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बलात्कार के लिए हो सख्त से सख्त सजा

बलात्कार औरतों के खिलाफ सबसे घिनौनी हिंसा है। उसे उसकी इच्छा के सरासर विरुद्ध संसर्ग करने पर बाध्य किया जाता है और जानवर की तरह पेश आने वाले पुरुष को किसी सूरत में माफ नहीं किया जा सकता। यहां तक कि उसे (पीडि़त महिला को) भी माफ कर देने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि बलात्कार सिर्फ किसी महिला के साथ ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के साथ किया गया अपराध है।

बदायूं की घटना ने न सिर्फ भारत में हलचल मचाई है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठ रही इसकी गुंज ने भारत की छवि को भी धूमिल किया है। भारत में बढ़ रही बलात्कार की घटनाएं, भयावह रूप धारण करती जा रही हैं। खासकर उत्तर प्रदेश की हालत बेहद दयनीय है, जहां दो वर्ष की बालिका से लेकर 80 वर्ष की वृद्ध महिलाएं तक सुरक्षित नहीं हैं। लेकिन इन व्याभिचारों पर लगाम लगाने के बजाय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसके लिए मीडिया कवरेज को दोषी बता रहे हैं। बदायूं में जिस तरह से दो बहनों के साथ हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के माथे को कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन मामला और गंभीर तब हो जाता है, जब प्रदेश के नेता बलात्कारियों को शह देने वाले बयानों की बौछार लगा देते हैं। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ही नहीं, पूर्व रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन उनकी नजर में बलात्कार लड़कों से होने वाली एक गलती भर है। यह गलती आज इस कदर बढ़ गई कि उत्तर प्रदेश का कोई भी ऐसा कोना नहीं है, जहां से ऐसी खौफनाक घटनाएं सुनने को नहीं मिल रही हैं। हालांकि, बाद में मुलायम ने खुद सफाई दी कि उन्होंने बलात्कारियों का कतई बचाव नहीं किया और उन्हें कानून के मुताबिक सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन नुकसान तो हो चुका था। कमोबेश यही हाल पूरे भारत की है, जहां महिलाओं को इसका भुक्तभोगी बनना पड़ रहा है। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का कोई बचाव नहीं हो सकता और दोषी को सजा मिलनी ही चाहिए।

बलात्कार का अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द ‘रेपÓ लैटिन के ‘रेपियोÓ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘कब्जा करनाÓ होता है। यानी ‘रेपÓ का शाब्दिक अर्थ है – किसी स्त्री केशरीर पर जबरन कब्जा करना। सामान्य अर्थों में बलात्कार का मतलब ‘जोर-जबरदस्ती, डरा-धमका कर या धोखे से किसी स्त्री से बिना उसकी सहमति के दुराचार करना है, जो उसके मन पर गहरा घाव दे जाता है।Ó फूल सिंह बनाम हरियाणा सरकार (एआईआर 1980 एससी 249) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बलात्कार किसी स्त्री की निजता पर हर मायने में हिंसक हमला है। कर्नाटक सरकार बनाम पुट्टाराजा (एआईआर 2004 एससी 433)के चर्चित मामले में सर्वोच्च अदालत के न्यायधीश अरिजित पसायत ने कहा था कि बलात्कारी सिर्फ शारीरिक चोट ही नहीं पहुंचाता, बल्कि स्त्री के जीवन के सबसे बहुमूल्य उसकी गरिमा, शूचिता, गौरव और सम्मान पर भी गहरा दाग लगा देता है। इंसान के वेश में ऐसे जानवरों की सबसे घिनौनी करतूत बच्चों, किशोरों और गर्भवती महिलाओं के साथ दुराचार होता (मौजूदा मामले में) है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने महज जेल में काटी गई अवधि तक सजा को घटाने का फैसला सुनाया तो हर कोई सन्न रह गया। यह अवधि सिर्फ 46 दिनों की थी। अदालत ने इसकी वजह यह दी कि अभियुक्त महज 22 साल का कुली, खेतिहर मजदूर है और घटना करीब 20 साल पहले 1985 में हुई थी। इसके अलावा नियत न्यूनतम सजा की अवधि घटाने की कोई वजह नहीं बताई गई।

इसलिए यह विनम्र सुझाव पेश करने का सही वक्त है कि बलात्कार के कानून में संशोधन करके ऐसे प्रावधान किए जाएं कि किन्हीं भी परिस्थितियों में किसी जज या अदालत को सजा की तय न्यूनतम अवधि को घटाने की छूट न हो, क्योंकि किसी भी हालत में बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता और दोष सिद्ध होने पर कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। ऊपर वर्णित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उचित हस्तक्षेप किया और निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बहाल कर दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपर्याप्त सजा के लिए गैर-जरूरी सहानुभूति न्याय व्यवस्था को अधिक नुकसान पहुंचाएगी और समाज तथा कानून से लोगों का भारोसा उठ जाएगा। ऐसे अपराधों के मामले में लंबा समय बीत जाने या अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों के मद्देनजर उदार रवैया अपनाकर कम सजा देना दीर्घावधि में नुकसानदेह और समाज के हितों के विरुद्ध होगा, जिसकी रक्षा सजा-प्रणाली में निहित अपराध रोकथाम की व्यवस्था को मजबूत करके की जानी चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि निर्भया मामले के बाद बलात्कार कानून में संशोधन के बावजूद हमारे विधि निर्माताओं ने जजों के हाथ से वह ‘विवेकाधीन बमÓ

वापस नहीं लिया, जिससे वे कोई विशेष

कारण देकर बलात्कार के मामलों में न्यूनतम सजा से भी कम दंड दे देते हैं।

बलात्कार तो बलात्कार है। उसे कोई भी परिस्थिति जायज नहीं ठहरा सकती। यहां तक कि किसी पति को भी पत्नी से बलात्कार का हक नहीं है। हालांकि हमारा कानून अभी वैवाहिक बलात्कार पर मौन है और महिला संगठनों की लगातार मांग का भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया है। इसका विरोध करने वालों की दलील है कि ऐसे कानून का असंतुष्ट पत्नियां उसी तरह दुरुपयोग करेंगी, जैसे धारा 498ए का दुरुपयोग होता है। लेकिन यह कोई बहाना नहीं है। दुरुपयोग का डर किसी कानून को न बनाने का आधार नहीं हो सकता। मैं यह मानता हूं कि दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा के प्रावधान किए जाने चाहिए कि अगर शिकायत फर्जी पाई गई तो भारी जुर्माना और न्यूनतम कैद होगी।

पंजाब सरकार बनाम गुरमीत सिंह (एआईआर 1996 एससी 1393) मामले में न्यायाधीश डॉ. ए.एस. आनंद ने बेहद साफ शब्दों में कहा था – ”……साक्ष्य का मूल्यांकन करते वक्त अदालतों को इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखना चाहिए कि बलात्कार के मामलों में कोई भी स्वाभिमानी स्त्री अपनी आबरू के खिलाफ अपमानजनक बयान देने अदालत में यूं ही नहीं आएगी, जो बलात्कार के मामलों में जरूरी है। यौन उत्पीडऩ के मामले में, मुकदमे में वास्तविक असर न डालने वाली कल्पित परिस्थितियों या बयान में गंभीर खामियों को भी किसी विश्वसनीय मामले को प्रभावित नहीं करने देना चाहिए। औरतों में शर्म-हया और यौन उत्पीडऩ पर मुंह न खोलने के रवैए वगैरह को भी अदालतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में पीडि़ता की गवाही महत्वपूर्ण होती है और उसके बयान को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मद्देनजर देखने के अनिवार्य कारण न होने पर अदालतों को सिर्फ यौन उत्पीडऩ के पीडि़ता की गवाही के आधार पर ही अभियुक्त को दोषी करार देना चाहिए, बशर्ते गवाही पूरे भरोसे से दी गई हो और विश्वसनीय लगे। पीडि़ता के बयान पर भरोसा करने के पहले परिस्थितिजन्य सबूतों पर गौर करना ऐसे मामलों में घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। किसी लड़की या महिला की बलात्कार या यौन उत्पीडऩ की शिकायत को भला क्यों संदेह से देखा जाना चाहिए।ÓÓ

हर आदमी को अपनी देह के साथ आत्महत्या के अलावा जो चाहे करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन यह अधिकार तभी तक है जब उससे किसी और को कोई नुकसान न हो। यानी कोई भी निजी तौर पर सार्वजनिक नजरों से दूर रहकर ही कुछ कर सकता है। लेकिन कोई भी व्यक्ति किसी लड़की या महिला पर उसकी इच्छा के विरुद्ध

जबरन उसके साथ कुछ नहीं कर सकता

और अगर कोई ऐसी जुर्रत करता है तो उसे

सख्त सजा भुगतने को तैयार रहना चाहिए। उन्हें यह कहकर छोड़ा नहीं जा सकता कि ‘लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। हमें उन्हें माफ कर देना चाहिए।Ó

बलात्कार औरतों के खिलाफ सबसे घिनौनी हिंसा है। उसे उसकी इच्छा के सरासर विरुद्ध संसर्ग करने पर बाध्य किया जाता है और पुरुष जिस तरह जानवर जैसा पेश आता है, उसे किसी सूरत में माफ नहीं किया जा सकता। यहां तक कि उसे (पीडि़ता को) भी माफी देने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि बलात्कार सिर्फ किसी महिला के साथ ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के साथ किया गया अपराध है। इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती है।

मेरा विश्वास है कि सहमति से सेक्स को ‘बलात्कारÓ नहीं कहा जाना चाहिए, लेकिन महिला की सहमति के बिना पुरुष को कभी उससे संबंध बनाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए और किसी भी सूरत में उस अपराध को माफ नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय समाज अनादि काल से स्त्रियों को सबसे ऊंचा सम्मान देता आया है और दुर्गा, काली, गौरी जैसी देवियों के रूप में पूजता रहा है। इसी से स्पष्ट है कि उनके खिलाफ हिंसा को काफी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। असली पूजा तो यही है कि स्त्रियों को सर्वोच्च सम्मान दिया जाए और जो भी उनकी इच्छा के विरुद्ध अपना हाथ गंदा करने की जुर्रत करे, उसे उसकी भारी कीमत चुकानी पड़े। उन्हें सिर्फ लड़का जानकर खुली छूट देने की इजाजत न मिले। पीडि़त लड़की या स्त्री को जो मानसिक प्रताडऩा सहनी पड़ती है और सामाजिक ताने सुनने को पड़ते हैं, उसे भला कोई कैसे भुला सकता है।

यह भी सही है कि सिर्फ सख्त सजा के प्रावधान ही औरतों के खिलाफ बलात्कार और दूसरी तरह की हिंसा की बढ़ती वारदातों की रोकथाम के लिए काफी नहीं हैं। अगर बलात्कार के सभी मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान कर दिया जाए तो बलात्कारी अपनी करतूत को अंजाम देने के बाद पीडि़ता की हत्या कर देगा, ताकि अदालत में उसके खिलाफ साक्षात गवाही की संभावना मिट जाए। फिर भी सजा सख्त और जल्दी मिलनी चाहिए, न कि पडि़ता को न्याय पाने में दशकों गुजर जाएं, जो आज ज्यादातर मामलों में देखा जाता है। महिलाओं को जितना संभव हो अधिकतम सुरक्षा मुहैया कराई जानी चाहिए। लड़कों और मर्दों के बीच जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए जिनमें उन्हें स्त्रियों का सम्मान करने की सीख दी जाए और दुराचार करने की जुर्रत करने पर सख्त सजा की चेतावनी दी जाए। कहने की जरूरत नहीं कि लड़कियों और स्त्रियों को किसी की बुरी नजर पडऩे पर अपनी रक्षा करने की सीख दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए विशेष सावधानी बरतने की सीख दी जानी चाहिए, ताकि वे किसी परिचित, रिश्तेदार या किसी और का शिकार बनने की सूरत में अपना बचाव कर सकें।

समाज को भी अपना मध्यकालीन नजरिया बदलना होगा और महिलाओं को अपनी वेशभूषा या अन्य किसी तरीके से पुरुषों को बलात्कार के लिए उकसाने का दोष देना बंद करना होगा। हर महिला को अपनी पसंद के कपड़े पहनने या घुमने-फिरने का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन इससे किसी लड़के या पुरुष को उकसावे का बहाना बनाकर उसे शिकार बनाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता है। नेताओं को भी महिलाओं के बारे में कुछ भी कहने में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उनका सम्मान सर्वोपरि है और किसी भी सूरत में उससे खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर नेता सार्वजनिक रूप से महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराएंगे तो इससे गलत प्रवृति के लड़कों और पुरुषों को प्रोत्साहन मिलता रहेगा और वे लड़कियों या महिलाओं के साथ हिंसा करने से गुरेज नहीं करेंगे। ऐसी बयानबाजी हमारे राष्ट्रीय हित में नहीं है और राष्ट्र की छवि भी इससे धूमिल होती है।

उदय इंडिया ब्यूरो

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