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यात्रा निर्वाण की

कैसे पाया अपन्तरम ने गुरु की अमृतवाणी सुनकर निर्वाण को? कैसे गुरु ने इस नाममात्र के शिष्य को पहुंचाया दूसरे छोर पर? कैसे इन शास्त्रों के सहारे, उपनिषदों के सहारे, जो नाव हैं दूसरे पार जाने के लिए, गुरु ने केवट बनकर पार लगाया? गुरू जानते थे दूसरा छोर। अगर अपन्तरम चाहता है कि वह पार उतर जाए इन शास्त्रों के सहारे तो क्या ये संभव था? नहीं। गुरु की अपार कृपा और उनकी अमृतवाणी से अपन्तरम आनंद से सराबोर हो गया। कहने लगा, कहां गया वो जगत, जो अभी अभी यहीं था। कहां खो गया। बात यह नहीं थी कि गुरु ने क्या दिया? बात यह थी कि इस अमृतवाणी के सुनने से शिष्य को क्या हो गया? आपने चेताया मुझे कि ‘अजहू चेत गंवार’। वैसे भी बहुत देर हो चुकी है। अब तो चेत। कब तक सोया रहेगा, जाग अब। इस छोटे से अनमोल मानव जन्म में पूरी कर ले अपनी निर्वाण की यात्रा। यात्रा कर भीतर की, क्योंकि संतों की यात्रा भीतर की ही होती है, बाहर का उन्हें कुछ भी पता नहीं होता। हां, असंतों की कुल जीवन यात्रा बाहर की है। संत को तो वही जान-समझ पाएगा, जो भीतर की यात्रा करे, स्वयं को जानने की, निर्वाण की ओर जाने की कोशिश करे। आपने सुनायी अमृतवाणी, बताया संत पलटू के बारे में। बाहर की यात्रा करते-करते कैसे करने लगे भीतर की यात्रा? कैसे दो-दो, चार-चार पैसे का सामान बेचते-बेचते राम नाम की धुन में रम गए। कैसे बेचने लगे तुरीया के महकते ताजे कमल? कैसे इन नौ द्वारों से पार दशम द्वार में प्रवेश कर गए? कैसे वे सिर्फ राम नाम की याद करने भर से न्यारे हो गए, सबसे प्यारे बन गए उस परम प्रभु के। वे वैश्य थे, जान गए, क्या है हानि-लाभ। तभी तो दावं पर लगा दिया अपने आपको। चढ़ा दिया प्रभु चरणों में स्वयं को और ऐसे पलटे कि नाम ही पलटू पड़ गया। दो भाई थे। दोनों पलट गए और बन गए पलटू दास और पलटू प्रसाद। राम नाम की ऐसी महिमा कि नगर सेठों के द्वार पर खड़े रहने वाले पलटू के द्वार पर अब नगर सेठ भेंट ले लेकर आने लगे। ऐसी सुगंध फैली राम नाम की, भीड़ आने लगी दूर दूर से। जीवन धन्य हो गया। जिन्होंने यात्रा की भीतर की पलटू के साथ, साधारण व्यापार करने वाले ऐसे पलटे की राम का नाम, समाधि ही बेचने लगे। ब्राह्मण के पास एक गुण है बुद्धि का। वह याज्ञवल्क्य या अष्टावक्र भी हो सकता है। अपनी बुद्धि को जगाकर चैतन्य हो जाने वाला ही ब्राह्मण है। जाग जाए बोध तो हर कोई ब्रह्म को जान सकता है। यही बात क्षत्रिय के विषय में भी है। जैनों के सारे तीर्थंकर क्षत्रिय थे। भुजाओं में जीने वाले, बल में जीने वाले, कैसे पा गये निर्वाण को? बात यह है कि तलवार चलाकर औरों को काटते-काटते खुद के अहंकार को ही काट फेंका और जब अहंकार कट गया तो घटाकाश मिल गया, महाकाश को और जन्म हुआ महावीर का। वैश्य के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है, वह धन का खोजी है पर जब परम धन की याद आ जाए तो आसानी से स्वयं के भीतर जा सकता है। यहां से भी परमात्मा का रास्ता है। पलटू वैश्य थे, लेकिन थे परम संत। शुद्र यदि बैठ जाए परम विश्राम में तो पा जाएगा, उस ब्रह्म को जो वासना शून्य है। ठीक चले तो लाओत्सू बन जाए, रैदास बन जाए। लेकिन ब्राह्मण सिर्फ भरे स्मृति को तो पंडित बन कर रह जाएगा। यदि क्षत्रिय भुजाओं में जिए तो सिर्फ योद्धा बनकर रह जाएगा। यदि वैश्य व्यापार करता रहे तो जीवन भर धन की रक्षा करता रह जाएगा। यदि हिम्मत आ जाए गुरु के सान्निध्य से, तो हम साथ हो ले कबीर के, जो कहते है :कबीरा खड़ा बाजार में, लिया लुकाठी हाथ,जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।

कबीर कहते हैं, खड़ा बाजार में हूं बेशक, लेकिन यात्रा करता हूं निर्वाण की। जिसकी हिम्मत हो आए मेरे साथ, लाठी से सिर गिरा दूंगा उसके अहंकार का। जो मोह के घर उसने बना रखे हैं, तैयार हो जो उन्हें जलाने के लिए चले हमारे साथ। करो तैयारी और यात्रा शुरू हो जाएगी निर्वाण की।

 

   ललित अग्रवाल

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