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जी हां, मैं हूं दिग्गी राजा!

मैं दिविजय सिंह हूं। प्यार से लोग मुझे दिग्गी राजा भी पुकारते हैं। कई शरारती, घटिया लोग तो डॉगी राजा ही कह देते हैं। सफाई देते हैं कि ‘आई’ के स्थान पर उनसे ‘ओ’ टाइप हो गया। मैं भी उन लोगों को मुआफ कर देता हूं। पर मैं भी कच्चा खिलाड़ी नहीं हूं। मैं भी तीर चलाने में माहिर हूं। जब भी मेरा तुक्का लगेगा मैं भी उन्हें घायल कर रख दूंगा।

मैं राजा के घर पैदा हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर। कोसना है तो ईश्वर को कोसो, मेरे पिता को दोष दो। मैंने तो जनता पर राज किया नहीं। जनता का सेवक बनकर मैंने बस उसकी सेवा ही की है। मध्य प्रदेश का मुख्यमन्त्री रह कर दस वर्ष मैंने राष्ट्र की सेवा ही की। पर मेरी जनता बड़ी कृतघ्न निकली। बांधती रही मेरी तारीफों के पुल और चुनाव में जीता दिया मेरे विरोधियों को। तब मैंने भी प्रण कर लिया कि जनता को इस अपराध की सजा अवश्य दूंगा, अगले दस वर्ष तक कोई चुनाव न लड़कर और न कोई पद ग्रहण कर। राजा नहीं हूं पर संस्कार तो मुझ में हैं ना – ‘प्राण जाए पर वचन न जाए।’

पर कमजोरी तो हर इन्सान में होती है। गांधी परिवार तो मेरी कमजोरी है। मैं उनका अनन्य भक्त हूं। मेरा तो धर्म-ईमान ही वही हैं। जब सोनियाजी ने मुझे केन्द्र में पार्टी का महासचिव बना दिया तो मैं उन्हें कैसे मना कर सकता था। मैं ही क्या, कोई और भी ऐसी हिमाकत नहीं कर सकता। मैंने कह दिया, ‘जो हुक्म जनाब’ । मैंने तो अपने परिवार में भी यही देखा है। वहां भी बस ‘हां’ ही होती है। ना का तो कोई सवाल ही नहीं। फिर मैं तो दरबारी आदमी हूं। फिर पद मैंने मांगा तो नहीं ना।

इस एहसान के बदले में मैंने सोनियाजी की जो सेवा की है वह सर्वविदित है। मैंने कभी उन पर आंच नहीं आने दी। उन पर तो क्या मैंने कभी उसे नहीं बख्शा जिसने उनके पुत्र को कभी टेढ़ी नजर से देखा हो। फिर राहुल बाबा तो मुझे अपना गुरू भी मानते हैं। मैं भी उनका बड़ा आदर करता हूं। समय-समय पर उन्हें सीख देता रहता हूं। पर मुझे दुख है कि इस बार वह पार्टी को फिर से सत्ता में न ला सके। मुझे भी उनसे बड़ी उम्मीद थी। पर राहुल जी भी क्या कर सकते थे? अगर सिपाही ही कायर और कमजोर निकले तो सेनापति क्या कर लेगा? वह हर स्थान पर, हर मोर्चे पर स्वयं तो लड़ नहीं सकता। इस बार संगठन व प्रत्याशियों की कमजोरी से अगर पार्टी हार गई तो उसके लिए राहुलजी बिल्कुल जिम्मेवार नहीं हैं।

मैं सोच रहा था कि मेरा भी दस वर्ष का वनवास खत्म हो गया है। राहुलजी जीत जाते तो मेरा भी कुछ बन जाता। मन्त्रीमण्डल तो तय ही था। प्रश्न तो केवल यह था कि मन्त्रालय गृह मिलता कि रक्षा या फिर विदेश। पर सब चौपट हो गया। उधर मध्य प्रदेश की जनता ने भी मुझ पर कोई कृपा नहीं की। उल्टे उन्होंने कांग्रेस की हार को पहले से भी अधिक करारी बना दिया। मुझे तो एक प्रकार से प्रदेश निकाला ही दे दिया। शुक्र है उन्होंने मेरे बेटे को विधानसभा में जीता कर मेरी लाज रख ली। पर मेरे कई विरोधी तो चुटकी लेते हैं – बेटा जीत गया, बाप होता तो उसकी बुरी हालत होती। चलो, कुछ भी है। जीता तो मेरा बेटा ही ना। मेरी पार्टी की कुल व्यवस्था तो बाधित नहीं हुई।

कई लोग मुझ पर भी उंगली उठा रहे हैं। कह रहे हैं कि तेरा शिष्य हार गया। वह सब मूर्ख हैं, अनाड़ी। उन्हें इतिहास का ज्ञान नहीं। उन्हें पता नहीं कि कौरव और पांडव दोनों ही गुरू द्रोणाचार्य के शिष्य थे। दोनों को ही उन्होंने शस्त्र विद्या सिखाई थी। पर कौरव हार गए और पांडव जीत गए, तो कौरवों की हार में द्रोणाचार्य का क्या दोष है?

लोग चाहे माने या न माने पर मैं अपने आपको महाभारत के संजय का अवतार मानता हूं, जो धृतराष्ट्र को युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाते थे। यही कारण है कि देश-विदेश में कहीं भी कोई भी घटना घट जाए तो मेरी आंखें उसी क्षण सब देख लेती थीं कि किसने क्या किया और उसमें किस का हाथ है। मैंने कई बार मीडिया के माध्यम से सरकार को भी सूचित व सावधान किया। मैंने कई बार बताया कि किस घटना के पीछे संघ का हाथ है। मैंने तो आगाह किया था कि करकरे ने उनसे बात की थी और उन्होंने हिन्दू संगठनों से अपने जीवन को खतरे के प्रति संकेत दिया था। मैंने सैक्यूलरिज्म के महानतम् तीर्थधाम आजमगढ़ के भी कई बार दर्शन किए और कांग्रेस के लिए मन्नतें मांगी। मैंने बार-बार कहा कि बाटला हाऊस एनकाऊंटर एक ड्रामा था। पर तब सरकार ने मेरी एक न सुनी। कांग्रेस बुरी तरह हारी। अब पछताने से क्या फायदा जब चिडिय़ां चुग गईं खेत।

कहते हैं कि प्यार की उम्र नहीं होती। यह बात मैंने अपने आप पर सच उतरती देखी है। मेरी धर्मपत्नी स्वर्गवासी हो गई। इस उम्र में तो आपको पता है कि जीवन साथी की बड़ी आवश्यकता होती है और विधि का विधान देखो कि उधर मेरी धर्मपत्नी गई और इधर मेरी जिन्दगी में उसकी जगह भरने के लिए आ गई एक और सुन्दर और उससे भी कम उम्र की – मेरी बेटियों से भी कम उम्र की एक महिला। हम दोनों ने साथ रहने, साथ जीने-मरने की कसमें भी खाईं। हमारा प्यार इतना सच्चा व पवित्र था कि हम दोनों ने शादी करने की घोषणा भी कर दी। मेरी तो पत्नी नहीं थी पर उसका तो पति था। वह मेरे लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गई। उसने भी अपने पति से तलाक लेने के लिए आवेदन कर दिया और अपना निश्चय दोहराया कि तलाक मिलने पर वह मुझ से तुरन्त शादी रचा लेगी। मुझे अपने बेटे पर नाज है कि उसने भी मेरी भावनाओं और प्यार के प्रति मेरी निष्ठा का सम्मान किया और कह दिया कि यदि मैं अपने बच्चों को बनी-बनाई मां का उपहार दे दूं तो वह उसे सहर्ष स्वीकार कर लेंगे।

प्यार का दुश्मन तो सारा जमाना होता है। उसमें बाधाएं और रोड़ा अटकाने वाले अनेक होते हैं। यही मेरे साथ हुआ। प्यार के आगे तो सारा जमाना झुक जाता है। ईश्वर भी नतमस्तक हो जाता है और अन्तत: आशीर्वाद दे देता है। पर उफ, मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। सारी दुनिया मेरी बैरी बन बैठी। आखिर मैं ही हार बैठा और घोषणा करनी पड़ी कि मैंने शादी करने का अपना मन बदल लिया है।

देखो, लोग मुझे अब कायर कहने लगे हैं, उस व्यक्ति को जिसने इस उम्र में भी प्यार करने की हिम्मत दिखाई। उस व्यक्ति को जिसने प्यार के इजहार में कायरता नहीं वीरता दिखाई। मैंने शादी न करने का निर्णय जरूर लिया है पर मैं बेवफा नहीं हूं। मेरा प्यार खत्म नहीं हुआ है। प्यार न खत्म होता है, न मरता है। कोई बात नहीं यदि हम इस जीवन में एक न हो सके, स्वर्ग में तो अवश्य साथ होंगे। वहां तो हमें कोई नहीं रोक सकेगा, ईश्वर भी नहीं। पर धत्त तेरे की। वहां भी दूध में मक्खी। मेरी धर्मपत्नी तो मुझ से भी पहले स्वर्ग पहुंच चुकी है। वह तो मुझ पर पहले ही कब्जा कर लेगी। वह तो हमें वहां भी शादी करने न देगी। पर मैं भी अपने प्यार के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हूं। मैं धर्मराज के पांव पकड़ लूंगा और तब तक नहीं छोड़ंूगा जब तक वह मुझे और मेरे प्यार को नर्क भेजने का फरमान जारी न कर दें। उसके बाद हम दोनों और हमारा प्यार मौज-मस्ती में अपना जीवन बिताएंगे।

हमारा प्यार, जिन्दाबाद।

हमारा प्यार, जिन्दाबाद।

तभी मुझे एक कड़क सी आबाज सुनाई दी – ‘सपने में क्या बकते जा रहे हो?’

मेरी बीवी… फिर ख्याल आया कि यह तो मेरा भ्रम ही है। मेरी बीवी तो मर चुकी है। तभी फिर आवाज आई – ”उठते हो या मैं पानी गिराऊं उठाने के लिए?’’

आंखें मलते हुए मैं बड़बड़ाया – ”पर मैं तो दिग्गी राजा….’’

तभी एक बार फिर कड़क आवाज आई – ”सुबह-सुबह किसका नाम सुना दिया, आज पता नहीं कैसा दिन गुजरेगा, पर यह दिग्गी-दिग्गी क्या बड़बड़ाए जा रहे हो? पता नहीं क्या-क्या सपने देखते रहते हो…’’, उसने झाड़ू लहराते हुये कहा – ”मैं उसकी बीवी की तरह मरी नहीं हूं, जिन्दा हूं। इस झाड़ू से पीट-पीट कर घर से बाहर कर दूंगी।’’

”मुआफ कर, भाग्यवान’’, मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा। ”वह तो सपने की गलती थी।’’

अंबा चरण वशिष्ठ

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