ब्रेकिंग न्यूज़ 

अतीत का अपमान, भविष्य की नाउम्मीदी

मितव्ययिता के नाम पर मीडिया द्वारा निरंतर किए जा रहे अंतर्नाद के कारण गोआ सरकार ने अपने तीन मंत्रियों सहित छह विधायकों को फुटबॉल मैच देखने के लिए 89 लाख रूपए के सरकारी खर्चे पर ब्राजील भेजने की योजना को रद्द कर दिया है। मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर ने विनम्रता से स्वीकार किया कि यह निर्णय जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया। हालांकि महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि  वास्तव में छह फुटबॉल खिलाडिय़ों को भेजना था, लेकिन मंत्री भी इसमें शामिल हो गए।

देश में खिलाडिय़ों की दुखद स्थिति का यह एक और उदाहरण था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘भारतीय अस्मिता’ की बात कहते हैं, लेकिन इस पूरे मीडिया अभियान में खेल और खिलाड़ी नेपथ्य में रहे। कहा जाता है कि भारतीय जनमानस की याददाश्त बेहद कमजोर है। खेल के क्षेत्र में दक्षता हासिल कर देश को प्रेरित करने वाले हर व्यक्ति को गुजरते समय के साथ भुलाया जाने लगा है। क्रिकेट के जुनून वाले देश में दूसरे खेल और खिलाडिय़ों को परंपरागत रूप से तुच्छ समझा जाता है।

हाल ही में रिलीज हुईं दो फिल्में – ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘पान सिंह तोमर’ खिलाडिय़ों के प्रति हमारे नजरिए का बेहतरीन उदाहरण है। क्रिकेट के प्रति जनता के जुनून ने इसे राष्ट्रीय खेल के रूप में स्थापित कर दिया है, राष्ट्रीय खेल हॉकी एक प्रायोजक के लिए आज मोहताज है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षण क्रिकेट के बजाय अन्य खेलों के जरिए आए हैं और क्रिकेटरों को छोड़ दिया जाए तो शायद ही किसी खिलाड़ी को इसका श्रेय मिला है। करोड़ों रूपए के विज्ञापन और प्रायोजन के इस युग में देश की महिमा को विदेशों में बढ़ाने वाले खिलाड़ी दरिद्रता में जीने को अभिशप्त हैं। कई अवसरों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं कि आखिर एशियाई खेलों और ओलंपिक में भारत अधिकाधिक पदक जीतने में असफल क्यों हो जाता है? पदक जीतने के मामले में देश के खराब प्रदर्शन को लेकर ज्यादा से ज्यादा महीने भर बहस की जाती है और फिर भुला दिया जाता है। यह जिम्मेदारी काफी हद तक उन प्रशासनिक निकायों में निहित है, जो देश में खेलों के विकास से संबंधित हैं। गुजरते समय के अनुसार ये इकाईयां राजनीतिक जागीरों में बदलती चली गईं, जिन्हें ना ही खेलों की जानकारी है और न ही उनमें रूचि। इन संस्थाओं की नींव को ईष्र्या और पूर्वाग्रह, संकीर्णता और सांप्रदायिकता तथा मूर्खता और विसंगतियों ने पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण कर दिया है। सामाजिक आरोहण और करियर के प्रति आसक्त रहने वाले लोगों द्वारा इन संस्थाओं की कुर्सी हासिल करने के लिए किए जाने वाले सालाना ‘झड़पों’ में खिलाडिय़ों की भुमिका सिर्फ प्यादों की रह गई है। सत्ता, दौलत, प्रभाव, राजनीतिक रसूख और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान से खिलाड़ी वंचित रह सकते हैं, लेकिन अधिकारी इसका आनंद उठाने से पीछे नहीं रहते। खेल को राजनेता एक मंच के रूप में इस्तेमाल करते हैं और यदि वे खेल के लिए निर्धारित किए गए कोष को पार्टी के लिए इस्तेमाल करते हैं तो यह बड़ी बात नहीं है, क्योंकि जवाबदेही उनका मजबूत पक्ष नहीं होता। इसके अलावा अपने नजदीकी और प्रिय लोगों को अनुबंध देना एक अलग लाभ है। शायद इसीलिए हमें ऐसा खेल मंत्री मिला है, जिसके हम काबिल हैं। जितने भी भारतीय खिलाडिय़ों ने अभी तक सफलता हासिल की है, इसका सारा श्रेय उन खिलाडिय़ों के बजाय प्रशासनिक निकायों को मिला है। अत: जब एक खिलाड़ी सेवानिवृत होता है तो वह हमेशा के लिए गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है।

लेजेंड खिलाडिय़ों के सम्मान को पुनस्र्थापित करने के लिए सरकार को वो सारे कदम उठाने चाहिए जो आवश्यक हैं। शुरूआत उन प्रशासनिक निकायों से करनी चाहिए जिन्हें खेलों से कोई लगाव नहीं है और सिर्फ अपने लोगों की सेवा में लगी हुई हैं। अगला कदम यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हमारे दक्ष खिलाडिय़ों का इस्तेमाल प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाने में हो। ऐसे लोगों को साथ लिया जा सकता है जिन्हें खेलों का जुनून हो और उनकी बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध हों। अगला कदम निर्धन खिलाडिय़ों की जरूरतों को देखते हुए उनके लिए हितकारी कोष की स्थापना करना है। यह धुंधलके में जी रहे हमारे खिलाडिय़ों की गरिमा को सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित होगा।

ऐसे अनेकों गरिमामयी उदाहरण भरे पड़े हैं। 1962 के एशियन खेलों में माखन सिंह ने स्वर्ण और रजत पदक जीता था। लेकिन देश ने उनके नाम को हमेशा के लिए भुला दिया और उन्हें अपने अगले 30 साल ट्रक चालक के रूप में बिताने पड़े। अर्जुन पुरस्कार पाने वाले कैडी जमशेद, 50 रूपए प्रति घंटे की कीमत पर गोल्फ कोर्स में फिर से कैडी बनने को बाध्य हैं। हॉकी ओलंपियन एस. डुंगडुंग ने एक बार कहा था कि कंपनियां उन्हें सिक्युरिटी गार्ड के रूप में भी नियुक्त करने को तैयार नहीं है। भारत दुनिया भर की वैश्विक घटनाओं में कितना पीछे है, इसकी जांच करने का आसान तरीका है। उदाहरण के रूप में 100 मीटर की दौड़ ही है। इसमें 2005 का भारतीय रिकॉर्ड 10.3 सेकेण्ड का है। इस लक्ष्य को कनाडाई पर्सी विलियम द्वारा 1930 में हासिल कर लिया गया था। इस तरह भारत 75 साल पीछे है। यूसैन बोल्ट द्वारा 2009 में 9.58 का बनाया गया रिकॉर्ड तो भूल ही जाना चाहिए। 1984 से अब तक हम सिर्फ तीन ओलंपिक पदक जीतने में कामयाब हुए हैं, जबकि चीन ने 420 पदक जीते हैं। पूरी कहानी बताने के लिए यही पर्याप्त है।

सबसे बड़ा आडंबर यही है कि भारत में खेलों को चलाने वालों को खेलों से कोई प्यार नहीं है, लेकिन उन्हें सरकारी अनुदान, प्रसिद्धि, राजनीतिक रसूख, विदेश यात्रा, ठेकों में मिलने वाली रिश्वत आदि और शक्ति से प्यार है। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में बदनाम हो चुके सुरेश कलमाडी ने अपनी बेवसाईट पर बताया – ”भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में मैंने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में देश को पहली बार व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाया।’’ संक्षेप में कहें तो क्रिकेट छोड़कर भारत में कोई भी अन्य खेल सुप्रबंधित नहीं है। भारतीय खेल राजनीति के जाल में फंसे हुए हैं। लगभग हर सप्ताह नए-नए विवाद सामने आते रहते हैं। पूर्व खिलाडिय़ों की आर्थिक स्थिति आज बेहद दयनीय है। भारत में खेल सुधार की बहुत आवश्यकता है। हर खेल का अपना अलग महत्व है और वह बराबर सम्मान तथा प्रबंधन का हकदार है। महिला टीमों की स्थिति अभी भी खराब है। कोई भी गंभीर कदम उठाने से पहले सरकार को इन मुद्दों का विश्लेषण करना चाहिए।

एशियाई खेलों में पदक जीतने वाले दो टिकट संग्राहकों ने हाल ही में बातचीत के दौरान बताया कि उनकी दशा अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा बेहतर है। इनमें से एक पूर्व खिलाड़ी को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर पार्किंग कॉम्पलेक्स में सहायक के रूप में तैनात किया गया था।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

стоматологические кабинетыооо полигон отзывы сотрудников

Leave a Reply

Your email address will not be published.