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ओडिशा में मोदी-लहर नाकाम क्यों?

राज्य के लोगों ने आक्रामक मोदी लहर देखी और अनुमान लगाया कि देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ओडिशा की लोकसभा सीटों पर भी भाजपा को एकतरफा वोट मिलेंगे। ऐसी स्थिति में क्या बीजद के पक्ष में कोई अंदुरूनी लहर हो सकती थी? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह आम बात है कि जब किसी पार्टी या उसके नेता के पक्ष में लहर होती है तो सामान्य सांगठनिक कमजोरियों के बावजूद मतदान उसी के पक्ष में होता है।

यह मोदी-लहर नहीं, यह मोदी-सुनामी है, जो इस संसदीय चुनाव में ओडिशा में भाजपा के लिए रास्ता साफ करेगी।यह वाक्य ओडिशा के एक प्रसिद्ध वरिष्ठ पत्रकार का है, जिन्होंने टी.वी. पर एक बहस के दौरान कहा था। ऐसी बात कहने वाले वे अकेले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि मीडिया, बुद्धिजीवी, राजनेता और आम लोगों की भी यही राय थी कि राज्य की आधे से अधिक लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा होगा और राज्य की विधानसभा में भी उसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति होगी। भुवनेश्वर में नरेन्द्र मोदी की पहली रैली बहुत सफल रही है और इसका ओडिशा के लोगों पर जबरदस्त असर रहा, खासकर राजधानी क्षेत्र और उससे सटे जिलों में। उसके बाद मोदी ने ओडिशा का तीन बार और दौरा किया और विभिन्न क्षेत्रों में 7 रैलियों के माध्यम से लोगों को संबोधित किया। मोदी के आगमन और उनके भाषणों से ओडिशा का पूरा राजनीतिक माहौल मोदी लहर और विकास तथा सुशासन के उनके संदेश से सराबोर हो गया। युवा एवं कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों के छात्रों ने रैलियों में बड़े पैमाने पर भाग लिया और मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए कसम खाई थी। रैलियों में खासा उत्साह था और लोग उनकी बातों पर लगातार प्रतिक्रिया दे रहे थे। ओडिशा के विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच यह आम बात थी कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वे भाजपा के उम्मीदवारों को वोट देंगे। यहां तक कि बीजू जनता दल के गढ़ में भी लोग खुलेआम कह रहे थे कि विधानसभा चुनावों में वो बीजद को वोट देंगे, लेकिन लोकसभा चुनावों में भाजपा को। मोदी लहर धीरे-धीरे बवंडर में बदलती गई और हर कोई इसके खिंचाव को महसूस कर रहा था। इस माहौल में लोकसभा की 21 सीटों और विधानसभा की 147 सीटों पर चुनाव हुए और उम्मीदवारों के भाग्य के फैसले ईवीएम मशीनों में कैद हो गए।

विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा एक्जिट पोल कराए गए, जिसमें ओडिशा और भारत के चुनावी नतीजों का अंदाजा लगाया गया। एक एजेंसी, टाईम्स नाऊ को छोड़कर, लगभग सभी संस्थानों ने राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए और भाजपा की भारी जीत का अनुमान लगाया, जो कि न सिर्फ सही साबित हुआ, बल्कि उनके आंकलन से भी अधिक सीटें भाजपा को मिलीं। लेकिन ओडिशा के बारे में उनका अनुमान मतगणना के बाद गलत साबित हो गया। सीएनएन के अनुसार, ओडिशा में भाजपा को 3 से 7 सीटें मिलनी थी, वहीं एबीपी के मूल्यांकन के अनुसार 10, इंडिया टीवी के अनुसार 7, इंडिया टुडे के अनुसार 5 से 7 और टुडे-चाणक्य के अनुसार 8+2 सीटें मिलनी थी।

इस दरम्यान, चुनावी अभियान में मुझे राज्य के विभिन्न भागों में जाने का मौका मिला। मेरा मूल्यांकन था कि भाजपा को लोकसभा की 7 से अधिक और विधानसभा की 25 से ज्यादा सीटों पर सफलता मिलेगी। वहीं सत्तारूढ़ बीजद को सरकार बनाने लायक सिर्फ 80 सीटें मिलने का मैंने अनुमान लगाया था। मीडिया के मांगने पर मैंने अपने मूल्यांकन को उन्हें उपलब्ध करा दिया, जो देश भर में कराए गए विभिन्न मीडिया संस्थानों के अनुमानों के अनुरूप था। बीजद के दो वरिष्ठ नेताओं ने मीडिया को बताया था कि विधानसभा चुनावों में उन्हें 80-85 सीटें मिलने जा रही हैं और हम सरकार बनाएंगे। मीडिया और ओडिशा के लोगों का भी यही अनुमान था कि इस बार की राज्य सरकार कमजोर होगी। लेकिन हैरत की बात है कि 16 मई को मतगणना में पता चला कि लोगों ने बीजद के पक्ष में बड़े पैमाने पर मतदान किया। बीजद को विधानसभा की 147 सीटों में से 117 और लोकसभा की 21 सीटों में से 20 सीटें मिलीं। यह कुछ ऐसा था, जिसकी कल्पना नहीं थी। यह कैसे संभव था? तो क्या हम कह सकते हैं कि नवीन लहर का पता तब चला जब ईवीएम मशीनें खुलीं और गणना शुरू हुई?

कोई भी व्यक्ति यह तर्क दे सकता है कि ओडिशा के लोगों ने नवीन पटनायक को इसलिए शानदार बहुमत दिया, क्योंकि विपक्षी दल एक बेतहरीन सरकार का विकल्प देने में विफल रही। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का कोई विकल्प नहीं होने और ओडिशा में मोदी लहर होने के बावजूद, लोकसभा चुनावों में बीजद की सफलता विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से आनुपातिक रूप में शानदार रही। चुनावी नतीजों के घोषणा के बाद कुछ लोगों और कुछ मीडिया वालों का तर्क था कि बीजद के पक्ष में चल रही लहर आंतरिक थी, जो दिखाई नहीं दी। लेकिन इसके विपरीत, राज्य के लोगों ने आक्रामक मोदी लहर देखी और अनुमान लगाया कि देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ओडिशा की लोकसभा सीटों पर भाजपा को एकतरफा वोट मिलेंगे। ऐसी स्थिति में क्या बीजद के पक्ष में कोई अंदुरूनी लहर हो सकती है? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह आम बात है कि जब किसी पार्टी या उसके नेता के पक्ष में लहर होती है तो सामान्य सांगठनिक कमजोरियों के बावजूद मतदान उसी के पक्ष में होता है।

मीडिया और ओडिशा के लोगों को यही अनुमान था कि ओडिशा में सत्ता-विरोधी कारक काम कर रहा है और कोयला, माईनिंग, मनरेगा, चिटफंड जैसे घोटालों के कारण नवीन पटनायक और उनकी सरकार की छवि धूमिल हो चुकी है। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह ध्वस्त रही है और लोगों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा था। सरकार द्वारा रोजगार के इंतजाम नहीं किए जाने के कारण युवाओं में क्रोध और हताशा की स्थिति थी। सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण राज्य भर के किसान हताश थे और उनमें से लगभग 4 हजार किसानों ने 3 साल के अंतराल में आत्महत्या कर ली।

इस पृष्ठभूमि के आधार पर कहा जा सकता है कि राज्य में बीजद या नवीन पटनायक के पक्ष में कोई लहर नहीं थी। इसके विपरीत राज्य का पूरा राजनीतिक माहौल मोदीमय था। वोटों की गिनती के बाद हर कोई यह देखकर चकित था कि राज्य में मोदी की लहर नहीं है और लोगों ने नवीन पटनायक को शानदार बहुमत दिया।

यह कैसे हुआ? विभिन्न मीडिया एजेंसियों, प्रेस और लोगों के अनुमान को ईवीएम द्वारा कैसे नकार दिया गया, जिस पर 2009 के विधानसभा चुनाव में लोगों के साथ धोखा करने का आरोप है? लोकतंत्र और जनता की हित में इसके लिए उच्चस्तरीय जांच की जरूरत है।

बिश्बभूषण हरिचंदन

                (लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं)  

 

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