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संकट में सपेरे

पहले बुजुर्ग सपेरे सांपों की विष थैली में कांटा चुभोकर विष निकालते थे। लेकिन अब सिरिंज के माध्यम से सांप के विष को निकालते हैं। विष निकालने के कुछ दिनों के भीतर ही थैली में फिर से विष एकत्र हो जाता है, तब सांप को छोड़ दिया जाता है। एक रिपोर्ट…

बस्ती के राजस्व कार्यालय में सांप छोडऩे वाले सपेरे हक्कुल और उसके साथी रामचेत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा कर भले ही प्रशासन ने अपना रुतबा दिखा दिया हो, लेकिन सपेरों के सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं। सपेरों का आरोप था कि जमीन आवंटन के लिए उससे रिश्वत मांगी गई थी। यूपी के बस्ती जिले के तहसील कार्यालय में उस समय हड़कंप मच गया जब एक नाराज सपेरे ने वहां 20 सांप छोड़ दिए। सपेरा जमीन न मिलने और रिश्वत मांगे जाने से परेशान था। दफ्तर के कर्मचारियों ने किसी तरह कुर्सी-मेज पर चढ़ कर अपनी जान बचाई।

सिमटे वनों व कड़े कानून के चलते सांपों के पकडऩे तथा उनके प्रदर्शन पर रोक के कारण सपेरा जाति के लोगों के सामने दो वक्त की रोजी-रोटी जुटा पाना मुश्किल हो गया है। सरकार की ओर से इनकी कोई सुध न लिए जाने के कारण, इनकी स्थिति दिनों-दिन बद से बदत्तर होती जा रही है।


सांप मारना गौहत्या के समान


सपेरों मे मान्यता है कि सांप मारना गौ-हत्या और बाल-हत्या के बराबर है। बुजुर्ग सपेरा हरिनाथ बताते हैं कि जिस सपेरे की पिटारी में सांप मर जाता है उसे पांच तीर्थ करने होते हैं तथा पांच नदियों में स्नान करके सातों गोत्रों के सरदारों (धार्मिक गुरू) को यथाशक्ति दान देना पड़ता है और समाज के लोगों को भोज कराना पड़ता है।


जरा-सी असावधानी और खत्म जीवन की कहानी उस स्याह सच के समान ही है, जो सपेरा जाति के उस कृष्ण पक्ष की बानगी है जिसकी ओर चाह कर भी वह समाज का ध्यान आकर्षित नहीं करा पाती है। सांपों को लेकर बनी फिल्म नागिन को मिली अपार सफलता के बाद फिल्म उद्योग में सांप और सपेरों की मांग बढऩे से ललितपुर जनपद के पचौड़ा में निवास करने वाली सपेरा जाति के लोगों को पैसे कमाने का भरपूर अवसर मिला। टोकरों में सांप पकड़कर उन्होंने मुम्बई की राह पकड़ी और कालिया मर्दन से लेकर शिवक या शुभदिन, जय महादेव , शिव-पार्वती, जीने की आरजू, नगीना, शेषनाग, नागमणि, प्यासे होंठ, हिस्स जैसी न जाने कितनी फिल्मों की शूटिंग के दौरान बीन बजाकर रोजी-रोटी कमायी। लेकिन कृत्रिम सांप के चलन तथा कम्प्यूटर के कमाल के कारण फिल्मों से सपेरा जाति के लोगों का नाता टूट गया, जिससे उन पर संकट के बादल मंडराने लगे।

नागमणि के जरिए पूरे संसार पर अपना राज कायम करने का सपना मन में पाले जंगल-जंगल हर मुसीबत और खतरे को झेलते हुए जीवन गुजार देने वाली सपेरा जाति की गाथा दुख का सागर है। सपेरों को जहां एक ओर समाज से अलग रहकर मीलों का सफर तय करने के बाद बमुश्किल दो वक्त की रोटी नसीब हो पाती है वहीं उनके बच्चे पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर रह जाते हैं। सिमटे वनों तथा कड़े कानून के चलते सांपों का खेल सार्वजनिक रूप से दिखाना भी अब उनके लिए कठिन होता जा रहा है।

रोजी-रोटी के लिए एकमात्र ये नागराज इनकी धार्मिक निष्ठा का भी अटूट हिस्सा हैं। अगर ये नाग इनकी जिन्दगी से अलग कर दिए जाएं तो सपेरों की धार्मिक आस्था में तो चोट पहुंचेगी ही साथ ही परिवार को दो जून की रोटी जुटाना भी टेढ़ी खीर साबित होगा। राजधानी लखनऊ के आसपास सपेरों के तीन गांव हैं। ये हंै – सरोजनीनगर क्षेत्र में गांधीग्राम, पीजीआई के समीप पूर्व परवरनगर तथा मोहनलालगंज क्षेत्र में अशरफनगर। इनका दर्द है कि वन विभाग के लोग जहां भी मिल जाते हैं वहीं सांप छोड़वा देते हैं तथा प्रताडि़त करते हैं। उनकी मांग है कि बस्तियों में मौजूद विषैले सांपों को पकडऩे का लाइसेंस दिया जाय, ताकि लोगों को जहरीले सांपों से भी मुक्ति मिल सके और उनकी रोजी रोटी भी चलती रहे। साथ ही धर्म के प्रति उनकी आस्था पर भी किसी प्रकार का चोट न लगे।


क्या कहते हैं वनाधिकारी


चिडिय़ाघर के वन्यजीव चिकित्सक डा. उत्कर्ष शुक्ला बताते हैं कि सांप स्तनधारी प्राणी नहीं हैं, लिहाजा प्राकृतिक तौर पर ये दूध नहीं पीते। सपेरे व कुछ लोग धार्मिक अंधविश्वास के चलते जबरदस्ती दूध पिलाते हैं। हां, सांप पानी जरूर पीते हैं। वह बताते हैं कि पशु-पक्षी क्रूरता अधिनियम के अंतर्गत किसी वन्य जीव को पालना व कैद करना अपराध है।


पूरब परवर निवासी रामसिंह नाथ बताते हैं कि वास्तव में वे अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। पढऩे लिखने के लिए गांधीग्राम को छोड़ कहीं भी विद्यालय की व्यवस्था नहीं है। दूसरी ओर गांधीग्राम के लोग बताते हैं कि मायावती के प्रथम मुख्यमंत्रित्व काल में 22 लोगों को ढ़ाई-ढ़ाई बीघे के पट्टे कर दिए गए थे, लेकिन आज तक वो जमीन उन्हें हस्तांतरित नहीं की गई। सरोजनीनगर के माती गांव के अंतर्गत गांधीग्राम में बसी सपेरों की बस्ती का हाल बेहाल है। करीब आधी शती पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने यहां एक प्राईमरी स्कूल खोलने की मंजूरी दी थी, जो आज भी इनके बच्चों को शिक्षा दे रहा है। गांधीग्राम के लिए उन्होंने दो एकड़ जमीन भी मुहैया कराई थी।

घास-फूस और छप्परों से ढके कच्चे घरों में बसर कर रहे इन सपेरों के बुजुर्ग, दलसिंह नाथ कहते हैं – “हम महाराणा प्रताप के वंशज हैं। हमारे पूर्वजों ने जंगलों में रहना तो स्वीकार कर लिया, मगर पराधीनता स्व्ीकार नहीं की। अब हालत यह हो गई कि भूखों मरने की नौबत आ गई है। तब बाबा गोरखनाथ हरियाणा मे चरखीदादरी के समीप कबीलों में पहुंचे और वहीं उन्होंने कबायली लोगों को ज्ञान प्रदान किया। साथ ही रोजी-रोटी के लिहाज से उन्होंने लौकी, बांस तथा मोम से बनाकर एक वाद्य यंत्र बीन दिया और उसे बजाने की धुन भी बतायी। जंगली जानवरों के बचाव के तरीके बताए। उन्हेांने कहा था कि बस्ती मे जाकर नागों की पूजा-अर्चना करवाने से जीविका का लक्ष्य पूरा हो जाएगा और भगवान शिव की आराधना भी।”

धार्मिक आस्था के बारे में राजकुमार नाथ बताते हैं – “मान्यता के अनुसार कबीले में बाबा गोरखनाथ के साथ उनके शिष्य संत कनीफानाथ भी आए थे और काफी दिनों तक कबीलों में साथ रहकर उन्होंने मार्गदर्शन किया था। काफी लोग उनके अनुयायी हो गए।” ये लोग अपनी संस्कृति, भाषा को थारू, भोक्सा व खासी जनजातियों से मिलती-जुलती बताते हैं। गोत्र विभाजन के सम्बन्ध में द्वारिका नाथ सात प्रकार के गोत्र – ओसवाल, वैद्य, पनिहार, घामरी, सहोता, सूड़ा व अग्रवाल बताते हैं। हर गोत्र में एक सरदार होता है। शादी-ब्याह से लेकर सारे धर्म-कर्म के कार्य वही सम्पन्न कराता है। सरदार के परिवार से सम्बंधित उत्तराधिकारी ही नया सरदार चुना जाता है। अनूपनाथ बताते हैं कि वे लोगों के घरों, खेत व खलिहानों से ही सांप पकड़ते हैं और सापों के जहरीले दांत तोड़ते हैं। पहले बुजुर्ग लोग सांपों की विष थैली में कांटा चुभाकर विष निकालते थे, मगर अब सिरिंज से माध्यम से निकालते हैं। कुछ दिनों पश्चात फिर से थैली में विष एकत्र हो जाता है, तब सांप को छोड़ दिया जाता है। सांप का मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े हैं, दूध नहीं। हो सकता है दूध को पानी समझ कर वह पी लेते हैं। शंकरजी पर दूध चढ़ता है इसलिए लोग सांपों को भी पिलाते हैं। आज तक कोई सांप दूध पीने से नहीं मरा।

नागपंचमी और श्रावण माह में एकत्रित किए गए धन के बल पर पूरे वर्ष का गुजारा करने की कवायद में लगे सपेरा जाति के लोग आधुनिकता के दौर में किसी तरह अपना भरण-पोषण कर रहे हैं। जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाली सपेरा जाति ललितपुर जनपद के पचौड़ा, धोर्रा, सिरसी, जरावली, टपरियन, गिदवाड़ा, गिरार आदि ग्रामों में निवास करती है। इसका मुख्य कार्य सांपों को पकडऩा तथा जंगली जड़ी-बूटियों को बेचना रहा है। इसके अलावा ये लोग जड़ी-बूटियों से दवा बनाकर भी बेचते हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा पद्धति के आगे इनका दवा व्यापार भी चौपट हो चुका है।


सांप का जहर एकत्र करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए – ई. आर.ए. सिंह


नाथ संप्रदाय के सपेरों द्वारा सापों को पालने से लेकर उनकी विषदन्त निकालने की पैतृक हुनर को ध्यान में रखकर अगर सरकार सपेरों को सांपों का विष संग्रह करने हेतु प्रशिक्षित करे तो सांपों से दुनिया भर में होने वाली लाखों मौतों को रोकने में कारगर सहायता मिलेगी और सपेरों को रोजगार भी। सांपों का जहर विष के असर को दूर करने में दवा बनाने हेतु होता है। इस जहर की कीमत बहुत अधिक होती है। हमारे देश के नीति बनाने वाले लोग कब जागेंगे, जब अब एक बड़ा प्रश्र है। जिन्होंने पीढिय़ों से हुनर पायी है, उनका उपयोग करने का वक्त आ गया है। यह बात ई. आर.ए. सिंह ने चौथी दुनिया से बात करते हुई कहीं थी। उनका मानना है कि सपेरों में गजब की क्षमता है।


पचौड़ा के खेमनाथ बताते हैं – “हमें सरकारी कागजों में सामान्य वर्ग में शामिल किया गया है, जिस कारण सिर्फ चुनाव के समय ही नेता लोगों को हमारी याद आती है। हमें कोई सरकारी सुविधा तक नहीं मिलती है। हमारी बस्ती में पांच सौ लोग रहते हैं। इनमें ज्यादातर के पास राशन कार्ड भी नहीं है। पेट की आग बुझाने के लिए हम लोगों ने नागिन बैंड बना लिया है। शादी-विवाह में नाच-गान करके दो जून की रोटी जैसे-तैसे जुटा पाते हंै। अपने आपको गोरखनाथ परम्परा का वाहक मानने वाली सपेरा जाति के दुर्दिनों की शुरुआत आजादी के साथ ही शुरू हो गई। राजे-रजवाड़ों के रहमोकरम पर पलने वाली सपेरा जाति ने कभी कृषि कार्य की ओर ध्यान नहीं दिया। आज हालत यह है कि भूमिहीन सपेरा की स्थिति बड़ी ही नाजुक है। रोजगार के साधन धीरे-धीरे समाप्त हो जाने के कारण इनकी हालात बद से बदत्तर होती जा रही है। कुपोषण के चलते इनके बच्चे मंदबुद्धि के शिकार हो रहे हैं। छोटे-छोटे कबीले के रूप में बसे जंगलों के पास इनके घरों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव साफ झलकता है। इस समुदाय के एकमात्र शिक्षित व्यक्ति सुन्दरनाथ प्राथमिक विद्यालय समोगर में शिक्षक हैं। जब उनसे इस समुदाय के पिछड़ेपन को जानने की कोशिश की गयी तो उन्होंने बताया कि सपेरा समाज के साथ हमेशा से उपेक्षा का भाव रखा जाता रहा है। योगी समुदाय से ताल्लुक रखने के कारण उनके पूर्वज अपनी मेहनत पर भरोसा करते रहे। समाज के हित के लिए विषधरों को पकडऩे में ही उन्होंने अपना सारा श्रम लगा दिया और संख्या में कम होने के कारण किसी ने उनके दुख-दर्द को जानने की कोशिश नहीं की। अशिक्षित और यायावर जिन्दगी बसर करने के कारण अपने अधिकारों के लिए कोई जाग्रत नहीं है। सपेरा जाति के अनेक बेसहारा बुजुर्ग एवं विधवाओं को पेंशन तक नहीं मिल पा रही है। समाज कल्याण विभाग से जब इस सम्बन्ध में जानकारी हासिल की गई तो पता चला कि सीमित बजट के चलते सभी को पेंशन नहीं मिल पाता है। इस तरह सांपों को पकड़कर विषधरों से समाज की रक्षा करने वाली सपेरा जाति का उद्धार कब होगा, यह प्रश्न आजादी के बाद से लेकर आज तक ताजा बना हुआ है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

 

 

 

 

 

 

 

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