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दान की शुरूआत घर से!

आमतौर पर यह जाना जाता है कि हमारे देश के अरबपति और खरबपति काफी सहृदयता दिखाते हैं, जब अपने परिवार के सदस्य के नाम पर मंदिर बनवाने की बात आती है। वे समझते हैं कि इससे भगवान खुश होंगे और ख्याति तथा और अधिक संपत्ति के लिए उन्हें आशीर्वाद देंगे। इसका एक और मतलब है- उन्हें कर में मिलने वाली छूट। अपने देय कर में भारी छूट पाने का यह सबसे बेहतर रास्ता है। ये ‘देशी लोग’ अपने पैसों का इस्तेमाल अपने नजदीकी और प्रिय लोगों के लिए करते हैं। जैसे कि अपनी पत्नी के जन्मदिन पर प्राईवेट जेट का तोहफा देना या अपने बेटे के 18वें जन्मदिन पर पोर्श गिफ्ट करना।

हमारे धनाढ्य लोगों के दान का मतलब घर से शुरू होकर घर पर ही खत्म होना है। ऐसा लगता है कि इसने ब्रिटेन के भारतीय व्यवसायियों को भी प्रभावित किया है। संडे टाईम्स की यूनाईटेड किंगडम के 1000 धनाढ्य लोगों की सूची में शामिल कई ब्रिटिश भारतीय, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स भारतीयों के गर्व हैं, मानव-कल्याण में विश्वास नहीं करते।

संडे टाईम्स के अनुसार, दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटिश भारतीय की धनाढ्य सूची में शामिल एक भी ब्रिटिश भारतीय धर्मार्थ की शीर्ष 20 की सूची में शामिल नहीं है। उनका तर्क है कि बिना भगवान को कमीशन दिए, हमने अपने खून, पसीने और परिश्रम से धन अर्जित किए हैं, इसलिए हम आनंद ले रहे हैं। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं।

लॉर्ड गुलाम नून ने लाखों पाउंड की कीमत से अपने राजस्थान स्थित गांव में बिजली, पानी, अस्पताल, घर, आदि का विकास किया है। नैट पुरी के नाम से विख्यात नरोत्तम पुरी ने चंडीगढ़ के नजदीक आधुनिक कॉलेज बनवाया है। लॉर्ड प्रो. भीखू पारेख, जो करोड़पति नहीं हैं, ने अपने भाई के साथ मिलकर मोबाईल हॉस्पीटल के लिए आधुनिक उपकरणों के लिए दान दिया है। इस अस्पताल से अच्छे डॉक्टरों की पूरी टीम जुड़ी हुई है। यह मोबाईल अस्पताल गांव-गांव की यात्रा करता है। इस सुविधा से लाखों लोग लाभान्वित हुए हैं। लेकिन भारत में कोई अपवाद नहीं है। भारत का एक रईस इतनी कीमत का घर बनवाता है कि उतनी ही कीमत में बना अस्पताल या स्कूल भारत के हजारों गांवों को फायदा पहुंचा सकता है।

पीएमओ का रहस्य

दिल्ली का ‘कॉकटेल सर्किट’ बेहद रहस्यमयी है। इसके सदस्य, जो विभिन्न व्यवसायों में अच्छी स्थिति में हैं और शराब तथा बातचीत के बेहद शौकीन हैं, आपस में झगड़ रहे हैं कि यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी नृपेन्द्र मिश्रा की नियुक्ति के सप्ताह भर के अंदर ही अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में डॉ. पी.के. मिश्रा को क्यों लाया गया। 1974 बैच के आईएएस अधिकारी पी.के. मिश्रा गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेन्द्र मोदी के प्रधान सचिव होते थे। मिश्रा को एक कर्तव्यनिष्ठ और कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति माना जाता है। उनमें वो सारे गुण हैं, जो मोदी को अपने अधिकारियों में चाहिए।

विविध अनुभव वाले नृपेन्द्र मिश्रा भी बहुत शांत और सौम्य व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में लाने के लिए इतने आतुर थे कि उनकी नियुक्ति में आने वाली परेशानी को खत्म करने के लिए अध्यादेश लाना पड़ा। शायद यह पहला अवसर है, जब प्रधानमंत्री कार्यालय में दो प्रधान सचिव हैं। इसके पीछे कई सिद्धांत हैं। एक म्यान में दो तलवार क्यों? इस रहस्य का निश्चित रूप से पर्दाफाश होगा, जो निश्चित रूप से अध्यादेश के भाग्य पर निर्भर करेगा। अगर इसे दबा दिया गया या राज्य सभा में गिर गया तो नृपेन्द्र मिश्रा स्वत: बाहर हो जाएंगे। अधिक संभावना है कि कार्यों और जिम्मेदारियों को दोनों मिश्राओं के बीच विभाजित कर दिया गया है और दोनों का सह-अस्तित्व होगा। अन्य कोई बाधा?

कैमरन को ऐश की चाहत

खबर है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन चाहते हैं कि ऐश्वर्या राय बच्चन की अभिनय वाली फिल्म की शूटिंग लंदन में हो। इस खबर ने बहुत लोगों को आश्चर्यचकित किया और बहुत से लोगों के गर्वीले चेहरे पर मुस्कान ला दी कि भारत के पास भी ऐश्वर्या राय बच्चन जैसी खुबसुरती है।

एक सूत्र का कहना है – ”ऐश्वर्या राय एक चैरिटी कार्यक्रम के दौरान लंदन में थीं। जब वह ब्रिटिश प्रधानमंत्री के आवास पर थीं, तब उन्हें अपनी अगली फिल्म की शूटिंग लंदन में करने का निमंत्रण दिया गया।”

उस समय जब कैमरन विपक्ष के नेता बने तब ब्रिटिश मीडिया ‘भारतीय खुबसूरती, जो पूरे विश्व का सबसे खुबसूरत चेहरा था’ से भरा पड़ा था। डेली मेल ने उच्च वर्गीय कहा तो टाईम ने ऐश के चेहरे को अपने कवर पर जगह दी थी। तब फिल्म ‘ब्राईड ऐंड प्रिज्यूडिश’ का प्रीमियर चल रहा था। उसके बाद मैडम तुसाद म्यूजियम में उनकी आदमकद मोम की प्रतिमा को स्थापित किया गया।  ब्रिटेन में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं था, जिसने उनके बारे में और उनकी खुबसुरती के बारे में नहीं जाना था। एलिजाबेथ बेनेट बनी ऐश के मुस्कुराते चेहरे वाले पोस्टर और बोर्ड लंदन की सड़कों और बसों में लगे हुए थे। इस अभियान ने अंग्रेजों को उनका दीवाना बना दिया। अभी तक भारत काले और सांवले चेहरे के लिए जाना जाता था, लेकिन यहां ब्लू आंखों और दिव्य चेहरे वाली एक जवान महिला ऐश थी। जवान इटॉनियन कैमरन को उनके बारे में पता था, इसलिए उन्हें बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। संयोग से जब प्रधानमंत्री ने लंदन से डेढ़ घंटे की दूरी पर स्थित वैटफोर्ड के नजदीक ऐल्डेन्हम में इस्कॉन मंदिर के भक्तिवेदांता की यात्रा की। प्रार्थना और भोजन के बाद स्वागत संभाषण में मंदिर के मुख्य पुजारी ने डेविड कैमरन को देवदास कैमरन कहकर संबोधित किया। हंसते हुए कैमरन ने कहा कि अगली बार मुंबई यात्रा के दौरान देवदास के रूप में उन्हें पारो (ऐश्वर्या राय) से मिलने में आसानी होगी। इससे लगता है कि कैमरन ऐश पर अभी भी मोहित हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

मोदी का फतवा

‘शास्त्री भवन हमारी शान, मत बनाओ पीकदान।’ ‘देखो देखो जेंटलमैन थूक रहा है।’ ये कुछ बिल-बोर्ड हैं, जो रातों-रात सरकारी कार्यालयों में दिखने लगे हैं। जिन लोगों ने विभिन्न सरकारी भवनों का दौरा किया है, वे साउथ ब्लॉक तक की दीवारों के कोने पर थूक के धब्बे और बदबूदार शौचालयों से परिचित हैं। सरकारी कार्यालयों में साफ-सफाई पर ध्यान देने वाले बिल-बोर्ड तब सामने आए जब गंदगी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी नाराजगी जताई। संसद में अपने भाषण के बीच में उन्होंने विशेष तौर पर साफ-सफाई के बारे में बोला। बार-बार गांधीजी का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा – गांधीजी ने सफाई पर बहुत जोर दिया है। उनका आश्रम भी इस बात का ध्यान रखता है। आईए हम प्रतिज्ञा करें कि 2019 में राष्ट्रपिता की 150वीं वर्षगांठ पर हम उन्हें स्वच्छ भारत का तोहफा दें।

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