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भारत में खाद्य सुरक्षा कब?

भारत में खाद्य सुरक्षा कब?

By डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल

वर्तमान में गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लाभार्थी, 7 किलो गेहूं 4.15 रुपये प्रति किलो की दर से या चावल 6.65 रुपये प्रति किलो की दर से ले सकेगा, जबकि गरीबी रेखा के उपर गुजर-बसर करने वाले लाभार्थी को अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधी कीमत पर 3 किलो अनाज प्रतिमाह दिया जाता है।

भारत में खाद्य सुरक्षा एक अहम मुद्दा है। भारत में धर्म सिखाता है कि व्यक्ति के जन्म लेने के पूर्व ईश्वर उसके भोजन का प्रबन्ध कर देता है, जबकि वर्तमान वैश्वीकरण के पंडा कहते हैं कि उदारीकरण के माध्यम से इतना धन उत्पन्न होगा कि इन सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा, पर आजकल समस्या बढ़ती ही जा रही है। कई जिलों में विशेषत: ओडिशा के कोरायत जिले में भूख से मरने की घटनाएं प्रत्येक वर्ष घटती रहती हैं। भारत में सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं – बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान।

जब तक खाद्यान्न का उत्पादन जनसंख्या की वृद्धि के दर से अधिक है तो चिन्ता का विषय नहीं है, यद्यपि असमानता के कारण भूख से मरने की घटनाएं यहां-वहां घट सकती हैं। 1950-51 से 2006-2007 तक भारत में खाद्यान्न औसतन वार्षिक दर से 2.5 प्रतिशत बढ़ा, जबकि भारत की जनसंख्या में औसत वृद्धि 2.1 प्रतिशत की दर से हुई। भारत में 1999-2007 में खाद्यान्न, 1.2 प्रतिशत की दर से कम हुई। फलत: 1990-2006 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खाद्यान्नों का उपयोग 468 ग्राम से 412 ग्राम हो गया तथा दालों का उपयोग 42 ग्राम से घटकर 33 ग्राम हो गया।

विश्व में 717 करोड़ जनसंख्या में प्राय: 85.2 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे हैं, जिसमें भारत की 126 करोड़ जनसंख्या में लगभग 40 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे हैं, इसलिए उनके लिए खाद्य सुरक्षा आवश्यक है। ये वे लोग हैं जिनकी 20 रुपये प्रतिदिन आमदनी भी नहीं है, अन्तर्राष्ट्रीय मानक एक डॉलर प्रतिदिन से तो वे काफी दूर हैं। रुपये या डॉलर तो उपर-नीचे बाजार में होता रहता है पर अर्थशास्त्रियों के अनुसार कम से कम भारत में एक कृषक को प्रत्येक दिन 2250 कैलोरी उर्जा प्राप्त होनी चाहिए, जोकि 518 ग्राम खाद्यान्न से आ सकती है। स्वास्थ्य मानकों के अनुसार उसे 2825 कैलोरी प्राप्त होनी चाहिए, जबकि भारत में औसत रुप से प्रति व्यक्ति 2104 (1988) कैलोरी उपलब्ध है।

इस प्रकार भारत की 120 करोड़ की जनसंख्या के लिए भारत को 22.7 करोड़ टन खाद्यान्न की आवश्यकता है, जबकि सन् 2040 तक भारत की 200 करोड़ जनसंख्या के लिए 30 करोड़ टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी।

वर्तमान स्थिति
अपनी कम से कम उदर पूर्ति के लिए व्यक्ति को न्यूनतम रुप से दो चीजें उपलब्ध होनी चाहिए।

  • संतोषजनक पौष्टिक आहार, सामान्य स्तर का कपड़ा, एक उचित ढंग का मकान और अन्य कुछ सामाग्रियां जो किसी भी परिवार के लिए आवश्यक है।
  • व्यक्ति की दूसरी आवश्यकता न्यूनतम शिक्षा प्राप्त करने की है, जिससे वह अपनी दैनिक गतिविधियां चला सके तथा शोषित न हो। इसके साथ-साथ उसे स्वास्थ्य सुविधाएं मिलनी चाहिए, पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध हो तथा साफ-सुथरा पर्यावरण प्राप्त हो। भारत का योजना आयोग उपरोक्त दो आवश्यकताओं को मूलभूत आवश्यकताएं मानता है। इनके अभाव में व्यक्ति का जीवित रहना कठिन है और यह सरकारों का दायित्व है कि वह इन बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करे। वे व्यक्ति जो अपनी मूलभूत आवश्यकता अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था नहीं कर सके, वे गरीबी रेखा के नीचे हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकारों ने भुखमरी को दूर करने के लिए प्रयास नहीं किये, पर यह यथार्थ है कि सरकारी प्रयास अभी तक अपना अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।

विभिन्न सरकारों ने जैसे बिहार तथा उत्तर प्रदेश ने गरीबों को निम्न प्रकार के राशन कार्ड दिये हैं जिनके द्वारा गरीबों को भूख से लडऩे में बहुत सहायता मिल जाती है।

  • पीला राशन कार्ड (अंत्योदय) – गरीबी रेखा (बी.पी.एल.) से नीचे वाले लोगों को।
  • लाल राशन कार्ड – गरीबी रेखा (बी.पी.एल.) से नीचे वालों को।
  • हरा राशन कार्ड – गरीबी रेखा से उपर (ए.पी.एल.)वालों को।
  • उजला कार्ड (अन्नपूर्णा) – मुफ्त अनाज।

प्राय: प्रथम तीन कार्ड ही राज्यों में प्रचलित हैं।
वर्तमान में गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लाभार्थी, 7 किलो गेहूं 4.15 रुपये प्रति किलो की दर से या चावल 6.65 रुपये प्रति किलो की दर से ले सकेगा, जबकि गरीबी रेखा के उपर गुजर-बसर करने वाले लाभार्थी को अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधी कीमत पर 3 किलो अनाज प्रतिमाह दिया जाता है। अंत्योदय अन्न योजना कार्डधारकों को महीने में 35 किलो अनाज 3 रुपये किलो चावल, 2 रुपये किलो गेहूं और एक रुपया किलो की दर से ज्वार (मोटा अनाज) मिलेगा। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2013 पास होने के पश्चात् लाभार्थी को पांच किलो चावल, गेहूं और मोटा अनाज क्रमश: 3, 2 और 1 रुपये प्रति किलो की दर से मिलेगा।

  • गर्भावस्था के दौरान और शिशु-जन्म के पश्चात् छ: माह तक मुफ्त भोजन दिया जायेगा। गर्भवती और धाय मां को न्यूनतम 6000 रुपये का मातृत्व भत्ता मिलेगा। 6 महीने से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए नि:शुल्क भोजन का प्रावधान है जो स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों पर उपलब्ध है। 6 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए नि:शुल्क मध्याह्न भोजन तथा कुषोषण के शिकार बच्चों के लिए नि:शुल्क भोजन उपलब्ध है।

मनरेगा योजना के अन्र्तगत गांवों में बेरोजगारों को कम से कम 50 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी पर कार्य दिया जायेगा।

14-02-2015

वर्तमान व्यवस्था में कमियां:
(क) सार्वजनिक वितरण-प्रणाली (पी.डी.एस.) के अन्तर्गत ही सरकारों द्वारा अनाज वितरण किया जाता है, पर इस प्रणाली में भ्रष्टाचार घुन की भांति लग गया है, फिर भी इस प्रणाली का कोई विकल्प नहीं है। एक मात्र विकल्प है, इस प्रणाली से संबन्धित अधिकारियों के मध्य व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन करना, जिससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्वंयमेव उन्नत हो जायेगी। यदि गरीबों को बैकों में धनराशि जमा की गई, तो वे फिर गांवों के बिचौलियों, दलालों एवं भ्रष्ट व्यक्तियों के दलदल में फंस जायेंगे, क्योंकि वे बाजार के हवाले हो जायेंगें अर्थात् बीमारी का गलत इलाज बीमारी को और गंभीर बना देगा।

(ख) खाद्यान्न वितरण में कमी होने से अनाज का आयात होता है। इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तम कार्य किया है, जिसमें अनाज का ज्यादा से ज्यादा संग्रहण स्थानीय स्तर पर किया जाता है। इससे कई लाभ हैं। प्रथम तो खेती को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा मिलता है। ज्यादा दूरी से अनाज मंगाने से उसकी बर्बादी के साथ ही उस पर ढुलाई खर्च भी अधिक होता है।

(ग) भूख का संबंध आजीविका के साधन न होने से है। इसलिए भूख की समस्या का निदान बेरोजगारों को उनकी क्षमता के हिसाब से नौकरी के अवसर उपलब्ध कराने से हो सकता है।

(घ) खाद्यान्न के भण्डारण में काफी खामियां हैं जिससे देश में काफी अनाज प्रति वर्ष सड़ कर नष्ट हो जाता है। ठीक से भंडारण नहीं होने से अनाज बारिश में भींग जाता है या संबद्ध अधिकारियों द्वारा उचित कदम न उठाने से कीड़े आदि लगने से संग्रहीत अनाज की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है।

खाद्य-सुरक्षा संबंधी रणनीति
लोकसभा ने 26 अगस्त, 2013 को खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित करके देश से भूख की समस्या को मिटाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह कानून देश की दो-तिहाई जनसंख्या को अनाज उपलब्ध करायेगा। अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत देश की 67 प्रतिशत जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जायेगी। यदि सरकार लाभार्थियों को अनाज उपलब्ध कराने में विफल रहेगी, तो उन्हें खाद्य सुरक्षा देगी।

इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान हैं –

    • लक्षित 75 प्रतिशत ग्रामीण एवं 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से कम कीमत पर अनाज लेने का वैधानिक अधिकार।
    • लाभार्थी को यह अधिकार होगा कि वह पांच किलो चावल, गेहूं या मोटा अनाज क्रमश: 3,2 और 1 रुपये की दर से प्राप्त कर सके।
    • अन्त्योदय योजना के प्राय: 2.42 करोड़ लाभार्थी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से 35 किलो अनाज प्रतिमाह प्रति परिवार प्राप्त करते रहेंगे।
    • लाभार्थियों की पहचान का काम राज्यों, केन्द्रशासित प्रदेशों द्वारा किया जायेगा जिसके मापदंड केन्द्र सरकार एक सरकारी आदेश के माध्यम से जारी करेगी। राज्य, केन्द्रशासित सरकार यदि वह इसके अनुदान के मद में आने वाले अतिरिक्त खर्च का वहन कर सकती है तो राज्य सरकारें इसके लिए स्वतंत्र होंगी। वे यदि चाहे तो इसके दायरे को इस आधार पर बढ़ा सकती हैं।
    • फिलहाल अनाज का जो आवंटन सुरक्षित किया जायेगा, उसके लिए केन्द्र सरकार राशन की दुकानों तक अनाज की ढुलाई के मद में होने वाले खर्च को लाभार्थियों पर लादने की अपेक्षा साझा करेगी।
    • यह अधिनियम चरणों में तभी लागू किया जायेगा जब राज्य उसे लागू करने के लिए तैयार हो जाए, क्योंकि यह राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों का संयुक्त प्रयास है। लाभार्थियों का वर्गीकरण प्राथिमकता वाले और सामान्य के रुप में किया गया है और वे एकमात्र समावेशी वर्ग का स्थान लेंगे।
    • इस विधेयक के तहत देश की 67 प्रतिशत जनता को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जायेगी जो भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए एक अनोखा कदम है। इस विधेयक के अमल में आ जाने से अनाज की मांग 6.12 करोड़ टन हो जायेगी, जिस पर वार्षिक खर्च लगभग 1,29,747 करोड़ रुपये आयेगा। इससे देश के भुगतान खाते का घाटा और बढ़ जायेगा।
    • इस अधिनियम के लागू होने के साथ धन की व्यवस्था नहीं की गई है। अधिकांश राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल है। अत: इसमें शक है कि राज्य तथा केन्द्र सरकार के मिले-जुले सहयोग से चलने वाली यह योजना पूरे वर्ष चल सकेगी।

14-02-2015

सुझाव-

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने तथा शिकायत निवारण के लिए प्रत्येक जिले में एक तंत्र स्थापित होगा। इसमें एक कॉल सेंटर तथा हेल्पलाइन होगी। साथ ही सोशल ऑडिट तथा सतर्कता समितियां बनाने का प्रावधान भी इसमें है।  यदि कोई अधिकारी कानून के प्रावधानों का पालन नहीं करता तो उसे सजा मिले तथा वे नौकरी से तुरन्त हटाये जायें।  राशन विक्रेताओं के विरुद्ध भी आवश्यक वस्तु अधिनियम (ई.सी. ऐक्ट) के अन्तर्गत कड़ी कार्यवाही हो।  कम्यूटरीकरण के माध्यम से गलत तरीके से राशन कार्ड बनाने तथा अनाज को उचित मूल्य की दुकानों तक पहुंचाने तक दृष्टि रखी जाये, जो छत्तीसगढ़ राज्य ने किया है। यह आश्चर्यजनक है कि खाद्यान्न का इतना स्थानान्तरण क्यों होता है।
  • खाद्यान्न के भंडारण की सुविधा को बेहतर बनाने के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारें वैज्ञानिक ढंग से भंडारण की सुविधाओं के निर्माण के लिए काम करेगी। वर्तमान प्रबंधन पद्धति का उपयोग करके अनाज के अनावश्यक रुप से स्थानान्तरण पर व्यय को बचाया जा सकेगा। खाद्य सुरक्षा व्यवस्था से ठेकेदारी, बिचौलियों तथा दलालों को दूर रखना होगा, अन्यथा सामाग्री को लक्षित लोगों तक पहुंचाना कठिन होगा तथा गुणवत्ता में उन्नति करना मुश्किल होगा, क्योंकि अक्षमता को जारी रखने में ही उनके निहित स्वार्थ की सिद्धि होती है।
  • सरकारों को अपने व्यर्थ खर्चों में कटौती करनी होगी, जैसे कि मंगलसूत्रों तथा टेलीविजन-लैपटॉप का वितरण, वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थयात्रा भ्रमण इत्यादि, ताकि गरीबी रेखा से नीचे के व्यक्तियों के लिए धनराशि आसानी से उपलब्ध हो सके। जिस क्षेत्र में भ्रष्टाचार पकड़ा जाए, उस ग्राम पंचायत या क्षेत्र पंचायत को काली सूची में डालकर उनको इस योजना से कुछ समय के लिए वंचित रखना चाहिए, ताकि पंचायत प्रतिनिधियों पर स्थानीय दवाब बने और उन्हें जनता पंचायत निर्वाचन में उचित दंड दे सके।
  • विश्व में 85.2 करोड़ लोग जो भुखमरी या कुपोषण से ग्रस्त हैं उनमें 50 प्रतिशत छोटे कृषक, 20 प्रतिशत भूमिहीन, 10 प्रतिशत घुमांतू लोग तथा 10 प्रतिशत छोटे-छोटे मत्स्य जीवी हैं। केवल 10 प्रतिशत ही शहरी क्षेत्र में गरीबी रेखा से नीचे हैं, जिनमें केवल 5 प्रतिशत भुखमरी से ग्रस्त हैं। अत: भारत में भी छोटे, सीमांत कृषकों तथा भूमिहीनों की समस्या पर नये सिरे से दृष्टिपात करना अत्यावश्यक है।  यदि उनकी उपज को ठीक बाजार मूल्य मिले तथा भूमिहीनों को सरकार की ओर से कृषियोग्य जमीनें प्राप्त हों तो समस्या का स्थायी हल हो सकता है। यहां तक कि सरकार खाद्य-सुरक्षा के मद से कुछ धनराशि के आवंटन का भूमिहीनों के लिए जमीनें खरीदने तथा वितरण करने में करें तो भूमिहीनों में भुखमरी की समस्या का हल एक सीमा तक हो सकता है। सीमांत तथा छोटे कृषकों को भी और जमीनें खरीदकर दी जा सकती हैं। आवश्यकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनतकश लोगों को सरकार पर परावलंबी न बनाकर उनको परिश्रम करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया जाये, ताकि वे शस्य श्यामलता धरती से उत्पादन बढ़ाकर संपूर्ण समाज में समृद्धि के प्रभात का आह्वान कर सकें।

सारांश
आशा है कि लोकप्रिय सरकारें खाद्य-सुरक्षा अधिनियम 2013 का सावधानी से कार्यान्वयन करेगी, अन्यथा मनरेगा योजना की भांति यह भी भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ जायेगा। यदि सरकारें अनुत्पादक खर्चे में कटौती कर सके तथा धन-राशि की व्यवस्था कर सके तो 67 प्रतिशत जनसंख्या को सस्ते में खाद्यान्न उपलब्ध कराना स्वागत योग्य ही है, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था में उछाल ही आयेगा पर यह कार्य विदेशों से ऋण लेकर न हो। साथ ही साथ इस अधिनियम के कार्यान्वयन में उचित विभागीय कार्यवाही तथा त्वरित दंड की व्यवस्था हो।

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