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भारत पर पाकिस्तान का अगला हमला

26 मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रीमंडल द्वारा लिए जाने वाले शपथ-ग्रहण के मात्र दो दिन पहले अफगानिस्तान के हेरात में स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमले से एक महत्वपूर्ण घटना पर भयावह छाया पडऩे के संकेत मिल रहे हैं। हाफिज सईद की लश्कर-ए-तैयबा की इस करतूत की पुष्टि कोई और नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. हामिद करजई ने खुद की है। उनकी असली योजना भारतीय काउंसलर के अपहरण की थी। अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर हमले करने के लिए लश्कर-ए-तैयबा ने अल-कायदा से हाथ मिलाया है। उल्लेखनीय है कि अगस्त 2013 में पाकिस्तान जलालाबाद स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर आत्मघाती हमला किया गया था, जिसमें दूतावास के किसी कर्मचारी को कोई हानि नहीं हुई थी, लेकिन 6 बच्चे सहित 9 निर्दोष लोग मारे गए थे। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का स्वभाव कुछ ऐसा है। यह हमला 5 जून 2013 को नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के मद्देनजर था।

अफगानिस्तान से आईएसएफ की वापसी की परिकल्पना के बाद, पाकिस्तान-अफगानिस्तान-भारत की त्रिकोणीय रणनीति की अनिश्चितता के कारण पाकिस्तानी सेना के घबराहट के अलावा, पाकिस्तान की आंतरिक संस्थागत प्रतिद्वंद्विता और गतिशीलता भारतीय दूतावास पर आतंकी हमले का कारण बना। हेरात में हुए हालिया आतंकी हमले की तरह जलालाबाद दूतावास पर आईएसआई के समर्थन से लश्कर-ए-तैयबा द्वारा किया गया हमला, पाकिस्तानी सेना की रणनीतिक मजबूरियों और प्राथमिकताओं के बारे में नवाज शरीफ को एक चेतावनी थी। इसका उद्देश्य उसी महीने होने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के सत्र से इतर, तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और नवाज शरीफ के किसी भी संभावित मेल-मिलाप को बाधित करने के लिए था।

पाकिस्तान के सैन्य-खुफिया गठजोड़ के हताश इन कृत्यों को पाकिस्तान में जिहादी संगठनों के विकास और उनकी रणनीति द्वारा समझा जा सकता है। अफगान-तालिबान (एटी), तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) जैसे जिहादी संगठनों के प्रभाव और संचालन के संबंधित क्षेत्र काफी विस्तृत हैं। अफगान-तालिबान और टीटीपी की जड़ एक ही है। हाल तक टीटीपी मुल्ला उमर को एक आलंकारिक और प्रेरणादायक व्यक्तित्व मानता था। अफगान-तालिबान और टीटीपी दोनों ही क्रमश: इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान और इस्लामिक अमीरात ऑफ पाकिस्तान की स्थापना की घोषणा कर चुके हैं। साथ ही दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में शरीया कानून लागू करने की घोषणा भी कर चुके हैं। हालांकि अफगान-तालिबान का मास्टर और संरक्षक पाकिस्तानी सैन्य-खुफिया तंत्र को अफगानिस्तान में उसके राजनीतिक-धार्मिक उद्देश्यों को लागू करने से कोई परहेज नहीं है। यही एजेंडा पाकिस्तान में लागू करने के प्रति यह तंत्र अनिच्छुक रहा है, जिसके कारण उसे टीटीपी के साथ एक भयंकर और आतंकवाद विरोधी युद्ध में शामिल होना पड़ा। यह एक नग्न विरोधाभास है कि पाकिस्तान की सेना उसके साथ सामंजस्य बैठाने की असंभव कोशिश कर रही है। पाकिस्तान प्रायोजित जिहाद और जिहादी संगठनों का आतंकवाद लोगों के लिए अलग धार्मिक प्रेरणा नहीं हो सकता, जैसे कि एक पाकिस्तान के लिए और दूसरा अफगानिस्तान के लिए, एक रणनीतिक कारणों से और दूसरा घरेलू कारणों से। पाकिस्तान के भीतर जिहादी गतिशीलता में तीसरा लश्कर-ए-तैयबा है। व्यापक रूप से स्थापित लश्कर पाकिस्तानी सेना का अनियमित हाथ है, खासकर भारत और भारतीय हितों के विरूद्ध। एक समय पश्चिमी हितों को लक्षित कर लश्कर वैश्विक जिहाद का हिस्सा बनने का फैसला किया था, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी द्वारा समय पर की गई कार्रवाई ने इस संगठन के डिजाईन को ध्वस्त कर दिया। इस परियोजना में डेविड हेडली ने मुख्य भूमिका अदा की। अमेरिका सफल रहा, लेकिन 26/11 के रूप में इसका भुगतान भारत को करना पड़ा। माना जाता है कि कर्मियों के तादाद के मामले में लश्कर पाकिस्तानी सेना के दो-तिहाई हिस्से तक पहुंच चुका है।

अफगान-तालिबान और लश्कर द्वारा क्रमश: अफगानिस्तान और भारत में पाकिस्तानी सेना की छद्म युद्ध की रणनीति में टीटीपी अब एक बड़ी बाधा बन चुका है। पाक में आंतरिक खतरे की भयावहता इस तथ्य से समझा जा सकता है कि अकेले टीटीपी के कारण 2007 से अब तक 60 हजार आम जनता और 5 हजार सुरक्षा बल के जवान मारे जा चुके हैं। दूसरी तरफ, ऑपरेशन एनड्यूरिंग फ्रीडम के तहत पिछले 14 सालों में लगभग 70 हजार आम नागरिक और 3,400 सुरक्षा बल के जवान मारे जा चुके हैं। टीटीपी के खिलाफ लड़ाकू विमानों का प्रयोग करने के लिए पाकिस्तानी सेना बाध्य है।

टीटीपी से कुछ इस तरह का खतरा है कि पाकिस्तानी सेना के बहुत सारे अधिकारियों ने सैनिक छावनियों के मेन गेट से अपने नेमप्लेट तक हटा लिए हंै। पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार, सेवानिवृत जनरलों का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया जाता है, जिसमें इस्लामाबाद में स्थित मदरसों से सहायता पहुंचाई जाती है। लाहौर से सिर्फ 150 किलोमीटर दूर, पंजाब प्रांत में 31 मई 2014 को पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के विधायक और आईएसआई के एक अधिकारी का टीटीपी ने अपहरण कर लिया था।

इस साल अप्रैल में जियो टीवी के प्रसिद्ध टीवी पत्रकार हामीद मीर पर आईएसआई के हमले के जरिए पाकिस्तानी टीवी चैनलों को धमकाया गया है। इन टीवी चैनलों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि संयम की भाषा बोलने वाले लोगों को बहस में न बुलाया जा सके। आज पाकिस्तान का पूरी मीडिया डरी हुई है। टीवी चैनलों पर आज धार्मिक समूह के नेता बहस में हिस्सा ले रहे हैं और भारत तथा नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की मीडिया बाजार में 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी वाला जियो टीवी पर पाकिस्तानी सैन्य-खुफिया तंत्र द्वारा पाकिस्तान विरोधी होने का आरोप लगाया जा रहा है। नवाज शरीफ को इस चैनल का संरक्षक माना जाता है।

चाहे मजबूरी हो या राजनीतिक बाध्यता, सत्तारूढ़ दल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) का 2013 के चुनावों के दौरान हाफिज सईद जैसे जिहादी नेताओं से मधुर संबंध दिखे। जून 2013 में नवाज शरीफ के भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ ने लश्कर-ए-तैयबा की मातृ संगठन जमात-उद-दावा (मरकज-ए-तैयबा) के लिए मुरीदके में 61.35 मिलियन रूपए का सरकारी अनुदान दिया। दूसरे आवंटन के रूप में 350 मिलियन रूपए की राशि इसी संगठन को मुरीदके में नॉलेज पार्क खोलने और पूरे पंजाब में विभिन्न पहल के लिए दी गई। पाकिस्तान में 2013 का चुनाव जिहादियों की धमकी से कम प्रभावित नहीं था। आवामी नेशनल पार्टी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कुछ उम्मीदवार अपने क्षेत्रों में चुनावी अभियान चलाने का साहस नहीं कर सके। पाकिस्तान से आने वाली समग्र संदेश यही है कि जिहादी संगठनों की सहमति और सहभागिता के बिना व्यवसाय, रणनीति या राजनीति संभव नहीं है। एक घटते लेकिन साहसी सैनिक के रूप में पहचाने जाने वाले पख्तून जिहादियों द्वारा पाकिस्तान पर कब्जा करने का डर उनके चेहरे पर साफ झलक रहा है और इसे पाकिस्तानी स्तंभकारों के लेखन से भी पहचाना जा सकता है।

स्थिति की नजाकत को समझते हुए निराशा में नवाज शरीफ सरकार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान तक पहुंचने का प्रयास कर रही है, जिसके कारण पाकिस्तानी सेना-खुफिया तंत्र खासा नाराज है। पाकिस्तानी सेना की नजर में टीटीपी का गठन पाकिस्तान के विरोध में किया गया है।

इस तरह नवाज शरीफ ने बिगड़े माहौल में भारत की यात्रा की। मोदी ने शरीफ को जो निमंत्रण भेजा उसका उद्देश्य उसके चेहरे को दुनिया के सामने लाना था। इससे पाकिस्तान के अंदर सेना, राजनीति और जिहादी तंजिमों का कुरूप चेहरा सामने आया।

हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला पाकिस्तानी सेना का नरेन्द्र मोदी, नवाज शरीफ और हामीद करजई के लिए एक संदेश था। अपनी छद्म गतिविधियों से पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान की राजनीति को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करता रहा है। इसी तरह कुछ भारतीय राजनीतिज्ञों के सहयोग से वह भारत में भी ऐसा ही करने की कोशिश कर रहा है। इस तरह का एक प्रयास पटना के गांधी मैदान में अक्टूबर 2013 को बम विस्फोटों के जरिए मोदी की हत्या के रूप में किया गया।

अगर इसी तरह से टीटीपी की शक्ति में वृद्धि होती रही, तो भारत और अफगानिस्तान के संबंध में पाकिस्तानी सेना की तिकड़म सीमित होती जाएगी। तब हताश पाकिस्तान, मुल्क का बंटवारा रोकने या जिहादियों द्वारा पाकिस्तान पर कब्जा करने से रोकने के लिए भारत के खिलाफ दुस्साहसिक कदम उठा सकता है। निकट भविष्य में ऐसा परिदृश्य सामने आ सकता है।

आर.एस.एन. सिंह

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