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द रेड साड़ी : जिसका था इंतजार

द रेड साड़ी : जिसका था इंतजार

By विजय दत्त

मोरो अपनी किताब में लिखी हर बात का जवाब देने को तैयार हैं। उन्होंने दावा किया कि किताब में लिखी हर बात नाटकीय और काल्पनिक ढग़ से लिखी गई है। लेखक ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किताब की पांडुलिपि भी सोनिया को भेजी थी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अगर लेखक का ये दावा सच है तो क्यों अब उसे कानूनी नोटिस भेजे जा रहे हैं?

लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘लाल साड़ी’ जब बाजार में आई तो उस पर बहुत से सवाल खड़े हो गए। लेखक के लिए जानकारी का स्रोत कफन में लिपटे रहस्य की तरह है। इसमें कोई अश्चर्य की बात नहीं है कि कई वर्षों के विवाद और कानूनी धमकियों के बाद ये किताब आखिरकार भारत में भी उपलब्ध हो गई। लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द लाल साड़ी’ (स्पेनिश में अल साड़ी रोजो) सोनिया गांधी की काल्पनिक जीवनी है, जो नेहरू-गांधी परिवार से संबंध रखती हैं। मोरो की ये पुस्तक सन 2008 में छपी तो इटली और स्पेन में इसकी 2,30,000 प्रतियां हाथों-हाथ बिक गई और कुछ ही घंटों में ही बड़े-बड़े पुस्तक भंडार खाली हो गए। इस पुस्तक का अपना रहस्य है जो लोगों के लिए भी किसी विस्मय से कम नहीं है। सोनिया गांधी दशकों तक भारत की ‘बेताज साम्राज्ञी’ रहीं। इस पुस्तक के विषय को जानने की जिज्ञासा लोगों में तब और बढ़ गई, जब इसका विमोचन इटली और स्पेन में हुआ।

लगभग सभी दैनिक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने इस पुस्तक के विषय के सार को व्यापक तौर पर प्रकाशित किया और इसकी समीक्षा भी की। इसमें वो हजारों लोग भी शामिल थे जो कि इस पुस्तक के रहस्य को जानने के लिए इसे खरीदने पुहंचे थे। इस पुस्तक के विषय को जानने के लिए हर तरफ लोगों में एक हलचल मची हुई थी।

ज्यादातर उत्सुक खरीददारों को पुस्तक की एक-एक प्रति हासिल हो पाई थी। इसे पाकर उन्हें इस बात की उम्मीद थी कि इस पुस्तक में माइनो परिवार और सोनिया गांधी के यूपीए में शामिल होने के बाद और उससे पूर्व की जिंदगी के विषय में विस्फोटक खुलासे होंगे। पहली बार जब सोनिया गांधी को पता चला कि इस पुस्तक में उनके ऊपर कुछ आरोप लगाए गए हैं तो उन्होंने खुद को ठगा-सा महसूस किया। उस वक्त सभी पत्र-पत्रिकाओं में 4-6 पन्नों में ‘द लाल साड़ी’ पुस्तक के बारे में प्रकाशित किया गया था। बावजूद इसके इस बात का रहस्य, रहस्य ही रहा की आखिर 2009 में जब से द लाल साड़ी भारत में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है, तब से मोरे को लगातार कानूनी नोटिस क्यों भेजे जा रहे थे?

विरोधाभास तो ये भी है कि जब ये पुस्तक 2008 में इटली और स्पेन में प्रकाशित हुई तो सोनिया गांधी ने इसके विषय को जानने की कोशिश की थी। जब ये पुस्तक प्रकाशित हुई उस वक्त सोनिया गांधी के बहनोई वरिष्ठ स्पेनिश राजनयिक थे। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक लेखक ने सोनिया गांधी की जीवनी लिखने से पहले शायद स्पेनिश राजनयिक से परामर्श नहीं किया, नहीं तो वो इस किताब को पढऩे वाले पहले शख्स होते।

14-02-2015

जब उन्हें इसके बारे में पता चला तो उन्होंने  पुस्तक की एक प्रति खरीदी और सोनिया के बारे में लिखी हर बात पढ़ी। इसमें सोनिया को एक प्रेम करने वाली पत्नी,कर्तव्यपरायण बहू और प्रधानमंत्री की आदर्श पत्नी के रूप मेें उनकी गरिमा का बखान किया गया था। इतना ही नहीं राजीव गांधी के निधन पर सोनिया ने जैसे खुद को संयमित रखा उसका भी वर्णन है। यह प्रधानमंत्री की विधवा के रूप में सोनिया की गरिमा को क्षति नहीं पहुंचाता।

इस पुस्तक में इंदिरा गांधी के परिवार के बारे में बड़े पैमाने पर वर्णन किया गया है, लेकिन पूरी पुस्तक की धुरी सोनिया गांधी ही हैं। यही नहीं, इसमें महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसले और अशांत अवधि का भी खुलासा किया गया है। इसके अतिरिक्त और भी कुछ तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है, जैसे आपातकाल की घोषणा, संजय गांधी की मौत, राजनीति में राजीव गांधी की प्रेरणा और उनकी हत्या के बाद पार्टी के आला नेताओं और सोनिया गांधी के बीच खीचतान। इस पुस्तक में 2004 में प्रधानमंत्री बनने से सोनिया गांधी के इंकार का भी रहस्योद्घाटन है।

लेखक ने अपनी किताब में दर्शाया है कि भारत आने के बाद सोनिया गांधी परिवार के साथ कैसे घुल-मिल गईं और भारतीय तौर-तरीकों के साथ जैसे सांमजस्य बैठाया, उसके बाद इंदिरा गांधी का सोनिया के प्रति काफी लगाव हो गया था। मोरो ने काफी गहराई से वर्णन किया है कि 20 वर्षीया सोनिया जब पहली बार इंदिरा गांधी से मिलीं तो वो अपनी सास से ही नहीं, बल्कि देश की भावी सशक्त प्रधानमंत्री से भी मिल रहीं थीं। उस वक्त सोनिया की पोशाक में लगी झालर कहीं से उधड़ गई थी। इंदिरा ने जैसे ही ये देखा तुरंत ही मातृत्व वृत्त के चलते उन्होंने सुई और धागा लेकर सोनिया की उधड़ी हुई झालर सिल दी। उसी दिन से दो अजनबियों के बीच रिश्ते की नींव मजबूत होती चली गई। यही नहीं संजय गांधी के बेटे वरूण गांधी के  प्रति भी उनका अथाह लगाव था। इसमें मेनका गांधी के कांग्रेस छोड़कर जाने को भी विस्तार से बताया गया है। 70 के दशक के मध्य से गांधी परिवार के बारे में पुस्तक में गहराई से विवरण दिया गया है, जो लोगों को अश्चर्य में डाल देगा। मोरो को गांधी परिवार के विषय में मिली जानकारी का स्रोत निजी बातचीत पर आधारित हो सकता है। परिवार के सदस्यों का आचरण सिर्फ समाचार-पत्रों से मिली जानकारी पर आधारित नहीं हो सकता। लेखक ने गांधी परिवार से जुड़े कुछ लोगों से या रिश्तोदारों से ही जानकारी हासिल की होगी।

मोरो कहते हैं कि गांधी परिवार की जानकारी किसी निकटतम संबंधी या रिश्तेदार ने दी है। खुद को कार्रवाई से बचाने के लिए वो कहते हैं कि ये पुस्तक नाटकीय और काल्पनिक जीवनी पर आधारित है। मोरे की किताब को कांग्रेस ने झूठ का पुलिंदा कहा है। किताब में वर्णित सभी चरित्र मर चुके हैं। सिर्फ सोनिया ही बचीं हैं, जो तथ्यों पर प्रकाश डाल सकती हैं। किताब में सोनिया को जैसे चित्रित किया गया है उससे तो भारत की जनता की सहानुभूति ही हासिल हो सकती है।

पुस्तक में सोनिया गांधी की जिंदगी के विभिन्न चरणों में आने वाली दुविधाओं पर भी नजर डाली गई है। पहली जब वो सिर्फ 20 वर्ष की थी और राजीव से उनके प्रेम संबंध हुए, फिर एक विदेशी के रूप में देश के परिवार नंबर एक में प्रवेश किया और प्रधानमंत्री की पत्नी के रूप में उत्कृष्ट भूमिका निभाई। सोनिया राजीव के राजनीति में उतरने से खुश नहीं थी, परन्तु उन्होंने अपनी ये इच्छा भी राजीव की खुशी के लिए दबा दी।

पुस्तक में कई घटनाओं से संबंधित ब्यौरा दिया गया है, जिससे देश के समकालीन इतिहास पर गहरा असर पड़ा है। लेखक ने इंदिरा गांधी की हत्या और सबसे ज्यादा हैरत में डालने वाली इंदिरा और जयप्रकाश नारायण केनिजी समीकरणों के बारे में बात की है। बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि जब वे जयप्रकाश को पटना देखने गईं उसके बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। जयप्रकाश नारायण ने उनसे हाथ जोड़ कर माफी मांगी उन समस्याओं के लिए, जो जयप्रकाश की ओर से उनके लिए खड़ी हो गई थीं। ये सुन कर वो रो पड़ीं।

इस पुस्तक में इमरजेंसी की घोषणा के लिए प्रमुख घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है, जोकि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखित किताब के घटकों से अलग है। मोरो कहते हैं कि इलाहबाद उच्च न्यायलय में चल रहे इमरजेंसी के केस को 12 जून 1975 में हार जाने के बाद राजीव ने इंदिरा को समझाया कि उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के बाद ही इस परिस्थिति से निपटा जा सकता है। इंदिरा भी राजीव की बात से सहमत हो गईं थीं, लेकिन संजय गांधी ने उनके इस फैसले को बदल दिया।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के मुताबिक इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करने के लिए सिद्धार्थ शंकर रे ने प्रेरित किया था। उन्होंने यह लिखा कि पूर्व रक्षा मंत्री बंसीलाल ही थे जिन्होंने संजय गांधी को आश्वस्त किया था कि वो अपनी मां को मना सकते थे कि वो अपने अगस्त ऑफिस से बाहर न आयें और आपातकाल लगाने का विकल्प तलाशें। इसके बाद इंदिरा ने रे से न्यायोचित समाधन के लिए पूछा। रे ने कुछ कानूनी किताबों का अध्ययन करके परामर्श दिया कि वो आपातकाल के लिए एक बैठक बुलाएं, लेकिन सशस्त्र बलों के समक्ष ये एक खुली चुनौती थी कि जयप्रकाश नारायण सरकार के इस फैसले का पालन नहीं करेंगे।

मोरो ने सोनिया के प्रधानमंत्री पद को स्वीकार करने से मना करने के नाटक को भी बाखूबी दर्शाया है। सोनिया की बेटी प्रियंका गांधी ने भी लोगों के समक्ष इस नाटक का स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर उनकी मां सोनिया ने इतने बड़े पद को ग्रहण करने से मना कर दिया है तो वो और उनका भाई दोनों ही अपनी मां के इस फैसले से काफी प्रभावित हैं। उन्होंने ये भी कहा कि हम अपने पिता को खो चुके हैं, अब अपनी मां को नहीं खोना चाहते। ये परिवारिक मुद्दा है, लेकिन हम अपने परिवार के खुद मालिक नहीं हैं। हमारा परिवार राष्ट्र के लिए समर्पित है तो इसका फैसला भी राष्ट्र ही करेगा।

14-02-2015

के.नटवर सिंह ने अपनी किताब में इस बात की पुष्टि की है कि सोनिया गांधी ने अपनी अंतर्रात्मा की बात सुनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस पद को स्वीकार करने से 2004 में मना कर दिया था। अब सवाल वही उठता है कि फिर पार्टी के कानूनविदों ने मोरो पर ये आरोप क्यों लगाया कि वो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। साथ ही ये भी कहा कि किताब झूठी बातों, आधे सच, मानहानिकारक बयान और अस्तित्व-विहीन स्थितियों के वर्णन से भरी पड़ी है। ब्रिटिश मीडिया ने बड़े पैमाने पर मोरो और अभिषेक मनु सिंघवी के बीच के संघर्ष को कवर किया था। 4 जून 2010 में लंदन के द डेली टेलीग्राफ  ने शीर्षक छापा था किइतालवी मूल की भारत की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा ने अपने जीवन पर आधारित एक काल्पनिक जीवनी का प्रकाशन बंद करने के लिए एक कानूनी अभियान शुरू किया है। सोनिया गांधी ने इस किताब को झूठ का पुलिंदा कहकर इसका विरोध किया था।

मोरो ने लिखा है कि 1991 में राजीव गांधी कि हत्या के बाद सोनिया भारत छोड़ देना चाहती थीं, लेकिन पार्टी के नेताओं ने उन्हें रोक लिया था। उन्होंने यह भी लिखा कि 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल में सोनिया का भी बड़ा हाथ था। हालांकि सोनिया गांधी ने स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब द रेड साड़ी में अपने वर्णन को अपवाद बताया।

लेखक और फिल्म निर्माता हमेशा ही सोनिया गांधी के रोमांस और दुखद घटनाओं पर लिखने और फिल्म बनाने को लेकर उत्सुक रहे हैं। सोनिया गांधी के वकीलों के अनुसार ये पूरी किताब झूठ और काल्पनिकता पर आधारित है। इसलिए सोनिया ने इस किताब को बंद कराने के लिए जो कदम उठाये हैं वो अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रख कर उठाये हैं। राजीव की हत्या के बाद सोनिया भारत छोड़कर जाना चाहती थी, क्योंकि सोनिया को लगता था कि उनके यहां रहने से उनके बच्चों को नुकसान हो सकता है। किताब में उनके हिंदी सीखने पर जोर दिया है, जोकि सोनिया की समझ से परे था। सोनिया को लगता था कि सेवकों द्वारा बोली जाने वाली भाषा उन्हें क्यों सिखनी चाहिए। दूसरा उनकी इतलावी राष्ट्रीयता को उनके खिलाफ ही प्रयोग किया जा रहा था और उनके समर्थक भी हिंदी भाषी थे। राजीव की हत्या के बाद भारत छोड़कर जाने की सोनिया के विचार पर मोरो ने सफाई दी कि इटली के एक अखबार में सोनिया के भारत छोडऩे संबंधी लेख छपा था। साथ ही ये भी कहा कि राजीव की मौत के बाद उनकी मां ने फोन पर सोनिया से पूछा था कि तुम कहां हो, क्या घर आओगी? सोनिया गांधी पर लिखी गई अनधिकृत काल्पनिक जीवनी पर पार्टी के नेता काफी क्रोधित हुए और सोनिया के वकीलों ने इस पुस्तक के प्रकाशन पर भी रोक लगाने के लिए जेवियर को धमकी दी। जेवियर मोरो कहते हैं कि अल साड़ी रोजो (लाल साड़ी) पुस्तक गांधी परिवार की काल्पनिक कहानी है न कि पारंपरिक जीवनी पर आधारित। सोनिया के वकीलों का कहना है कि अंग्रेजी में छपी ये किताब विकृतियों पर आधारित है। गांधी परिवार की नाराजगी इस बात से भी है कि सोनिया अपने हिंदूवादी माहौल की शिकार हो गईं।

मोरो ने लिखा कि सोनिया का पालन-पोषण इटली में हुआ था और कैम्ब्रिज में पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी से मुलाकात हुई थी।  1968 में सोनिया राजीव की पत्नी बनकर भारत आ गईं। अगर लेखक की इस तरह की टिप्पणी से सोनिया की छवि को कोई नुकसान पहुंचता है तो उनके वकीलों ने उस वक्त कोशिश क्यों नहीं, जब 2008 में किताब इटली और यूरोप में किताब प्रकाशित हुई। 2010 में मोरो को कई कानूनी नोटिस भेजे गए, लेकिन 2008 में सोनिया के वकीलों द्वारा कोई कानूनी कदम नहीं उठाए गए। उन्हें इस बात से फर्क पड़ता है कि भारतीय उनकी सच्चाई से अवगत हो जाएंगे, लेकिन उन्हें इस बात से कोई फर्क क्यों नहीं पड़ा कि यूरोपियन उनकी हकीकत को जान लेंगे।

एक सच ये भी है कि गांधी परिवार कांग्रेसियों के लिए शाही परिवार रहा है। उन्हें इस बात का डर सताता रहता है कि शाही परिवार की हकीकत अगर जनता के सामने आई गई तो कहीं लोग उसे घृणित नजर से न देखने लगें। गांधी परिवार से ही भारत के तीन प्रधानमंत्री बने। अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी का प्रभाव भी कुछ ऐसा ही था। कांग्रेसियों को लगता है कि गांधी परिवार ही भारत के शासन को चला सकता है। इसलिए पार्टी में किसी तरह की कोई दरार ना आ जाए, इसके लिए किताब के सच को दबाना जरूरी है।

मोरो की किताब में सोनिया गांधी की लोकाचार और राजनीतिक संस्कृति की कमजोरियों को भी दर्शाया गया है। चिन्तन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि अगर लेखक पर सिंघवी के आरोपों को एक बार दरकिनार कर भी दिया जाए, तो सिंघवी जो सोनिया गांधी और उनके परिवार के विषय में सफाई पेश कर रहे हैं वो कितनी विश्वसनीय है।

मोरो अपनी किताब में लिखी हर बात का जवाब देने को तैयार हैं। लेखक ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किताब की पांडुलिपि भी सोनिया को भेजी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अगर लेखक का ये दावा सच है तो क्यों अब उसे कानूनी नोटिस भेजे जा रहे हैं?

कुल मिलाकर पूरी किताब मे सोनिया को पार्टी का कर्ताधर्ता तो बताया ही गया है, साथ ही उनके लिए सहनुभूति भी दिखाई गई है। भारत में किताब न छापने के लिए सिंघवी के गुस्से के प्रकोप और नोटिस ने भारतीय प्रकाशकों के लिए आंतक का माहौल तैयार कर दिया। इसके बावजूद रोली बुक्स के प्रमोद कपूर ने बिना किसी दबाव में आए किताब को बेचा। किताब की कीमत कम होने की वजह से भी लोग इसे ज्यादा खरीद रहे हैं। किताब का इतने बड़े पैमाने पर बिकने से पता चलता है कि विक्रेताओं की कोशिशें कामयाब रहीं। पुस्तक का सार बताते हुए किसी ने कहा कि किताब में कुछ भी नया नहीं है भारतीयों के लिए, बल्कि किताब पढऩे के बाद लोग उन्हें अपने नजरिये से परखेंगे ना कि जैसा मोरो ने चित्रण किया है उसके आधार पर। शायद यही कारण है कि लोगों का सोनिया पर भरोसा बना रहा और वो राजनीतिक सफलता हासिल करती रहीं।

लेखक स्वीकार करता है कि किताब नाटकीय और काल्पनिक जीवनी पर आधारित है, लेकिन यह पुस्तक लोगों के लिए एक रोचक अध्ययन होगा। पुस्तक में लेखक ने कहा कि सोनिया को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था कि जो व्यक्ति उन्हें चाहता था, उनसे लगाव रखता था वो अब इस दुनिया में नहीं रहा। वो अब कभी उसे नहीं देख पायेंगी।

‘मनोहर कहानियां’ में छपी कहानियों की ही तरह इस किताब की सामग्री को भी लेखक ने अपनी  काल्पनिक शक्ति से रोचक बनाकर लोगों के सामने पेश किया है। मनोहर कहानियां में एक युवक हवड़ा पुल पर खड़ा है और अचानक हुगली नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेता है। इसमें लेखक को कैसे पता चल जाता है कि मरने वाला व्यक्ति मरने से पहले क्या सोच रहा था, लेकिन लेखक अपनी मानसिक शक्ति से उसे कल्पना का रूप देकर किताब में चित्रित करता है। ठीक वैसे ही मोरो ने भी मानसिक शक्ति से कल्पना पर आधारित द लाल साड़ी की रचना की है। ये किताब भी मनोहर कहानियां की तरह ही लोगों के लिए रोचक साबित होंगी और और इससे ज्यादा कुछ नहीं।

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