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इंसानियत का फैसला

जानवरों के प्रति होने वाली किसी भी रूप में क्रूरता को कड़े शब्दों में भत्र्सना किए जाने की आवश्यकता है। जानवरों के प्रति ङ्क्षहसा वाली क्रूर प्रथाएं निश्चित रूप से बंद होनी चाहिए और इसमें शामिल लोगों पर न सिर्फ जुर्माना लगाया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें कारावास की सजा भी होनी चाहिए। जानवरों के प्रति किसी भी तरह की हिंसा के लिए ‘जीरो टोलरेंस की नीति होनी चाहिए।

इस पृष्ठभूमि में यह उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960’ का हवाला देते हुए 7 मई 2014 को ‘जल्लीकट्टू दौड़’ पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके पहले भी, सुप्रीम कोर्ट ने इस दौड़ को 2008 में निषिद्ध किया था, लेकिन उसी दिन इसे रद्द भी कर दिया। लेकिन इस बार इसे लागू किया गया है। 2010 में कोर्ट ने अभिव्यक्ति की शर्त पर कानून के दायरे में जल्लीकट्टू को आयोजित करने की अनुमति दी थी।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा अप्रैल 2014 में बैल को प्रदर्शन करने वाले जानवरों की सूची से हटा लेने के बाद इस खेल को प्रतिबंधित करने के बीच आने वाली बाधाएं हट गईं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आगे बढ़ते हुए इस विवादित खेल को खत्म कर दिया। ऐसे किसी भी क्रूर कृत्य में संलिप्तता को जिससे जानवरों को भारी दर्द और नुकसान होता है किसी भी परिस्थिति में जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

शब्द जल्लीकट्टू दो शब्दों – जल्ली या सल्ली, जिसका अर्थ सिक्का है और कट्टू, जिसका अर्थ बांधना है, से बना है। पहले बैल के सिंगों पर सिक्कों की एक छोटी-सी थैली बांधने का रिवाज था और प्रतियोगी बैलों के सिंगों पर बंधी थैली को हथियाने की कोशिश करते थे। शुरूआती दौर में विजेता को उस जगह प्रसिद्धि मिलती थी, जहां इस प्रतियोगिता का आयोजन होता था। इस दौरान समारोह में उपस्थित महिलाएं अपने लिए वर का चुनाव करतीं थीं। लेकिन अब, इस परंपरा का मूल्य काफी गिर चुका है और विजेता को कम मूल्य के उपहार जैसे, कुर्सी, बैग, कुर्ता या साईकिल दे दी जाती है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस तरह की क्रूर प्रथा, जो कि लगभग 4 हजार वर्ष पुरानी है, लोगों के बीच हानिरहित खेल के रूप में मान्य है। तमिलनाडु के ग्रामीण कहते हैं कि यह एक हानिरहित खेल है, जिसमें हथियाररहित खिलाड़ी उग्र बैल को 10 सेकेण्ड तक या 50 फीट दूर अंतिम पंक्ति के पार पहुंचने तक पकड़े रहने की कोशिश करता है। यदि खिलाड़ी बैल द्वारा दूर नहीं फेंका जाता, तब उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है, लेकिन खिलाड़ी बैल के सिंग को पकड़े रहने में असमर्थ रहता है तो बैल को विजेता घोषित कर दिया जाता है।

पशु कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पशुओं के साथ कई तरह के क्रूर व्यवहार किए जाते हैं, जैसे – कान काट देना, पीटना या चाकू से जख्मी करना। यह भयानक और पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह न सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित करने योग्य है क्योंकि इससे बैल को बेहद कष्ट होता है, बल्कि यह आदमी को अमानवीय भी बनाता है और आत्मसुरक्षा की दृष्टि से भी खतरनाक है। दुश्मन के रूप में सभी अजनबियों पर हमला करने के लिए बैल को दिया जाने वाला प्रशिक्षण भी बेहद खतरनाक है। इससे यह भी प्रतिबिंबित होता है कि हम मनुष्य वास्तव में कर क्या रहे हैं।

जो सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है, वह यह है कि डीएमके जैसी बड़ी पार्टियां इन खेलों में हिस्सा लेती हैं। डीएमके प्रमुख करूणानिधि ने यहां तक कह दिया कि लोगों की भावनाओं को समझते हुए राज्य सरकार को इस खेल को जारी रखने के लिए कोर्ट से संपर्क में रहना चाहिए। लेकिन, लोगों की भावनाओं को जानवरों के प्रति हो रहे क्रूरता के प्रति न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। लोगों की भावनाओं को पशुओं को निर्दयता से पीटने, उनके शरीर में चाकू घोंपने या पूंछ को मरोडऩे या उनके आंख और नाक में लाल मिर्च को डालने को न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

संजीव सिरोही

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