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अच्छे दिनों के इंतजार में

मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो आजाद भारत में पैदा हुए। उनकी सरकार को देश की जनता ने जितना विश्वास दिया उससे यह तो स्पष्ट है कि सरकार चलाने में अन्दर या बाहर से नरेन्द्र मोदी के समक्ष उस तरह की चुनौतियां नहीं होंगी, जैसी कि 23 राजनीतिक दलों के कुनबे वाले एनडीए को समेटे रखने की कोशिशों में वाजपेयी के समक्ष आईं थीं।

रायसीना हिल्स पर बने विशाल राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में नरेन्द्र मोदी के गरिमामय शपथ ग्रहण ने अटल बिहारी वाजपेयी के शपथ ग्रहण समारोह की यादें ताजा कर दीं। मोदी की तरह ही वाजपेयी ने भी राष्ट्रपति भवन के प्रागंण में इसी प्रकार शपथ ली थी। हालांकि प्रधानमंत्री पद के लिए हुए अब तक के सभी शपथ ग्रहण समाराहों में इन दो प्रधानमंत्रियों – वाजपेयी और मोदी के अतिरिक्त केवल चन्द्रशेखर ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिनका शपथ ग्रहण समारोह भी राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में हुआ था। लेकिन वह इतिहास की बात है। आम जनता को यदि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से किसी अन्य प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह की याद ताजा होती हैं, तो वह वाजपेयी का ही शपथ ग्रहण समारोह है। दोनों भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और दोनों ही एनडीए का नेतृत्व कर रहे हैं। वाजपेयी पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे, जिनकी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया, बल्कि देश की वित्त-विकास योजनाओं और सब को साथ लेकर चलने की कोशिशों में उनकी मिसाल आज भी दी जाती है। लेकिन मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो आजाद भारत में पैदा हुए। उनकी सरकार को देश की जनता ने जितना विश्वास दिया उससे यह तो स्पष्ट है कि सरकार चलाने में अन्दर या बाहर से नरेन्द्र मोदी के समक्ष उस तरह की चुनौतियां नहीं होंगी, जैसी कि 23 राजनीतिक दलों के कुनबे वाले एनडीए को समेटे रखने की कोशिशों में वाजपेयी के समक्ष आईं थीं। हालांकि मोदी के शपथ ग्रहण समारोहों से ऐन पहले इस खबर ने चिन्ता जरूर पैदा कर दी थी कि मोदी की ताकत में 25 में से 25 सीटों का योगदान देने वाले राजस्थान के सभी सांसद प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ बैठक कर रहे थे। इन सांसदों का दुख यह था कि मिशन-25 की शानदार सफलता के बावजूद मोदी मंत्रिमंडल में राज्य का प्रर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। लेकिन दुखी सांसदों को वसुंधरा राजे द्वारा यह समझाए जाने पर कि यह मौका अपने तेवर दिखाने का नहीं है। राजस्थान के सांसद अपने तेवर ताक पर रख कर राष्ट्रपति भवन की ओर चल दिए। मंत्रिमंडल में सात महिलाओं को शामिल कर महिलाओं को 15 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया गया है। मोदी के मंत्रिमंडल में पार्टी के भीष्म पितामह माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, शान्ता कुमार आदि बुजुर्ग नेता शामिल नहीं हैं। यहां तक कि इंदौर की वरिष्ठ सांसद सुमित्रा महाजन भी बाहर हैं। इन माननीय नेताओं का भविष्य अभी स्पष्ट नहीं है। संभव है नजमा को महिला और अल्पसंख्यक होने के कारण शामिल किया गया हो। इस बात की संभावना है कि इन माननीयों को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या स्पीकर बनने तक का इंतजार करना पड़े। नजमा हेपतुल्ला जैसे नेताओं को यदि अपवाद मान लिया जाए तो मोदी के इस मंत्रिमंडल को ‘युवा’ की संज्ञा दी जा सकती है। मोदी के लिए यह सहज स्थिति भी है कि उन्हें कभी निर्णय लेने में किसी वरिष्ठ नेता की आयु का लिहाज नहीं करना पड़ेगा। मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में देश की विविधता को प्रतिबिंबित करते साधु-सन्तों व अन्य धर्म गुरूओं तथा फिल्मी सितारों और देश-विदेश के व्यापारिक घरानों, राजनेताओं, राजदूतों के अतिक्ति पहली बार सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए। पड़ोसी देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और बांग्लादेश की स्पीकर शिरीन सहित, सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने समारोह में शिरकत की। यह शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन इस प्रकार था कि किसी को नरेन्द्र मोदी या अन्य किसी नेता के पैर छूने का मौका नहीं मिला। मोदी और राजनाथ सिंह जैसे उनके कोर ग्रुप के नेताओं ने इस शपथ ग्रहण समारोह और उनके मंत्रिमंडल के आकार से संकेत दे दिए हैं कि सरकार अपने पड़ोसी देशों के साथ ‘सहयोगी रिश्ते’ रखने की कोशिश करेगी और जनता से मिली ताकत के बलबूते पर बेखौफ, बगैर किसी दबाव के काम करेगी। वैसे तो मोदी ने शपथ लेने से पूर्व ही प्रधानमंत्री के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन शपथ लेने के बाद मोदी ने अधिकारिक तौर पर साउथ ब्लॉक जाकर काम शुरू करने में देरी नहीं की। प्रधानमंत्री के तौर पर उनका पहला दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारत आए अन्य राष्ट्राध्यक्षों से भेंट करने में बीता। नमो-नवाज मुलाकात, खासतौर पर गर्मजोशी के साथ कैमरों के सामने मुस्कुराते हुए दोनों देशों के नेताओं ने मोदी के विपक्षियों को घोर निराशा में डुबो दिया होगा, जो मोदी के नाम पर अल्पसंख्यकों और पाकिस्तान के साथ संबंधों के भविष्य पर कई सवाल खड़े करते रहे थे। दोनों नेताओं की गर्मजोशी के साथ मिलने के वक्त उनकी ‘बॉडी लेंग्वेज’ से दोनों पड़ोसी देशों के सबंधों के नए आगाज के अनुमान लगने स्वाभाविक थे। मोदी की पूर्ववर्ती सरकारों, यहां तक कि वाजपेयी सरकार में भी मंत्रालयों की संख्या भारी भरकम रही हैं। इससे जहां एक ओर तो सरकार चलाने के खर्च का बोझ असहनीय रहता था, वहीं दूसरी ओर लालफीताशाही बढऩे से योजनाएं अधर में लटक कर समय पर पूरी नहीं हो पाती थीं। विभिन्न मंत्रालय अलग-अलग राजनैतिक दलों के नेताओं के पास होने से योजनाओं की फाइलों का भविष्य हमेशा संदेह के घेरे में रहता था। लेकिन वह गठबंधन की सरकारों की मजबूरी थी। मोदी को मिले जनादेश की ताकत ने मोदी को इस मजबूरी से उबार दिया है। वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र चुन कर मोदी ने एक नहीं अनेक संकेत दिए हैं। इनमें मोक्षदायिनी गंगा की अपनी मुक्ति तो शामिल है ही, साथ ही देश की नदियों को परस्पर जोडऩे के वाजपेयी के स्वपन को पूरा करने की ओर भी ठोस कदम उठाए जाने भी शामिल हैं। मोदी को मिली यह स्वतन्त्रता, पिछले 20 साल में किसी प्रधानमंत्री को नहीं मिली है। मोदी ने ‘छोटा, किन्तु सुन्दर और सुघड़’ की कहावत के मद्देनजर तार्किक और संगठित आधार पर कई मंत्रालयों को एक कर अमेरिका की तर्ज पर उनकी संख्या को कम कर दिया है। मोदी के ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के सिद्धान्त पर कई मंत्रालयों को जोडऩे की कोशिशों से एक ही विषय की फाइल एक ही मंत्रालय से क्लियर हो सकेगी। मोदी सरकार के समक्ष खड़ी चुनौतियों की पहली परीक्षा जुलाई में होगी, जब 2014-15 का पूर्ण बजट पेश किया जाएगा। शपथ ग्रहण समारोह के दिन सेंसेक्स का 25 हजारी हो जाने से संकेत लगाए जा रहे हैं कि ‘देश के अच्छे दिन आने वाले हैं।’ लेकिन पिछले 25 सालों में पहली बार हुआ है जब लगातार दो साल विकास दर पांच प्रतिशत से कम रही। इस वक्त विकास दर 4.7 प्रतिशत है। यह दर पिछले दो साल से बनी हुई है। यह देश के लिए चिन्ता पैदा करती है। मंदी के दौर में देश में हर साल एक करोड़ 20 लाख युवा बेरोजगारों का जुड़ जाना उस चिन्ता और गंभीर बनाती है। देश की नजरें मोदी सरकार के उन कदमों पर विशेष रूप से लगी हैं कि मंदी के इस दौर में बेरोजगारी की बढ़ती तादाद पर कितना और क्या ध्यान देती है। बढ़ती महंगाई का मोदी सरकार क्या तोड़ निकालती है, यह जानना देश के हर तबके के लिए महत्वपूर्ण होगा। बजट से पता लगेगा कि सरकार आर्थिक हालात से जुड़े रोजगार के नए मौके पैदा करने, महंगाई घटाने, ढांचागत परियोजनाओं में तेजी लाने जैसे अपने चुनावी वादों को कैसे पूरा करती है। देश के अर्थशास्त्रियों की नजर बजट में आय-व्यय का संतुलन बैठाने पर रहेगी। बजट से सरकार की सब्सिडी नीति का पता चलेगा। गिरते रूपए को संभालने के कदमों पर भी अर्थशास्त्रियों की सीधी नजर रहेगी। विकास पुरूष के तौर पर उभरे मोदी का ‘गुजरात मॉडल’ राष्ट्रीय स्तर पर कसौटी पर है।

अन्त में: मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में लगभग 4000 गणमान्य व्यक्ति आमंत्रित थे, लेकिन लोगों की नजरें मोदी की मां और उनके परिवार के सदस्यों को तलाश कर रही थीं। लेकिन मोदी की मां और उनके परिवार के सदस्य गुजरात में अपने घर पर बैठ कर टीवी पर ही शपथ ग्रहण समारोह देख रहे थे। ऐसा नहीं कि मोदी के परिवार के किसी सदस्य को इस समारोह में आने का निमन्त्रण पत्र नहीं मिल सकता था, लेकिन मोदी और उनके परिवार ने देश के समक्ष एक उदाहरण पेश कर दिया कि पूरा देश मोदी का परिवार है। मोदी परिवारवाद से ऊपर हैं।

 श्रीकान्त शर्मा

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