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भूटान यात्रा से विदेश नीति के संकेत

भूटान यात्रा से विदेश नीति के संकेतभारत के उत्तरी सीमान्त की सुरक्षा के लिए तीन देश अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। ये देश हैं तिब्बत, भूटान और नेपाल। भूटान की सीमा सुरक्षा का उत्तरदायित्व तो भारत के पास ही है। भारत की दोषपूर्ण रणनीति के कारण 1950 में ही चीन ने तिब्बत को ग़ुलाम बना लिया था। नेपाल में चीन अभी तक माओवादियों की सहायता कर वहां अराजकता और अस्थिरता को पैदा कर रहा है। नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं भड़काने में चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी। भूटान की यात्रा से भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि विदेश को लेकर भविष्य में उसकी प्राथमिकताएं क्या होंगी ।

नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद अपनी विदेश यात्रा के लिए सबसे पहले भूटान को चुना। अपने देश की पुरानी परम्परा सबसे पहले अमेरिका या फिर पश्चिमी देशों की ओर भागने की रही है। मोदी ने ‘पश्चिम की ओर देखो’ के स्थान पर ‘पूर्व की ओर देखो’ को विदेश नीति का आधार बनाया है। अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी मोदी ने दक्षेस देशों के राज्याध्यक्षों को निमंत्रित कर एक नई पहल की थी। भारत की सुरक्षा की दृष्टि से हिमालयी क्षेत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। लेकिन दुर्भाग्य से यह क्षेत्र विकास और सुरक्षा की दृष्टि से भी अवहेलना का शिकार रहा है। हिमालयी क्षेत्र के दो दूसरे देशों मसलन भूटान और नेपाल पर चीन अरसे से गिद्ध दृष्टि लगाए बैठा है। नेपाल में माओवादियों को शह देकर चीन वहां भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की लम्बे समय से कोशिश करता रहा है और उसे कुछ सीमा तक इसमें सफलता भी मिली है। भूटान में भी पिछले कुछ अरसे से यही खेल हो रहा है। उसने प्रयास किया था कि भूटान उसे अपनी राजधानी थिम्पू में दूतावास खोलने की अनुमति दे। चाहे उसे अपने इस प्रयास में सफलता नहीं मिली हो, लेकिन इससे चीन की नीयत का पता जरुर चल गया। यह ठीक है कि पिछले कुछ साल से भारत और चीन के बीच व्यापार बढ़ा है, लेकिन चीन सीमा के प्रश्न पर मैकमोहन रेखा को भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा मानने की बात तो दूर, उसने बहुत जोर से अरुणाचल प्रदेश पर अपना अधिकार जमाना शुरु कर दिया है। इतना ही नहीं वह भारतीय सीमा के भीतर सैनिक घुसपैठ भी करता रहता है। उसने पाकिस्तान की परमाणु अस्त्र बनाने में ही सहायता नहीं कि बल्कि अब उसके सैनिक जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से में भी आकर जम गए हैं, जो पाकिस्तान के कब्जे में है।

भारत के उत्तरी सीमान्त की सुरक्षा के लिए तीन देश अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। ये देश हैं तिब्बत, भूटान और नेपाल। भूटान की सीमा सुरक्षा का उत्तरदायित्व तो भारत के पास ही है। भारत की दोषपूर्ण रणनीति के कारण 1950 में ही चीन ने तिब्बत को ग़ुलाम बना लिया था। नेपाल में चीन अभी तक माओवादियों की सहायता कर वहां अराजकता और अस्थिरता को पैदा कर रहा है। नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं भड़काने में चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी। भूटान की यात्रा से भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि विदेश को लेकर भविष्य में उसकी प्राथमिकताएं क्या होंगी और साथ ही चीन के बिल्कुल पास खड़े होकर नरेन्द्र मोदी ने उसको स्पष्ट संदेश भी दे दिया है। मोदी ने भूटान में कहा कि यदि किसी का पड़ोसी ठीक न हो तो उसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है, इसे भारत से बेहतर और कौन समझ सकता है। मोदी का स्पष्ट संकेत चीन की तरफ था। मोदी ने हिमालय के शिखर पर खड़े होकर परोक्ष रूप से चीन को एक और संकेत दिया – ‘भारत फॉर भूटान और भूटान फॉर भारत’। मोदी ने भारत और भूटान की साझी सांस्कृतिक विरासत की चर्चा की। दरअसल आज तक भारत पड़ोसी देशों की या तो अवहेलना करता रहा है या फिर उनसे विकास और पूंजी निवेश को आधार बना कर सम्बंध विकसित करने की कोशिश करता रहा है। उसने पुरातन साझी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सम्बंधों का आधार बनाने की कभी कोशिश नहीं की। भूटान यात्रा का संकेत स्पष्ट था कि पड़ोसी देश, जिनके साथ हमारे सांस्कृतिक, सामाजिक और सामरिक हित जुड़े हैं, उन्हें वरीयता दी जाएगी। दरअसल दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत की सांस्कृतिक विरासत साझी हैं और ये सभी देश चीन से भयभीत रहते हैं। भारत पर इन देशों ने बहुत ही आशा थी, लेकिन जब चीन ने तिब्बत पर हमला बोल दिया तो भारत उसकी सहायता करने की बजाय तिब्बत को ही चीन के साथ मिलजुल कर रहने के उपदेश देने लगा।

भारतीय विदेश नीति में चीन का प्रश्न आता है तो उसके पीछे-पीछे तिब्बत का प्रश्न अपने आप चलता है। प्रत्यक्ष रुप से चाहे उसकी चर्चा न हो, लेकिन उसकी छाया भारत-चीन चर्चा में हर समय विद्यमान रहती है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर तिब्बत का प्रश्न इसलिए भी फोकस में आया है, क्योंकि मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए चार बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। चीन की विदेश नीति को लेकर समय-समय सामने आते संकेतों को भी समझ लेने का दावा करने वालों का कहना है कि एक बार तो चीन ने मोदी का स्वागत इस अंदाज में किया जो केवल राष्ट्राध्यक्षों के लिए ही सुरक्षित है। साउथ ब्लॉक के धुरन्धर वैसे भी सामान्य घटना के असामान्य अर्थ निकालने के लिये प्रसिद्ध हैं। यह अलग बात है कि व्यावहारिक धरातल पर उनके असामान्य अर्थ गलत सिद्ध हुए। लेकिन यहां तो अन्य सांकेतिक साक्ष्य भी विद्यमान हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मोदी चीन के साथ व्यापार बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। अभी तो मोदी ने चीन के साथ विकास के मामले में प्रतिस्पर्धा की बात कहीं ही है। चीन मोदी को इतनी अहमियत दे रहा है कि उसने मोदी की ताजपोशी के तुरन्त बाद अपने विदेश मंत्री वांग यी को दिल्ली रवाना कर दिया, ताकि बीजिंग के राष्ट्रपति की आगामी भारत यात्रा की आधारभूमि तैयार की जा सके। कहा जाता है कि मोदी की प्राथमिकता गुजरात की तर्ज पर विकास करना है, इसलिए वे हर हालत में चाहेंगे कि चीन को किसी भी कारण से उत्तेजित न किया जाए। बल्कि, इसके विपरीत चीन के साथ व्यापार बढ़े और चीन भारत में उदारतापूर्वक निवेश करे। इसलिए मोदी का प्रयास रहेगा कि चीन के साथ लगती लम्बी सीमा और तिब्बत में चीन की नीति पर फिलहाल चुप ही रहा जाए। लेकिन ध्यान रखा जाना चाहिए कि मोदी चीन के साथ व्यापारिक हितों के मुद्दे उठाते समय भी चीन के साथ सीमा विवाद, अरुणाचल में चीनी

घुसपैठ और पाक अनाधिकृत जम्मू-कश्मीर में चीनी सैनिकों की उपस्थिति ही नहीं बल्कि चीन द्वारा पाकिस्तान को आण्विक शक्ति व अन्य सैनिक साजों-समान मुहैया करने के प्रश्न उठाने से नहीं चूके। जबकि सभी जानते हैं कि चीन इन प्रश्नों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में उठाने पर सहज नहीं रह पाता।

लेकिन मोदी की तमाम चीन यात्राओं के बावजूद वे अपने चुनाव प्रचार के दौरान अरुणाचल प्रदेश में जाकर भारत-तिब्बत सीमान्त पर चीन को चेतावनी देना नहीं भूले। वहां उन्होंने भारतीय सीमा के भीतर चीन की सेना की घुसपैठ की चर्चा ही नहीं की बल्कि भारत की सीमाओं को विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित करने की देश की प्रतिबद्धता को भी दोहराया। प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद मोदी ने अरुणाचल प्रदेश के युवा नेता किरण रिजूजू को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर आन्तरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया। ध्यान रहे कि किरण रिजूजू चौदहवीं लोकसभा में चीन के बढ़ते खतरों के प्रति अत्यन्त सक्रिय थे और लोकसभा में तिब्बत के प्रश्न को प्राय: उठाते रहते थे। लोकसभा में रिजूजू की सक्रियता से चीन भी असहज होता था। अरुणाचल प्रदेश में आन्तरिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा चीनी सेना की घुसपैठ से ही रहता है। भारत की चीन के साथ 2521 मील की सीमा लगती है और यह सीमा जम्मू-कश्मीर से शुरु होकर अरुणाचल प्रदेश तक जाती है। चीन ने केवल तिब्बत पर ही नहीं बल्कि भारतीय भूभाग पर भी कब्जा किया हुआ है। चीन के साथ आर्थिक रिश्ते बढ़ें, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता लेकिन आर्थिक रिश्ते बढ़ाने के मोह में सीमा पर चीनी खतरे को न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न हीं उसे फिलहाल विदेश नीति के पिछवाड़े में फेंका जा सकता है। दरअसल भारत में चीन का खतरा बरास्ता तिब्बत होकर ही आता है। तिब्बत दोनों देशों के बीच में एक प्राकृतिक बफर स्टेट है, जिस पर 1950 में चीनी आधिपत्य के बाद ही भारत के उत्तरी सीमान्त पर चीन की लाल छाया प्रकट होने लगी थी।

विदेश नीति को लेकर भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र के निम्न भाग को पढ़ लेना आवश्यक होगा-‘हम अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंध सुदृढ़ करेंगे, लेकिन आवश्यकता पडऩे पर सख्त कदम और मजबूत स्टैंड लेने से भी नहीं हिचकेंगे’। लेकिन घोषणा-पत्र का यह अंश केवल साज-सज्जा का हिस्सा नहीं है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं का हिस्सा है। इसका संकेत मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से ही मिलना शुरु हो गया था। इस समारोह में निर्वाचित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोबजंग सांग्ये और उनकी गृहमंत्री श्रीमती डोलमा गेयरी को भी निमंत्रित किया गया था। यह पहली बार हुआ है कि निर्वाचित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री को इस प्रकार के समारोह में आमंत्रित किया गया हो। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोबजंग सांग्ये चार हजार की भीड़ में गुम हो जाने वाले किसी अन्य आमंत्रित की तरह नहीं थे। उनके अपने शब्दों में ही, ‘मैंने सोचा था कि मुझे कहीं पीछे की कतारों में बैठा दिया जाएगा, ताकि मैं भीड़ में गुम रह सकूं। लेकिन, जब मैंने अपना निमंत्रण पत्र दिखाया तो आयोजकों ने मुझे आगे की कतार में बैठने के लिए कहा’।

लोबजंग सांग्ये भारत के प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में आगे की कतार में बिठाए जाने की बात तो दूर उन्हें इस समारोह में आमंत्रित करने से ही चीन नाराज होगा, इतना तो विदेश मंत्रालय अच्छी तरह जानता ही होगा। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अनेक बार कहा है कि भारत केवल दूसरे देशों के एक्ट करने पर केवल प्रतिक्रिया करने वाला देश ही नहीं बना रहेगा, वह अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर एक्ट भी करेगा। लोबजंग सांग्ये को आगे की पंक्ति में बैठाकर चीन से सम्बंधित विदेश नीति के मामले में भारत ने सचमुच एक्ट किया है। अलबत्ता सांग्ये को इस समारोह में निमंत्रित किए जाने पर चीन ने अपने असंतोष की प्रतिक्रिया दर्ज करवा दी है। लेकिन बाद की यह खबर यह भी है कि सरकार ने अरुणाचल प्रदेश के साथ लगती तिब्बत सीमा के साथ 54 चौकियां बनाने का निर्णय किया है ।

हिमालयी क्षेत्रों में भावात्मक जुड़ाव पैदा करने के लिए मोदी ने इस क्षेत्र के देशों और प्रान्तों के खेल उत्सव का भी सुझाव दिया। कहने का अभिप्राय यह है कि भारत अपने उत्तरी सीमान्त को लेकर सजग हो गया है और इस क्षेत्र में चीन के प्रत्यक्ष खतरे को उसने समझ लिया है। चीन पाकिस्तान के साथ मिल कर भारत को घेरने की नीति पर काम कर रहा है। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर के गिलगित और बल्तीस्तान में तो उसके सैनिकों ने ही डेरा डाल लिया है। भारत का यह भूभाग पाकिस्तान के कब्जे में है। यदि चीन की नीयत भारत को मित्र मानने की होती तो वह पाकिस्तान से रिश्ता जोड़ते समय इस इलाके में कार्य करने से परहेज करता। लेकिन, चीन ने तो पूर्वी तुर्किस्तान (सिक्यांग) को इस्लामाबाद से जोडऩे वाले काराकोरम मार्ग के नाम पर गिलगित बल्टीस्तान में घुसपैठ का बहाना ढूंढ लिया है।

चीन की इस घेराबन्दी का उत्तर नरेन्द्र मोदी ने भूटान के बाद अपनी विदेश यात्रा के लिए जापान का चयन करके दिया है। जापान व चीन की अदावत पुरानी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चीन जापान को धमकाने वाली स्थिति में आ गया था। वह बीच-बीच में जापान को अपमानित भी करता रहता था। अब तो चीन ने उन द्वीपों पर भी अपना हक जताना शुरु कर दिया है जो जापान का भूभाग माने जाते हैं। इसे समय का फेर ही कहना चाहिए कि द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद अमेरिका ने जापान को सैन्य शक्ति के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि आत्म-सम्मान के मामले में भी पंगु बनाने के प्रयास किए और उसे कुछ सीमा तक सफलता भी मिली। अमेरिकी प्रभाव के कारण जापान में विसंस्कृतिकरण की प्रक्रिया अत्यन्त तेज हो गई। लेकिन जापान ने अपने परिश्रम से आर्थिक उन्नति के बल पर विश्व में अपना सम्मान प्राप्त किया। जाहिर है उसके बाद जापान अपनी पहचान और आत्म-सम्मान के लिये प्रयत्नशील होता। जापान की इसी हलचल ने चीन की चिन्ता बढ़ा दी है। जापान में मानों काल का एक चक्र पूरा हो गया हो। कुछ वर्ष पहले जापान में लोगों ने सत्ता उदार लोकतान्त्रिक दल को सौंप दी, जिसे जापान की राष्ट्रवादी चेतना का प्रतिनिधि दल माना जाता है। इस दल के जापान के प्रधानमंत्री शिन्जों एबे देश के खोए राष्ट्रीय गौरव को प्राप्त करना चाहते हैं। दरअसल भारत और जापान दोनों ही यूरोपीय जातियों की साम्राज्यवादी चेतना के शिकार रहे हैं। भारत द्वितीय युद्ध से पहले तक और जापान उस युद्ध के बाद से। आज चीन दोनों को ही धौंस से डराना चाहता है। नरेन्द्र मोदी ने शायद इसीलिए भूटान के बाद जापान के साथ भारत की एक जुटता प्रदर्शित करने के लिए उसे अपनी विदेश यात्रा के लिए चुना है।

ऐसा नहीं है कि चीन भारत की विदेश नीति में हो रहे इन परिवर्तनों की भाषा को समझ नहीं पा रहा है। चीन इतना तो समझ ही चुका है कि भारत में जो नया निजाम आया है वह किसी भी देश से आंख झुका कर बात करने के लिये तैयार नहीं है। चीन सरकार के आधिकारिक अंग्रेजी दैनिक ग्लोबल टाईम्स ने इसके संकेत भी दिए हैं। दैनिक के अनुसार चीन ने कुछ समय पहले भूटान के साथ दौत्य सम्बंध स्थापित करने की इच्छा जाहिर की थी लेकिन भारत को इसमें आपत्ति थी, क्योंकि भारत चीन को इस क्षेत्र में अपना प्रतिद्वन्द्वी मानता हैं। वह चाहता है कि सभी लोग विश्वास कर लें कि मोदी की भूटान और जापान यात्रा में केवल आर्थिक सम्बंध बढ़ाने के प्रयास थे उसका चीन के खतरे से कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन चीन इतना तो जानता है कि आर्थिक सम्बंध राजनैतिक सम्बंधों के पीछे चलते हैं आगे नहीं ।

 डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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