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शिक्षा: कैसे निर्धारित होंगी प्राथमिकताएं?

यह समझ हर व्यक्ति को है कि देश के विकास के लिए हमारे स्कूलों – यानी सरकारी स्कूलों – की स्थिति सुधारनी चाहिए। इसके लिए जो प्रयास आवश्यक हैं, उनमें अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अध्यापक प्रशिक्षण पूरी कर्मठता से किया जाए, उसमें कोई कोताही स्वाकार्य न हो।

इस समय देश में आशा और विश्वास का अद्भूत वातावरण बना है। 1977 में चुनाव के बाद लोगों ने राहत की सांस ली थी – वे आपात्काल के पहले की स्थितियों को लौटाना चाहते थे। आज देश को आगे ले जाने की चर्चा गांव से लेकर रायसीना रोड तक चल रही है। गुन्नार मिरडल नें अपनी पुस्तक ‘ऐसियन ड्रामा’ में लगभग चालीस साल पहले लिखा था कि विकासशील देशों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान ‘शक्ति स्त्रोत – पावर हाउस’ हैं। हर क्षेत्र में गुणवत्ता का आधार स्त्रोत शिक्षा है, स्कूल है। स्कूल अध्यापकों की गुणवत्ता शिक्षक-प्रशिक्षकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यह समझ हर व्यक्ति को है कि देश के विकास के लिए हमारे स्कूलों – यानी सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारनी चाहिए। इसके लिए जो प्रयास आवश्यक है, उनमें अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अध्यापक प्रशिक्षण पूरी कर्मठता से किया जाए, उसमें कोई कोताही स्वाकार्य न हो। स्कूली शिक्षा में सरकारें बहुधा प्रगति के आंकड़ें प्रस्तुत करती हैं और उसे गुणवत्ता मान लेती हैं। स्कूलों की संख्या बढ़ी है, अध्यापकों के पद बढ़े हैं, स्कूलों में छात्रों का नामांकन बढ़ा है और बढ़ी हैं ऐसी ही अनेक संख्याएं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। उसका क्रियान्वयन साल भर पहले पूरा हो जाना चाहिए था। यदि उत्तर प्रदेश या बिहार के गांवों में जाकर देखा जाए तो स्पष्ट दिखाई देगा कि कुछ भी नहीं बदला है। केवल कमरे, वह भी कहीं-कहीं, बन जाने से स्कूल में सीखने की प्रक्रिया नहीं सुधर जाती है। उसके लिए ईमानदारी से कत्र्तव्य निर्वहन का पाठ पहले उन्हें पढऩा पड़ता है, जो बच्चों को पढ़ाने का उत्तरदायित्व लेते हैं। यहीं नहीं, जिला शिक्षा अधिकारी या ब्लॉक स्तर पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त अधिकारियों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता सभी स्वीकार करते हैं। आवश्यकता है कि शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार मुक्त हो और उसमें जो कार्य संस्कृति की शिथिलता जड़े जमा चुकी हैं उससे मुक्ति पाई जाए। यह अत्यंत कठिन चुनौती है और सम्भवत: इसी कारण इस पर चर्चा कम होती है। जो कारक भविष्य के लिए डाली जा रही नींव को ही कमजोर कर रहे हों, उनसे आंख चुराना स्वीकार्य नहीं हो सकता है। शिक्षा में प्रभावशाली बदलाव और सुधार के लिए पहले प्राथमिकता तो स्कूल शिक्षा को उपेक्षित, स्वीकार्य तथा उपयोगी स्तर पर लाना है। ऐसा न कर पाना उस बच्चे के प्रति अन्याय होगा जिसे देश ने केवल कागजों पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम दिया है।

स्कूलों के बाद नहीं, उन्ही के साथ शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं की बदहाली को समझना तथा सुधारना आवश्यक है। इस समय देश में लगभग 15,000 ऐसे संस्थान हैं। इनमें से अधिकांश शिक्षा के व्यापारीकरण के केन्द्र बन गए हैं। यह कल्पना करना कितना भयावह है कि ऐसे संस्थानों को स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया ही भ्रष्टाचार का देशव्यापी चर्चा का विषय बन गई हो। कुछ दिन पहले एक शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय में अनायास पुस्तकालय देखने की इच्छा प्रकट करने पर ‘प्राचार्य’ महोदय ने नि:संकोच कहा : ”आज लाइब्रेरी यहां से दूसरे स्थान पर गई है, वहां ‘इन्सनेक्शन’ होनेवाला है।’’ ऐसे उदाहरण हजारों जगह मिल जाएंगे। सभी जानते हैं कि परिवार तथा स्कूल से ही व्यक्ति मानवीय सामाजिक तथा जनतात्रिंक मूल्यों से परिचित होता है। धीरे-धीरे यह परखता है कि उनका अन्य लोग कैसे अनुपालन कर रहे हैं और इस सबके आधार पर वह इन्हें आत्मसात करता है। जो युवा एक भ्रष्ट तंत्र पर स्थापित प्रशिक्षण महाविद्यालय से निकलेगा वह कैसे ईमानदार बनेगा और किस प्रकार अपने विद्यार्थियों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने का विचार या साहस करेगा? इस अवस्था में बिना बदलाव किए यदि केन्द्र सरकार शिक्षा को जीडीपी का 6 पतिशत देने लगे तब भी क्या सुधार संभव हो सकेगा? क्या एक ऐसी नियामक व्यवस्था बन पाएगी जिसकी कार्य-संस्कृति अनुकरणीय हो, जो केवल उन संस्थानों को स्वीकृत करे जो पारदर्शिता तथा ईमानदारी से चलाए जा रहे हों? शिक्षा में निजी निवेश आवश्यक है। उसका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन सरकार का यह उत्तरदायित्व है कि जो लोग शिक्षा में आकर अपनी अपनी ‘दूकान’ खोल चुके हैं, उन्हें ऐसा न करने दिया जाए। 2009 में कपिल सिबल ने बिना आगे-पीछे सोचे एका-एक अनेक घोषणाएं कर डाली, जिसमें से अधिकांश नकारात्मक हैं। सरकार ने उस समय 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता रद्द की, अन्य 44 को कहा कि क्यों न उनकी मान्यता रद्द कर दी जाए। आज भी 44+44 बड़े इत्मीनान से अपना कार्य कर रहें हैं। इसी प्रकार की शिथिलता के अनेक उदाहरण स्कूल शिक्षा के संदर्भ में दिये जा सकते हैं।

नई सरकार ने कौशल विकास के लिए अलग मंत्रालय बनाया है। कौशल, विशेषकर हस्त-कौशल के अधिग्रहण का प्रारंभ तो घर और स्कूल से ही होता है।

इसी समझ को व्यहारिक तथा सर्व-उपलब्ध स्वरूप महात्मा गांधी ने बुनियादी तालीम के रूप में देश को दिया था। कोठारी शिक्षा आयोग के बाद बड़ी आशाएं थीं कि व्यवसायिक शिक्षा तथा कार्य अनुभव को प्रमुखता मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। समान्य अपेक्षा यही होती है कि शिक्षा या तो रोजगार दिलाए या स्वरोजगार के लिए आवश्यक समझ तथा कौशल दे सके। पिछले अनुभव से यह स्पष्ट हो गया है कि कौशल प्रशिक्षण को औपचारिकता में नहीं बांधा जा सकता है। इस दिशा में किए गए प्रयास सराहनीय हैं, मगर वे सर्वसुलभ नहीं हो पाए हैं। शिक्षा व्यवस्था को भी स्थानीय कारीगरों तथा कौशलवान व्यक्तियों को सम्मानपूर्वक स्कूलों से जोडऩा चाहिए। ऐसा करने से सामाजिक सद्भाव तथा समरसता भी बढ़ेगी। जाति प्रथा को व्यवहारिक पक्ष में जो उपस्थिति आज तक बनी है उससे मुक्ति मिलने की सम्भावना भी बढ़ेगी। उसके लिए प्रधान अध्यापकों तथा प्राचार्यों को प्रशिक्षण देना होगा तथा उन पर विश्वास करते हुए उन्हें अधिकृत करना होगा कि वे इस पक्ष पर तथा अनेक अन्य प्रकार से भी समाज का सहयोग ले सकें। देश को अब ऐसा शिक्षित युवा वर्ग नहीं चाहिए जो बेरोजगारी का दंश झेलता रहे। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता नहीं, रोजगार या स्वरोजगार चाहिए। इसके लिए कौशल देना राष्ट्र का कर्तव्य है।

शिक्षा में नीतिगत निर्णय लेने के स्तर पर राजनेताओं की उपस्थिीत संविधान सम्मत है। परंतु जब कोई नेता या मंत्री या राजनीतिक दल शिक्षा के द्वारा राजनीतिक रोटियां सेंकता है तब व्यवस्था में गुणवत्ता चरमरा जाती है। उत्तर प्रदेश में जो लैपटॉप मुफ्त दिए गए उस पर मुख्यमंत्री तथा मुलायम सिंह यादव के चित्र छपे हैं। यह किस प्रकार के प्रजातांत्रिक मूल्य हैं और क्या किसी को भी शिक्षा में ऐसे खिलवाड़ करने का हक है? शिक्षा व्यवस्था को अनुभवी शिक्षाविदों तथा विद्वानों की देख-रेख तथा मार्गदर्शन में चलनी चाहिए। उसमें दलगत राजनीति या विचारधारा विशेष के चंगुल से मुक्त रखा जाना चाहिए। आज कुलपति की नियुक्ति से लेकर ग्राम शिक्षा समिति तक की नियुक्तियां विद्वता तथा उपयुक्तता के आधार पा नहीं होती हैं। इसे सभी जानते हैं। इस सोच तथा अस्वीकार्य प्रचलन को बंद करना पड़ेगा।

भारत के अधिकांश शिक्षा संस्थानों में अनेक धर्मों के मानने वाले एक साथ पढ़ते और पढ़ाते हैं। स्कूल सामाजिक सदभाव तथा पन्थिक समरसता बढ़ाने में सराहनीय योगदान करते रहे हैं। जो कमियां रह जाती हैं उन्हें दूर करने के उपाय शिक्षा व्यवस्था में ‘सेक्यूलरिज्म-पंथनिरपेक्षता’ का सही विवेचन करने के बाद किए जा सकते हैं। 12 सितंबर 2002 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सब धर्मों के मूल तत्व बच्चों को पढ़ाना सेक्यूलरिज्म को ढृढ़ करेगा। न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी थी कि ऐसा पचास साल पहले होना चाहिए था। 2004 में जब सरकार बदली तो उसने इसे नकार दिया। इस पर पुनर्विचार की आवश्यक्ता है। शिक्षा को राष्ट्रहित के सभी पक्षों को अपने में समाहित करना होगा। सघन पर्यावरण शिक्षा की जितनी आवश्यक्ता आज है और आगे के वर्षों में होगी, उससे अब सारा विश्व जानता है। पर्यावरण शिक्षा को कक्षा एक से बारह तक अलग विषय के रूप में पढ़ाने के लिए, बिना बस्ते का बोझ बढ़ाए, एक वाद सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत हुआ था। इसका पाठ्यक्रम न्यायालय के आदेश पर सारे राज्यों ने जांचा परखा तथा स्वीकार किया। 13 जुलाई 2004 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया कि आगे से पर्यावरण शिक्षा एक अलग विषय होगा, ताकि भावी पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझ सके तथा वह सारे कौशल तथा जानकारी हासिल कर सके। इसे भी यूपीए सरकार ने अपनी संस्थाओं द्वारा दरकिनार कर दिया। यदि 2004 से यह लागू हो गया होता तो आज एक ऐसी पीढ़ी हमारे देश में तैयार हो गई होती जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति पूरी तरह समर्पित होती।

शिक्षा व्यवस्था एक वृहत तंत्र है, जो घर, परिवार, समाज तथा सरकार में हर जगह अपनी उपस्थिति दर्शाता है। इसमें अनेक पक्ष अपनी ओर ध्यान खींचते हैं। इस समय जो कार्य बिना विलंब के साथ प्रारंभ किया जाना चाहिए वह है एक ‘राष्ट्रीय शिक्षा आयोग’ की स्थापना की त्वरित घोषणा। 1964-66 में गठित शिक्षा आयोग ने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। अनेक लागू नहीं हो पाए। इस आयोग की रिर्पोट के आधार पर बनीं 1968 की शिक्षा नीति 1986 में फिर बनाई गई तथा 1992 में उसका पुर्नवेक्षण हुआ।

अब समय है कि आयोग अपना कार्य करे। उसकी अंतरिम रिर्पोट के आधार पर शिक्षा नीति परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ हो तथा 2005 में बना स्कूल शिक्षा की पाठ्यक्रम रूपरेखा पुन: बनाई जाए।

भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी को पूरी तरह मिटाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा ही एकमात्र आशा की किरण है। आशा और विश्वास के साथ प्रारंभ हो रहा यह समय इस आशा किरण को घर-घर उपलब्ध करा सके, ऐसा प्रयास हर स्तर पर प्रारंभ होना चाहिए।

जगमोहन सिंह राजपूत

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