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देश को साख और रोजगार की चुनौती

महीनों से चल रही चुनावी गहमा-गहमी के बाद, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही, नई सरकार की प्रस्तावित आर्थिक नीतियों पर चर्चा भी तेज हो रही है। देश में मंहगाई, लगातार गिरते औद्योगिक उत्पादन, बढ़ते भुगतान घाटे और रूपए के गिरते मूल्य के चलते आगामी सरकार की आर्थिक सोच का महत्व और भी बढ़ जाता है। यूपीए के दस साल के शासनकाल के अंतिम तीन सालों का लेखा-जोखा देखें तो इन तीन सालों में जीडीपी ग्रोथ लगातार घटती हुई 4.5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। महंगाई की दर दो अंकों में पहुंच चुकी है। खाने-पीने की चीजों में तो यह महंगाई 15 प्रतिशत तक पहुंच गई। सच्चाई यह है कि पिछले कई वर्षों में महंगाई की लगातार ऊंची दर बने रहने के कारण भारत की शेष विश्व की तुलना में प्रतिस्पद्र्धा-शक्ति कहीं कम हो गई है। लागतें बढ़ रही हैं, निवेश और उपभोक्ता मांग थम-सी गई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण भी थम चुका है। नतीजा यह है कि औद्योगिक संवृद्धि दर जो लगातार 10 प्रतिशत से अधिक बनी हुई थी, 2011-12 में 2.7 प्रतिशत और 2012-13 में मात्र 1 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है और 2013-14 में इसके ऋणात्मक 0.2 प्रतिशत तक पहुंचने के संकेत मिल रहे हैं। यानि पिछले साल तो औद्योगिक उत्पादन 0.2 प्रतिशत सिकुड़ गया।

रोजगार है बड़ी चुनौती

यूपीए के पुरोधा मंत्री दावा करते रहे हैं कि इस कालखंड में ग्रोथ रेट का औसत 8 प्रतिशत के आस-पास रही और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में कमी आई और लोगों की हालत सुधरी। लेकिन धरातल पर परिस्थितियां इस बात की गवाही नहीं देती। यूपीए सरकार की सबसे बड़ी नाकामी रोजगार सृजन के क्षेत्र में रही। गौरतलब है कि देश की कार्यशील जनसंख्या में हर साल 1 करोड़ 20 लाख लोग जुड़ जाते हैं। यानि दस सालों में कार्यशील जनसंख्या 12 करोड़ बढ़ गई। लेकिन यूपीए शासन के दस सालों में मात्र 2 करोड़ लोगों को ही रोजगार के अवसर जुटाए जा सके। यानि यूपीए शासन के दौरान इन सालों में बेरोजगारी 10 करोड़ बढ़ गई। यही नहीं रोजगार का स्तर भी गिरा। सरकारी एजेंसी ‘एनएसएसओ’ के आंकड़ों के हिसाब से वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच 2 करोड़ 50 लाख स्वरोजगार से बाहर हो गए और साथ ही 2 करोड़ 20 लाख लोग दिहाड़ी मजदूरों की श्रेणी में शामिल हो गए। यह इस बात की ओर इंगित करता है कि परंपरागत रोजगार में लगे किसान, कारीगर और छोटा-मोटा धंधा करने वाले दुकान और लघु उद्यमी और स्वरोजगार से बाहर होते हुए बढ़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर बन गए।

योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया मानते हैं कि रोजगार सृजन कम हुआ, लेकिन उनका दावा है कि इस दौरान कृषि में अच्छी ग्रोथ हुई और कृषि श्रमिकों की मजदूरी पहले से बेहतर हुई है। लेकिन, सच्चाई यह है कि जो लोग पहले अपनी जमीन पर खेती करते थे, अब वे जमीन से बेदखल होकर मजदूर बनते जा रहे हैं। वंचितों के कल्याण हेतु प्रतिबद्धता दिखाने वाली सरकार की नीतियों ने वास्तव में समाज के कमजोर वर्गों, चाहे वे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के हों, महिलाएं हों या अन्य, सभी को इन नीतियों से भयंकर नुकसान पहुंचा है। जबकि 2001 में अनुसूचित जनजाति के 44.7 प्रतिशत लोग अपनी जमीन पर काम करने वाले किसान की श्रेणी में थे। 2011 की जनगणना में यह आंकड़ा घटकर मात्र 34.5 प्रतिशत रह गया। लगभग यही स्थिति अनुसूचित जाति के लोगों की भी रही। यानि भूमि खो कर अब वे दूसरों की जमीन पर या कहीं और मजदूरी करने के लिए बाध्य हैं। पिछले 10 वर्षों में जनजातीय वर्ग में इतनी बड़ी मात्रा में लोगों का मालिकाना हक वाले किसानों का भूमि से वंचित होना वास्तव में चिंता का विषय है।

गिरता रोजगार का स्तर

जनगणना के आंकड़ें बताते हैं कि इन वर्गों के लोगों में केवल जमीन की मलकियत का ही क्षरण नहीं हुआ है, बल्कि उनके रोजगार का स्तर भी घटा है। रोजगार में स्थायित्व का भी क्षरण हुआ है। ऐसे लोग, जिनको साल में कम से कम 6 महीने लगातार काम करने का मौका मिलता हो, उनकी संख्या अनुसूचित जाति-जनजाति में जो 2001 में क्रमश: 73 प्रतिशत और 69 प्रतिशत थी, अब घटकर क्रमश: 70.7 प्रतिशत और 64.8 प्रतिशत ही रह गयी है। इसका मतलब यह है कि इन मजदूरों में अस्थायी रोजगार बढ़ा है। इन वर्गों में अस्थायी रोजगार के आंकड़े इस बात की गवाही भी दे रहे हैं।

छोटे मोटे धंधों से भी बाहर हो रहे दलित

दलित (अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग) परंपरागत भूमि से बाहर होकर दूसरों की जमीन पर मजदूरी करने को ही मजबूर नहीं हो रहे, बल्कि घरेलू उद्यमों को छोडऩे पर भी वे मजबूर हो रहे हैं। जनगणना के ताजा आंकड़ों के अनुसार, घरेलू उद्योगों में संलग्न अनुसूचित जाति के कार्मिकों की संख्या 2001 में 3.9 प्रतिशत के घटकर 2011 में 3.2 प्रतिशत ही रह गयी, जबकि अनुसूचित जनजातियों में यह 2.1 प्रतिशत से घटकर 1.8 प्रतिशत रह गया।

यूपीए सरकार ‘मनरेगा’ के माध्यम से रोजगार सृजन का दावा करती रही। यह सही है कि बेरोजगारों को इस स्कीम के माध्यम से पैसा बांटा गया, लेकिन इस कार्यक्रम में भी यूपीए सरकार की प्रसिद्धि के अनुरूप गड़बडिय़ां देखने में आई। मनरेगा रोजगार सृजन का विकल्प कभी नहीं बन सकता। इसका कारण यह है कि हजारों करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी इससे केवल अस्थायी रोजगार ही मिलता है। जरूरत है ऐसी सरकारी नीति की जिससे गरीब और बेरोजगार को स्थाई और उत्पादक रोजगार के अवसर मिले। इसके लिए उत्पादन के तौर-तरीकों को बदलना होगा। आवश्यकता है ग्रामीण और कृषि विकास की। उसके लिए कृषि में पूंजीगत निवेश बढ़ाना होगा, साथ ही खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाकर देश को आत्मनिर्भर बनाना होगा, ताकि भुखमरी का स्थायी इलाज हो सके।

रूपया यानि देश की साख

चीन से बढ़ते आयातों के साथ-साथ ‘विश्व व्यापार संगठन’ और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के दबाव में लगातार बढ़ते आयातों के चलते हमारे आयात 500 अरब डॉलर से ज्यादा अर्थात् 30 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंच गए। इसका असर यह है कि अपने पर दबाव बढ़ा और वह एक समय तो 69 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंच गया। देश पर कर्ज बढ़ता गया और विदेशों में देश की साख गिरती गई। रुपए के कमजोर होने के कारण हमारी आयातों की लागत भी बढ़ती गई, जिसने महंगाई की समस्या को और भी जटिल बना दिया। हालांकि पिछले एक वर्ष में सोने के आयातों पर कृत्रिम प्रतिबंध लगाने के कारण भुगतान घाटा थोड़ा थमा है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। देश में उत्पादन बढ़ाकर, चीन से आयातों पर प्रतिबंध लगाकर और महंगाई को थामते हुए देश के निर्यातों को प्रोत्साहित करके ही हम रुपए की साख को पुन: स्थापित कर सकते हैं।

क्या करे सरकार?

आज जरूरत इस बात की है कि देश में रोजगार के अवसर बढ़े, महंगाई रूके, औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़े, किसानों की हालत सुधरे, महंगाई थमे – खासतौर पर खाने-पीने की चीजों की महंगाई, देश पर देशी-विदेशी कर्ज कम हो। चीन से आयातों को कम करने हेतु लघु उद्योगों को पुनर्जीवित करने पर जोर हो, रुपये की इज्जत बढ़े और भारत की गिनती दुनिया के धनी देशों में हो। इसके लिए जरूरी है देश के लोगों की प्रतिभा पर विश्वास करते हुए, एक ऐसी नीति का निर्माण हो, जिसमें विदेशी निवेश का गुणगान न हो। उत्पादन के ऐसे तौर-तरीके हों जिनसे रोजगार बढ़े, आयातों को सीमित करते हुये देश में उत्पादन बढ़े, गैर जरूरी सरकारी खर्चों और लोक-लुभावन नीतियों की बजाय ‘सर्वजन हिताय नीति’ का निर्माण हो।

डॉ. अश्विनी महाजन

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