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मोदी, मंत्रीमंडल और उम्मीदें

इस मंत्रीमंडल में मोदी की नीति – ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ की झलक साफ दिखती है। मनमोहन सिंह सरकार में 71 मंत्रियों वाले मंत्रीमंडलीय समूह को नया आकार देते हुए सिर्फ 45 मंत्री रखे गए हैं, जिसमें 22 कैबिनेट मंत्री हैं। नवनिर्वाचित मंत्रियों को एक के बाद एक करके शपथ ग्रहण के लिए बुलाए जाने को कोई भी व्यक्ति मंत्रीमंडल के चयन और गठन में मोदी की पूर्णता को देख सकता था।

एक दशक बाद ऐसा हुआ कि मंत्रीमंडल की सदस्यता किसी ऐसे एक व्यक्ति को समर्पित नहीं थी, जिसके पास बिना किसी उत्तरदायित्व और जवाबदेही की सर्वोच्च शक्ति थी। अधिकारियों की अक्षमता और कठपुतली की अवस्था से बाहर निकलकर उत्साहित सक्रियता की अवस्था में आने में सिर्फ 70 मिनट लगे। चुनावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की परिणति शपथ ग्रहण समारोह और मंत्रीमंडल के गठन के रूप में हुई। राष्ट्रपति भवन के फोरकोर्ट में संध्या 6 बजे से शुरू हुई इस समारोह में सार्क देशों के सदस्यों के साथ-साथ 4 हजार गणमान्य लोग मौजूद थे। समारोह शुरू होने के ठीक 70 मिनट बाद, शाम 7.10 बजे एक प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रीमंडल के सदस्यों को चुनने के विशेषाधिकार के तहत एक दशक से चली आ रही 10 जनपथ के ‘परामर्श’ (तनाशाही पढ़ें) के अभ्यास को बदल दिया है। इस 70 मिनट के दौरान लोकतंत्र फिर से बहाल हो गया।

इस मंत्रीमंडल में मोदी की नीति – ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ की झलक साफ दिखती है। मनमोहन सिंह सरकार में 71 मंत्रियों वाले मंत्रीमंडलीय समूह को नया आकार देते हुए सिर्फ 45 मंत्री रखे गए हैं, जिसमें 22 कैबिनेट मंत्री हैं। नवनिर्वाचित मंत्रियों को एक के बाद एक करके शपथ ग्रहण के लिए बुलाए जाने को कोई भी व्यक्ति मंत्रीमंडल के चयन और गठन में मोदी की पूर्णता को देख सकता था।

57 वर्ष के औसत उम्र वाले मंत्रीमंडल में टेक्सटाईल्स डिजायनर, आंख-नाक-कान (ईएनटी) विशेषज्ञ, साध्वी, राजपरिवार के वंशज को शामिल करना, अलग-अलग पृष्ठभूमि और प्रतिभा के लोगों का शानदार मिश्रण है। इस कैबिनेट में 25 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है, जिसमें से 6 महिलाएं कैबिनेट मंत्री हैं।

यह मंत्रीमंडल अनुभवी और नवागंतुकों का सम्मिश्रण है, जिन्होंने प्रतिबद्धता और दबाव झेलने की शक्ति को दिखाया। इस चुनाव में सेवानिवृत जनरल वी.के. सिंह रिकॉर्ड अंतर से जीते, स्मृति ईरानी राहुल गांधी से जीत लगभग छीनने ही वाली थीं, निर्मला सीतारमण ने मनीष तिवारी और मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों के हमलों से पार्टी को बचाते हुए चुनाव जीता। इस बार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे 75 वर्ष के उपर के बुजुर्गों को आराम करने को कहा गया, जबकि अरूण शौरी और सुब्रह्ममण्यम स्वामी जैसे टेक्नोक्रेट को कुछ समय के लिए नजरअंदाज कर दिया गया।

इस तरह मोदी ने एक दशक बाद मंत्रियों को चुनने और मंत्रीमंडल का गठन करने का प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार पुन: प्राप्त किया। डॉ. मनमोहन सिंह एक कठपुतली की तरह थे, जिनके तार को 10 जनपथ से नियंत्रित किया जाता था। यहां तक कहा जाता है कि उन्हें पता तक नहीं था कि प्रणब मुखर्जी को वित्तमंत्री बनाया जा रहा है। सोनिया गांधी तक सीधे पहुंच के कारण चिदंबरम, मुखर्जी और एंटोनी जैसे लोगों द्वारा डॉ. मनमोहन सिंह के अधिकारों को बुरी तरह क्षति पहुंचाई गई। डॉ. सिंह अपने आत्म-सम्मान के लिए चुप्पी साधे रहे। जब निर्णय सीधे 10 जनपथ से लिए जाएं, ऐसे में मंत्रीमंडल शायद ही कोई

काम करे। इस बात की पुष्टि संजय बारू ने अपनी किताब ‘दि एक्सीडेंटल प्राईम मिनिस्टर’ में भी की है। डॉ. सिंह की स्थिति एक डाकघर की तरह थी। इसके विपरीत, मोदी ने संकेत दिया है कि वे प्रधानमंत्री के रूप में अंतिम बॉस हैं। मंत्रियों से कहा गया है कि वे अपने निजी स्टॉफ में परिवार के सदस्यों को शामिल न करें।

जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि मंत्रियों को आगाह किया गया है कि जो नीति एक बार बन जाएगी, उसे किसी भी कीमत पर बदला नहीं जाएगा। विभागों की घोषणा के दौरान यह कहा गया था कि मोदी सभी महत्वपूर्ण नीतियों और उन विभागों, जो अभी आवंटित नहीं हुए, पर निगरानी रखेंगे। नीतियों के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए लिया गया यह निर्णय, दिखाता है कि मोदी का प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण होगा। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के अलावा इस तंत्र और प्रक्रिया को आसान बनाकर भ्रष्टाचार मुक्त, जबावदेह और लोगों के अनुकूल बनाया जाएगा।

ऐसा मोदी ही कर सकते हैं। 4 बजे सुबह उठने वाले व्यक्ति के पास इसके लिए पर्याप्त समय है। उन्होंने जयललिता को भी अवगत करा दिया है कि उन्हें नीतियों पर किसी तरह का दबाव बनाने की अनुमति नहीं होगी।

इंदिरा गांधी के दिनों की तरह, जब उन्होंने बांग्लादेश बनाने का खुद निर्णय लिया था, मोदी ने लीक से हटकर सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित करने का खुद निर्णय लिया। मोदी ने शपथ-ग्रहण समारोह को सार्क देशों के सदस्यों के साथ बातचीत और भारत को सार्क देशों के नेता के रूप में पुनस्र्थापित करने वाली शुरूआत के रूप में बदल दिया। इस पर कोई भी यकीन कर सकता है कि यह निमंत्रण सिर्फ एक ही बार उठाया जाने वाला कदम नहीं है। एशियन डेवलपमेंट बैंक की तर्ज पर सार्क बैंक की स्थापना सहित कई प्रस्ताव अभी पंक्तिबद्ध हैं। अद्भूत याददाश्त क्षमता वाले मोदी निश्चित रूप से इसे आगे बढ़ाएंगे।

सार्क के सदस्य देशों के प्रमुखों को निमंत्रण देना इस मामले पर लोगों को ध्यान देने में मदद करेगा और सदस्य देश होने को संभावित फायदा भी पहुंचाएगा। अगर विभिन्न सदस्य देशों के लोग अपनी सरकार पर और भी ज्यादा घुलने-मिलने का दबाव बनाएं तो सार्क भी यूरोपीय यूनियन जैसा शक्तिशाली संगठन बन सकता है। नवाज शरीफ को बुलाने की उनकी परिकलित जोखिम का भुगतान हो चुका है। भाग्य साहसी लोगों का साथ देता है। अगर शरीफ ने इस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया होता तो भारत के बहुत से लोगों ने मोदी का मजाक उड़ाया होता। लेकिन, क्योंकि वह आए, भारत (मोदी) की छवि और चमकदार हो गई। उनके बारे में मुसलमानों का ‘संदेह और आशंका’ पूरी तरह टूट कर बिखर गया।

अगर मोदी बांग्लादेश के साथ तीस्ता जलसंधि अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हैं तो बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध निश्चित तौर पर सुधरेंगे। मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने इसके लिए प्रयास किया था, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के कारण इसमें सफलता नहीं मिली। बांग्लोदश की न्यूज एजेंसी ‘बीडीन्यूज24 डॉट कॉम’ के दिल्ली संवाददाता ने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को उद्धृत करते हुए लिखा है – ”अपने शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के प्रमुखों को आमंत्रित करने के दौरान मोदी विदेश मंत्री के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा था कि पता लगाएं कि तीस्ता जलसंधि को कम से कम समय में कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।’’ मोदी ने शेख हसीना को आश्वस्त किया कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के लिए वे ठोस और सार्थक कदम उठाएंगे। मोदी सिक्कम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग को तीस्ता जल को साझा करने के लिए मना सकते हैं, ताकि राज्य के प्रयोग के लिए प्रर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके। तब ममता शायद ही मोदी विरोधी नारे लगाते हुए गलियों में प्रदर्शन करें।  बीडीन्यूज24 डॉट कॉम के रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अपने पड़ोसियों के साथ व्यवसायिक और मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करने की दिशा में तीस्ता जलसंधि समझौता मोदी का पहला कदम होगा और उनकी छवि एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में गढऩे में मददगार होगा।

अपनी अलग सोच को पहले ही दिखा चुके मोदी ने संकेत दिया है कि मूलमंत्र सभी मंत्रालयों के लिए प्रभावी और कुशल संचालन में सहायक है। ऐसा लगता है कि मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय, जिसे मुख्य नीतियों के हब के रूप में तैयार किया गया है, के

जरिए नीतियों के क्रियान्वयन और परियोजनाओं की प्रगति पर नजर रखेंगे। संक्षेप में कहें तो सरकार, सुशासन और नीति-निर्माण, नीतियों का क्रियान्वयन और परियोजनाएं, सभी मोदी के अधीन होगी। मंत्रीमंडल के सदस्यों पर भी मोदी की निगरानी होगी।

यह महत्वपूर्ण भी है। यह मोदी ही हैं, जिन्होंने विकास, सुशासन, रोजगार में वृद्धि, भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण, गांवों के समूहों के बीच शहरों का विकास, महंगाई पर नियंत्रण और अन्य तकलीफों से मुक्ति का वादा किया है। मोदी ने अपने द्वारा पैदा किए गए उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए मंत्रीमंडल का गठन एक शक्तिशाली साधन के रूप में किया है। पुराने दिनों में कैबिनेट का अर्थ होता था – एक ऐसी जगह, जहां बादशाह के सिपहसलार बैठकों के लिए मिलते थे। मोदी के मंत्रीमंडल के मंत्री मोदी द्वारा निर्धारित उच्च मानदंडों पर काम करेंगे। भारत ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कैबिनेट सिस्टम को एक बार फिर से अपना लिया है। लोकतंत्र के ‘अच्छे दिन आ गए हैं।’

विजय दत्त

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