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भारत की विविधता

दुनिया में अन्य कोई देश धर्म में डूबकर इतनी भौगोलिक एकता में नहीं जुड़ा है, जितना कि भारत। भारतीय महाकाव्य रामायण में वर्णित भारत का भूगोल उल्लेखनीय रूप से सटीक है। महाकाव्य में वर्णित प्रत्येक घटना भारतीय मानचित्र और स्थानीय नायकों के साथ पूरी तरह से जुड़ी है।

हाल ही में हिंदी को लेकर किया गया विवाद निरर्थक था। भारतीय भाषाओं को अगर ध्यान से सुना जाए तो उनमें काफी समानताएं मिलेंगी। यही कारण है की टॉलीवुड (दक्षिण भारतीय) फिल्मों के कलाकार बॉलीवुड में और बॉलीवुड के कलाकार टॉलीवुड में बिना किसी मनोवैज्ञानिक झिझक के काम कर रहे हैं। यही कारण है कि दक्षिण भारतीय लोग हिंदी फिल्म और उत्तर भारतीय लोग दक्षिण भारतीय फिल्मों के संगीत को बहुत पसंद कर रहे हैं। अभी हाल ही में दक्षिण भारतीय गाना ‘कोलावरी डी’ ना केवल दक्षिण में बल्कि पूरे भारत में पसंद किया गया। जो बात करूणानिधि और राज ठाकरे को समझ में ना आती हो वो बात हिंदुस्तान की आम जनता ने बखूबी समझ ली है और उसे मूलत: अपना भी लिया है। किसी भी भारतीय को भाषा को लेकर कभी कोई विवाद नहीं था, क्योंकि इनका मूलस्त्रोत एक ही है, यानि की ‘संस्कृत’। ये संस्कृत भाषा की महानता है कि उसने भारत की भूमि पर कई तरह के अतिसुन्दर और निर्मल क्षेत्रीय भाषाओं को जन्म दिया है, जो वर्तमान में हमारे सामने कई भाषाओं के रूप में एक बहुत ही सुन्दर गुलदस्ते के रूप में मौजूद है। भारतीय पोशाकों की भी बात करें तो आज हर तरह की पोशाक देश के हर हिस्से में पहनी जा रही है। इसीलिए आज की आवश्यकता है कि अब भाषा की राजनीति को तिरस्कृत किया जाए और जो हमारी बुनियादी एकता है उसको प्रोहोत्साहित किया जाए। इन्हीं निरर्थक विवादों का ये परिणाम है कि हमारे यहां विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों का राजनीति में आगमन हुआ, जिसका दुष्परिणाम आज भी पूरा देश भुगत रहा है।

जिन्होंने हाल ही लोकसभा में शपथ-ग्रहण समारोह को देखा, उनके लिए कुछ सबक है।  इसमें भाषाई संकीर्णता की राजनीति के आधार और ‘विविधता में एकता’ के व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझने की जरूरत है।  जिस किसी ने भी विभिन्न सदस्यों द्वारा ली जा रही शपथ को ध्यान से सुना, उन्हें हिंदी, बांग्ला, गुरूमुखी, गुजराती, पंजाबी, मलयालम, मैथिली और इन भाषाओं की जननी संस्कृत में कोई मौलिक अंतर नहीं दिखा होगा। वहां कुछ ऐसे सदस्य भी थे जिन्होंने उर्दू को चुना, जिसकी श्रवण और संवेदनशीलता कुछ और नहीं बल्कि हिंदी ही थी। उर्दू भाषा तब गुट और सांप्रदायिक रंग धारण करती है, जब कुछ लोग इसके लिए अरबी लिपि पर जोर देते हैं।

यदि विभिन्न भारतीय भाषाओं के अक्षरों, स्वरों और उनके बोधगम्य गुणों में मौलिक एकता नहीं होती, तो भारत का सॉफ्ट पॉवर एशिया और अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों में अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर पाता। भारतीय संस्कृति की पहुंच और उसका सूक्ष्म प्रभाव सामान्यत: कम करके आंका गया है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मध्य-पूर्व या मोरक्को जैसे अफ्रीकी देशों में भारतीय संगीत और फिल्मों का बोलबाला है। इसके आंतरिक संज्ञानात्मक ढांचे की कुछ बुनियादी समानता के साथ बहुत कुछ करना है, जो कि ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और प्रभावों का एक उत्पाद है। अन्य प्रशंसनीय बाहरी प्रभावों के बावजूद, पूरे भारत के विभिन्न लोकगीत, धार्मिक और शास्त्रीय संगीत यानि सामवेद एक आम मूल जड़ है।

भारत की एक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित एक लेख मुझे याद है, जिसमें लेखक ने अपनी ‘पाक-कला यात्रा’ का वर्णन किया था, जो जम्मू से शुरू होकर केरल में खत्म होती है। उन्होंने वर्णन किया है कि कैसे जम्मू में परोसी गई ‘दाल’ ट्रेन के पंजाब में घुसते ही गाढ़ी हो गई और रास्ते में धीरे-धीरे उसका स्वाद बदलता गया और दक्षिण में पहुंचने तक वह सांभर में बदल गई। फिर भी वह मूल रूप से ‘दाल’ ही थी। उत्तर से दक्षिण भारत की यात्रा करने के दौरान यही स्थिति ‘फुलका’, ‘चपाती’ या ‘रोटी’ की भी थी। हालांकि रोटी की बुनियादी प्रकृति एक ही है। यह एक एकता है, विविधता नहीं।

मणिपुर से लेकर केरल तक और ओडिशा से लेकर गुजरात तक, भारत में महिलाएं साड़ी ही पहनतीं हैं। इनकी लंबाई, शैली और रंग में अंतर हो सकता है, फिर भी वह साड़ी ही है। धोती के मामले में भी यही स्थिति है। इस विषय में भारत अपने अतीत के साथ एक मजबूत कड़ी बरकरार रखता है। ‘जॉन के’ अपनी पुस्तक ‘इंडिया : अ हिस्ट्री’ के पृष्ठ संख्या 276 पर लिखते हैं – ‘‘इब्न बतूता के ‘सबसे बड़ा मध्ययुगीन यात्री’ के टैग का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मार्को पोलो था। 1290 ईस्वी में चीन से भारत के दक्षिणी छोर तमिलनाडु के बंदरगाह पर आकर मार्को पोलो अपने लिए एक कोट बनवाना चाहता था। यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में कोई दर्जी या कपड़ा सिलने वाला नहीं था। वास्तव में यहां के लोग बहुत कम कपड़ों में होते थे, जो सिले हुए नहीं होते थे। एक ही कपड़ा व्यक्ति के शरीर पर होता था। यह परंपरा आज भी साड़ी, शॉल, धोती और लुंगी के रूप में प्रचलित है।’’ यह भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक एकता की गहराई और निरंतरता का सबूत है।

डायना एल. अपनी एक किताब ‘इंडिया : अ सेके्रड जियोग्रॉफी’ में लिखती हैं – ‘‘सदियों से एक पवित्र स्थान के रूप में ख्यात भारत की जमीनी हकीकत समझने के प्रयास में मैंने पूरे भारत के तीर्थस्थानों की हजारों मील यात्रा की। मैंने भारत के पवित्र स्थानों के दोहराव, नदियों का तंत्र, ज्योर्तिलिंगों का सिस्टम और देवियों के स्थानों के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया। सात पवित्र नदियों में से चार नदियों – गंगा, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी के उद्गम स्थलों का दौरा किया। पहाड़ों और समुद्र के बीच संकीर्ण क्षेत्र सहित मैंने पश्चिमी घाट की यात्रा की, जिसे परशुराम क्षेत्र कहा जाता है। कहा जाता है यह भूमि भगवान विष्णु के एक अवतार परशुराम द्वारा समुद्र से ली गई थी। मैंने भारत के अलंकृत और जटिल कहानियों की सचाई जानने के लिए बार-बार खोज की। कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा से लेकर उनके कथित मृत्यु स्थान गुजरात तक मैंने उनके जीवन और विद्या से जुड़े स्थानों की यात्रा की। मैंने उन स्थानों और जंगलों की अनगिनत बार यात्रा की, जिसके बारे में कहा जाता है कि प्राचीन भारत में अज्ञातवास के दौरान महाभारत के नायकों ने अपना समय गुजारा था या रामायण में वर्णित राम, सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान जिन वनों की यात्रा की थी। यह मेरे लिए स्पष्ट होता गया कि भारत में जहां कहीं भी कोई गया वहां सजीव नदियों, पर्वतों, वनों और गांवों का वर्णन अलंकृत देवताओं और नायकों की कहानियों से जुड़ा हुआ है। भारत के अध्ययन से जो साफ हुआ वह यह है कि उसकी भौगोलिक विशेषताएं – नदियां, पर्वतें, चोटियां और तटवर्ती क्षेत्र भी देवताओं और नायकों की कहानियों से परिपूर्ण हैं। यह एक गुंजयमान पवित्र भूगोल है। लेकिन यह एक ऐसी भी भूमि है, जो व्यापक रूप से एक दूसरे से कड़ी के रूप में जुड़ी हुईं हैं।’’

दुनिया के अन्य कोई देश धर्म में डूबकर इतनी भौगोलिक एकता में नहीं जुड़ा है। भारतीय महाकाव्य रामायण में वर्णित भारत का भूगोल उल्लेखनीय रूप से सटीक है। महाकाव्य में वर्णित प्रत्येक घटना भारतीय मानचित्र और स्थानीय नायकों से साथ पूरी तरह से जुड़ी हुई है।  जो तथ्य आगे विश्वसनीय बनाता है, वह है रामायण के रचयिता बाल्मिकी का राम और लक्ष्मण के साथ यात्रा नहीं करना। फिर भी स्थानीय किवदंतियां और घटनाओं से पूरी तरह से आच्छादित है। इसलिए पुरात्व से जुड़ी ये घटनाएं, किवदंतियां, भूगोल और इतिहास अपने आप में अद्वितीय हैं। जब राम के पुत्रों ने राम को रामायण के विषय में सुनाया तब उन्होंने स्वयं इसे मान्य किया था। अपने नाना के साम्राज्य ‘कैकेय’ (अब पाकिस्तान में) से भरत की वापसी के दौरान नदियों के अनुक्रम को पार करने का वर्णन समकालीन भूगोल के सटीक अनुरूप है। 1808 ईस्वी में भारत का इतिहास लिखने के लिए जेम्स मिल्स और चाल्र्स ग्रांट की नियुक्ति कर अंग्रेजों ने भारत के साथ सबसे बड़ा धोखाधड़ी की है। बदले में इन दोनों इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हुए रामायण को बिना देश का भ्रमण किए हुए एक गढ़े गए इतिहास के रूप में लिखा।

भारत की सांस्कृतिक एकता पर सबसे बड़ा शैतानी हमला लॉर्ड मिंटो द्वारा किया गया, जिसने 1906 में आगा खां को मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन का प्रस्ताव लाने के लिए प्रोत्साहित किया। दुर्गादास ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू ऐंड आफ्टर’ के पृष्ठ संख्या 50 पर लिखा है – ‘‘उनको (आगा खां को) भारत में मुसलमानों के नेता का दर्जा प्राप्त था।’’ दुर्गादास इस तरफ इशारा करना नहीं भूले कि स्वतंत्रता के बाद आगा खां 5 करोड़ अपने धर्मावलंबी भाईयों को भारत में छोड़कर खुद पाकिस्तान चले गए। आगा खां की मांगों को तत्परता से स्वीकार करते हुए, अंग्रेजों ने मुसलमानों को ‘विजेता और शासक जाति के वंशज’ कहते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। दुर्गादास याद दिलाते हैं कि ‘भारतीय मुसलमानों का बहुमत हिंदू धर्म से धर्मांतरित है और वे तुर्क, पर्शियन, पठान या मुगलों के वंशज नहीं हैं।’

मिंटो के षड्यंत्र का सबसे अच्छा वर्णन अरूण शौरी ने अपनी किताब ‘मिशनरीज ऑफ इंडिया’ के पृष्ठ संख्या 196 पर किया है। मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन की आगा खां की मांग पर लेडी मिंटो ने अपने आलेख में लिखा था – ‘‘जैसा कि एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, यह एक महत्वपूर्ण घटना का दिन है….. यह भारतीय इतिहास का एक युग है। …. एक बहुत बड़ी घटना आज घटित हुई है। भारतीय इतिहास का यह एक ऐसा कार्य है जो भारत और भारतीय इतिहास को लंबे समय तक प्रभावित करेगा। यह 6 करोड़ 20 लाख लोगों को वापस लाते हुए विद्रोहात्मक विपक्ष में खड़ा करने से कम नहीं है।’’

भारत की सांस्कृतिक एकता पर एक और बड़ा हमला ‘जनगणना’ के जरिए किया गया। अरूण शौरी ने 1903 में ‘सिख रीलिजन ऐंड इट्स एडवांटेजेज टू द स्टेट’ पर एम. मैक्लिफ के लेख को उद्धृत करते हुए लिखा है -’’पूर्व गणनाओं में अज्ञानता के कारण सिखों ने खुद को हिंदू के रूप में दर्ज कराया था, जो वस्तुत: थे भी। समय के साथ हिंदूओं और सिखों के बीच एक तीखी रेखा का सीमांकन कर दिया गया।…’’ वे आगे कहते हैं कि जनसंख्या निर्धारण से अलग, सिखों में अलगाव की भावना को तेज करने के लिए सेना में उनके लिए अलग समारोहों को जानबूझकर पेश किया गया था।

भारत में शायद ही ऐसी कोई जाति होगी जिसने भारत या इसके हिस्से पर शासन नहीं किया हो। लगभग 25 सालों (325 ईसापूर्व से 321 ईसापूर्व तक) तक भारत के सबसे बड़े साम्राज्य के मुखिया के रूप में नंद वंश समाज के सबसे निचले तबके से आता था। कई इतिहासकारों के अनुसार, 132 सालों तक देश पर शासन करने वाला सबसे बड़ा साम्राज्य का मालिक मौर्य वंश का सामाजिक स्तर भी नीचे का ही था। ‘जॉन के’ अपनी पुस्तक ‘इंडिया : अ हिस्ट्री’ के पृष्ठ संख्या 145 पर लिखते हैं कि 400 ईस्वीं में भारत-भ्रमण पर आया बौद्ध तीर्थयात्री फाहियान ने पाया कि सिवाय एक जाति के (शव का अंतिम संस्कार करने वाला) भारत में कोई जाति प्रथा नहीं थी। ‘आबादी का कोई भी हिस्सा वंचित नहीं था। इस चीनी यात्री को कोई जाति भेद और कोई भी दमनकारी जाति-व्यवस्था यहां नहीं दिखी। यहां शांति और व्यस्था प्रबल थी।’ पृष्ठ संख्या 189 पर वे आगे लिखते हैं – ‘‘सिंध की तरह शूद्र या ब्राह्मण मूल का राजा वैसे ही सामान्य थे, जैसे उनके पूर्वज थे या शाही या लड़ाकू क्षत्रिय के रूप में खुद को प्रदर्शित करते थे।’’ वे आगे लिखते हैं – ‘‘जाति व्यवस्था ने अपने पैर तब जमाए जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक बेहतरी से वंचित करने के षड्यंत्र के तहत धार्मिक भेदभाव और दमनकारी ‘कर’ लगाए।’’

महान ऑस्ट्रेलियाई इतिहासकार ए.एल. बसम ने अपनी पुस्तक ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ के पृष्ठ संख्या 9 पर कहते हैं – ‘‘…. प्राचीन विश्व के किसी भी अन्य हिस्से में मनुष्य से मनुष्य का और मनुष्य का राज्य से संबंध इतना उचित और मानवीय नहीं था। अन्य किसी प्राचीन सभ्यता में इतनी कम संख्या में गुलाम नहीं थे और किसी भी प्राचीन कानून में इनके अधिकारों को संरक्षित नहीं किया गया था, जैसा कि अर्थशास्त्र में (पृष्ठ संख्या 152 एफ) उल्लेखित किया है।

महिलाओं की मुक्ति के संदर्भ में कहा जाए तो यह भारत का ही प्रभाव था कि श्रीमावो भंडारनायके के रूप में श्रीलंका ने विश्व को पहली महिला राष्ट्रपति दी। लेकिन इस प्रभाव के बिना इस्लामिक देशों में बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना, खालिदा जिया जैसी महिलाओं का प्रधानमंत्री बनना असोचनीय था। भारत की भाषाई एकता पर सबसे पहले अंग्रेजों द्वारा हमला किया गया और निजी हितों के कारण उसे भारत में पीछे छोड़ गए। कुछ मीडिया फोरम ने प्रधानमंत्री द्वारा हिंदी में कूटनीति के संचालन की वांछनीयता पर बहस करने में जल्दबाजी की। कुछ ऐसे बेशर्म भारतीय लोगों के समूह भी हैं, जो विभिन्न सेमिनारों या व्याख्यानों में गर्व से यह कहने में नहीं चूकते कि ‘हमारी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है’। यह अलग मामला है कि उनकी अंग्रेजी भी उतनी ही बदतर है।

इस लेखक ने उर्दू के प्रसिद्ध कवि ‘फिराक गोरखपुरी’ (अंग्रेजी के प्राध्यापक) की एक बात सुनी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी का पहला प्राध्यापक ब्रिटेन में नहीं भारत में नियुक्त किया गया था। अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए, जब अंग्रेजी को ब्रिटेन में स्थानीय भाषा के रूप में जाना जाता था। यहां तक कि अंग्रेजी के महान कवि मिल्टन (1608-1674) ने कैंब्रिज में लैटिन भाषा का अध्ययन किया था। ब्रिटेन में उन्हीं लोगों को शिक्षित समझा जाता था, जिन्हें लैटिन या ग्रीक भाषा आती थी। इस मानदंड के अनुसार मिल्टन के समय ब्रिटेन में सिर्फ 5 प्रतिशत लोग ही शिक्षित थे।

हाल ही में हुए चुनावों के नतीजे कई मायनों में अद्वितीय हैं। अतीत की जाति और धर्म की राजनीतिक लाईन से अलग यह एक बड़ा बदलाव है। अगर भारतीयों के बीच जन्मजात मनोवैज्ञानिक एकता होती तो यह संभव नहीं हो सकता था, जो राजनीतिक षड्यंत्रकारियों और जोड़-तोड़ के माहिर खिलाडिय़ों का शिकार हो गया था। ये अंग्रेजों से भी बदतर हैं।

इस लेख का उद्देश्य भारत की जबरदस्त धार्मिक (संकीर्ण राजनीतिक संदर्भ में नहीं), भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता को रेखांकित करना है।  वास्तव में, भारत की भौगोलिक स्थिति ने एक महासागर को

अपना नाम दिया है। यह एक ऐसा भूगोल है, जिसमें सांस्कृतिक और राष्ट्रीयता की निरंतरता को संरक्षित रखने वाले भारत का पावन भूगोल शामिल है। बहुत कम देश या राज्य इस तरह की एकता का दावा कर सकते हैं। इसलिए ‘विविधता में एकता’ मात्र एक पाखंड है। जिस व्यक्ति ने इस मुहावरे को गढ़ा है, उसे इतिहास के कुड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए।

 आर.एस.एन. सिंह

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