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राष्ट्रभाषा पर क्षेत्रवाद भारी?

हिन्दी दलगत और क्षेत्रवाद की राजनीति का लगातार शिकार होती रही है। अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दी अब तक भारत की एकमात्र अधिकारिक भाषा का सम्मान प्राप्त कर चुकी होती। सरकारी कार्यालयों, न्यायालयों आदि में गर्व से हिन्दी का प्रयोग किया जाता। भारतीय भाषाओं में से हिन्दी के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसी भाषा नहीं है जिसे पूरे देश में समझा जाता हो।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद अनेक ऐसे कदम उठाए हैं, जो शासन में ताजगी का आभास देते हैं। उन्हीं में एक खास कदम देशवासियों को भारतीय होने के गौरव का अहसास कराता है। देश तो 67 साल पहले ही आजाद हो गया था, लेकिन अंग्रेजी भाषा की गुलामी सरकारी दफ्तरों से आज तक गई नहीं। लेकिन मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित विदेशी मेहमानों से दुभाषिए के जरिए हिन्दी में बात कर भारतवासियों को सम्मानित होने का अहसास कराया। दक्षेस देशों के नेताओं से मोदी ने हिन्दी में वार्तालाप किया। इन नेताओं में अनेक तो ऐसे थे जो हिन्दी बोलते और समझते थे, लेकिन कई नेता ऐसे भी थे जिन्हें हिन्दी समझ नहीं आती है। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने सभी नेताओं से हिन्दी में बात की। जिन नेताओं को हिन्दी नहीं आती थी, उनके लिए बातचीत के दौरान दुभाषिए मौजूद थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई आदि नेता हिन्दी समझते हैं, और बोलते भी हैं। इसलिए उनके साथ तो दिक्कत की कोई बात नहीं थी, लेकिन मोदी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति महेन्द्र राजपक्षे से भी हिन्दी में बात की, जो हिन्दी बिल्कुल नहीं समझते। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान मोदी थिम्पू में भी हिन्दी में ही बोले।

यह केवल एक बार के लिए नहीं था। मोदी का एक कदम और आगे बढ़ कर यह संकल्प लेना कि वह भविष्य में भी विदेशी मेहमानों से हिन्दी में ही बातचीत किया करेंगे, देशवासियों की भावना को गौरव देने जैसा ही है। ऐसा नहीं कि मोदी की मातृभाषा हिन्दी हो, इसीलिए वह हिन्दी के साथ अपना मातृभाषा प्रेम दिखा रहे हों। मोदी की मातृभाषा हिन्दी नहीं, बल्कि गुजराती है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री होने के नाते देश की अस्मिता को ध्यान में रखते हुए उनका ऐसा करना देश को विश्व में सम्मानजनक स्थान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मोदी के ये कदम एक स्वतन्त्र और सम्प्रभु राष्ट्र के प्रधानमंत्री सरीखे हैं। मोदी के ये कदम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में दिए भाषण की याद दिलाते हंै। उन दिनों जनता पार्टी की सरकार थी और वाजपेयी उस सरकार में विदेश मंत्री थे। वाजपेयी के हिन्दी में दिए भाषणों का देश मुरीद है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में दिया गया वह भाषण किसी सरकारी अधिकारी द्वारा उनके लिए अंग्रेजी में तैयार भाषण का हिन्दी में अनुवाद था। फिर भी देश ने खुद को गौरवान्वित महसूस किया। इसी प्रकार चन्द्रशेखर ने प्रधानमंत्री रहते हुए मालदीव में हुए दक्षेस सम्मेलन में हिन्दी में भाषण दिया था।

चीन और जापान के नेता करते हैं अपनी भाषा में बात

किसी भी देश की संस्कृति और भाषा उसके आत्मसम्मान का ही नहीं बल्कि राष्ट्र की प्रगति की उचित दिशा का पथ भी है। विदेशी भाषा में बात कर कैसे आत्मगौरव प्राप्त किया जा सकता है? चीन और जापान का उदाहरण भारत के सामने हैं जहां के नेता अपने देश की भाषा में बात करना अपना गौरव मानते हैं। मोदी चीन की कार्यप्रणाली के प्रशंसक माने जाते हैं। वैसे तो मोदी का हिन्दी प्रेम जगजाहिर है, लेकिन हो सकता है कि विदेशी मेहमानों से भी हिन्दी में बात करने की प्रेरणा मोदी ने संभवत: चीन के नेताओं से ली हो। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की हिन्दी और अंग्रेजी में पकड़ बहुत मजबूत है। उन्हें दोनों ही भाषाओं में लगातार सुना जा सकता है। वह एक भाषा में बोल कर दुभाषिए की तरह हू-बहू दूसरी भाषा में उसका अनुवाद करने में देर नहीं लगातीं। मीडिया से बातचीत के दौरान इसका आनन्द लिया जा सकता है। लेकिन सुषमा स्वराज का हिन्दी प्रेम भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भारत की विदेश नीति में हिन्दी को सम्मानजनक स्थान मिलने की संभावना बहुत प्रबल मानी जा रही है, जबकि प्रधानमंत्री खुद इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहे हों।

हिन्दी होती रही है राजनीति की शिकार

मोदी द्वारा हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाने के प्रयास में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के मंत्रालय की ओर से योगदान देने का प्रयास हुआ है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने एक आदेश जारी कर सभी मंत्रालयों के अधिकारियों को फेसबुक, ट्वीटर, गूगल आदि सोशल साईटों पर हिन्दी में टिप्पणी लिखने के निर्देश दिए हैं। हालांकि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के ये निर्देश नए नहीं थे, बल्कि एक प्रकार ‘स्मरण निर्देश’ थे। इसमें यूपीए सरकार द्वारा इस संबंध में पहले से ही जारी निर्देशों की अनुपालन करने की ही याद दिलाई गई थी। इसमें कहा गया था कि सभी अधिकारी सोशल साइटों पर हिन्दी में टिप्पणी दें, लेकिन यदि वे अंग्रेजी में टिप्पणी देते हैं, तो हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में टिप्पणी दें। उसके बाद तो गैर-हिन्दी भाषी राज्यों, खासतौर पर तमिलनाडु ने सियासी तूफान खड़ा कर केन्द्र सरकार को कदम पीछे करने पर मजबूर कर दिया था। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर केन्द्र सरकार के इस निर्देश पर उसे पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि मोदी सरकार की ओर से अनेक वरिष्ठ मंत्रियों ने स्पष्टीकरण दिया कि हिन्दी को जबर्दस्ती किसी पर थोपा नहीं जा रहा है और सरकार की नीति के तहत क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व देते हुए उन्हें भी लोकप्रिय बनाया जा रहा है, लेकिन जयललिता ने इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए केन्द्र सरकार को लिखा कि यह मुद्दा पहले भी कई बार तमिलनाडु के लोगों की नाराजगी का कारण बना है।

अधिकारिक भाषा कानून और हिन्दी विरोधी आन्दोलन

हिन्दी लगातार दलगत और क्षेत्रवाद की राजनीति का शिकार होती रही है। अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दी अब तक भारत की एकमात्र अधिकारिक भाषा का सम्मान प्राप्त कर चुकी होती, सरकारी कार्यालयों-न्यायालयों आदि में गर्व से हिन्दी का प्रयोग किया जाता। भारतीय भाषाओं में हिन्दी के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसी भाषा नहीं है जिसे पूरे देश में समझा जाता हो और जो देश के लगभग पूरे भाग में एक सशक्त सम्पर्क भाषा के रूप में काम करती हो। लेकिन गैर-हिन्दी राज्यों के क्षेत्रीय दलों ने उसे दलगत राजनीति का शिकार बना दिया और एक विदेशी भाषा होने के बावजूद अंग्रेजी आज भी देश पर राज कर रही है। आजाद होने के बाद भारत में राज्यों का बंटवारा स्थानीय भाषा के आधार पर किया गया। उसी आधार पर ओडिशा में उडिय़ा, पंजाब में पंजाबी, हरियाणा में हरियाणवी, आंध्र प्रदेश में तेलुगू, तमिलनाडु में तमिल उन राज्यों की भाषाएं हैं। फि र भी पूरे देश को एक ऐसी अधिकारिक भाषा की आवश्यकता थी, जो पूरे देश को एक साथ बांध कर रख सके। इस संबंध में हिन्दी से बेहतर कोई अन्य भाषा नहीं हो सकती थी। लेकिन दलगत क्षेत्रवादी राजनीति को विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व तो स्वीकार था, लेकिन देेश की अपनी भाषा स्वीकार नहीं था। इसी क्रम में हिन्दी लगातार क्षेत्रवाद की दलगत राजनीति की शिकार होती गई।

दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध कोई नई बात नहीं है। हिन्दी को लेकर आजादी से पूर्व भी वहां हिन्दी विरोधी आन्दोलन हुए हैं। उस वक्त यह राज्य मद्रास प्रेजिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था और उसे मद्रास स्टेट कहा जाता था। राज्य में हुए हिन्दी विरोधी आन्दोलनों में छात्र और राजनीतिक आन्दोलन हुए हैं। ये आन्दोलन भारतीय गणराज्य, विशेष तौर पर तमिलनाडु में हिन्दी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिए जाने को लेकर हुए। ऐसा ही पहला हिन्दी विरोधी आन्दोलन 1937 में हुआ था, जब मद्रास प्रेजिडेंसी के स्कूलों में सी. गोपालाचारी (राजाजी) के नेतृत्व में चल रही प्रथम इंडियन नेशनल कांग्रेस सरकार ने हिन्दी को आवश्यक विषय के रूप में पढ़ाने की कोशिश की। इस कदम का विरोध ई.वी. रामासामी (पेरियार) और जस्टिस पार्टी ने, जो बाद में द्रविड़ कषगम बन गई, विरोध किया। यह आन्दोलन तीन साल चला था और आन्दोलनकारियों ने कई प्रकार से अपना विरोध प्रकट किया। सरकार ने इस आन्दोलन को कुचलने की पूरी कोशिश की जिसमें दो लोग मारे भी गए थे। 1939 में कांग्रेस सरकार के त्यागपत्र देने के बाद मद्रास के ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड एरिस्किन ने फरवरी 1940 में आवश्यक रूप से हिन्दी पढ़ाने के कदम को वापस ले लिया।

आजादी के बाद

देश के आजाद होने के बाद भी देश के लिए संविधान बनाने के दौरान भारतीय गणराज्य की अधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार किए जाने को लेकर काफी बहस चली। आजादी के बाद देश को एक ऐसी अधिकारिक भाषा की आवश्यकता थी जो देशवासियों को गुलामी के हर अहसास से मुक्त करा सके। संविधान निर्माताओं के दिलोदिमाग में इस संबंध में हिन्दी के अतिरिक्त कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं थी। गहन विचार विमर्श और गहराई से चर्चा करने के बाद संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को भारत की अधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया और यह फैसला किया गया कि हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी को भी अगले पन्द्रह सालों के लिए अधिकारिक भाषा के तौर पर प्रयोग किया जाए, जब तक कि हिन्दी उसका स्थान लेने के लिए तैयार न हो जाए। इस फैसले के अनुसार पन्द्रह साल बाद केवल हिन्दी को ही देश की अधिकारिक भाषा रखा जाना था।

26 जनवरी 1950 को नया संविधान देश में लागू हो गया और हिन्दी के साथ 15 साल तक अंग्रेजी को भी देश की अधिकारिक भाषा के रूप में देश में मौजूद रखने का फैसला अमल में लाया गया। लेकिन संविधान लागू होने के 15 साल बाद 1965 में भारत सरकार ने हिन्दी को एकमात्र अधिकारिक भाषा बनाने की कोशिश शुरू की तो कई क्षेत्रवाद की राजनीति से सराबोर गैर-हिन्दी राज्यों में इसका विरोध शुरू हो गया। दक्षिण भारत के ये राज्य देश में अंग्रेजी का अस्तित्व बनाए रखना चाहते थे। द्रविड़ कषगम से निकली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने हिन्दी विरोध का नेतृत्व किया। हिन्दी का विरोध करने वालों की शंकाओं का निपटारा करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 1963 में आधिकारिक भाषाओं का कानून ले आए और उन्होंने सुनिश्चित किया कि 1965 के बाद भी अंग्रेजी का अस्तित्व बना रहे। लेकिन उस कानून के मसौदे से डीएमके संतुष्ट नहीं हुआ। डीएमके ने शंका जाहिर की कि भविष्य की सरकारें संभवत: नेहरू के आश्वासनों का सम्मान न करें।

26 जनवरी 1965 को हिन्दी को एकमात्र अधिकारिक भाषा के रूप में शोभित होना था। यह दिन जैसे-जैसे निकट आने लगा, दक्षिण भारत के राज्यों, विशेष तौर पर तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास स्टेट) में हिन्दी-विरोधी आन्दोलन तेज होने लगा। मद्रास स्टेट में यह आन्दोलन चरम पर था। वहां कॉलेज के छात्र इस आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे। 25 जनवरी 1965 को मदुरै के दक्षिण भाग में आन्दोलनकारी छात्रों और कांग्रेस पार्टी के सदस्यों में परस्पर बहस ने भारी दंगे का रूप ले लिया। बाद में वह दंगा पूरे मद्रास स्टेट में फैल गया। दंगा दो महीने चला और इस दौरान दंगाईयों ने खूब लूट-मार की और अंतत: पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं। मद्रास स्टेट की कांग्रेस सरकार को अद्र्धसैनिक बल बुलाने पड़े। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस घटना में दो पुलिसकर्मी सहित 70 लोग मारे गए।

शास्त्रीजी का आश्वासन

स्थिति को शान्त करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को घोषणा करनी पड़ी कि जब तक गैर-हिन्दी भाषी राज्य चाहेंगे तब तक देश में अंग्रेजी अधिकारिक भाषा के रूप में रहेगी। शास्त्री जी के आश्वासन के बाद दंगा शान्त हो गया और छात्र आन्दोलन भी समाप्त हो गया। लेकिन उस आन्दोलन से राज्य में बड़े राजनैतिक बदलाव हुए। डीएमके 1967 का विधानसभा

चुनाव जीत गई और उसके बाद से कांग्रेस कभी भी राज्य में वापस सत्ता में नहीं आई। अधिकारिक भाषा कानून में 1967 में संशोधन भी किया गया। तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने आधिकारिक भाषा कानून में संशोधन कर हिन्दी और अंग्रेजी को हमेशा के लिए आधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया।

इस प्रकार हिन्दी को भारत की आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए कितनी मशक्कत झेलनी पड़ी, लेकिन फि र भी देश में विदेशी भाषा अंग्रेजी का जो वर्चस्व है, वह आज भी हिन्दी को प्राप्त नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देश की सत्ता हाथ में लेने के तुरन्त बाद विदेशी मेहमानों से हिन्दी में विचार विमर्श करना और यह फैसला लेना कि वह भविष्य में भी विदेशी नेताओं से हिन्दी में ही बात करेंगे, भारतवासियों के लिए कितने गौरव की बात है, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

गहराई से समझा जाए तो पता लगेगा कि हिन्दी विरोध वास्तविकता से अधिक सियासी है। डीएमके ने कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बेदखल करने के लिए हिन्दी विरोध को अस्त्र बना कर इस्तेमाल किया। वहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने मोदी सरकार के हिन्दी की ओर बढ़ते कदम देख कर केन्द्र सरकार को चेतावनी देने में देर नहीं की। डीएमके तो पहले से ही हिन्दी विरोध को राजनीतिक हथियार बनाती रही है।


हिंदी से ऐसा भी क्या वैर?


केन्द्र शासन ने उतना ही कहा, जितनी संविधान की मंशा है। यह मानते हुए कि भारत के संविधान में मान्य सभी भाषाएं राष्ट्रभाषाएं हैं और हिंदी राजभाषा, राजभाषा में सचमुच कामकाज करने की तरफ ध्यान दिया गया। वरना अब तक होता यह है कि विज्ञापन और प्रचार से लेकर संवाद माध्यमों को प्रेषित की जाने वाली विज्ञप्तियां तक अंग्रेजी में तैयार होती हैं। उनका अनुवाद राजभाषा में किया जाता है। मैंने अनेक वर्षों तक संसद के कामकाज की रिपोर्टिंग की है। यह जानकर विस्मय नहीं हुआ कि कोई भी विधेयक का मूल हिंदी में तैयार नहीं होता। विधि विभाग के प्रारूप का अनुवाद अंग्रेजी से हिंदी में किया जाता है। राज्यों से सामान्य सी बातों के लिए पत्र-व्यवहार अंग्रेजी में होता है। जबकि तय हो चुका है कि जिन राज्यों की हिंदी मातृभाषा है उनसे हिंदी में पत्र-व्यवहार हो, जिन राज्यों में हिंदी समझी जाती है, जैसे पंजाब, गुजरात, महाराष्टï्र वहां हिंदी के साथ अंग्रेजी में पत्राचार हो। लालबहादुर शास्त्री के कार्यकाल में हिंदी विरोधी अंादोलन के कारण तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से अंग्रेजी में पत्राचार किया जाने लगा। राजभाषा के प्रचार एवं राजभाषा में कामकाज को बढ़ावा देना केन्द्रीय गृह मंत्रालय के दायित्व का भाग है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कर्तव्य है कि वे जनता की भाषा में काम कराएं ताकि आम लोग समझ सकें कि उनके बारे में किया क्या जा रहा है? आज बैंक की पर्ची पर हिंदी लिखी रहती है लेकिन लिखना अंग्रेजी में पड़ता है।

भाषा को लेकर कुछ राजनीतिक दलों और कुछ राज्यों की विशेष भूमिका है। हिंदी को राजभाषा बनाने का दबाव संविधान समिति में उन लोगों ने बनाया था जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर गांधीभक्त आचार्य दादा धर्माधिकारी इनमें शामिल थे। अब ऐसा क्या हुआ कि तमिलनाडु सहित कुछ राज्य हिंदी विरोधी हो गए थे? 1965 में हिंदी विरोध को हवा देने के पीछे राजनीति थी। कांग्रेस नेता के. कामराज नाडर की पिछड़े वर्ग पर पैठ थी। पिछड़े वर्ग के दूसरे नेताओं ने द्रविड़ अस्मिता के सहारे भाषा को हथियार बनाया। कांग्रेस झुकी और ऐसी झुकी कि आज तमिलनाडु में राजनीतिक रूप से अस्तित्व खो बैठी है। मुख्य दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम है या अण्णा द्रविड़ मुनेत्र कषगम। हिंदी विरोध में दोनों एक हैं। कथनी और करनी का अंतर यह है कि जयललिता हिंदी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। आसानी से बोलती भी हैं। करुणानिधि ने विधानसभा भवन बनवाया और हिंदी फिल्म संगीत बजाया। दरअसल ये नेता इस बात से चिंतित हैं कि भाषा का मुद्दा समाप्त होने पर द्रविड़ अस्मिता का दूसरा कोई आधार नहीं बचता, क्योंकि मंडल आयोग के बाद तमिल पिछड़ों के एकमात्र नुमाइंदे नहीं रह गए। अलग राष्ट्र का नारा चलेगा नहीं। हिंदी विरोधी आंदोलन के बाद पैदा हुए लोग 50 की आयु छू रहे हैं। वे जानते हैं कि उनके बच्चे नई प्रौद्योगिकी और देश भर में प्रचलित भाषा के भरोसे ही भविष्य संवार सकते हैं। पिछली सरकार में राज्यमंत्री रहे राज्यसभा सदस्य सुदर्शन नचियप्पन ने संसद में मांग की थी कि रात्रि का आकाशवाणी का मुख्य हिंदी समाचार बुलेटिन तमिलनाडु में प्रसारित हो। आंदोलन के बाद से यह बंद था। श्री नचियप्पन का कहना है कि देश और खाड़ी देशों में तमिल बच्चे नौकरी पाने में मार खाते हैं क्योंकि हिंदी बोल-समझ नहीं पाते। इस मामले में मलयाली बहुत आगे हैं।

दलील दी जाती है कि हिंदी में सरकारी पत्राचार के कारण हिंदी न जानने वाले राज्यों के कर्मचारी पिछड़ जाएंगे। इस थोथे तर्क की असलियत परखें। भारतीय प्रशासनिक सेवा में हर व्यक्ति को संबंधित राज्य की भाषा बोलना, लिखना आना अनिवार्य है। केन्द्रीय महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक के रूप में संचार घोटाले का भांडा फोडऩे वाले श्री राय केरल संवर्ग से थे। धाराप्रवाह मलयालम बोलते हैं। अखिल भारतीय सेवाओं में भाषा काम न करने का बहाना हो सकता है, कारण नहीं। दूसर, नई तकनीकी से ऐसे उपकरण उपलब्ध हैं जो भाषांतर करें तथा मजमून का अनुवाद उपलब्ध कराएं। राज्य स्तर के कर्मचारी वर्ग को कामकाज राज्य की भाषा में करना है। केन्द्र से आए निर्देशों को अपनी भाषा में जारी कर काम कराना है। यह अवश्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं में संख्या घटने की आशंका के कारण राजनीतिक हेतु से अंग्रेजी को बनाए रखने का हिमायती वर्ग मुखर है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक आसानी से हिंदी तथा भारतीय भाषाओं को स्वीकार करती हैं। अधिकार को मुठ्ठी भर लोगों की पकड़ में बनाए रखने के लिए हिंदी विरोध वस्तुत: भारतीय जनभाषाओं का विरोध है। राज्यों से पत्राचार में भारतीय भाषाओं के अनेक शब्द अपने आप प्रशासन में प्रचलित होंगे। इस दिशा में हिंदी बहुल राज्यों को दिल बड़ा करना होगा। हिंदी विरोधी आंदोलन के उत्तर में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अन्य राज्यों की कम से कम एक भाषा सीखने का हिंदीभाषी युवाओं से आग्रह किया था। डॉ. लोहिया स्वयं बांग्ला और जर्मन सहित अनेक भाषाओं के जानकार थे। उनके अनुयायी जार्ज फर्नांडीस दस भाषाओं में भाषण देने में समर्थ थे। पामुलापति वेंकट नरसिंहराव आधा दर्जन भाषाओं के ज्ञानी थे। न कानून कहीं आड़े आता है और न किसी के अहित की आशंका है। राज्यों में वहां की भाषाओं को बढ़ावा देकर राजभाषा से संवाद बढ़ाया जा सकता है।

इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि बहुमंडलीकरण के युग में सरकारी नौकरियों की संख्या सिकुड़ेगी। इसलिए नौकरी की कमी के भय से भाषा विरोध बेमानी है। भारत से बाहर जाकर हिंदी बोलते हुए भारतीय अपना मान बढ़ाएंगे। प्रशासन में हिंदी के प्रयोग से हजारों भारतीय शब्दों का आपस में आदान-प्रदान बढ़ेगा। आवश्यकता इस बात की है कि मंत्रालयों और सरकारी विभागों के राजभाषा प्रखंड सक्रिय होकर शब्दावली को सुलभ और बोधगम्य बनाए। 14 सितम्बर को हिंदी दिवस नहीं, भारतीय भाषा मनाने वाले देश भर में मिलने लगेंगे।

प्रकाश दूबे

                (लेखक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं ।)


हिन्दीभाषी देशवासियों का प्रतिशत

देश में हिन्दी भाषी लोगों की संख्या जितनी है, उतनी अन्य किसी भाषा के लोगों की नहीं है। देश में हिन्दी या हिन्दी से जुड़ी भाषाओं के बोलने या जानने वालों की संख्या 45 प्रतिशत से अधिक है। जिन दक्षिण भारतीय राज्यों में हिन्दी का जम कर विरोध होता है, वहां अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, अक्षय कुमार, राजकुमार, राज कपूर, सलमान खान या अन्य किसी लोकप्रिय सितारे या नायिका की हिन्दी फिल्में बॉक्स आफि स पर हाउसफु ल जाती हैं।

वैसे हिन्दी को अधिकारिक भाषा बनने देने के रास्ते में रूकावट खड़ी करने में सरकारी बाबुओं का भी बड़ा हाथ है। सरकार में प्रयोग की जाने वाली हिन्दी की वर्तनी और शैली में आम आदमी द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी में काफी अन्तर है। एक बार रेल बजट पर बहस के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लोकसभा में भाषण दे रहीं थीं। उस वक्त वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री नहीं थीं, बल्कि लोकसभा सदस्या थीं। उन्हें बीच में टोकते हुए पिछली पंक्ति में बैठे एक सदस्य ने कहा – ‘मैडम, कृप्या हिन्दी में बोलें।’ ममता बनर्जी ने जवाब दिया – ‘भाई, मैं तो हिन्दी में ही बोल रही हूं।’ ममता बनर्जी अपना भाषण हिन्दी में ही दे रहीं थीं, बस उन्होंने अपने भाषण में हिन्दी के कुछ कठिन शब्दों का प्रयोग कर दिया था।


मोदी संयुक्त राष्ट्र में भी हिन्दी में बोलें


मोदी सरकार ने हिन्दी में काम करने को प्रोत्साहन देने के कदम वापस खींच लिए, यह कितना उचित है?

मोदी सरकार ने हिन्दी में काम करने को प्रोत्साहन देने के अपने कदम वापस नहीं खींचे हैं, बल्कि उनका स्पष्टीकरण कर दिया है। मोदी ने विदेशी मेहमानों से हिन्दी में बातचीत की। अधिकारियों से भी वह हिन्दी में ही बातचीत करते हैं। हिन्दी में काम करने को लेकर जो कानून बना है, सरकार उससे तो बाहर नहीं जा सकती। कानून में हिन्दी को सम्पर्क भाषा माना गया है। सभी भारतीय भाषाओं को बराबर का दर्जा दिया गया है। मेरा मानना है कि मोदी सरकार ने हिन्दी को लेकर जिस प्रकार का रूख अपनाया है, उससे हिन्दी का प्रचार प्रसार बढ़ेगा। मुझे तो यह पता लगा है कि अधिकारियों ने टिप्पणियां हिन्दी में लिखनी शुरू कर दी हैं।

क्या देश की आजादी के 67 सालों में हिन्दी को वह स्थान मिल पाया है, जो उसे मिलना चाहिए?

हिन्दी को राष्ट्रभाषा का जो दर्जा पहले मिला हुआ था, वही दर्जा उसे बाद में मिला रहना चाहिए था। यह मसला संविधान सभा में ही सुलझा लिया जाना चाहिए था। उस वक्त इस बारे में पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी। अब देश के विभिन्न भागों में जो राजनीतिक तत्व हैं, वे अपने निजी हितों की वजह से अपने ढंग से पेश करते हैं। यह गलती तो उसी वक्त हुई जब संविधान सभा में हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने पर विचार किया गया था। उसी वक्त हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाता तो आज यह दिक्कत सामने नहीं रहती।

हिन्दी को जब भी राष्ट्रभाषा का सम्मान देने की कोशिश की गई, तभी दक्षिण भारत में इसका जबर्दस्त विरोध किया गया….

यह सही है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का दक्षिण भारत में विरोध होता रहा है। मैं भी हिन्दी भाषी और हिन्दी का पक्षपाती हूं, लेकिन मेरा मानना है कि हिन्दी वाले भी कभी-कभी सीमा से पार चले जाते हैं। हिन्दी के विरोध में अन्य भाषाओं के लोगों को क्यों खड़ा किया जाए। हिन्दी को तो सेतुबंध का काम करना चाहिए। हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अधिकतर भाषाओं की एक ही है। दोनों ओर संतुलन रखा जाना चाहिए। इस संबंध में आत्मनियंत्रण की बहुत जरूरत है। मेरा मानना है कि हिन्दी में धीरे-धीरे प्रचार-प्रसार बढ़ेगा।

हिन्दी का जिस प्रकार से विरोध होता है, वह राजनीति प्रेरित अधिक लगता है। खासतौर पर दक्षिण भारत में जिस प्रकार से हिन्दी का विरोध होता है।

पूरे दक्षिण भारत में नहीं, बल्कि जो भी हिन्दी विरोधी आन्दोलन हुआ, वह थोड़ा बहुत तमिलनाडु में हुआ। केरल में विशेष कुछ नहीं हुआ।

मोदी सरकार ने हिन्दी को प्रोत्साहन के लिए जो कदम आगे बढ़ाए थे, वह उसे वापस लेने पड़े।

कौन-से ऐसे नए कदम थे। सरकार ने ट्वीटर पर हिन्दी में टिप्पणी करने की बात कही कि लोग हिन्दी अधिक समझते हैं, ट्वीटर पर अपनी बात हिन्दी में कहो। यदि अन्य भाषा के लोगों को उनकी भाषा में बताया जाता है, तो हिन्दी वालों को एतराज नहीं होना चाहिए।

हिन्दी का विरोध करना कितना उचित है? हिन्दी में टिप्पणी करने के लिए सरकार के निर्देशों के विरोध के लिए डीएमके नेता करूणानिधि और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता एक हो गए। जयललिता ने प्रधानमंत्री को विरोध पत्र लिख डाला।

करूणानिधि और जयललिता राजनीतिज्ञ हैं। राजनीतिज्ञ अपनी ओर से कुछ करते हैं, तो वह अलग बात है।

तो क्या हिन्दी विरोध राजनैतिक अधिक है और आम जनता हिन्दी का विरोध नहीं करती?

जनता में हिन्दी का उतना विरोध नहीं है। यह तो राजनेता ही अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस प्रकार के मुद्दों को उछालते हैं। सरकार हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए जो भी कदम उठाए, उस के प्रतिकूल परिणामों पर पहले से विचार करे और उनका निराकरण पहले सोच ले, जिससे बाद में उसे स्पष्टीकरण देने की नौबत ही न आए। स्पष्टीकरण देने के हालात पैदा होने से जनता में शक पैदा होने लगता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विदेशी राजनयिकों से हिन्दी में बात किए जाने पर आप की क्या टिप्पणी है?

यह बहुत ही सकारात्मक कदम है। इससे देश की अस्मिता की भावना प्रकट होती है। कई बार तो विदेशी खुद कहते हैं कि आपके देश की भाषा नहीं है जो आप अंग्रेजी में बात करते हैं। दुभाषिए इसी के लिए होते हैं कि एक की भाषा समझ कर दूसरे को समझाएं। मैं समझता हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी का अनुसरण मोदी कर रहे हैं। मैं चाहता हूं कि मोदी जब यूएन में बोलें तो वह हिन्दी में बोलें।

टी.एन. चतुर्वेदी, पूर्व राज्यपाल, कर्नाटक


सरकारी हिन्दी और आम हिन्दी

हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने की प्रक्रिया में गठित एक कमिटी ने शब्दकोष तैयार किया और हिन्दी के शब्दों का मानकीकरण भी किया। इसी क्रम में हिन्दी दो तरह के भागों में विभक्त हो गई। एक आम आदमी की हिन्दी और दूसरी सरकारी हिन्दी। आज भी सरकारी हिन्दी आम आदमी की समझ से परे है। हर मंत्रालय में हिन्दी विभाग है और उस विभाग का कार्य अंग्रेजी के दस्तावेजों का हिन्दी में अनुवाद करना है। उस अनुवाद के बजाय अंग्रेजी में पढ़ कर उसके मूल दस्तावेज को अधिक आसानी से समझा जा सकता है।

हिन्दी को आधुनिक तकनीक का भी सहयोग दिया जाना चाहिए। यूपीए शासन में विज्ञान भवन में आयोजित हिन्दी दिवस समारोह के आयोजन के दौरान यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने आईटी मंत्रालय के विभाग द्वारा तैयार एक ऐसी तकनीक की सीडी जारी की थी, जो अंग्रेजी के मसौदे का तुरन्त हिन्दी में अनुवाद कर देती थी।


हिन्दी को सरकारी संरक्षण की जरूरत नहीं


हिन्दी को प्रोत्साहन देने के मोदी सरकार के कदमों का विरोध किया जाना कितना उचित है?

देश में राज्यों पर हिन्दी थोपी नहीं जा सकती। हिन्दी के विरोध में दक्षिण भारत में आन्दोलन हुए थे। अभी ये निर्देश जारी किए ही गए थे कि सोशल मीडिया पर हिन्दी में अपनी बात रखी जाए तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और करूणानिधि उसके विरोध में एक हो गए। वे लोग इस मुद्दे पर बहुत ही संवेदनशील हैं। मोदी सरकार के निर्देशों मे कहीं कोई ऐसा मतलब बिल्कुल भी नहीं था कि हिन्दी थोपने की कोशिश की जा रही है। इन निर्देशों में केवल इतना था कि सोशल मीडिया पर जो भी अपनी बात रखी जाएं, वह हिन्दी में रखी जाएं और जो जरूरी हो, उसे अंग्रेजी में भी बता दिया जाए। इसमें हिन्दी को थोपने की कोई बात ही नहीं थी। इस का इतना विरोध होना नहीं चाहिए था, लेकिन जिस प्रकार से विरोध हुआ उससे यह पता लगता है कि इस मुद्दे को लेकर दक्षिण भारत के राज्य कितने संवेदनशील हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी विरोध किया है। हिन्दी तो अपनी ताकत से स्वत: बढ़ेगी। वह सरकार के थोपने से नहीं बढ़ेगी।

क्या हिन्दी राजनीतिक षड्यन्त्र की शिकार नहीं हो रही है?

हिन्दी की लड़ाई को राज्य के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। हिन्दी तो उससे बहुत दूर निकल आई है। देश की सरकार उसे मान्यता देने की स्थिति में नहीं है। मोदी सरकार बहुमत की सरकार है, लेकिन वह भी इस दिशा में कुछ खास नहीं कर सकती। उसे भी अपने छोटे से कदम का भी स्पष्टीकरण देना पड़ा। हिन्दी को षड्यन्त्र की शिकार नहीं कहना चाहिए। हिन्दी की अपनी ताकत है, जिससे वह आगे बढ़ेगी। आज वह व्यापार की, फिल्मों की, मनोरंजन की भाषा है। पूरे भारत में हिन्दी सम्पर्क की भाषा है। दक्षिण में भी, जहां सबसे अधिक विरोध है, वहां भी जब हिन्दी में बोलते हैं तो लोग समझ जाते हैं। हिन्दी को यदि राजभाषा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा भी बनाना है तो सभी राज्यों की सरकारों को साथ लेना जरूरी होगा। जब तक सभी राज्यों की सरकारें साथ नहीं होंगी, तब तक हिन्दी को कोई सरकार राष्ट्रभाषा नहीं बनवा सकती। राष्ट्रभाषा बनाने का अर्थ है, हिन्दी को राष्ट्र से मान्यता मिल जाए। हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए उसे राष्ट्र से मान्यता की जरूरत नहीं है। वह अपनी ताकत से खुद आगे बढ़ेगी। एक दिन ऐसा आ सकता है कि वह उस स्थान पर पहुंच जाए कि सब लोग उसे स्वीकार करें। हिन्दी को लेकर अभी भारत में सर्वानुमति नहीं है। हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषाएं भी फलें-फूलें, इसी में हिन्दी का भी सम्मान है। इसी से हिन्दी को भी ताकत मिल सकती है। अब तो अंग्रेजी ही ग्लोबल भाषा बन गई है। चीन जैसा देश भी अंग्रेजी की तरफ जा रहा है। वह भी एक प्रक्रिया है, जिससे भारत खुद को विमुख नहीं कर सकता। हिन्दी अपने आप आगे बढ़ रही है, और आगे बढ़ती रहेगी। जमीनी स्तर पर मीडिया, व्यापार, फिल्मों की वजह से हिन्दी अपने आप में मजबूत हो रही है। यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण नहीं है कि सरकारी कामकाज में हिन्दी का कितना उपयोग होता है। यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है कि हिन्दी के लेखक की पुस्तकें तीन सौ से ग्यारह सौ प्रतियों तक छपती हैं। उसकी पुस्तकें बिकती नहीं हैं। हिन्दी के पत्र-पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। अभी समाचार पत्र बढ़ रहे हैं। लेकिन एक वक्त आ सकता है जब समाचार पत्र छपने कम हो जाएं। अमेरिका-यूरोप में ऐसा हो रहा है। न्यू मीडिया आगे आएगा। न्यू मीडिया की भाषा अभी अंग्रेजी है, लेकिन हिन्दी भी तेजी से बढ़ रही है और अपनी जड़ें जमा रही है। हिन्दी को स्वत: फलने-फूलने देना चाहिए।

मोदी अंग्रेजी जानते हैं, फिर भी विदेशी राजनयिकों से हिन्दी में बात करते हैं। उन्होंने भविष्य में भी ऐसा ही करने का फैसला किया है। संभव है वाजपेयी के बाद अब मोदी यू.एन. में हिन्दी में भाषण दें।

हिन्दी के लिए यह बहुत ही सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह केवल एक प्रतीकात्मक संकेत बन कर नहीं रह जाना चाहिए। वाजपेयीजी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में भाषण दिया था, लेकिन वह एक प्रतीकात्मक भाषण बन कर रह गया। उसकी गूंज-अनुगूंज कहीं सुनाई नहीं दी। मोदी का विदेशी राजनयिकों से हिन्दी में बात करना बहुत प्रशंसनीय है। उन्हें इसे आगे भी जारी रखना चाहिए। लेकिन देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशी राजनयिकों से तो हिन्दी में बात करेंगे, लेकिन मोदी जयललिता या करूणानिधि से कैसे बात करेंगे। मोदी का हिन्दी में उनसे बात करना क्या वह पसंद करेंगी? उनके साथ भी क्या मोदी दुभाषिए के जरिए हिन्दी में ही बात करेंगे या उनसे अंग्रेजी में बात करेंगे?

 

– मधुसूदन आनन्द, वरिष्ठ विश्लेषक एवं नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक


लेकिन वह तकनीक कहीं ठंडे बस्ते में पड़ी अपनी किस्मत को रो रही होगी। कुछ ऐसी तकनीक जरूर आई है, जो शब्दकोष का काम देती है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी में टाइप करने से उससे हिन्दी में शब्द लिखे जा सकते हैं।

किसी भी भाषा का ज्ञान रखना और उसका उपयोग करना बहुत अच्छा है, लेकिन देश की अपनी एक आधिकारिक भाषा होनी चाहिए, जिसे हर देशवासी गर्व से अपनी भाषा कह सके। यह आवश्यक नहीं कि वह मातृभाषा ही हो, लेकिन अपने देश की भाषा हो।

वास्तव में हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसका हृदय बहुत विशाल है। इसने अन्य भाषाओं के शब्दों को भी इस प्रकार आत्मसात किया है, जैसे वे हिन्दी के ही शब्द हों। यहां तक कि हिंदी ने स्कूल, स्टेशन, पैन, ट्रेन जैसे बहुत सारे अंग्रेजी के शब्दों को भी अपना लिया है। ऐसा लगता ही नहीं जैसे वे अंग्रेजी के शब्द हों। हिन्दी का यह गुण कि जो उच्चारित करो, उसे लिख सको, हिन्दी की विशालता का बढ़ा देता है। इसीलिए हिन्दी देश में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। सियासी चश्मा उतार कर देखा जाए तो हिन्दी ही ऐसी एकमात्र भाषा है जिसे आधिकारिक भाषा बनाया जा सकता है।

श्रीकान्त शर्मा

 

 

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