ब्रेकिंग न्यूज़ 

पहचान

लोग कहते हैं कि हमें प्रभु को पाना है, लेकिन यात्रा कठिन है। कैसे राह पार लगेगी? क्या इसके लिए हमें तैयारी की जरूरत है? नहीं, सब कुछ मिला ही हुआ है। जो पल-पल हममे घट रहा है, उसे सिर्फ पहचानने की आवश्यकता है। हमें सिर्फ उसको याद करके जीने की कला को सीखना है। धीरे-धीरे हम उसमें इतने रम जाएंगे कि हमें याद करने की आवश्यकता ही नहीं होगी। वह स्वयं ही हमें फलिभूत हो जाएगा। ईश्वर न ही हमसे कभी अलग था, न है, न ही होगा। जब संत पलटू को प्रभु की प्राप्ति हुई तो वे बहुत हंसे। लोगोंने हंसने का कारण पूछा तो वे बोले :-

पलटू दीवाल कहकहा, मत कोऊ झांकन जाई !

पी को देखन मैं चली, आपई गयी हिराय !!!

हमें सिर्फ अहंकार छोडऩा है, समझो प्रभु को पा लिया। अहंकार को छोड़ते ही हम ईश्वर के नजदीक स्वत: चले जाते हैं और उससे जुडऩे की प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं। ईश्वर अपने बच्चों से दूर कैसे हो सकता है। वह तो हमेशा हमें अपनी गोद में रखने को आतुर है, हमेशा लालायित है हमारे लिए। फिर क्यों न हम उसके लिए अपनी ‘मैं’ को छोड़ डालें, अपने अहंकार को खत्म कर दें और सब में अपने आप को देखें और सबको अपने समान मानें। समाज के लोगों ने अपने स्वार्थ साधने के लिए जो व्यवस्थाएं बनाई है, उसने हमें प्रभु की निकटता के एहसास से दूर कर दिया है।

अवतारवाद का अर्थ ये है कि हमने प्रभु को एक नाम, एक शक्ल के रूप में जाना है और असली बात से दूर चले गए। असली बात का मतलब यह है कि जो मर्म है और जो तथ्य है। असली तथ्य है प्रभु के साथ एकाकार होने की अवस्था। अपने आप को भेंट कर ही कोई प्रभु को पा सकता है। जैसे कबीर ने सब पाखंडों से मुक्त और रुढि़वादिता से दूर होकर अपने आप को इतना तपाया, इतना रमाया कि कबीर ने आखिर में कह ही दिया कि मैं अब हरि ही हो गया, अब किसके सामने सिर झुकाऊं। पत्थर पूजे हरि मिले तो मै पूजूं पहाड़।

कहने का सार यह है कि हम अपने आप को सब जैसा समझ लें और भेदभाव को हटा दें, जिसकी परतें इस झूठी व्यवस्था के चलते हमारे हृदय पर जम चुकी हैं, तो अहंकार मिट जाएगा और जब धीरे-धीरे आप अपने अहंकार को काटने की कला सीख जाएंगे और अपने मन के प्याले को उसके प्रेम से भरने के लिए रिक्त हो जाएंगे तभी परमात्मा का प्रकाश हममें समा जाएगा। वह निरंतर है और रहेगा। बस हमें खुद को उस अंधेरे से मुक्त करना पड़ेगा। पर्दा हटाओ सामने है वह और पर्दा भी झीना सा कोई कठिनाई नहीं, वह मिला हुआ है, बस देखने की नजर चाहिए!!!

 

ललित अग्रवाल

लोग कहते हैं कि हमें प्रभु को पाना है, लेकिन यात्रा कठिन है। कैसे राह पार लगेगी? क्या इसके लिए हमें तैयारी की जरूरत है? नहीं, सब कुछ मिला ही हुआ है। जो पल-पल हममे घट रहा है, उसे सिर्फ पहचानने की आवश्यकता है। हमें सिर्फ उसको याद करके जीने की कला को सीखना है। धीरे-धीरे हम उसमें इतने रम जाएंगे कि हमें याद करने की आवश्यकता ही नहीं होगी। वह स्वयं ही हमें फलिभूत हो जाएगा। ईश्वर न ही हमसे कभी अलग था, न है, न ही होगा। जब संत पलटू को प्रभु की प्राप्ति हुई तो वे बहुत हंसे। लोगोंने हंसने का कारण पूछा तो वे बोले :-

पलटू दीवाल कहकहा, मत कोऊ झांकन जाई !

पी को देखन मैं चली, आपई गयी हिराय !!!

हमें सिर्फ अहंकार छोडऩा है, समझो प्रभु को पा लिया। अहंकार को छोड़ते ही हम ईश्वर के नजदीक स्वत: चले जाते हैं और उससे जुडऩे की प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं। ईश्वर अपने बच्चों से दूर कैसे हो सकता है। वह तो हमेशा हमें अपनी गोद में रखने को आतुर है, हमेशा लालायित है हमारे लिए। फिर क्यों न हम उसके लिए अपनी ‘मैं’ को छोड़ डालें, अपने अहंकार को खत्म कर दें और सब में अपने आप को देखें और सबको अपने समान मानें। समाज के लोगों ने अपने स्वार्थ साधने के लिए जो व्यवस्थाएं बनाई है, उसने हमें प्रभु की निकटता के एहसास से दूर कर दिया है।

अवतारवाद का अर्थ ये है कि हमने प्रभु को एक नाम, एक शक्ल के रूप में जाना है और असली बात से दूर चले गए। असली बात का मतलब यह है कि जो मर्म है और जो तथ्य है। असली तथ्य है प्रभु के साथ एकाकार होने की अवस्था। अपने आप को भेंट कर ही कोई प्रभु को पा सकता है। जैसे कबीर ने सब पाखंडों से मुक्त और रुढि़वादिता से दूर होकर अपने आप को इतना तपाया, इतना रमाया कि कबीर ने आखिर में कह ही दिया कि मैं अब हरि ही हो गया, अब किसके सामने सिर झुकाऊं। पत्थर पूजे हरि मिले तो मै पूजूं पहाड़।

कहने का सार यह है कि हम अपने आप को सब जैसा समझ लें और भेदभाव को हटा दें, जिसकी परतें इस झूठी व्यवस्था के चलते हमारे हृदय पर जम चुकी हैं, तो अहंकार मिट जाएगा और जब धीरे-धीरे आप अपने अहंकार को काटने की कला सीख जाएंगे और अपने मन के प्याले को उसके प्रेम से भरने के लिए रिक्त हो जाएंगे तभी परमात्मा का प्रकाश हममें समा जाएगा। वह निरंतर है और रहेगा। बस हमें खुद को उस अंधेरे से मुक्त करना पड़ेगा। पर्दा हटाओ सामने है वह और पर्दा भी झीना सा कोई कठिनाई नहीं, वह मिला हुआ है, बस देखने की नजर चाहिए!!!

ललित अग्रवाल

игри для днвочекbike cargo trailer

Leave a Reply

Your email address will not be published.