें कोई शंका नहीं है कि जनसंपर्क प्रबंधकों ने मोदी के सार्वजनिक वाक् कला को प्रभावित किया है, लेकिन जनसंपर्क अधिकारी, किसी व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर अच्छा बोलने वाले व्यक्ति के रूप में गढ़ सकते। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मायावती, मुलायम सिंह यादव जैसे लोग भी जनसंपर्क कंपनियों से वाक् कला को सीखते आ रहे हैं, लेकिन उनकी बातें हमेशा नकारात्मक पक्ष रखती हैं। मोदी के शब्दों पर लोग इसलिए विश्वास करते हैं, क्योंकि वे उनके सामने एक दृढ़ विश्वासी के रूप में खड़े होते हैं। लोगों का मानना है कि मोदी उनकी बेहतरी के लिए काम करेंगे और उनका जीवन स्तर बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे। मोदी में लोगों ने एक कुशल नेतृत्व देखा और इसी कारण उन्हें जनादेश भी दिया। नवंबर-दिसंबर 2013 के अपने सर्वे में सीएनएन-आईबीएन और सीएसडीएस ने मोदी के बिना भाजपा को 150 सीटें दी थीं, जबकि मोदी के नतृत्व में सीटों की संख्या 236 बताई गई थीं। इससे साफ जाहिर होता है कि इस चुनाव में मोदी का पूरा असर रहा।

मोदी एक क्षेत्रीय नेता जरूर रहे हैं, लेकिन उनका दृष्टिकोण हमेशा राष्ट्रीय स्तर का रहा है। यह मात्र अभिव्यंजना नहीं है। वे प्राय: गुजरात गौरव की बात करते हैं और कुछ लोग उन्हें संकीर्ण व्यक्ति या गुजरात की महिमा गाने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। उन्हें गुजरात की संस्कृति पर गर्व है, क्योंकि गुजरात की संस्कृति ने उनकी सोच को दिशा दी है। देवगौड़ा भत एक क्षेत्रीय नेता थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे कन्नड़ नेता ही बने रहे। देवगौड़ा इस पद पर 1996 की चुनावी अंकगणित के कारण पहुंचे थे, जिसमें किसी भी पार्टी को इतनी भी सीटें नहीं मिली थीं कि गठबंधन की सरकार बना सके। इस तरह के गठबंधन के लिए कांग्रेस का सहयोग क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अहम था और देवगौड़ा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए, क्योंकि वे सबको स्वीकार्य थे। प्राय: सबको स्वीकार्य व्यक्ति, एक ऐसा व्यक्ति होता है, जिसका अपना कोई दृष्किोण नहीं होता। इस तरह मोदी देवगौड़ा से बिल्कुल अलग हैं।

नरेन्द्र मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में 2007 में गुजरात में जीत हासिल करने के बाद से ही देखना शुरू कर दिया था। उनका विश्वास था कि गुजरात मॉडल देश के विकास के लिए उपयुक्त मॉडल साबित हो सकता है। इस तरह भाजपा के युवा सदस्यों और देश के तीस साल तक के युवाओं ने उनमें विश्वास जताया। यहां तक कि मध्यम वर्ग, शहरी और ग्रामीण लोगों ने अपना जनादेश मोदी के पक्ष में दिया। नरसिंह राव ने सबसे पहला कदम राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था को ज्यादा मुक्त करने का उठाया था। मोदी ने इससे आगे बढ़कर देशवासियों को सपने दिखाएं हैं।

मोदी ने अपने चुनावी भाषण में एक बात और कही थी – न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन। छोटे सरकारी तंत्र समाज को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। क्लासिकल उदार दर्शन के सार को आर्थिक और समाजिक स्वतंत्रता के रूप में तभी बनाए रखा जा सकता है, जब सरकार छोटी हो। क्लासिकल उदारवाद यूरोप और अमेरिका में एक बार फिर लौट आया है, जहां औद्योगिक अर्थव्यवस्था पहले पैदा हुई थी। रोनाल्ड रीगन और माग्रेट थैचर ने बड़े राज्यों में सरकारी स्तर पर गहन कल्याणकारी योजनाएं चलाईं। मोदी ने गुजरात में जो नीति अपनाई है, वह अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत पहल है, जिसमें राज्य सरकार का दोस्ताना सहयोग हासिल है। पिछले 65 सालों से एक अक्षम, भ्रष्ट और सत्तावादी सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को चलाया जाता रहा। इस देश को भ्रष्टाचारियों के हाथ से निकालने का मोदी का यह प्रयास अलौकिक है।

भरत बरियाववाला

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