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हिंदी बनाम अंग्रेजी

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत संघ के आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित हिंदी को महत्व देने के केन्द्र सरकार के सुझाव को कुछ लोग थोपने के नाम पर विरोध कर रहे हैं। यह सामान्य ज्ञान की बात है कि 1930 के पूर्वाद्र्ध में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में पेश किया गया था। देश के दक्षिणी भाग में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ का भी गठन किया गया था।

यह अजीब बात है कि अंग्रेजों के शासन की समाप्ति के छह दशक बाद और संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत देवनागरी लिपि सहित हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार करने के बावजूद कुछ लोग हिंदी को उन पर थोपने के नाम पर विरोध कर रहे हैं, जबकि अंग्रेजी का नहीं। इसका श्रेय अंग्रेजों को जाना चाहिए, जो एक चालाक शासक थे और विशेष रूप से मैकाले को। अपनी चालाक भाषा नीति के कारण उन्होंने हमें महसूस करा दिया है कि हमारी अपनी ही राष्ट्रभाषा हिंदी हम पर थोपी जा रही है, लेकिन अंग्रेजी नहीं जोकि हम पर थोपी गई है। अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में आधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग किया था और स्वतंत्रता के बाद अचानक आधिकारिक भाषा के परिवर्तन से किसी तरह की कठिनाईयां पैदा न हो इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड (2) के तहत अंग्रेजी भाषा को ट्रांजिसनरी उपाय के रूप में अगले 15 सालों तक प्रयोग करने की स्वीकृति दी गई थी। संविधान के गठन के तुरंत बाद ही केन्द्र सरकार के प्राथमिक कर्तव्यों में से एक भाषा नीति थी, जिसमें हिंदी को संघ की आधिकारिक भाषा और प्रांतीय भाषाओं को अपने-अपने राज्यों की द्वितीय भाषा के रूप में घोषणा शामिल थी। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भाषा नीति बनाने में केन्द्र सरकार की विफलता ने ऐसी भ्रम की स्थिति बनाई है। हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा बनाने के पीछे उद्देश्य और प्रायोजन था कि यह राज्य और केन्द्र के बीच संपर्क भाषा के रूप मेें काम करेगा। लेकिन जहां तक राज्य का सवाल है इसके प्रशासन को आधिकारिक भाषा पर काम करने की जरूरत है, जिसके फलस्वरूप केन्द्र और राज्य के बीच आधिकारिक भाषा को लेकर कोई विवाद नहीं हो। अगर केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा और राज्यों की राजभाषा के बीच सीमांकन की गई होती तो कोई समस्या नहीं होती। राष्ट्रीय राजभाषा नीति को विकसित करने में केन्द्र सरकार की विफलता और राजनीतिक फायदे के लिए नागरिकों के बीच क्षेत्रीय और संकीर्ण भावनाओं के प्रोत्साहन ने राष्ट्रीय एकीकरण को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। इस पहलू को उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने ‘प्रदीप जैन बनाम भारतीय संघ’ मामले में इस प्रकार रेखांकित किया है – ‘आज हम पाते हैं कि देश की अखंडता को क्षेत्रवाद, भाषाई और सांप्रदायिकता जैसी विभाजनकारी ताकतों से खतरा है और सांप्रदायिक वफादारी राष्ट्रीय जीवन में प्रभुत्व पाती जा रही है, जो राष्ट्रीय अखंडता को नष्ट कर रही है। हम भूलते जा रहे हैं कि भारत एक देश है और हम सभी भारतीय पहले हैं और अंत तक भारतीय हैं। यह खुद को याद दिलाने का समय है कि महान दूरदर्शी और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने कहा था – ‘यदि भारत जीवित रहेगा तो कौन मरेगा और यदि भारत मरेगा तो कौन जीवित रहेगा?’ इस बात को हमें अवश्य महसूस करना चाहिए और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सार्वजनिक जीवन के कई लोग इसे कभी-कभी इतिहास की अज्ञानता के कारण और कभी-कभी जानबूझकर स्वार्थ को बढ़ावा देने के लिए नजरअंदाज करते रहते हैं। क्षेत्रीय, भाषाई और सांप्रदायिकता के आधारों के बजाय राष्ट्रहित अनिवार्य रूप से और हमेशा के लिए प्रबल होनी चाहिए।’ (एआईआर 1984 एससी 1420 , पैरा-1)

1984 में संविधान पीठ द्वारा कहे गए चेतावनी भरे शब्दों के बावजूद, सभी राज्यों पर लागू होने वाली राष्ट्रीय भाषा नीति बनाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा न ही कोई कदम उठाए गए और न ही देश के सभी राज्यों के बीच भाषाई और क्षेत्रीय समन्वय स्थापित करते हुए नागरिकों के बीच भाईचारे और अखंडता के लिए देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने में कोई मदद की गई।

यह निर्विवाद है कि संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल भाषाओं सहित भारत की प्रत्येक भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है। इस तथ्य को ध्यान में रखने योग्य है कि देश के उत्तरी हिस्से के अधिसंख्य राज्यों की भाषा रही हिंदी, अन्य राज्यों में भी प्रयोग में लाई जाती है और इसे देवनागरी लिपि के साथ केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकृति दी गई है। वास्तव में हमारे संविधान के प्रमुख वास्तुकार डॉ. भीमराव अंबेडकर चाहते थे कि हमारी सबसे पुरानी और विश्व की सबसे समृद्ध भाषा संस्कृत भारत की आधिकारिक भाषा हो। उस सुझाव पर संविधान सभा के सदस्य, खासकर तमिलनाडु से संबंध रखने वाले लोगों ने अपनी सहमति और समर्थन दिया था। जो भी हो, संविधान सभा में बड़ी संख्या में हिंदी भाषी होने के कारण हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकृत किया गया। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल प्रत्येक भाषा हमारी राष्ट्रीय भाषा है। आज भाषाई अलगाववाद इस हद तक पहुंच गया है कि हिंदी का विरोध हो रहा है, लेकिन अंग्रेजी, जो कि पूरी तरह से एक विदेशी भाषा है और न ही हमारी संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल है, को कुछ लोगों द्वारा मातृभाषा के रूप में लिया जा रहा है। जबकि तथ्य यह है कि इस भाषा को अंग्रेजी हुकुमत के दौरान हम पर थोपा गया था। आज अंग्रेजों के जाने के छह दशक बाद भी हम उस मानसिक गुलामी से निकल नहीं पा रहे हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि देवनागरी, हिंदी और संस्कृत दोनों की समान लिपि है और जो हिंदी पढ़ और लिख सकते हैं वो संस्कृत भी आसानी से पढ़ और लिख सकते हैं। और यही नहीं, जहां तक महाराष्ट्र राज्य का सवाल है, समान देवनागरी लिपि होने के कारण हिंदी, मराठी और संस्कृत के बीच एक मजबूत बंधन है। यह कहा जाना चाहिए कि इसका सारा श्रेय अंग्रेजों, खासकर मैकाले को जाना चाहिए, जिन्होंने अपनी शिक्षा और भाषा नीति के कारण भारतीयों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहा कि अंग्रेजी हमारी मातृभाषा है और हिंदी हम पर थोपी गई भाषा है।

इस तथ्य को ध्यान रखते हुए कि ‘शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर देवनागरी लिपि सीखना हम भारतीयों का कर्तव्य है’ भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश के सभी नागरिकों, जिनकी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिंदी और संस्कृत नहीं था, को देवनागरी लिपि सीखने को अनिवार्य करने के लिए मैंने राज्यसभा में ‘द लर्निंग ऑफ देवनागरी स्क्रिप्ट (फॉर नेशनल यूनिटी) बिल 2011’ नाम से एक बिल पेश किया था। लेकिन बिल को स्वीकार्य नहीं किया गया। हालांकि, देश के व्यापक हित में उसी तर्ज पर एक सरकारी विधेयक लाने के लिए मैंने वर्तमान सरकार को एक सुझाव भेजा है।

मौजूदा हालात को देखते हुए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि लगातार छह दशकों से चली आ रही प्रक्रिया को धीमी गति से लागू किया जाए, ताकि जो हिंदी से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हो।

जस्टिस (रिटार्यड)एम. रामा जॉइस

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