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भारतीय रेल का महाबाजार

रेल के लिए नए सिरे से विचार करने की दरकार है। यह सुनकर कानों को सुहाना लगता है कि 300 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली बुलेट ट्रेन की योजना बनाई जा रही है, लेकिन ‘आम आदमी’ के दुखों को भुला दिया जाता है जो हर रोज यात्रा के दौरान परेशानी झेलता है। उसे तो बस सुरक्षित और साफ-सुथरी यात्रा ही चाहिए ।

आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर जब 7 अक्टूबर 1858 को अपनी बेगमों और बच गए दो बेटों और कुछ कारिंदों के साथ बर्मा में लंबे निर्वासन के लिए बैलगाड़ी में बैठकर दिल्ली से रवाना हो रहे थे, तो उन्हें दिल्ली से कुछ ही दूरी पर रेल पटरियां बिछाने का काम चलता दिखा था। यह अंग्रेजों की भारतीय राजधानी दिल्ली से कोलकाता को जोडऩे के लिए पटरी बिछायी जा रही थी। भारत में रेल का काम पांच साल पहले ही शुरू हुआ था। अब करीब 165 साल बाद करीब 53,000 किलोमीटर का यह रेल तंत्र देश को ऐसे जोड़ता है जो पहले कभी नहीं था। इससे दूरदराज के तटीय और पर्वतीय इलाकों से लेकर संसाधनों की आवाजाही भी दुनिया भर में संभव हो पाई है। भारतीय रेल दुनिया में चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है। इसकी लंबाई करीब 64,000 कि.मी. है और हर रोज करीब 12,000 यात्री गाडिय़ां तथा 7,000 मालगाडिय़ां करीब 2.5 करोड़ लोगों को और करीब 26.5 लाख टन माल ढ़ोती हैं। इसमें दुनिया के सबसे ज्यादा 13.6 लाख कर्मचारी हैं। यही एकमात्र ऐसा सरकारी उपक्रम है जिसका बजट अलग से पेश होता है।

अपने विशाल आकार और फैलाव के बावजूद भारतीय रेल का राजस्व देश के जीडीपी में 1.5 प्रतिशत से भी कम का योगदान देता है। दूसरी तरफ देश पर इसके इंतजामात का बोझ जीडीपी के करीब 13 प्रतिशत बैठता है जो यूरोप और अमेरिका के करीब 10 प्रतिशत से काफी अधिक है। यही नहीं, यात्री किराया देश पर भारी बोझ डालता है। भारत में रेल किराया सबसे सस्ता है, चीन में यह पांच गुना महंगा है।

हमारा रेल नेटवर्क इस दौरान कितनी प्रगति कर पाया है इसकी एक मिसाल देखिए. भारत में पहली ट्रेन ने 16 अप्रैल 1853 को 400 यात्रियों के साथ बंबई से थाणे के बीच 34 कि.मी. की यात्रा 28 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से करीब 75 मिनट में तय की। अब 161 साल बाद मुंबई में धीमी ट्रेन की गति 50 कि.मी. प्रति घंटे ही है। यहां तक कि हमारी बहुचर्चित शताब्दी ट्रेनों की रफ्तार भी यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले ही हासिल कर ली गई थी। बर्लिन-हैम्बर्ग सेवा की शुरुआत 1933 में औसतन 124 कि.मी. प्रति घंटे रफ्तार के साथ शुरू हुई। इसकी अधिकतम गति 164 कि.मी. प्रति घंटे की थी। जो आज 80 साल बाद भी किसी भी भारतीय ट्रेन से ज्यादा रफ्तार है।

पिछले दशक में रेलवे की लागत, ईंधन और कर्मचारियों पर खर्च समेत करीब 100 प्रतिशत बढ़ गई है, जबकि माल भाड़े में वृद्धि सिर्फ 35-40 प्रतिशत और यात्री किराए में 25 प्रतिशत (ताजा बढ़ोतरी को जेाड़कर) ही बढ़ोतरी हुई है। भारतीय रेल इसी तरह यात्रियों पर पैसे गंवाती है और माल ढुलाई में पैसा बनाती है। लिहाजा, भारतीय रेल में यात्रा तो सस्ती है, लेकिन वह माल की ढुलाई महंगी करती है। भारत में मालगाड़ी आज भी 25 कि.मी. की रफ्तार से रेंगती है। इससे उसकी स्पर्धा की क्षमता घट जाती है। फिर माल डिब्बों की भारी कमी है। लिहाजा, रेल को पूंजी निवेश की जरूरत है, जिसके लिए रेल मंत्रालय फंड की व्यवस्था नहीं कर पाता। पेट्रोलियम, तेल, लौह-अयस्क जैसे भारी सामान की ढुलाई के लिए अब दूसरे परिवहन की ओर रुख किया जा रहा है। जाहिर है, रेल को ज्यादा और तेज ढुलाई की दरकार है। इसके अलावा भारी बोझ वहन की क्षमता के काबिल रेल पटरियों को भी बदलने की जरूरत है।

फिलहाल रेलवे में नई लाइन बिछाने, अमान परिवर्तन, बिजलीकरण और दोहरीकरण के 347 परियोजनाएं चल रही हैं। इसमें करीब 1.50 लाख करोड़ खर्च होंगे। लेकिन पैसे की तंगी से रेलवे ज्यादातर परियोजनाओं को रोक देने को मजबूर हुई है। इसी तरह उत्पादन और शोध तथा विकास का काम भी रुका हुआ है। आदर्श स्थिति में भारत में सिग्नल, ईंजन को कोच निर्माण का दुनिया में सबसे बेहतरीन कारखाना होना चाहिए था, लेकिन लगभग हर तकनीक का आयात किया जाता है। दिल्ली मेट्रो के लिए हमें ईंजन और कोच विदेश से मंगाना पड़ रहा है।

रेल के लिए नए सिरे से विचार करने की दरकार है। यह सुनकर कानों को सुहाना लगता है कि 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली बुलेट ट्रेन की योजना बनाई जा रही है, लेकिन ‘आम आदमी’ के दुखों को भुला दिया जाता है जो हर रोज यात्रा के दौरान परेशानी झेलता है। उसे तो बस सुरक्षित और साफ-सुथरी यात्रा ही चाहिए। लगभग एक सदी पहले महात्मा गांधी ने सितंबर 1917 की एक यात्रा का जिक्र इस तरह से किया है : “पूरी यात्रा में एक बार भी डिब्बे में सफाई नहीं हुई। शौचालय की भी सफाई नहीं हुई। टंकी में पानी नहीं था। वापसी की यात्रा भी वैसी ही थी। डिब्बा एकदम गंदा दिखता था..उसमें कीड़ों की भरमार थी।” क्या आज भी हालात इससे बेहतर हैं। आज ज्यादातर ट्रेनों में यात्रा दु:स्वप्र जैसी ही होती है। दूसरे दर्जे के आरक्षित डिब्बे में पानी नहीं होता और शौचालय से बदबू बेइंतहा आती है। हर स्टेशन पर बेइंतहा भीड़ उसमें घुस आती है। राजधानी, शताब्दी और दूरंतो को छोड़कर बाकी गाडिय़ों में सुविधाओं की बात तो दूर सुरक्षित यात्रा भी संभव नहीं रह गई है।

भारतीय रेल की सबसे तेज गाडिय़ों की रफ्तार भी चीन, जापान या फ्रांस की औसत गाडिय़ों के बराबर नहीं है। वहां ऐसी रफ्तार कई दशक पहले हासिल की जा चुकी है। भारत की सबसे तेज गाड़ी 150 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, जबकि चीन की गाडिय़ां 300 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं। अब तो बीजिंग से गुआंगजो की 2,298 कि.मी. की यात्रा पर हर रोज 300 गाडिय़ां इसी रफ्तार से दौड़ती हैं। फ्रांस में तो 574 कि.मी. प्रति घंटे रफ्तार से चलने वाले ईंजन का परीक्षण चल रहा है।

रेलवे स्टेशनों की दशा दयनीय है। अजीब विडंबना है कि भारतीय हवाई अड्डे दिन प्रति दिन बेहतर होते जा रहे हैं और हमारे राजमार्ग दुनिया में होड़ लेने लायक बनते जा रहे हैं जबकि हमारे रेलवे स्टेशनों की दशा आज भी नहीं बदली है। स्टेशनों पर आदमी से कुत्ते, बिल्ली और यहां तक कि चुहे भी होड़ करते दिखते हैं। एक ही प्लेटफॉर्म पर आने-जाने वाले यात्रियों, हॉकरों, कूड़ा-कचरा, भिखारियों, यहां तक कि जेबकतरों और अपराधियों की भागम-भाग मची रहती है। और अगर कोई ट्रेन देर से आई और अगली ट्रेन के यात्री भी उसी प्लेटफॉर्म पर आ जाएं तो हालात नरक से बदतर हो जाते हैं।

इसकी कोई वजह नहीं बताई जा सकती कि क्यों भारतीय रेल ओएनजीसी, एनटीपीसी या इंडियन ऑयल जैसे सार्वजनिक उपक्रम की शक्ल नहीं ले सकते। क्या इंतजार यह है कि रेल की दशा भी एअर इंडिया जैसी हो जाए? अगर रेल की हालत एअर इंडिया जैसी नहीं हुई है तो उसकी एकमात्र वजह यह है कि उसे कहीं से खास होड़ नहीं मिल रही है। बेशक, सरकार के किसी विभाग की तरह रेल को चलाना बंद करना चाहिए। उसे मंत्री और रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के साम्राज्य की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए। हर रेल संभाग को स्वतंत्र मुनाफा केंद्र में बदल देना चाहिए और रेलवे को अपनी मूल क्षमताओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि पानी से लेकर सब कुछ खुद करने की पुरानी मानसिकता छोडऩी चाहिए।

नेताओं के हाथ में रेलवे कामधेनु गाय की तरह बन गई है। वे इसका मनचाहा इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए करते हैं। पिछले दशक में चार रेल मंत्रियों ने हर बजट में 46 से 105 तक नई ट्रेनें चलाने की घोषणा की। कई ट्रेनों के फेरे बढ़ाए गए और कुछ का विस्तार किया गया। विडंबना देखिए कि लालू प्रसाद के दौर में रेल में कुछ अहम प्रगति देखी गई। इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि वे बिहार की राजनीति में इतने उलझे रहे कि रेल की ओर ध्यान देने का उनके पास

समय ही नहीं था। वे ज्यादातर पटना में रहे और अधिकारियों को दिल्ली में रेल का मामला देखने को कहते रहे। तो, राजनीति का हस्तक्षेप न रहने से अधिकारियों ने चमत्कार कर दिखाया।


यह कठिन और कष्टप्रद, लेकिन जरूरी फैसला था”–सदानंद गौड़ा


रेल किराया और माल-भाड़ा बढ़ोतरी को रेल मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा “असामान्य स्थितियों में असाधारण उपाय’ बताते हैं और कहते हैं कि “कठिन हालात का मुकाबला नरमी से संभव नहीं है।” हालांकि वे वादा करते हैं कि “ताजा किराया और माल-भाड़ा वृद्धि का एक-एक पैसा रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने और यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा में इजाफे के लिए खर्च किया जाएगा।” सोमवार को बंगलुरु से दिल्ली रवाना होने के पहले रेल मंत्री ने उदय इंडिया के विशेष संवाददाता एस.ए. हेमंत कुमार से इस बारे में विस्तार से बात की। बातचीत के कुछ अंश:

क्या यह (रेल किराया बढ़ोतरी)बजट में ही नहीं की जा सकती थी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा नीत एनडीए सरकार की रेल के इंफ्रास्ट्रक्चर और यात्रियों की सुरक्षा तथा सुविधाओं में ठोस, सार्थक विकास की सुनियोजित योजना है। इसे आप रेल बजट में देख पाएंगे। लेकिन इसके पहले हमें रेलवे की वित्तीय हालत का जायजा लेना था, जो उत्साहवद्र्धक नहीं है। इसलिए हमें उस पर अमल करना पड़ा जिसका फैसला पूर्व यूपीए सरकार कर चुकी थी। एक मायने में यह बोझ हमारे सिर आ गया। यह तलवार की धार पर चलने जैसी स्थिति है। यह कठिन और कष्टप्रद, लेकिन जरूरी फैसला था। लेकिन हम बढ़े हुए किराए का इस्तेमाल आम आदमी के हक में करेंगे।

लेकिन पूर्व रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा कि रेलवे के पास 7,000 करोड़ को सरप्लस फंड है?

मैं अपने पूर्ववर्ती मंत्री के साथ वाद विवाद में नहीं जाना चाहता। रेल बजट में सब कुद साफ हो जाएगा। अपने कांग्रेस के दोस्तों से मैं पूरी विनम्रता से कहना चाहता हूं कि वे लोगों को झांसा देने की कला में माहिर थे। रेल बजट में सब दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। बस कुछ दिन इंतजार कीजिए।

 

लेकिन क्या यह आम आदमी पर बोझ नहीं है? जरूरी जिंसों के दाम पहले ही आसमान छू रहे हैं…

मैं मानता हूं कि इससे अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन मुझे यह भी एहसास है कि जागरूक आम आदमी समझेगा कि “असामान्य मर्ज का इलाज असाधारण ही होता है।” यह कड़वी दवा है, मैं यह मानता हूं लेकिन यह रेलवे के मर्ज को देखते हुए जरूरी भी है। आप बुखार से तप रहे किसी आदमी को गुलाब जामुन या रसगुल्ला नहीं खिलाएंगे। मुझे पूरा यकीन है कि जब मैं बजट में सुरक्षित और सुविधाजनक रेल यात्रा का ऐलान करूंगा तो लोग इस मजबूरी को समझेंगे।

प्रधानमंत्री ने विश्व स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर वाले 100 शहर बनाने और विभिन्न शहरों के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की बात की है। आप इंफ्रास्ट्रक्चर में इजाफे के लिए फंड का इंतजाम कैसे करेंगे?

मैं बजट की बातें अभी नहीं बताऊंगा लेकिन उसमें रेलवे को सुरक्षा और सुविधा के मामले में विश्व स्तरीय बनाने की अल्पकालिक और दीर्घावधिक योजनाएं होंगी। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार की भी बातें होंगी। संसाधनों को तय करने का मामला भी बजट का हिस्सा है जिसे अभी नहीं बताया जा सकता। लेकिन मैं प्रधानमंत्री के बुलेट ट्रेन और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के सपने को साकार करने के प्रति प्रतिबद्ध हूं।

रेलवे के इंफ्रासट्रक्चर में विकास और बुलेट ट्रेन के लिए राज्यों के भरपूर सहयोग की दरकार होगी। आप इस मुद्दे से कैसे निपटेंगे?

मैं मानता हूं कि केंद्र को राज्यों के सहयोग की दरकार होगी मैं इस बारे में मुख्यमंत्रियों से बात करूंगा। हम राज्य सरकारों से बात करके उनकी प्राथमिकता तय करेंगे। हम राज्य की जरूरतों पर ध्यान देंगे, न कि उन पर कुछ थोपेंगे। मैं प्रधानमंत्री के सपने और राज्यों की जरूरतों में तालमेल बिठाऊंगा। मुझे यकीन है कि हम इसे हासिल कर लेंगे।

कर्नाटक के लिए आपकी योजनाएं क्या हैं?

मेरी राज्य सरकार में निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों से एक दौर की बातचीत हो चुकी है। मैं रेलवे इंफ्रास्ट्रक् चर कमेटी के प्रमुख तथा कर्नाटक विधान परिषद के अध्यक्ष डी.एच. शंकरमूर्ति से बातचीत के लिए मिलने वाला हूं।

मैं मुख्यमंत्री और दूसरों से बात करके राज्य की प्राथमिकताओं को तय करना चाहता हूं। मैं रेलवे का पूरे देश में विकास को ध्यान में रखकर कर्नाटक के लिए भी योगदान करना चाहता हूं। राज्यों की जरूरतों पर अमल करते हुए मेरा नारा होगा, “सबको समान न्याय, तुष्टीकरण और भेदभाव किसी के साथ नहीं।”


रेलवे में भारी निवेश की दरकार है और निजी क्षेत्र को उसके सुधार में योगदान देने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। रेल ईंजन और वैगन के निर्माण में एफडीआई को बुलावा देना चाहिए।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले की बात करने के कुछ ही दिन बाद रेल किराया और माल भाड़े में इजाफ ा कर दिया। रेल मंत्री ने एक लाइन में इसकी सफाई दी कि वे पूर्ववर्ती सरकार के फैसलों पर अमल करने को ‘मजबूर’ हुए, मानो सरकार ऐसा अलोकप्रिय फैसला लेकर आंसू बहा रही है। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय रेलवे को पटरी पर लाने के लिए किराए में बढ़ोतरी जरूरी थी। अब मोदी को जिम्मेदारी लेकर रेलवे में सुधारों को आगे बढ़ाना चाहिए। सरकार को गठबंधन धर्म के नाम पर सार्वजनिक सेवा देने की अपनी भूमिका से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। गाडिय़ां बढ़ाने पर पाबंदी लगाकर मौजूदा सेवाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

रेलवे को अब इस पर ध्यान देना चाहिए कि दुर्घटनाएं न हों और सुरक्षा को प्राथमिकता मिले। रेल और प्लेटफ फॉर्म पर साफ-सफ ाई पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ट्रेन और प्लेटफ फॉर्म के शौचालयों की दुर्दशा बेहिसाब है और खासकर महिला यात्रियों को बेहद असुविधा का सामना करना पड़ता है। रेलवे पुलिस की लापरवाहियों पर भी अंकुश लगनी चाहिए। पुलिस तो यात्रियों की शिकायतें सुनती ही नहीं। यात्रियों को परेशान करने की भी शिकायतें हैं। रेल पुलिस ट्रेन में डकैतियों और चोरी की रोकथाम में भी अक्षम है।

इसमें दो राय नहीं कि राकेश मोहन कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक रेलवे का या तो निजीकरण किया जाना चाहिए या उसे कॉरपोरेट ढंग से चलाया जाना चाहिए। रेलवे टिकट की व्यवस्था भी सुधारी जानी चाहिए। किसी आपात स्थिति में टिकट लेना आज जैसे मुश्किल नहीं होना चाहिए। लोग तत्काल टिकट खिड़कियों पर खड़े होते हैं और आईआरसीटीसी की वेबसाइट खंगालते रहते हैं, लेकिन टिकट बमुश्किल ही मिलती है। दो महीने पहले टिकट बुकिंग से भी खास लाभ नहीं मिलता।

रेलवे की प्रशासकीय व्यवस्था में असंतुलन भी चिंता का विषय है। भारतीय रेल दुनिया में ऐसा अनोखा संगठन है, जिसके पास अपने मेडिकल, सुरक्षा और उत्पादन के संस्थान हैं। इससे प्रशासकीय खर्च बेहिसाब बढ़ जाता है। यहां 60,000 सुरक्षाकर्मी और 57,000 मेडिकल स्टाफ हैं, जो 36,000 ड्राईवरों से काफी ज्यादा है। इसके अलावा 44,000 लोग रेलवे की उत्पादन इकाइयों में लगे हैं।

नंदन नीलकेणि ने अपनी किताब ‘इमैजिनिंग इंडिया’ में लिखा है – “जब मैं रेल मंत्रालय में सुधीर कुमार से मिलने गया तो मैं यह देखकर हैरान रह गया कि उनका ज्यादातर समय अफसरशाही को आलस्य से जगाने और रेलवे के नियम वगैरह ही तय करने में जा रहा है। उन्होंने बताया कि वे रेल म्यूजियम देखने गए तो पाया कि 1922 के रेल ट्रैक वनज के उपकरण और माप आज भी लगे हैं और वही मानक आज भी रेल में चलता है।”

सामान्य फेरबदल, अचानक नीतियों में बदलाव और जैसे-तैसे चलाए रहने की मानसिकता सिर्फ इस महान क्षमताओं वाली संस्था को और बर्बाद ही करेंगे। और देश के आम आदमी का सबसे ज्यादा अहित इसी से होता है। इसलिए ‘कुछ नहीं हो सकता’ और ‘रेलवे इतनी बड़ी है कि बदलाव आसान नहीं’ जैसे रवैए छोडऩे होंगे। अगर ई. श्रीधरन देश में विश्वस्तरीय मेट्रो रेल भारतीय रेल के ही इंजीनियरों को साथ लेकर बना सकते हैं तो इससे यही जाहिर होता है कि मामला क्षमता का नहीं, बल्कि प्रबंधन संस्कृति और इरादे का है। अगर सुधार का इरादा हो तो बहुत कुछ बदल सकता है। मतलब यह कि भारतीय रेल को एक स्वप्नद्रष्टा और ऐसे सपने की दरकार है जो औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर दुनिया में होड़ लेने लायक विश्वस्तरीय परिवहन व्यवस्था की स्थापना कर सके।

अनिल धीर

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